हम भी हैं गौरा देवी...जलते जंगल को बचाने वाली चार पहाड़ी महिलाओं की कहानी

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- Author, वर्षा सिंह
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
- पढ़ने का समय: 10 मिनट
"जंगल जलता देखकर गांव वाले दु:ख तो जता रहे थे लेकिन वहां जाकर आग बुझाने के बारे में कोई नहीं सोच रहा था. जबकि आग तीन दिन से लगी हुई थी. दिन में तो आग दिखाई नहीं देती, सिर्फ धुआं-धुआं सा लगता. लेकिन रात को लपटें दिखतीं तो पता चलता कि आग बहुत फैली हुई है."
ये शब्द हैं चमोली के नौरख गांव की रहने वाली रीना देवी के.
22 साल की रीना देवी को यह आग देखकर डर लग रहा था, लेकिन इससे भागने की जगह चार सहेलियों ने मिलकर जंगल की इस आग को बुझाने का फ़ैसला किया.
इस साल सर्दियों के बावजूद भी उत्तराखंड के जंगल जगह-जगह जल रहे थे और दशोली ब्लॉक में नौरख गांव का जंगल जनवरी महीने में तीन दिन से आग की चपेट में था. इस गांव में क़रीब तीन सौ परिवार रहते हैं.
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रीना देवी बताती हैं, "जंगल हमारे गांव के पीछे है. घर के पीछे ही हम वहां से लाई हुई घास इकट्ठा करके रखते हैं. एक चिंगारी भी आती तो उसके जलने का ख़तरा हो सकता था."
अपनी तीन साथियों जमुना, ममता और गुड्डी के साथ रीना रोज़ाना घास और लकड़ी लाने जंगल जाती हैं.
18 जनवरी को,चौथे दिन भी, जब धुआं नहीं छंटा और आग नहीं बुझी तो चारों ने अकेले ही जंगल की आग बुझाने का फ़ैसला किया.
'जो घास जल रही थी, हमारे पशुओं का चारा थी'

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रीना बताती हैं कि उनके गांव का जंगल दूर और खड़ी चढ़ाई पर है. बहुत चट्टानें हैं. वहां पहुंचने में एक घंटे से ज़्यादा समय लगता है.
उनका कहना है, "जंगल की आग में जो घास जल रही थी, हमारे पशुओं का चारा थी. वहां बांज, बुरांस, देवदार के पेड़ हैं. तिमूल, भमौरा, मख्यूं, अमरूद, आंवला, अखरोट जैसे फलदार पेड़ हैं."
पांच साल की बेटी और डेढ़ साल के बेटे की मां रीना बताती हैं कि पति (दिलवर लाल) कभी-कभार मज़दूरी कर लेते हैं.
उनका कहना है, "मेरे पास दो गायें हैं. चार छोटे-छोटे खेत हैं. शादी के बाद जंगल से जुड़ा काम महिलाओं को ही करना होता है. हम अपने पशुओं के लिए जंगल से घास लाते हैं. इसी चारे को खाकर वे दूध देती हैं. उनके गोबर से खाद बनाकर खेतों में डालते हैं. जंगल से लाई लकड़ियों से ही ज़्यादातर खाना पकाते हैं. हमारे पशु, हमारी खेती, हमारा घर सब कुछ इन्हीं पर निर्भर करता है."
चीड़ की टहनियों से बुझाईं आग की लपटें

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दूर से जलते दिख रहे जंगल की आग गांव की ओर बढ़ने का अंदेशा डराने लगा था. गांव में इस पर पसरे सन्नाटे के बीच, चौथे दिन वे चारों घर का कामकाज निपटाकर जंगल की ओर चल पड़ीं.
गुड्डी देवी बताती हैं, "सर्दियों का मौसम था फिर भी चलते समय गर्मी लग रही थी. जलते हुए जंगल के बीच पहुंचने में क़रीब डेढ़ घंटा लगा. बारिश नहीं होने से मिट्टी ढीली थी और चारों तरफ सूखी पत्तियां बिखरी थीं. चट्टानों पर चढ़ाई करते हुए पांव फ़िसलने का डर था. हम चारों ने चीड़ की टहनियां निकालीं और उनसे आग पर झपोड़-झपोड़ कर (आग पर पटक कर) बुझाने लगीं."
गुड्डी देवी बताती हैं कि गांववाले इसी तरह आग बुझाते हैं.
जमुना एक बार पहले भी गांव के लोगों के साथ आग बुझा चुकी हैं. तब वन विभाग के कहने पर गांव वाले जंगल गए थे.
वह कहती हैं, "इस बार अभी तक विभाग की ओर से आग बुझाने के लिए नहीं कहा गया. हमारी मदद के बिना वन विभाग के कर्मचारी अकेले यह काम कर भी नहीं सकते."
लेकिन जंगल में आग लगती कैसे है? इसका जवाब गुड्डी देवी देती हैं, "आसपास के गांव के ही कोई लोग जंगल में बिखरी सूखी पत्तियों में आग लगा देते हैं. इस उम्मीद में कि इससे अच्छी हरी घास उगेगी. लेकिन आग लगाने से नुक़सान ही होता है. हरी और सूखी, दोनों घास जल जाती है."
"घास और सूखी पत्तियों के ढेर में लगी आग को चीड़ की टहनियों से बुझाने में करीब तीन-चार घंटे लग गए,"
रीना बताती हैं कि चढ़ाई की वजह से सांसें फूल रही थीं, "आग जगह-जगह फैली हुई थी और लपटें हमारे मुंह पर आ रही थीं. डर था कि आग हम पर न लग जाए. इससे फिसल कर गिरने का ख़तरा भी था. अगर कोई जंगली जानवर इस दौरान वहां होता है तो उसके दौड़ने पर पत्थर गिरते हैं. मगर हम चारों ने हार नहीं मानी और आग बुझाकर ही दम लिया."
"हम पानी लेकर भी नहीं गए थे," यह याद कर अब रीना हंसती हैं लेकिन उस समय नहीं, "जंगल में आंवले के पेड़ थे. हमने आंवले तोड़कर खाए. उससे हमें मुंह में तरलता का अनुभव हुआ और देह में थोड़ी जान आई.".
जंगल की आग के ख़तरे कैसे अलग हैं

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द एनर्जी एंड रिसोर्सेज़ इंस्टीट्यूट यानी टेरी में सीनियर फेलो और क्लाइमेट चेंज एंड एयर क्वालिटी की डायरेक्टर सुरुचि भडवाल पिछले 25 वर्षों से देश में जलवायु परिवर्तन के असर और अनुकूलन से जुड़े मुद्दों पर शोध कार्य कर रही हैं.
वह बताती हैं कि जंगल की आग के असर का ठीक-ठीक मूल्यांकन अब तक नहीं किया जा सका है.
वो कहती हैं "जंगल की आग में पेड़, घास, झाड़ियां, कीट-पतंगे, पक्षी, वन्यजीव और मिट्टी से जुड़ा पूरा इकोसिस्टम प्रभावित होता है. इससे होने वाला नुक़सान हमारी समझ से कहीं ज़्यादा बड़ा होता है. आमतौर पर अभी हम देखते हैं कि कितना हेक्टेयर जंगल जला. इसमें कितना कार्बन संचित रहा होगा. लेकिन वास्तविक नुकसान कहीं अधिक है."
चार महिलाओं के आग बुझाने के कार्य पर सुरुचि कहती हैं, "महिलाओं ने सिर्फ घास और सूखी पत्तियों की आग नहीं बुझाई, बल्कि वन के पूरे इकोसिस्टम की रक्षा की. साथ ही वे अपने जीवन और भविष्य की सुरक्षा भी कर रही हैं. इसलिए इनके काम को पर्यावरण संरक्षण की एक मज़बूत मिसाल के तौर पर देखा जाना चाहिए."

वनों पर चारा-पत्ती के लिए निर्भरता और इनके संरक्षण में महिलाओं की भूमिका को उत्तराखंड वन विभाग भी बखूबी समझता है. नौरख गांव बद्रीनाथ वन प्रभाग में आता है.
इसके प्रभागीय वन अधिकारी सर्वेश कुमार दुबे बताते हैं, "हम गांव-गांव में प्रशिक्षण कार्यक्रम चला रहे हैं. साथ ही जो गांव या महिलाएं आग बुझाने में अच्छा कार्य कर रही हैं, वन पंचायतों के माध्यम से उन्हें 30-30 हज़ार रुपये की वित्तीय सहायता दी जा रही है और सम्मानित भी किया जा रहा है."
डीएफ़ओ दुबे के मुताबिक पिछले साल बद्रीनाथ वन प्रभाग में 6 लाख रुपये के बजट में 20 वन पंचायतों को यह रकम दी गई. साथ ही ज़िला प्रशासन के आपदा प्रबंधन मद से 10 हज़ार रुपये की आग बुझाने के उपकरणों की किट दी गई.
बीबीसी हिन्दी से बातचीत में वह कहते हैं, "हमने इस वर्ष भी 30 से 40 वन पंचायतों को आग बुझाने की खातिर वित्तीय मदद देने के लिए बजट का प्रस्ताव रखा है."
घरवालों ने क्या कहा

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उधर, नौरख गांव की चार वन अग्नि वॉरियर्स आग बुझाकर लौटीं तो पहले घरवालों की डांट मिली.
गुड्डी देवी ने कुछ उत्साह से घर पर यह किस्सा बताया तो उनके पति नाराज़ हुए, "हमको बहुत अच्छा लग रहा था कि हमने आग बुझाई लेकिन पति ने बोला कि तुम वहां क्यों गई. जंगल में पत्थर गिरते हैं. आग फैली थी. अगर तुम्हें कुछ हो जाता तो क्या होता. तुमने अपने बच्चों के बारे में नहीं सोचा."
इस पर गुड्डी देवी का जवाब था कि गाय के लिए चारा भी तो चाहिए ही.
"अगर जंगल में दोबारा आग लगेगी तो हम फिर बुझाने जाएंगे," वह पूरे आत्मविश्वास से कहती हैं.
रीना देवी के पति दिलवर लाल भी आग बुझाने का किस्सा सुनकर पहले कुछ डर गए लेकिन फिर पत्नी को शाबाशी दी.
उन्होंने कहा, ''हमने उनको बोला कि तुम जंगल क्यों गए लेकिन फिर अच्छा लगा कि उन्होंने जंगल बचा लिया. नहीं तो गांव तक आग पहुंचने का खतरा था.''
"जैसे गौरा देवी ने पेड़ों से चिपकर जंगल कटने से बचाया था, वैसे हम भी जंगल को अपना समझते हैं. हम भी गौरा देवी हैं".
जमुना पेड़ों को कटने से बचाने के लिए विख्यात 'चिपको आंदोलन' की गौरा देवी का उदाहरण देती हैं और बाकी सहेलियां इस पर खिलखिलाती हैं.
'जंगल से है ख़ास रिश्ता'

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शाम को गौशाला जाने से पहले चारों सहेलियां एक साथ बैठकर जंगल से अपने रिश्ते पर बीबीसी हिन्दी के साथ बात करती हैं.
दो बेटे और एक बेटी की मां 35 वर्षीय गुड्डी देवी अपने सहेली रीना की बातों से सहमति जताती हैं.
वो कहती हैं, "जब आग लगती है तो भालू, गुलदार, काकड़, हिरन जैसे जंगली जानवर गांवों की ओर आते हैं. फिर उनके हमले का ख़तरा होता है. जंगल में आग लगेगी तो वे कहां रहेंगे. जैसे हमें हमारा घर चाहिए, वैसे उनको भी उनका घर चाहिए."
वह कहती हैं, "मेरे पास दो गाय और एक बछड़ा है. अभी एक ही गाय दूध दे रही है. थोड़ा दूध घर के लिए रखते हैं और थोड़ा बेचकर कुछ पैसे मिल जाते हैं,"
28 साल की ममता देवी सहेलियों की बात को आगे बढ़ाती हैं. वो कहती हैं, "गांव के बहुत से लोग नौकरी के लिए शहर चले जाते हैं. गरीब लोग ही पहाड़ में रह जाते हैं. हम इंतज़ार कर रहे हैं जब मार्च-अप्रैल में जंगल में बुरांस के फूल खिलने लगेंगे तो उन्हें चुनकर जैम-जूस बनाने के सेंटर पर देंगे. उससे भी कुछ आमदनी हो जाएगी."
ममता, नौ और छह साल के दो बेटों की मां हैं. वह कहती हैं कि गांव का जीवन जंगल से ही जुड़ा है.
वो कहती हैं, "अक्तूबर के पहले हफ्ते में एक बारिश हुई थी. इसके बाद नवंबर, दिसंबर में बिलकुल बारिश नहीं हुई. जनवरी के तीसरे हफ्ते तक जंगल ऐसे जल रहे थे जैसे गर्मियों में जला करते हैं."
वह बताती हैं, "खेतों में हमने गेहूं बोया था. बारिश समय पर नहीं हुई अब मुश्किल लग रहा है कि एक-दो किलो भी गेहूं निकले. पिछले साल भी सर्दियों में बारिश नहीं हुई थी और खेती चौपट हो गई. नहीं तो, एक से दो क्विंटल तक गेहूं हो जाता था. अब अगर जंगल भी जल जाएगा, हमारे पशुओं का चारा चल जाएगा तो परेशानी और बढ़ जाएगी."
क्या बताते हैं मौसम से जुड़े आंकड़े

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ममता देवी के अनुभव की तस्दीक भारत मौसम विज्ञान विभाग भी करता है.
उत्तराखंड में नवंबर में 98 फ़ीसदी कम और दिसंबर में 100 फ़ीसदी कम यानी कोई बारिश दर्ज नहीं हुई. राज्य में 100 दिन से अधिक का सूखा रहा और 23 जनवरी को साल की पहली बरसात और बर्फ़बारी हुई.
विश्व मौसम विज्ञान संगठन के मुताबिक़ वर्ष 2025 रिकॉर्ड तौर पर दर्ज तीन सबसे गर्म वर्षों में से एक रहा.
इसके साथ ही, पिछले 11 साल दुनिया के अब तक के 11 सबसे गर्म साल रहे हैं.
अनियमित बारिश, बढ़ता तापमान और लंबे समय तक पड़ने वाला सूखा जंगलों में आग के फैलने के लिए अनुकूल परिस्थितियां बना रहे हैं.
एक शोध रिपोर्ट इसकी पुष्टि करती है कि जंगल की आग के प्रति संवेदनशील इलाकों में प्री-मानसून बारिश में साफ़ गिरावट दर्ज की गई है, जिससे जंगलों में ईंधन के तौर पर मौजूद सूखी पत्तियां और घास बढ़ रही हैं. आग का खतरा और ज़्यादा हो गया है.
नौरख गांव की चार सहेलियों के मुताबिक यह बदलाव उनके रोज़मर्रा के जीवन को प्रभावित करता है.
जमुना देवी बताती हैं कि दिन भर की कड़ी मेहनत के बीच जंगल उनका साझा समय और साझी जगह है.
जमुना आगे कहती हैं, "जंगल हमारी सहेली की तरह है. यही वह समय होता है जब हम आपस में गप्पें मारते हुए जाते हैं. वहीं घास-पत्ती, लकड़ी इकट्ठा करते हुए अपने सुख-दुख की बात करते हैं. कभी कोई तीज-त्योहार या कोई बात हो गई और हम नहीं जा पाए, नहीं तो साल के 365 दिन हमें जंगल जाना ही होता है."
रीना कहती हैं, "गांव में हम महिलाएं सुबह 5-6 बजे उठ जाते हैं. गौशाला का काम करते हैं. नाश्ता बनाकर बच्चों को स्कूल भेजना, घर का काम निपटाना और उसके बाद सुबह नौ बजे हम चारों एक साथ जंगल के लिए निकल पड़ते हैं और 12 बजे तक घर लौटते हैं. फिर घर और खेत के कामों में जुट जाते हैं. खेती भी हम महिलाएं मिलकर करती हैं. कभी हम उनके खेत में काम करते हैं तो कभी वे हमारे खेत में."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.















