बांग्लादेश चुनाव को लेकर भारत, चीन और रूस का रुख अमेरिका से अलग क्यों

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- Author, अमृता शर्मा
- पदनाम, बीबीसी मॉनिटरिंग
बांग्लादेश में आम चुनाव की तैयारियां की जा रही हैं और इस राजनीतिक गतिशीलता में दुनिया के बड़े शक्तिशाली देश पैर जमाने की कोशिश कर रहे हैं.
ये आम चुनाव किसी वास्तविक राजनीतिक चुनाव के मुक़ाबले अधिक कड़वाहट और अनिश्चितताओं से भरा हुआ है.
इस अनिश्चितता को रफ़्तार इस वजह से भी मिली है क्योंकि देश की प्रमुख विपक्षी पार्टियों ने इस चुनाव को नामंज़ूर कर दिया है जिनमें बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) और जमात-ए-इस्लामी जैसी पार्टियां शामिल हैं.
ये पार्टियां देश में बड़े पैमाने पर रैलियां निकाल रही हैं और मांग कर रही हैं कि आम चुनाव केयरटेकर सरकार की निगरानी में कराए जाएं.
देश में 44 आधिकारिक रजिस्टर्ड राजनीतिक दल हैं जिनमें से 26 चुनावों में भाग लेंगे और 14 ने चुनाव का बहिष्कार किया है.
राजनीतिक समीकरण

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स्थानीय मीडिया के मुताबिक़, बीते 11 महीनों में हुई राजनीतिक हिंसाओं में 82 लोगों की मौत हुई है जबकि तक़रीबन 8150 लोग घायल हुए हैं. सरकार का आरोप है कि इसके लिए विपक्ष ज़िम्मेदार है.
बांग्लादेश में 7 जनवरी को मतदान होना है और आवामी लीग के नेतृत्व वाली सरकार ने विपक्षी नेताओं की बड़े पैमाने पर गिरफ़्तारियां की हैं. विपक्ष का आरोप है कि अक्तूबर से अब तक विभिन्न मामलों में 21,835 बीएनपी कार्यकर्ताओं को गिरफ़्तार किया गया है.
इन घटनाक्रमों से ऐसे भू-राजनीतिक समीकरण सामने आए हैं जो कई परिस्थितियों में असामान्य हैं. अमेरिका ने जहां बीएनपी की ‘स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव’ की मांग का समर्थन किया है और यहां तक चेतावनी दी है कि जो चुनावों को बाधित करेगा उसके वीज़ा पर अंकुश लगाया जाएगा.
वहीं बांग्लादेश के क़रीबी सहयोगी भारत ने रूस और चीन का पक्ष लेते हुए साफ़ कहा है कि बांग्लादेश चुनाव में बाहरी दख़ल नहीं होना चाहिए.
कथित तौर पर भारत ने चिंता जताई है कि अमेरिकी सक्रियता क्षेत्र को अस्थिर कर सकती है और कट्टरपंथी ताक़तों को प्रोत्साहित कर सकती है और दक्षिण एशिया में चीनी प्रभाव को मज़बूत कर सकती है.
चुनाव के लिए बांग्लादेश पर अमेरिकी दबाव

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बांग्लादेश चुनाव ने ‘वैश्विक भू-राजनीतिक हॉटस्पॉट’ में बदल गया है जिसमें अमेरिका, चीन, रूस जैसी वैश्विक शक्तियों के साथ क्षेत्रीय शक्ति भारत भी है जो अपने-अपने रणनीतिक हितों की रक्षा करना चाहते हैं.
इन चुनावों में इतिहास अपने आपको दोबारा दोहरा रहा है क्योंकि अमेरिका फिर से ख़ुद को अकेला पा रहा है.
साल 2014 के चुनाव से पहले भी चीन, रूस और भारत कथित तौर पर इस पर सहमत थे कि शीर्ष पद पर शेख़ हसीना को होना चाहिए.
मई 2023 में अमेरिका ने स्पेशल वीज़ा पॉलिसी की घोषणा की थी और कहा था कि उसका मक़सद उन बांग्लादेशी लोगों को वीज़ा देने पर रोक लगाना है जो बांग्लादेश में लोकतांत्रिक चुनावी प्रक्रिया को कमज़ोर करने के लिए ज़िम्मेदार हैं.
इस नीति को लेकर कहा गया कि इसका मक़सद ‘बांग्लादेश के निष्पक्ष और शांतिपूर्ण राष्ट्रीय चुनाव का समर्थन करना है.’
अमेरिका ने कहा था कि उसकी नीति में ‘बांग्लादेश के वर्तमान और पूर्व कर्मचारी, सरकार समर्थित और विपक्षी राजनीतिक दलों के सदस्य और क़ानूनी एजेंसियों, न्यायपालिकाओं और सुरक्षा सेवाओं के सदस्य’ शामिल होंगे.
प्रधानमंत्री शेख़ हसीना ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि अमेरिका का वीज़ा प्रतिबंधों को लागू करने का ‘कोई तार्किक आधार’ नहीं है.
एक आधिकारिक बयान में कहा गया कि ढाका इस घोषणा को हसीना सरकार की ‘सभी स्तरों पर स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने की स्पष्ट प्रतिबद्धता’ के ‘व्यापक संदर्भ में’ देखना चाहेगा.
चीन, रूस का अमेरिका पर निशाना

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हालांकि, अमेरिका के इस क़दम की चीन और रूस ने तुरंत निंदा की.
चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने कथित तौर पर कहा कि हसीना ने अगस्त में बैठक के दौरान कहा कि ‘राष्ट्रीय संप्रभुता, स्वतंत्रता और क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा करने के लिए बांग्लादेश का चीन समर्थन करता है.’
हाल ही में बांग्लादेश में चीन के राजदूत याओ वेन ने अमेरिका का नाम लिए बग़ैर कथित तौर पर कहा था कि एक देश बांग्लादेश में मानवाधिकार, लोकतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की बात करता है लेकिन वो साथ ही एकतरफ़ा वीज़ा प्रतिबंध भी लगाता है.
याओ ने कहा कि वो देश बांग्लादेशी लोगों पर आर्थिक प्रतिबंध भी लगाता है.
बांग्लादेश के चुनावों को लेकर अमेरिका और चीन के अलग-अलग बयान ‘प्रभाव के लिए लड़ाई’ को भी दिखाते हैं.
जहां अमेरिका बांग्लादेश में सबसे बड़ा विदेशी निवेशक है और बांग्लादेश दक्षिण एशियाई देशों में रेडीमेड कपड़ों का सबड़े बड़ा बाज़ार है.
वहीं चीन बांग्लादेश का सबसे बड़ा रक्षा सप्लायर, ट्रेडिंग पार्टनर है. इस वजह से भी दोनों सुपर पावर के बीच हितों का टकराव भी होता है.
एक भारतीय मीडिया रिपोर्ट का कहना है कि बांग्लादेश चुनावों को लेकर अमेरिका का मक़सद ‘हसीना पर दबाव बनाना है ताकि ढाका पर बीजिंग का प्रभाव कम हो.’
वहीं रूस भी बांग्लादेश के साथ अपने रिश्तों को मज़बूत कर रहा है और उसने हाल ही में पांच दशकों में पहली बार बांग्लादेश में युद्धपोत भेजा था. उसने अमेरिका पर चुनावों में दख़ल देने की कोशिश करने का आरोप भी लगाया था.
15 दिसंबर को एक बयान में रूसी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता मारिया ज़ख़ारोवा ने कहा कि अगर चुनाव अमेरिका की पसंद के हिसाब से नहीं जाता है तो उसकी ‘दख़ल’ का मक़सद बांग्लादेश में परिस्थितियों को अरब स्प्रिंग की तर्ज़ पर अस्थिर करना है.
सितंबर में ढाका के अपने पहले दौरे पर रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लेवरोफ़ ने भी अमेरिकी क़दम की निंदा करते हुआ कहा था कि ये क़दम भारत-प्रशांत क्षेत्र में ‘चीन को निशाना बनाने और रूस को अलग-थलग करने के लिए है.’
चीन और भारत का एक मत

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बांग्लादेश के आगामी चुनाव ने भारत को चीन और रूस के साथ एक कैंप में लाकर खड़ा कर दिया है.
भारत विपक्षी पार्टी बीएनपी के सत्ता में आने की संभावना को लेकर शंका में है क्योंकि उसको आशंका है कि इसके परिणामस्वरूप क्षेत्र में इस्लामी कट्टरपंथ को बढ़ावा मिल सकता है.
सत्तारूढ़ आवामी लीग (एएल) सरकार इस्लामी चरमपंथियों पर लगाम लगाने के लिए जानी जाती है जिसकी वजह से उसके भारत से मज़बूत संबंध हुए हैं.
हसीना सरकार ने उन विद्रोही समूहों के ख़िलाफ़ कड़े क़दम उठाए थे जो देश में शरिया क़ानून लागू करने की मांग करते थे.
सरकार ने बीएनपी और जमात-ए-इस्लामी पार्टियों के ख़िलाफ़ भी कड़े क़दम उठाए जिन्हें इन तत्वों के लिए सहानुभूति रखने वाला माना जाता था.
हालांकि, हसीना सरकार ने चुनाव से पहले बीएनपी कार्यकर्ताओं के ख़िलाफ़ कड़े क़दम उठाए जो अंतरराष्ट्रीय सुर्ख़ियां बने और ख़ासतौर पर अमेरिका ने उन पर प्रतिक्रिया दी.
वहीं, भारत ने बांग्लादेश चुनाव को उसका आंतरिक मामला बताया. कथित तौर पर उसने अमेरिका को ढाका की वर्तमान सरकार पर बेहद दबाव बनाने को लेकर चौंकन्ना रहने को कहा क्योंकि इससे क्षेत्रीय स्थिरता को ख़तरा हो सकता था और चरमपंथी ताक़तें मज़बूत होतीं.
अगस्त में बांग्लादेश स्थित अंग्रेज़ी अख़बार ढाका ट्रिब्यून ने लिखा, “भारत कभी नहीं चाहता कि बांग्लादेश में कोई कट्टरपंथ और उग्रवाद को संरक्षण देने वाली विरोधी ताक़त सत्ता में आए.”
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