कश्मीर पर बांग्लादेश में चर्चा किसके पक्ष में

कश्मीर

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इमेज कैप्शन, बांग्लादेश की राजधानी ढाका में इस्लामी आंदोलन बांग्लादेश का एक कार्यकर्ता जम्मू-कश्मीर पर भारत सरकार के हालिया फ़ैसले का विरोध करते हुए. इस राजनीतिक धड़े के लोग नेशनल प्रेस क्लब में इकट्ठा हुए थे.
    • Author, टीम बीबीसी हिन्दी
    • पदनाम, नई दिल्ली

पाँच अगस्त को मोदी सरकार ने जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले संविधान के अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी कर दिया था. इसे लेकर पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान से तनाव तो बना ही हुआ भारत प्रशासित कश्मीर में भी हालात सामान्य नहीं हैं. मोदी सरकार के इस फ़ैसले की चर्चा केवल पाकिस्तान में ही नहीं बल्कि उससे अलग बने देश बांग्लादेश में भी हो रही है.

बांग्लादेश में भी मोदी सरकार के फ़ैसले पर लोग अपनी राय रख रहे हैं. 6 अगस्त को बांग्लादेश की राजधानी ढाका में इस्लामी आंदोलन बांग्लादेश ने भारत सरकार के फ़ैसले के ख़िलाफ़ विरोध मार्च निकाला था. यह इस्लामिक गुट है और इसके कार्यकर्ता राजधानी ढाका के नेशनल प्रेस क्लब में इकट्ठा हुए थे.

यूनिवर्सिटी ऑफ़ बांग्लादेश में नसरीन अख़्तर मीडिया स्टडीज पढ़ाती हैं. नसरीन को लगता है कि यह फ़ैसला किसी राजनीतिक पार्टी का है न कि देश की सरकार का. उनका कहना है कि फ़ैसले को लेने से पहले जम्मू-कश्मीर के लोगों को भरोसे में नहीं लिया गया.

नसरीन मानती हैं कि जम्मू-कश्मीर के लोग इस फ़ैसले को बहुत आसानी से नहीं स्वीकार करेंगे और मामला बिगड़ने की आशंका है. उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर भारत के बाक़ी राज्यों से अलग है.

कश्मीर

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बांग्लादेश की राजधानी ढाका की पत्रकार मकसूद अज़ीज़ कहती हैं, ''भारत में नस्ली और भाषायी विविधता काफ़ी है. इसके साथ ही भारत की पहचान दुनिया के बड़े लोकतांत्रित देश की भी है. लेकिन जिस तरह जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा छीना गया उससे भारत के लोकतांत्रिक मूल्यों पर बुरा असर पड़ा है. सरकार को इस फ़ैसले में जम्मू-कश्मीर के लोगों की भी राय लेनी चाहिए थी.''

मकसूद का मानना है कि भारत के इस फ़ैसले से दुनिया भर में लोकतंत्र को लेकर ग़लत संदेश गया है.

सामाजिक कायकर्ता लीना परवीन कहती हैं, ''कश्मीर को लेकर भारत और पाकिस्तान में तनाव बढ़ रहा है. मुझे लगता है कि भारत को कश्मीर की संस्कृति का आदर करना चाहिए. अगर पीएम मोदी थोपना चाहते हैं, तो उनका जो लक्ष्य है, वो पूरा नहीं होगा.''

लीना कहती हैं, ''आधुनिक दुनिया के साथ कश्मीर विकसित नहीं हो पाया है. कश्मीर विवाद के कारण भारत को नुक़सान हो सकता है. इस समस्या का समाधान होना चाहिए. मोदी को चाहिए कि वो कश्मीरियों के अधिकारों का भी आदर करें. अगर मोदी सरकार के इस क़दम से कुछ अच्छा होता है तो मैं उनके साथ हूं.''

शेख हसीना

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इससे पहले बांग्लादेश ने आधिकारिक रूप से कहा था कि अनुच्छेद 370 को हटाना भारत का आंतरिक मामला है, ऐसे में उसके पास किसी और के अंदरूनी मामलों पर बोलने का अधिकार नहीं है,.

सड़क यातायात और पुल मंत्री और सत्ताधारी अवामी लीग के महासचिव ओबैदुल क़ादर ने कहा कि बांग्लादेश पड़ोसियों के आंतरिक मामलों पर टिप्पणी नहीं करता.

बांग्लादेश यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले शम्स रहमान ने बीबीसी से कहा, "अनुच्छेद 370 ख़त्म होने के बाद अब दूसरे राज्यों के लोग कश्मीर में ज़मीन ख़रीदने और बसने की कोशिश करेंगे लेकिन अभी इसकी क़ानूनी प्रक्रिया स्पष्ट नहीं है."

शम्स रहमान भारत के मौजूदा हालात की तुलना बांग्लादेश के पहाड़ी ज़िलों से करते हैं. उन्होंने कहा, "चटगाँव की ज़मीन वहां के मूल निवासियों की थी लेकिन बाद में बांग्लादेश के राष्ट्रवादी भी वहां चले गए और अब वो वहां बस भी गए हैं. नतीजा, अब चटगाँव में मुसलमानों की आबादी ज़्यादा है. यही स्थिति कश्मीर में भी आ सकती है.''

रहमान इस बात को लेकर ख़ास तौर पर चिंतित हैं कि इस क़दम से कश्मीर का 'अद्वितीय स्थान' कहीं खो जाएगा.

बांग्लादेश के पत्रकार अली आसिफ़ शावोन का भी यही मानना है कि अगर कश्मीर में लोगों पर कथित दमन बढ़ता है तो उनकी आवाज़ें भी उसी अनुपात में ऊंची उठती जाएंगी.

नुसरत जहां ने कहा कि जब 370 और 35 ए को शामिल किया गया था तो ये कहा गया था कि कभी न कभी इसे हटाया ज़रूर जाएगा लेकिन इसमें कश्मीर के लोगों की सहमति भी होगी, मगर उस वक़्त कश्मीर में हालात ऐसे नहीं थे कि उनकी राय ली जा सके.

नुसरत के मुताबिक़, "मोदी सरकार ने वो किया जो कोई अन्य बीजेपी सरकार नहीं कर पाई लेकिन इस मामले में किसी क़ानून की पालन नहीं हुआ. हालांकि भारत सरकार ने कहा कि उन्होंने जो कुछ किया, वो कश्मीरियों की भलाई के लिए किया लेकिन अगर इस अचानक लिए गए फ़ैसले में कश्मीरियों की कोई राय ही नहीं ली गई तो ये फ़ैसला उनके भले के लिए कैसे हो सकता है?"

बांग्लादेश

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प्रवासियों के लिए काम करने वाले एक एनजीओ से जुड़ी उम्मे हबीबा ने बीबीसी से बताया कि वो इसी साल कश्मीर की यात्रा पर गई थीं.

उन्होंने कहा, "कश्मीर हमेशा से मेरी दिलचस्पी की जगह रही है. कश्मीर की प्राकृतिक सुंदरता और इसका अनोखापन हमेशा इसकी पहचान रहेगा. मैं मार्च में कश्मीर गई थी. ये वही समय था जब भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव बढ़ने की कगार पर था. इसलिए हमारे साथ सफ़र कर रहे कुछ लोग वापस लौट गए थे लेकिन हमने अपनी यात्रा जारी रखी थी. कश्मीर यात्रा की यादें ज़िंदगी पर मेरे साथ रहेंगी. लेकिन जब से 370 और 35 ए हटाने की ख़बर आई और धारा-144 लगा दी गई, हम वहां जाने के बारे में सोच भी नहीं सकते. कश्मीर एक 'वॉर ज़ोन' जैसा लगने लगा है."

बिती सप्तर्षि बांग्लादेश की एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं जो महिला अधिकारों के लिए काम करती हैं. उन्होंने बीबीसी से कहा, "कश्मीर किसी की संपत्ति नहीं है. न हिंदुओं की, न मुसलमानों और न बौद्धों की. ये कश्मीर के लोगों के लिए है. अपने हालिया फ़ैसले के बाद भारत सरकार ने न सिर्फ़ कश्मीर में अपनी इज़्ज़त खो दी है बल्कि दूसरे राज्यों के क़ानूनों को भी कमज़ोर कर दिया है."

लेकिन पूर्व राजनीतिक कार्यकर्ता रौशन नितुल मोदी सरकार के फ़ैसले का समर्थन करते हुए कहते हैं, ''गोवा-तमिलनाडु में भी संस्कृतियों का अंतर है लेकिन वहां के लोग अलग कानून और संवैधानिक सहूलियतों की मांग नहीं करते. जहां तक विचारधारा की बात है, यहां सरकार के पास कोई विकल्प नहीं था, ये रवैया थोड़ा कठोर लग सकता है लेकिन इसकी ज़रूरत है.''

नसीमुल शुवो नौकरी पेशा शख़्स हैं और बांग्लादेश में रहते हैं उन्होंने कहा, ''अभी कश्मीरी लोग आज़ादी चाहते हैं इसके बाद वो लोग पाकिस्तान के साथ चले जाएंगे, भारत सरकार ये नहीं चाहेगी. क्यों लोग बलूचिस्तान के बारे में बात नहीं करते?

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