नेपालः सांप्रदायिक राजनीति के चक्रव्यूह में फंस सकता है नेपाल का मधेश-तराई इलाका -कैसे हैं ज़मीनी हालात?

- Author, फणींद्र दाहाल और माधुरी महतो
- पदनाम, बीबीसी नेपाली
- पढ़ने का समय: 18 मिनट
गाँव–गाँव में केसरिया झंडे लगे हैं, कई झंडों पर हनुमान की तस्वीर भी दिखती है. हिंदू बहुल ग्रामीण बस्ती के ठीक बीचोंबीच एक मस्जिद है और उससे करीब 100 मीटर दूर है राम-जानकी का मंदिर.
धनुषा के सखुवा-मडान में पिछले पांच दशक से रह रहीं सबीला खातून बताती हैं कि उनके गाँव में छठ और ईद दोनों में उत्सव जैसा माहौल हुआ करता था. लेकिन हाल की घटनाओं को याद करके उन्हें अब ठीक से नींद भी नहीं आती.
दो मुस्लिम किशोरों ने टिक-टॉक पर हिंदुओं के ख़िलाफ़ कथित अपमानजनक शब्दों वाला एक पोस्ट डाल दिया. उसी से सांप्रदायिक तनाव शुरू हुआ और उसके बीच पिछले महीने उनके घर के सामने वाली मस्जिद में आग लगा दी गई और तोड़फोड़ भी की गई.
इस घटना में कुरानशरीफ़ समेत कई अहम धार्मिक किताबें जल गईं, जिसके बाद तराई के कई ज़िलों में विरोध-प्रदर्शन हुए.
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'ऐसी घटना के बारे में कभी सोचा भी नहीं था'

जनवरी 3 को दोपहर में 75 साल की समीला अपने घर में खाना खाकर बैठी थीं. बाहर अचानक शोर–गुल बढ़ा और बड़ी भीड़ इकट्ठा हो गई.
नारों के बीच कुछ लोग मस्जिद में घुस गए और तोड़फोड़ शुरू कर दी, समीला यह सब अपनी आँखों से देख रही थीं.
उन्होंने कहा, "मैंने उनसे कहा कि मुझे ही मार दो, पर मस्जिद को मत छुओ. लेकिन किसी ने मेरी बात नहीं सुनी. शादी के बाद से मैंने कभी ऐसी दुश्मनी नहीं देखी थी. यह सब देखकर मेरा तो खाने का भी मन नहीं किया. लगभग पाँच दिन भूखी रही. अभी भी दिल बहुत दुखा हुआ है."
घटना के करीब हफ़्ते बाद जब बीबीसी नेपाली की टीम सखुवा–मडान के धार्मिक स्कूल, मदरसा मोहम्मदिया अल–सफिया, पहुँची तो वहाँ टूटी हुई कुर्सियाँ, जली हुई किताबों के अवशेष और बिखरा हुआ धान हर तरफ फैला दिखाई दे रहा था.
मस्जिद का नीले रंग का टूटे टिन का दरवाज़ा भी बाहर खड़ा किया हुआ था.

मस्जिद के मौलाना, भारत के मधुबनी के रहने वाले अब्दुल अज़ीम बता रहे थे कि उनका कंबल जला दिया गया और उनका मोबाइल भी गायब है.
वह कहते हैं, "जब यह घटना हुई, तब मस्जिद के अंदर कोई नहीं था. मैं खाना खाकर बाहर दुकान के पास बैठा था. इतनी बड़ी भीड़ आई और लोग पत्थर फेंक रहे थे कि मेरे बस में कुछ करना ही नहीं था. मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि ऐसा हो सकता है."
घटना के बाद करीब एक हफ्ते तक मस्जिद में नमाज़ पढ़ना बंद रहा. परिवार की सुरक्षा की चिंता के बाद मौलाना अज़ीम मधुबनी स्थित अपने घर लौट गए.
क्या कार्रवाई हुई?

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सरकारी वक़ील के दफ़्तर ने पुलिस रिपोर्ट के आधार पर जो चार्जशीट दाखिल की है, उसमें कहा गया है कि लगभग 90 लोग मस्जिद में घुसकर तोड़फोड़ में शामिल थे.
इस समूह पर आरोप है कि उन्होंने बिजली का मीटर, पंखे तोड़ दिए और दानपात्र में रखे लगभग पांच लाख रुपये लूट लिए.
इस मामले में स्थानीय तेलीयानी टोले के नौ लोगों पर नेपाल की मुलुकी अपराध संहिता 2074 के तहत "धार्मिक अपराध" का मुकदमा चलाया गया.
जनवरी के पहले हफ़्ते में धनुषा ज़िला अदालत ने 15,000 रुपये की ज़मानत पर सभी को रिहा कर दिया.
क़ानून की धारा 155 के मुताबिक़ किसी धार्मिक स्थल को नुक़सान पहुंचाने या नुक़सान करवाने पर 3 साल तक की जेल या 30,000 रुपये तक जुर्माना हो सकता है.

स्थानीय निवासी और पूर्व गाँव विकास समिति अध्यक्ष, शोभित महतो का कहना है कि यह विवाद उस समय बढ़ा जब टिक–टॉक पर हिंदू महिलाओं को निशाना बनाकर एक वीडियो पोस्ट किया गया.
अभियुक्तों की गिरफ़्तारी की तैयारी चल ही रही थी कि इसी दौरान आगजनी और तोड़फोड़ की घटनाएँ हो गईं.
उन्होंने कहा, "कुछ लोगों ने भीड़ को उकसाकर यहाँ भेज दिया. आग लगने के बाद ही हमें पता चला. अगर नफ़रत फैलाने वालों पर कार्रवाई नहीं हुई, तो अभी भले हालात शांत हों, आगे फिर ऐसी ही घटनाएँ होंगी."
'हिंदू महिलाओं के खिलाफ अपमानजनक शब्द बोलकर टिक–टॉक पर वीडियो डालने' के आरोप में 19 साल के दो मुस्लिम युवकों पर भी केस दर्ज है.
वे अभी ज़मानत पर रिहा हैं, लेकिन उन पर धारा 156 के तहत लिखकर या बोलकर धार्मिक भावनाओं को आहत करने का आरोप लगा है.
इस धारा में दोषी पाए जाने पर अधिकतम 2 साल जेल और 20,000 रुपये जुर्माना हो सकता है.
सोशल मीडिया पर ऐसा पोस्ट डालने वाले दोनों युवक भी 15,000 रुपये की ज़मानत पर रिहा किए जा चुके हैं.
दबाव और आरोप–प्रत्यारोप

स्थानीय मुस्लिम युवक इसराफ़ील अंसारी कहते हैं कि गाँव में अब तक सामंजस्य वाला माहौल वापस नहीं आया है. उल्टा, उन पर मुकदमा वापस लेने का दबाव बढ़ता जा रहा है.
उन्होंने कहा, "हम तो चाहते हैं कि आपसी सद्भाव बना रहे. चाहे अपराधी कोई भी हो, कार्रवाई होनी चाहिए. लेकिन हम पर दबाव है कि मामला वापस ले लो और अदालत में जाकर बोलो कि कुछ हुआ ही नहीं. यहाँ तक धमकी दी जा रही है कि अगर खेत में गए तो पिटाई कर देंगे."
उनका कहना है, "अगर अब किसी को छोड़ दिया गया तो आगे चलकर और बड़ी घटनाएँ होंगी. टिक–टॉक का वीडियो बनाने वाले दोनों लड़कों पर भी कार्रवाई हो, पर मस्जिद में तोड़फोड़ और आगजनी करने वालों को भी सज़ा मिलनी चाहिए."
मस्जिद के आस-पास रहने वाले कई हिंदू परिवार उस दिन की घटना के बारे में खुलकर बोलना नहीं चाहते.
सखुवा–मडान स्थित रामजानकी मंदिर के महंत, रामकुमार दास का कहना है कि मुस्लिम युवाओं द्वारा डाला गया पोस्ट हिंदू समुदाय को बहुत आहत करने वाला था.
वह कहते हैं, "यहाँ 81 फ़ीसदी आबादी हिंदुओं की है. यहाँ की पहचान ही हिंदू धर्म है. लेकिन इस पोस्ट से हिंदू धर्म पर हमला किया गया."
नेपाल में बदलता माहौल

10 साल के सशस्त्र संघर्ष और 2006 के दूसरे जनआंदोलन के बाद नेपाल ने धर्मनिरपेक्ष, संघीय गणराज्य की व्यवस्था अपनाई.
लेकिन हाल के वर्षों में नेपाल को फिर से हिंदू राष्ट्र घोषित करने की मांग सड़कों पर और बड़े राजनीतिक दलों के भीतर भी तेज़ हुई है.
ताज़ा सुरक्षा आँकड़ों के मुताबिक, तराई के कई ज़िलों में सांप्रदायिक घटनाएँ बढ़ी हैं और धार्मिक मुद्दों पर सक्रिय संगठनों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है.
धनुषा ज़िला पुलिस कार्यालय के प्रवक्ता गणेश बम कहते हैं कि सखुवा-मडान की घटना में कुछ स्थानीय हिंदूवादी संगठनों के सदस्यों की भूमिका भी सामने आई है.
उन्होंने कहा, "यहाँ 'हिंदू सम्राट (नेपाल)' नाम का संगठन है. इसके लोग बाहर से भी आते हैं और स्थानीय लोगों को भड़काते हैं. कमला नगर पालिका में सभी को इकट्ठा करके समझाया गया कि आगे ऐसा कुछ नहीं होना चाहिए. फिर मामला अदालत में गया और लोग ज़मानत पर छूट गए. फिलहाल हालात सामान्य हैं."
'सेना' नाम वाले संगठन

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जनकपुर के सीताचौक में 'हिंदू सम्राट सेना' नामक संगठन ने एक पूरा घर किराए पर लेकर कार्यालय बनाया हुआ है. वहाँ सदस्यों के रहने और सोने की व्यवस्था भी है.
यह संगठन ज़िला प्रशासन कार्यालय, धनुषा में 'हिंदू सम्राट नेपाल' के नाम से पंजीकृत है. इसके सदस्य अपने नाम के पीछे 'सनातनी' लगाते हैं.
संगठन के केंद्रीय अध्यक्ष, राजेश सनातनी कहते हैं कि वे हिंदू धर्म की रक्षा के लिए आवाज़ उठाते हैं, लेकिन मस्जिद पर हुए हमले में अपने संगठन की कोई भूमिका नहीं बताते.
उन्होंने कहा, "हम पर बेवजह आरोप लगाकर बदनाम करने की कोशिश हो रही है. हम सुरक्षा एजेंसियों के समन्वय से ही अपने कार्यक्रम करते हैं. हम प्रभु श्रीराम की सेना हैं और धर्म के नाम पर आगे बढ़ते हैं."
वे कहते हैं, "धर्म की सेना का मतलब है कि हिंदू समाज को कैसे आगे बढ़ाया जाए- सफाई अभियान, आर्थिक मदद, और अन्य सामाजिक कार्य… ऐसे काम हम करते हैं."
सुरक्षा अधिकारियों के मुताबिक जनकपुर और आसपास के इलाक़ों में हिंदू स्वयंसेवक संघ, विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल, हिंदू राष्ट्र स्वाभिमान अभियान, जानकी सेना, लक्ष्मण सेना जैसे कई संगठन सक्रिय हैं.
धनुषा ज़िला पुलिस कार्यालय के तत्कालीन प्रमुख, रुगम बहादुर कुँवर कहते हैं, "कुछ लोग हिंदू समुदाय में भी हैं और कुछ मुस्लिम समुदाय में भी हैं, जो छोटी–छोटी बातों को बड़ा बनाकर देशभर में फैलाने की कोशिश करते हैं. यह अच्छा नहीं है."
वह आगे कहते हैं, "हमने देखा है कि कई लोग अलग-अलग संगठनों का नाम लेकर गैरक़ानूनी गतिविधियां कर रहे हैं. यह भी जाँच कर रहे हैं कि इन्हें कहीं से आर्थिक मदद तो नहीं मिल रही. नेपाल पुलिस इस पर बारीकी से जांच कर रही है."
बढ़ती धार्मिक दूरी

जनकपुर और आसपास के इलाक़ों में धार्मिक आधार पर बढ़ती दूरी साफ़ दिखाई देती है. बिजली के खंभों पर लगे झंडों से लेकर घरों–मोहल्लों तक.
गाँव-गाँव में धार्मिक झंडे लगाने और मोहल्लों के नाम धर्म के आधार पर रखने का चलन अब पूरे मधेश प्रदेश में फैल रहा है.
अगस्त 2025 के अंतर से लेकर जनवरी 5 2026 तक, पुलिस के रिकॉर्ड के मुताबिक हिंदू और मुस्लिम समुदाय के बीच कम से कम 27 झड़पें हुईं.
इन झड़पों में टिक-टॉक पर अपमानजनक पोस्ट, गानों को लेकर विवाद, सार्वजनिक ज़मीन पर झगड़े- सभी शामिल थे.
कहीं मूर्ति तोड़ने के आरोप लगे, कहीं टुनामुना (टोना–टोटका) का विवाद. कई जगह पर एक समुदाय के लगाए झंडे या बैनर दूसरे समुदाय ने हटाने की कोशिश की तो मारपीट हो गई.
इन घटनाओं में 50 लोग गिरफ़्तार हुए और 29 लोग घायल हुए.
इस अवधि में सबसे ज्यादा झड़पें धनुषा, रौतहट और बाँके में दर्ज की गईं.
सखुवा-मडान की घटना का सबसे बड़ा असर पर्सा के वीरगंज में दिखा-,जहाँ हालात काबू करने के लिए कर्फ़्यू और निषेधाज्ञा लगानी पड़ी.
मुस्लिम बहुल छपकैयाँ में एक मोटरसाइकिल को भी आग के हवाले कर दिया गया.
वीरगंज की मुश्किलें

नेपाल के प्रवेश द्वार के रूप में जाना जाने वाला सीमावर्ती शहर वीरगंज घंटाघर, मंदिरों, मस्जिदों और धार्मिक तालाबों के कारण प्रसिद्ध है.
आर्थिक गतिविधियों का बड़ा केंद्र होने की वजह से यहाँ छोटी घटनाएं भी पूरे देश का ध्यान खींच लेती हैं.
स्थानीय विश्लेषकों का कहना है कि अधिकांश लोग शांति और सद्भाव के पक्ष में रहते हैं, लेकिन कुछ चुनिंदा लोग तनाव फैलाने की कोशिश करते हैं, और वही अक्सर सांप्रदायिक तनाव बढ़ा देते हैं.
सखुवा-मडान की घटना के विरोध में जब स्थानीय मुस्लिम समुदाय ने ज़िला प्रशासन कार्यालय में ज्ञापन देने की योजना बनाई, तो वीरगंज के कई हिंदूवादी संगठन भी सड़कों पर उतर आए.
अधिकारियों के अनुसार, इस बार लाठागल्ली के पास वाली मस्जिद पर प्रदर्शनकारियों ने पत्थर फेंके.
सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में मस्जिद की छत से भी पत्थर फेंकते हुए लोग दिखाई देते हैं- जिसकी पुष्टि सुरक्षा एजेंसियों ने भी की है.

स्थानीय निवासी, मौलाना मोहम्मद मज़हर अली क़ादरी इसे 'अत्याचार सहन न होने पर आत्मरक्षा का कदम' बताते हैं.
वह कहते हैं, ''धनुषा की घटना को लेकर मुस्लिम समुदाय ने शांतिपूर्ण विरोध किया था.लेकिन जब उस विरोध को रोकने की कोशिश हुई, तभी हालात बिगड़े.''
वह कहते हैं, "हमारी बात साफ़ है, चाहे हिंदू हो या मुस्लिम, गलती करने वाले पर कानून के हिसाब से कार्रवाई होनी चाहिए. अगर ऐसा नहीं होता तो उसका हौसला बढ़ता है, और ऐसी घटनाएँ बार–बार होती हैं."
वह आगे कहते हैं, "सोशल मीडिया पर ज़हर फैलाने वालों पर सरकार को कार्रवाई करनी चाहिए. ऐसे काम में सिर्फ कुछ लोग शामिल होते हैं. जब चार-पाँच लोगों पर कार्रवाई होती है, तो छठा व्यक्ति ऐसा करने की हिम्मत नहीं करता."
पर्सा में शांति के लिए राजनीतिक समझौता

इस बार पर्सा में स्थिति सामान्य करने के दौरान ज़िला प्रशासन कार्यालय में सभी दलों के बीच एक सर्वदलीय राजनीतिक समझौता किया गया.
इसमें यह तय हुआ कि नेपाल के किसी भी हिस्से में हुई घटना के नाम पर वीरगंज में कोई प्रदर्शन नहीं होगा.
एक स्थायी सद्भाव समिति भी बनाई गई है, जिसमें हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों के दो–दो प्रतिनिधि शामिल हैं.
पर्सा के राष्ट्रीय बजरंग दल के अध्यक्ष, विवेक सिन्हा का कहना है कि पहले भी ऐसे समझौते होते रहे हैं, लेकिन झगड़े रुकते नहीं.
उन्होंने कहा, "पिछले नौ–दस सालों से जब भी हम हनुमान जयंती की रैली निकालते हैं, बवाल हो जाता है. सिर्फ यहाँ नहीं, पूरे देश में ऐसी घटनाएँ होती रहती हैं. हर बार कर्फ़्यू लगता है, फिर मेल–मिलाप की बातें होती हैं, कागज़ी समझौते बनते हैं- लेकिन फिर वही दोहराया जाता है."
"प्रशासन भी हमें शक की नज़र से देखता है. देश के क़ानून मंत्री भी इसी क्षेत्र से थे, और इतने नेता हैं, पर किसी ने आज तक हमसे नहीं पूछा कि क्या हुआ, कैसे हुआ. हमें नेताओं पर भरोसा नहीं है."
'हम बहुसंख्यक हैं लेकिन हमारा असर कम होता जा रहा है'

खुद को हिंदू नेता बताने वाली वीरगंज की रमिता माया गुप्ता कहती हैं, "हम बहुसंख्यक हैं, लेकिन हमारा प्रभाव कम होता जा रहा है. इसलिए वीरगंज में हम आवाज उठा रहे हैं. यह हम पूरे देश के हिंदुओं के लिए कर रहे हैं."
हिंदूवादी समूहों के भीतर ही एक दूसरा पक्ष भी है, जो राजशाही के बिना हिंदू राष्ट्र की मांग कर रहा है.
नेपाल विश्व हिंदू महासंघ के महासचिव अभिषेक तिवारी का कहना है कि वे संघीय ढाँचे के भीतर हिंदू राष्ट्र की बात करते हैं.
उनके अनुसार, 'क्षणिक समाधान' के लिए किए गए समझौते कभी स्थायी नतीजा नहीं देते.
वह कहते हैं, "2006 के जनआंदोलन के बाद जो नागरिकता बांटी गई, वही पूरी समस्या की जड़ है. उससे कई गैर-नेपालियों को नागरिकता मिल गई. जब तक उसे रद्द नहीं किया जाता. समाधान मुमकिन नहीं है."
मुस्लिम समुदाय की राय

जनता समाजवादी पार्टी के केंद्रीय सदस्य तबरेज अहमद कहते हैं कि ऐसी जाँच-पड़ताल पर मुस्लिम समुदाय को कोई आपत्ति नहीं लेकिन वे आरोप लगाते हैं कि धर्म के नाम पर राजनीति करने की कोशिश हो रही है, और तनाव फैलाने वाले लोग 'किसी और के इशारे पर' काम कर रहे हैं.
वह कहते हैं, "पहले ऐसी गतिविधियाँ नहीं होती थीं. इसमें पैसा लगता है, वह कहाँ से आता है? कोई तनख़्वाह भी नहीं मिलती. मैं दोनों तरफ की बात कर रहा हूँ. आम समझ यही है कि ये लोग कहीं न कहीं से संचालित होते हैं."
वह आगे कहते हैं, "हम हमेशा मिलकर रहते आए थे, लेकिन आज ऐसा क्यों हो रहा है? यह साफ़ दिखता है. अगर राज्य चाहे तो पता कर सकता है कि कौन-कौन इसमें शामिल हैं. अगर मधेश को अस्थिर करके हमेशा पिछड़ा रखने की कोशिश हुई, तो आगे चलकर राज्य के लिए बड़ी मुश्किलें खड़ी होंगी."
मेयर की भूमिका

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इसी दौरान, जब पर्सा प्रशासन सर्वदलीय बैठक कर रहा था, वीरगंज महानगर के मेयर राजेशमान सिंह ने फेसबुक पर एक पोस्ट डाली.
उसमें उन्होंने धार्मिक तनाव बढ़ने के बाद होने वाली सद्भाव रैलियों और औपचारिक बैठकों को 'आत्मसंतुष्टि लेने की प्रवृत्ति' बताते हुए तंज कसा.
कई अधिकारियों ने सवाल उठाया कि शहर में तनाव के माहौल में मेयर की भूमिका सहयोगी नज़र नहीं आई.
लेकिन बीबीसी से बात करते हुए मेयर सिंह ने कहा, "मेरा कहना है कि हम उन लोगों से बात करें जो धर्म के प्रति सच में आस्था रखते हैं- न कि उनसे जो एक-दूसरे को नीचा दिखाते हैं. ऐसी बातचीत से रास्ता निकलता है?"
उन्होंने आगे कहा, "अगर कोई मुझसे सलाह नहीं माँग रहा और खुद ही आगे बढ़कर फैसले ले रहा है, तो मैं कैसे बीच में कूदूँ? मुझे बुलाइए, चाहे मैं काठमांडू में हूँ या कहीं और, मैं खड़ा हो जाऊँगा या नहीं, यह देख लीजिए. जब दमकल चाहिए था, तब मुझे फोन कर सकते थे, लेकिन साम्प्रदायिक तनाव के समय बोलने में झिझक क्यों?"
'दोनों समुदायों को भिड़ाने की कोशिश'

पर्सा के प्रमुख ज़िला अधिकारी, भोला दाहाल बताते हैं कि राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि बैठकों में शामिल हो रहे हैं,और ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए उनसे और सहयोग की उम्मीद है.
वह कहते हैं कि ये घटनाएँ किसी बड़े संगठित समूह की वजह से नहीं, बल्कि कुछ चुनिंदा लोगों के कारण हो रही हैं, जो माहौल को भड़काने की कोशिश कर रहे हैं.
दाहाल के शब्दों में, "दोनों समुदायों में कुछ ऐसे लोग हैं जो किसी न किसी तरह धार्मिक आधार पर दरार पैदा करने की कोशिश करते हैं, या दोनों को भिड़ाकर हालात को हिंसक बनाना चाहते हैं. लेकिन यह कहना सही नहीं होगा कि कोई राजनीतिक दल या पूरा समुदाय इस टकराव को बढ़ाना चाहता है."
वीरगंज के नागरिक समाज प्रतिनिधि, विनोद कुमार गुप्ता मानते हैं कि मधेश में दिख रहा हिंदू-मुस्लिम तनाव चुनावों में भी दिख सकता है.
वह कहते हैं, "आगे चलकर ऊपर के स्तर पर इसी आधार पर सीटों का लेन–देन होने लगेगा. जो संगठन मज़बूत दिखेगा, वह कहेगा इतनी सीट दिला दो, मैं आपके उम्मीदवार को जितवाऊँगा. यह ख़तरा नेपाल में बढ़ रहा है."
जनसंख्या का आंकड़ा

2021 की जनगणना के अनुसार:
- नेपाल की कुल आबादी में हिंदू 81.19% हैं
- मुस्लिम आबादी 5.09% है
- मधेश प्रदेश में मुस्लिम जनसंख्या 13.3% है
- लुम्बिनी प्रदेश में 7.4%
भारत–नेपाल सीमा से लगे इन प्रदेशों के कई जिले धार्मिक तनाव के मामलों में संवेदनशील माने जाते हैं.
सरकार क्या कहती है?

हाल ही में मधेश प्रदेश में हुई निर्वाचन केंद्रित सुरक्षा बैठक में, तराई के ज़िलों में बढ़ता धार्मिक तनाव सबसे बड़ी सुरक्षा चुनौती बताया गया.
चुनाव नज़दीक आते ही, पिछले हफ्ते रौतहट के गौर में विवाद हुआ जब मस्जिद में नमाज़ चल रही थी और बाहर हिंदू समुदाय की शादी का बाजा बज रहा था. यही बात झगड़े की वजह बनी.
वहाँ शनिवार से लगाया गया कर्फ़्यू सोमवार को हटाया गया.
इसी बीच पार्किंग को लेकर दो समुदायों के युवाओं में झगड़ा हुआ, जिसके बाद वीरगंज में सोमवार सुबह से अनिश्चितकालीन कर्फ़्यू लगा.
पर्सा प्रशासन ने सोमवार शाम में कर्फ़्यू हटाया, लेकिन निषेधाज्ञा मंगलवार सुबह तक जारी रखी.
बीबीसी से बात करते हुए गृहमंत्री अर्याल ने कहा कि संभावित धार्मिक तनाव को वह एक गंभीर सुरक्षा चुनौती की तरह ले रहे हैं.
उन्होंने कहा, "हर समुदाय को अपने धर्म–संस्कृति की रक्षा करने का अधिकार है. लेकिन किसी दूसरे समुदाय के धर्म–संस्कृति में दख़ल देने की इजाज़त किसी को नहीं. ऐसा कोई भी कदम कानूनन दंडनीय है. हमने सभी ज़िला प्रशासन कार्यालयों को निर्देश दिया है कि धार्मिक सद्भाव बढ़ाने वाले कार्यक्रम चलाएँ."
धनुषा में बढ़ता तनाव जब अलग–अलग ज़िलों में फैलने लगा, तो गृह मंत्रालय ने कहा कि सोशल मीडिया के जरिए साम्प्रदायिक तनाव न फैले, इसके लिए खुफिया विभाग और सभी सुरक्षा एजेंसियाँ सक्रिय भूमिका निभा रही हैं.
'सबसे बड़ी सुरक्षा चुनौती'

मधेश स्तर की सुरक्षा बैठक में राष्ट्रीय अनुसंधान विभाग के प्रमुख ने 'बढ़ते धार्मिक और राजनीतिक कट्टरवाद' को सबसे बड़ी सुरक्षा चुनौती बताया. यह जानकारी एक वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारी ने बीबीसी को दी.
अधिकारियों का कहना है कि कई ऐसे संगठनों की गतिविधियों पर नज़र रखने के लिए खुफ़िया कर्मियों को भी तैनात किया गया है.
एक अधिकारी ने बताया कि सुरक्षा एजेंसियां कई संगठनों पर नज़दीक से निगरानी रख रही हैं और 'भीतर अपने स्रोत तैयार करके' सूचनाएँ जुटाई जा रही हैं.
उनके मुताबिक़, युवा इन संघर्षों में ज्यादा शामिल होने लगे हैं, और कुछ इलाकों में छोटी उम्र से ही 'हिंदू-मुस्लिम बंटवारे' का माहौल बनता दिख रहा है.
वीरगंज के विनोद कुमार गुप्ता कहते हैं, "सिर्फ़ मेल–मिलाप का कागज़ बनाकर मन नहीं जुड़ते. जो लोग इसमें शामिल हैं, उन पर सख़्त से सख़्त कार्रवाई होनी चाहिए तभी ये घटनाएं रुकेंगी."

सखुवा–मडान के शोभित कुमार महतो कहते हैं कि समाज साथ चलना चाहता है, लेकिन कुछ युवाओं के विरोध की वजह से हालात बिगड़ जाते हैं.
वो कहते हैं "हम यहाँ हमेशा मिलकर रहते आए हैं. अब हम ऐसी घटनाएँ दोबारा नहीं होने देंगे. जो उकसाने की कोशिश करेगा, हम खुद उसका विरोध करेंगे."
सत्तर साल की अतिमा ख़ातून भी चाहती हैं कि पहले जैसा सद्भाव फिर लौट आए.
वह कहती हैं, "हम अपना धर्म और संस्कार निभा रहे हैं, वे अपना निभा रहे हैं. हर धर्म और परंपरा का सम्मान करना चाहिए. हमनें अपने बच्चों और पोतों-पोतियों को भी समझाया है कि आने वाली पीढ़ियों में भी ऐसी घटनाएं नहीं होनी चाहिए."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
















