बांग्लादेश चुनाव में भारत फैक्टर और शेख हसीना का नई दिल्ली कनेक्शन

भारत बांग्लादेश संबंध

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    • Author, शुभज्योति घोष
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़ बांग्ला, दिल्ली

बांग्लादेश में चुनावी मौसम आते ही जिस पड़ोसी देश की प्रत्यक्ष या परोक्ष भूमिका की सबसे ज्यादा चर्चा होती है वह बेशक भारत है.

विभिन्न राजनीतिक दलों के चुनाव प्रचार के दौरान घुमा-फिराकर भारत फैक्टर का जिक्र होता है. इसी तरह इस मुद्दे पर अटकलों का अंबार लग जाता है कि भारत बांग्लादेश के चुनाव में क्या चाहता है.

इस बार का चुनाव भी अपवाद नहीं है. विपक्षी दल बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के एक शीर्ष नेता ने तो सार्वजनिक रूप से यह आरोप भी लगाया है कि दरअसल दिल्ली ने बांग्लादेश के नागरिकों का (लोकतांत्रिक) भाग्य छीन लिया है.

बांग्लादेश में ये मानने वालों की कमी नहीं है कि लगातार दो बार सवालों से घिरे संसदीय चुनाव कराने के बावजूद शेख हसीना सरकार जिस तरह लगातार 15 वर्षों से सत्ता में है, ऐसा भारत के सक्रिय समर्थन और सहयोग के बिना किसी हालत में संभव नहीं होता. ऐसे लोग सार्वजनिक रूप से भी यह बात कहते रहे हैं.

दूसरी ओर, सत्तारूढ़ पार्टी या गठबंधन के नेताओं और मंत्रियों को अक्सर ताकतवर पड़ोसी भारत के प्रत्यक्ष समर्थन के लिए उसकी प्रशंसा करते भी देखा-सुना जाता रहा है.

'बांग्लादेश का लोकतांत्रिक भविष्य'

वीडियो कैप्शन, बांग्लादेश में इतने विरोध प्रदर्शन क्यों हो रहे हैं?

एक उम्मीदवार और पूर्व सांसद ने हाल में एक सरकारी अधिकारी को धमकी देते हुए कहा है, "यह याद रखें कि मैं शेख हसीना का यानी भारत का उम्मीदवार हूं."

टेलीफोन पर उनकी इस बातचीत के ऑडियो क्लिप के लीक होकर वायरल होने के बाद इस पर बहस तेज हो गई है. ऐसे अनगिनत उदाहरण मौजूद हैं.

भारत ने हालांकि औपचारिक रूप से कभी इस बात को स्वीकार नहीं किया है कि पड़ोसी बांग्लादेश के चुनाव में उसकी कोई 'भूमिका' रही है या वह उसमें 'हस्तक्षेप' करता है.

भारत की आधिकारिक तौर पर घोषित नीति यह रही है कि बांग्लादेश का लोकतांत्रिक भविष्य तय करने का अधिकार सिर्फ वहां के नागरिकों को ही है.

लेकिन दिल्ली में अनौपचारिक बातचीत में सरकारी अधिकारी, कूटनीतिज्ञ और विश्लेषक यह बात मानते हैं कि दुनिया के तमाम देश चाहते हैं कि उनके पड़ोस में मित्र सरकार रहे और भारत भी इसका अपवाद नहीं है. भारत भी चाहता है कि बांग्लादेश में एक ऐसी सरकार सत्ता में आए जिसके साथ काम करने में सहूलियत हो और संपर्क भी सामान्य रहे.

भारत बांग्लादेश संबंध

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लेकिन बांग्लादेश में इस बात पर कम अटकलें नहीं लगती हैं कि ढाका में एक मित्र सरकार को सत्ता में देखने के लिए दिल्ली ने किस हद तक सक्रियता दिखाई है.

बांग्लादेश के कई कूटनीतिज्ञ और पर्यवेक्षक मानते हैं कि दिल्ली की यह सक्रियता कुछ हद तक सार्वजनिक है, लेकिन ज्यादातर परदे के पीछे हैं.

इस रिपोर्ट में हमने वर्ष 2008, 2014 और 2019 में हुए बांग्लादेश के संसदीय चुनावों में भारत की उस कथित भूमिका की चर्चा की है.

उन चुनावों में भारत का रवैया कैसा रहा था, उसने क्या बयान दिए थे और चुनावी नतीजों के बाद कैसी प्रतिक्रिया दी थी, उसी का जिक्र इस रिपोर्ट में किया गया है.

29 दिसंबर, 2008

वीडियो कैप्शन, युक्त राष्ट्र के मुताबिक हाल के महीनों में बांग्लादेश में 76 लोग "लापता" हो गए हैं.

बांग्लादेश के पिछले तीन संसदीय चुनावों में यही सबसे कम विवादास्पद था. बीएनपी ने इस चुनाव में 30 सीटें जीती थी.

उसके बाद उसने चुनावी प्रक्रिया में जालसाजी के आरोप लगाए थे, लेकिन उसके आरोपों को कोई तवज्जो नहीं मिली थी.

बांग्लादेश का वह चुनाव सेना के समर्थन वाली कार्यवाहक सरकार की देख-रेख में हुआ था. वह चुनाव से दो साल पहले 'वन इलेवन' के जरिए सत्ता में आ कर देश चला रही थी.

लेकिन उस समय देश के दोनों प्रमुख दलों, अवामी लीग और बीएनपी की दो शीर्ष नेताओं क्रमशः शेख हसीना औऱ खालिदा जिया को सक्रिय राजनीति से दूर करने की कोशिशें भी कम नहीं हुईं.

हालांकि बाद में उनके नेतृत्व में ही दोनों दलों ने चुनाव लड़ा था.

फरवरी 2008 में, बांग्लादेश के सेनाध्यक्ष मोइन यू अहमद ने भारत का दौरा किया

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भारत के पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अपनी आत्मकथा में दावा किया है, "उन दोनों महिला नेताओं को जेल से रिहा करा कर राजनीति में उनकी वापसी के मामले में उन्होंने खुद एक अहम भूमिका निभाई थी."

भारत में उस समय मनमोहन सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार थी और प्रणब मुखर्जी उसमें विदेश मंत्री थे.

बांग्लादेश के उस चुनाव से ठीक दस महीने पहले सेना प्रमुख जनरल मोइन यू अहमद भारत के आधिकारिक दौरे पर आए थे. अपने छह-दिवसीय दौरे के दौरान उन्होंने प्रणब मुखर्जी के साथ भी मुलाकात की थी.

प्रणब मुखर्जी ने अपनी किताब 'द कोएलिशन ईयर्स' में लिखा है, "मैंने बांग्लादेश के सेना प्रमुख से हसीना और खालिदा समय तमाम राजनीतिक कैदियों को जेल से रिहा करने का अनुरोध किया था. जनरल इस बात से चिंतित थे कि शेख हसीना जेल से बाहर आने पर उनको बर्खास्त कर देंगी."

"लेकिन मैंने उनको भरोसा दिलाया था कि शेख हसीना के सत्ता में लौटने के बावजूद उनकी नौकरी बहाल रहेगी. मैंने राजनीतिक कैदियों की रिहाई में अमेरिकी राष्ट्रपति से हस्तक्षेप का अनुरोध करते हुए मैंने उनके साथ भी मुलाकात का इंतजाम किया."

प्रणब मुखर्जी की किताब

प्रणब मुखर्जी की आत्मकथा 'द कोएलिशन इयर्स' अक्टूबर 2017 में प्रकाशित हुई थी

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भारत के पूर्व राष्ट्रपति ने अपनी किताब में स्वीकार किया है कि वर्ष 2008 के संसदीय चुनाव में शेख हसीना और खालिदा जिया के चुनाव लड़ने के पीछे भारत की सक्रिय भूमिका थी.

शेख हसीना के परिवार के साथ उनके बेहद नजदीकी निजी और पारिवारिक संबंध थे. हसीना प्रणब मुखर्जी को काका बाबू कह कर बुलाती थीं.

प्रणब मुखर्जी की पुस्तक में इस बात का संकेत था कि इस नजदीकी के कारण ही उन्होंने जनरल मोईन यू अहमद को शेख हसीना की ओर से नौकरी नहीं जाने का भरोसा दिया था.

भारत ये भी चाहता था कि वर्ष 2008 के चुनाव में बीएनपी किसी भी हालत में सत्ता में नहीं लौट सके.

खालिदा जिया के दूसरे कार्यकाल (2001-2006) के दौरान वीना सीकरी लंबे समय तक ढाका में भारतीय उच्चायुक्त रही थीं.

वीणा सीकरी
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वीणा सीकरी ने बीबीसी से कहा, "यह किसी से छिपा नहीं है कि उस समय दिल्ली और ढाका के आपसी संबंध सबसे निचले स्तर पर पहुंच गए थे. द्विपक्षीय व्यापार, यातायात और सहयोग ठप होने की स्थिति में पहुंच गया था. भारत के पूर्वोत्तर के उग्रवादी संगठनों को सीधे मदद मिल रही था. दिल्ली की सरकार इस स्थिति को शीघ्र बदलने के पक्ष में थी."

लेकिन वीना सीकरी यह भी याद दिलाती हैं कि बीएनपी को सत्ता से हटाने के लिए भारत को कुछ भी नहीं करना पड़ा. इसकी वजह यह है कि बांग्लादेश के लोगों के भारी समर्थन के कारण ही तीन चौथाई से ज्यादा सीटें जीत कर अवामी लीग उस समय सत्ता में आई थी.

शेख हसीना के सत्ता में आने के बाद भारत सरकार ने उनका स्वागत करते हुए अगले दिन (30 दिसंबर) को जो बयान जारी किया था वह भी प्रशंसनीय है.

वीडियो कैप्शन, बांग्लादेश की पहली सरकार ने बंदूकों के साए के बीच शपथ ली थी- विवेचना

प्रणब मुखर्जी के मंत्रालय की ओर से जारी उस बयान में कहा गया था, बेहद करीबी और मित्र पड़ोसी देश में मुक्त, निष्पक्ष और शांतिपूर्ण चुनाव के जरिए जिस तरह बहुदलीय लोकतंत्र बहाल हुआ है उसके लिए भारत बांग्लादेश के लोगों का अभिनंदन करता है.

"शेख हसीना के नेतृत्व में अवामी लीग और महागठजोड़ की यह ऐतिहासिक जीत पूरे दक्षिण एशिया की लोकतांत्रिक राजनीति में मील का एक बड़ा पत्थर है."

"भारी तादाद में वोटरों की भागीदारी और चुनावी प्रक्रिया का निष्पक्ष संचालन दरअसल लोकतंत्र की महान जीत है. बांग्लादेश के लोगों ने लोकतांत्रिक परंपरा के प्रति एक बार फिर अपनी आस्था जताते हुए विकास और प्रगति के पक्ष में सर्वसम्मत फैसला दिया है."

उस बयान में बांग्लादेश की नवनिर्वाचित शेख हसीना सरकार के साथ घनिष्ठ संबंध रखते हुए काम करने का संकल्प भी जताया गया था.

कई पर्यवेक्षकों का मानना है कि दिल्ली आज भी इस संकल्प का अक्षरशः पालन कर रहा है.

5 जनवरी, 2014

दिसंबर, 2013 ढाका में बांग्लादेश के विदेश मंत्री और सुजाता सिंह की मुलाकात.

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बांग्लादेश के इस चुनाव में भारत के कथित हस्तक्षेप पर सबसे ज्यादा विवाद और बहस हुई थी. उसकी वजह थी कि चुनाव से ठीक एक महीने पहले भारत के तत्कालीन शीर्ष कूटनीतिज्ञ का विवादास्पद ढाका दौरा.

भारत की तत्कालीन विदेश सचिव सुजाता सिंह 4 दिसंबर 2013 को महज 24 घंटे के दौरे पर ढाका पहुंची थीं.

उस दौरान उन्होंने प्रधानमंत्री शेख हसीना, विपक्षी नेता खालिदा जिया और जातीय पार्टी के चेयरमैन जनरल हुसैन मोहम्मद इरशाद के साथ अलग-अलग बैठक की थी.

सुजाता सिंह ने बांग्लादेश के तत्कालीन विदेश मंत्री महमूद अली और विदेश सचिव एम शहीदुल हक के साथ भी बातचीत की थी.

इसके अलावा बांग्लादेश की पहली कतार के मीडिया घरानों के संपादकों के साथ भी उनकी बातचीत हुई थी.

जातीय पार्टी के तत्कालीन प्रमुख हुसैन मुहम्मद इरशाद. (दिसंबर, 2013)

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भारतीय विदेश सचिव के उस दौरे के पहले ही मुख्य विपक्षी पार्टी बीएनपी ने एलान कर दिया था कि वह चुनाव में शामिल नहीं होगी. जातीय पार्टी ने भी चुनाव से दूर रहने की बात कही थी.

उस समय भारत और बांग्लादेश के अखबारों में छपा था कि सुजाता सिंह ने जातीय पार्टी पर चुनाव में शामिल होने का दबाव डालने और चुनाव को एक स्वीकार्य स्वरूप देने के लिए ही जनरल इरशाद से मुलाकात की थी.

जातीय पार्टी के प्रमुख ने भी खुद ऐसा ही संकेत दिया था. जनरल इरशाद शुरुआत में तैयार नहीं होने के बावजूद बाद में सरकार के दबाव में चुनाव में हिस्सा लेने पर मजबूर हो गए और बीएनपी की गैरमौजूदगी में जातीय पार्टी ने ही प्रमुख विपक्षी पार्टी की भूमिका निभाई.

सुजाता सिंह ने 5 दिसंबर, 2013 को ढाका में पत्रकारों से बातचीत में दावा किया था कि किसी भी लोकतंत्र में विपक्षी पार्टी की भूमिका काफी अहम होती है और खालिदा जिया और जनरल इरशाद के साथ उनकी बैठक बांग्लादेश की प्रमुख राजनीतिक पार्टियों के साथ भारत की 'लगातार जारी बातचीत की प्रक्रिया' का ही हिस्सा है.

भारतीय विदेश सचिव की टिप्पणी

वीडियो कैप्शन, भारत के लिए इतना अहम क्यों है बांग्लादेश?

उस प्रेस कॉन्फ्रेंस में बांग्लादेश में भारत के तत्कालीन राजदूत पंकज शरण भी मौजूद थे.

विदेश सचिव सुजाता सिंह का कहना था, "मैंने अपनी बैठकों के दौरान इस बात पर जोर दिया है कि भारत एक स्थिर, शांतिपूर्ण और प्रगतिशील बांग्लादेश के पक्ष में है और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के कामयाब संचालन को अहमियत देता है."

ढाका की मीडिया में भारतीय विदेश सचिव की टिप्पणी की व्याख्या करते हुए कहा गया था कि भारत बांग्लादेश चुनाव को 'समावेशी' या 'भागीदारी' वाला बनाने के लिए सक्रिय प्रयास कर रहा है.

दिल्ली में एक मशहूर थिंक टैंक की सीनियर फेलो और बांग्लादेश मामलों की विशेषज्ञ स्मृति पटनायक मानती हैं कि मीडिया में सुजाता सिंह के उस दौरे की गलत व्याख्या की गई थी.

उन्होंने बीबीसी से कहा, "यह सही है कि कई लोगों ने उनके इस प्रयास को हस्तक्षेप के तौर पर देखा था. लेकिन मेरी राय में भारतीय विदेश सचिव का मुख्य मकसद पड़ोसी बांग्लादेश को संवैधानिक संकट से बचाना था."

डॉक्टर स्मृति पटनायक के मुताबिक़, "भारत ने यह सोच कर उक्त कदम उठाया था कि विपक्षी दलों के बिना होने वाले किसी भी चुनाव को अंतरराष्ट्रीय स्वीकृति नहीं मिलेगी और बांग्लादेश के समक्ष संकट पैदा हो जाएगा जो भारत के लिए भी वांछनीय नहीं है."

बीएनपी ने चुनाव का बहिष्कार करते हुए वोटिंग के दिन सड़कों पर प्रदर्शन किया था

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खैर, बीएनपी के बिना हुए चुनाव में करीब 40 प्रतिशत मतदान हुआ था और अवामी लीग ने 234 सीटें जीती थी.

भारत का मानना था कि बीएनपी के हिस्सा नहीं लेने के बावजूद जातीय पार्टी के मैदान में होने और उचित मतदान प्रतिशत के कारण बांग्लादेश के इस चुनाव को मान्यता मिलने में दिक्कत नहीं होगी.

भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता सैयद अकबरुद्दीन ने चुनाव के दिन ही एक बयान में कहा था, "बांग्लादेश का पांच जनवरी का चुनाव एक संवैधानिक जरूरत थी. हिंसा कभी आगे बढ़ने की राह नहीं हो सकती. बांग्लादेश में लोकतांत्रिक प्रवृत्ति को अपने रास्ते पर चलने की अनुमति दी जानी चाहिए."

इसके ठीक एक सप्ताह बाद शेख हसीना ने एक बार फिर बांग्लादेश की प्रधानमंत्री के तौर पर शपथ ली. जिन वैश्विक नेताओं ने सबसे पहले उनको शुभकामनाएं दी थी उनमें भारयी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी शामिल थे.

सिंह ने 12 जनवरी की शाम को टेलीफोन पर हसीना को शुभकामनाएं देते हुए कहा था, "बांग्लादेश के लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत बनाने के लिए मैं आपके देश के आम लोगों के प्रयासों की कामयाबी की कामना करता हूं."

30 दिसंबर, 2018

भारत के विदेश मंत्रालय के तत्कालीन प्रवक्ता रवीश कुमार

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भारत पांच साल पहले के अपने अनुभव से सबक लेकर या किसी दूसरी वजह से कुछ महीने पहले से ही भारत कुछ महीने पहले से ही वर्ष 2018 के बांग्लादेश चुनाव से एक दूरी बना कर चल रहा था. कम से कम सार्वजनिक तौर पर तो ऐसा ही लग रहा था.

चुनाव से ठीक दस दिन पहले (20 दिसंबर, 2018) भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कुमार ने अपनी साप्ताहिक ब्रीफिंग में कहा, "बांग्लादेश का चुनाव पूरी तरह उसका अंदरूनी मामला है. बांग्लादेश महज हमारा नजदीकी पड़ोसी और मजबूत सहयोगी ही नहीं है, वहां एक जीवंत लोकतंत्र भी है. हम बांग्लादेश के उस लोकतंत्र का सम्मान करते हैं."

लेकिन बांग्लादेश के उस चुनाव में बीएनपी के शामिल होने के फैसले को ही भारत की इस 'स्पष्ट तटस्थता' की सबसे बड़ी वजह कहा जा रहा था.

उस बार बीएनपी ने समान विचारधारा वाले कुछ दूसरी पार्टियों के साथ गठजोड़ कर चुनाव लड़ने का फैसला किया था. उसी समय भारत में बीजेपी-विरोधी कई पार्टियां आपस में गठजोड़ कर अगला चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही थीं. इसे महागठबंधन कहा जा रहा था.

वामपंथी दलों ने 30 दिसंबर के चुनाव में धोखाधड़ी के खिलाफ ढाका में विरोध प्रदर्शन किया था

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ढाका में तैनात भारत के पूर्व राजदूत पिनाक रंजन चक्रवर्ती ने तब बीबीसी से कहा था, "बांग्लादेश के इस चुनाव में तमाम पार्टियां हिस्सा ले रही हैं, इसलिए भारत को इसमें सिर खपाने की खास जरूरत नहीं है."

"बांग्लादेश में बड़ा बदलाव यह आया है कि भारत में बनने वाले महागठबंधन की तर्ज पर वहां भी विपक्ष का गठजोड़ सामने आया है. अब तो संयुक्त मोर्चा भी आ गया है. नतीजतन चुनाव सही राह पर आगे बढ़ रहा है. अगर सब कुछ इसी तरह चलता रहा तो मानना होगा कि वर्ष 2014 के मुकाबले यह पूरी तरह अलग होगा."

उस चुनाव से पहले भारत के विदेश सचिव या किसी शीर्ष कूटनीतिज्ञ या अधिकारी ने सार्वजनिक रूप से ढाका का दौरा नहीं किया. हालांकि बांग्लादेश के राष्ट्रीय चुनाव आयोग के निमंत्रण पर भारत के सरकारी अधिकारियों के एक बड़े दल ने वहां जाकर (28-31 दिसंबर, 2018) पूरी चुनावी प्रक्रिया का पर्यवेक्षण किया था.

चुनाव से करीब डेढ़ महीने पहले बीबीसी बांग्ला की एक रिपोर्ट में कहा गया था, "बांग्लादेश के ज्यादातर राजनीतिक पर्यवेक्षक मानते हैं कि बांग्लादेश के चुनाव के प्रति भारत की तटस्थता बरतने की वजह उसकी रणनीति में बदलाव भी हो सकता है."

चुनावी धांधली और भ्रष्टाचार के आरोप

ढाका में चुनाव के अगले दिन सुबह का अख़बार पढ़ते आम लोग

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दिल्ली में यह बात कोई गोपनीय नहीं थी कि सार्वजनिक रूप से चुनाव से दूरी बनाए रखने की कोशिश के बावजूद भारत का सीधा समर्थन शेख हसीना के नेतृत्व वाली अवामी लीग के प्रति ही था.

30 दिसंबर को बड़े पैमाने पर चुनावी धांधली और भ्रष्टाचार के आरोप सामने आने के बाद यह मामला और साफ हो गया. पता चला कि कई जगह मतदान शुरू होने से पहले आधी रात को ही सत्तारूढ़ पार्टी के समर्थन में वोट पड़ चुके हैं. बीबीसी ने उस धांधली का वीडियो भी पोस्ट किया था.

विपक्षी पार्टी बीएनपी चुनाव के दिन ही आधी रात के मतदान का बायकाट कर मैदान से हट गई थी.

इधर, वोटों की गिनती शुरू होने के बाद आधी रात को ही साफ हो गया कि अवामी लीग और महागठजोड़ एक बार फिर भारी मतों से जीत कर सत्ता में लौट रहा है. अवामी लीग ने जातीय पार्टी और दूसरे सहयोगी दलों के साथ मिल कर तीन सौ में से 293 सीटें जीती थी.

लेकिन भारत ने चुनाव में धांधली पर कोई टिप्पणी नहीं की. भारत से वहां गई पर्यवेक्षकों की टीम की रिपोर्ट, जो उस समय बांग्लादेश में ही थी, ने भी अपनी रिपोर्ट में इसका कोई जिक्र नहीं किया था.

शेख हसीना का नेतृत्व

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लेकिन 31 दिसंबर की सुबह दिल्ली से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का फोन आने में देरी होने पर ढाका में हल्की बेचैनी पैदा होने लगी थी. आखिर सुबह करीब 11 बजे प्रधानमंत्री मोदी ने बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना को फोन कर उनको बधाई दी. उसके बाद बताया गया कि दोनों नेताओं के बीच कुछ देर तक मित्रतापूर्ण माहौल में बातचीत भी हुई.

नरेंद्र मोदी ने उम्मीद जताई कि अवामी लीग की निर्णायक जीत और शेख हसीना का दूरदर्शी नेतृत्व भारत और बांग्लादेश के आपसी संबंधों को और आगे ले जाएगा. हसीना को फोन करने वाले वैश्विक नेताओं में मोदी सबसे पहले थे. इसलिए हसीना ने उनके प्रति आभार जताया था.

बाद में दिल्ली में विदेश मंत्रालय की ओर से जारी एक बयान में कहा गया था, "प्रधानमंत्री मोदी ने दोहराया है कि पड़ोसी, क्षेत्रीय विकास और सुरक्षा के क्षेत्र में नजदीकी सहयोगी और भारत की 'नेबर फर्स्ट' नीति के एक केंद्रीय स्तंभ के तौर पर बांग्लादेश की भारत के लिए कितनी अहमियत है."

वीडियो कैप्शन, बांग्लादेश के पाकिस्तान से अलग होने की वजह

लेकिन तब तक भारत की प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस की ओर से हसीना के पास बधाई का कोई फोन नहीं आया था. उस पार्टी ओर उसके नेतृत्व के साथ हसीना के करीबी और पारिवारिक संबंध भी हैं. दरअसल, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी उस समय विदेश में छुट्टी बिता रहे थे.

भारत में बांग्लादेश के तत्कालीन राजदूत सैयद मुअज्जम अली ने संसद में कांग्रेस नेता आनंद शर्मा को मोबाइल पर फोन कर अनुरोध किया कि प्रधानमंत्री तक का फोन आ गया लेकिन कांग्रेस की ओर से कोई संदेश नहीं पहुंचा. उसके बाद आनंद शर्मा ने तुरंत राहुल गांधी की तलाश कर पार्टी की ओर से भी बयान जारी कराने का इंतजाम किया.

कांग्रेस ने अपने बयान में कहा, "बांग्लादेश में शेख हसीना की जीत दरअसल लोकतंत्र की जीत है."

एक बार फिर यह साबित हो गया कि शेख हसीना और अवामी लीग के प्रति भारत का समर्थन किसी पार्टी विशेष तक ही सीमित नहीं है.

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