उत्तराखंड का वो गाँव, जहाँ इससे ज़्यादा सोने के गहने पहनने पर है पाबंदी

गाँव की नई बहू रेखा चौहान के मुताबिक़ कुछ महिलाएँ मानती हैं कि गहनों की सीमा तय नहीं होनी चाहिए थी.

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इमेज कैप्शन, कन्दाड़ गाँव की रेखा चौहान के मुताबिक़ कुछ महिलाएँ मानती हैं कि गहनों की सीमा तय नहीं होनी चाहिए थी
    • Author, वर्षा सिंह
    • पदनाम, देहरादून से बीबीसी हिन्दी के लिए

बाज़ार में सोने की बढ़ती क़ीमत की वजह से उत्तराखंड में एक जनजातीय क्षेत्र के किसानों ने एक तरीक़ा अपनाया है.

जनजातीय क्षेत्र जौनसार बावर के किसानों ने गाँव की ख़ुशहाली बनाए रखने के लिए गहनों के इस्तेमाल की ही सीमा तय कर दी है. लेकिन महिलाओं से जुड़ा ये फ़ैसला, उनकी ग़ैर मौजूदगी में लिया गया.

हाल ही में सोने के आसमान चढ़ते भाव से चिंतित कन्दाड़ और इंद्रोली गाँव के पुरुषों ने एक बैठक बुलाई थी.

इस समय शादी-विवाह के मुहूर्त निकलने शुरू हो गए थे और गाँव में दो परिवारों की शादियाँ तय हो चुकी थीं.

पुरुषों की चिंता थी कि सोना उनकी पहुँच के बाहर निकल चुका है. गहनों को लेकर घरों में कहासुनी हो रही है.

दोनों गाँवों की पंचायत के मुखिया "स्याणा जी" की अध्यक्षता में हुई बैठक में पुरुषों ने एक मत से फ़ैसला किया कि अब महिलाएँ शादी-विवाह में सिर्फ़ तीन गहने ही पहनेंगी. नाक की फुली, कान के बूंदे और गले का मंगलसूत्र.

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कन्दाड़ और इंद्रोली गाँव उत्तराखंड के जनजातीय क्षेत्र जौनसार बावर का हिस्सा है.

देहरादून ज़िले के चकराता तहसील में टौंस और यमुना नदी के बीच बसा यह इलाक़ा अपनी ख़ास सांस्कृतिक और सामाजिक परिवेश, सामूहिक भावना और उत्सव का आनंद लेने के लिए जाना जाता है.

'किसान कैसे ख़रीदेगा सोना'

चकराता के गाँव कंदाड़ में सब्ज़ी काटते किसान

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इमेज कैप्शन, किसानों का मानना है कि गहने सीमित करने का फ़ैसला सामाजिक समानता के लिए लिया गया है

कन्दाड़ ग्राम सभा में कन्दाड़ और इंद्रोली सहित चार गाँव शामिल हैं. यहाँ 65 से अधिक परिवार रहते हैं और मतदाताओं की संख्या लगभग 650 है.

मुखिया स्याणा अर्जुन सिंह रावत कहते हैं, "बैठक में क़रीब 60-70 पुरुष शामिल हुए. गाँव के नौकरीपेशा लोग तो गहने ख़रीद सकते हैं, लेकिन किसान नहीं ख़रीद पाएगा. इसलिए फ़ैसला हुआ कि गहने पहनना सीमित करो. फिर तय हुआ कि शादी-विवाह जैसे समारोहों में महिलाएँ नाक, कान और गले का मिलाकर सिर्फ़ तीन गहने पहनेंगी."

गाँव की बैठकों में पारंपरिक तौर पर महिलाओं को शामिल नहीं किया जाता.

स्याणा रावत बताते हैं, "बैठकों में पुरुष ही आते हैं और वे ही फ़ैसले करते हैं. अगर किसी ने हमारा ये फ़ैसला नहीं माना, तो उसे 50 हज़ार रुपए की राशि जुर्माने के तौर पर चुकानी होगी."

कन्दाड़ गाँव के पुरुष इस फ़ैसले से खुश नज़र आते हैं और महिलाएँ इस फ़ैसले के पीछे दिए गए तर्कों से सहमत हैं. हालाँकि उनकी सहमति के पीछे कुछ निराशा झलक ही जाती है.

'गहने सीमित नहीं होने चाहिए'

कन्दाड़
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स्याणा जी की पत्नी अनारी देवी की आवाज़ में भी ये निराशा महसूस होती है.

वो कहती हैं, "सब गाँववालों का फ़ैसला हमने मान लिया. अफ़सोस तो हुआ लेकिन ठीक भी हुआ. जिनके पास पैसे नहीं हैं, वे गहने कैसे बना पाएँगे."

बीते दौर की बात करने पर अनारी देवी की आवाज़ में गहनों की खनक सुनाई देती है, "मेरी सास जी के पास बहुत सारे गहने थे. वे सब उनके बच्चों में बँट गए. अब गहने बनाना मुश्किल है. ऐसी भी महिलाएँ हैं जिनके पास इतने गहने नहीं हैं. गाँववालों ने सोचा कि सबको एक जैसा बनना चाहिए."

अनारी देवी का मानना है कि गहना महिलाओं की संपत्ति है, कभी कोई मुसीबत आ गई, बीमारी लगी, मकान बनाया तो यही गहना काम भी आता है.

गाँव की पंचायत का ये फ़ैसला सबसे पहले मुखिया के परिवार पर लागू हुआ. क़रीब 20 दिन बाद 29-30 अक्तूबर को स्याणा अर्जुन सिंह रावत के दो बेटों की शादी हुई.

चकराता के भंगार गाँव से विदा होकर कन्दाड़ की बहू बनकर आईं रेखा चौहान अपने गहनों की तरफ़ देखकर कहती हैं, "गहने सुंदरता बढ़ाते हैं. कुछ महिलाएँ चाहती हैं कि गहने सीमित नहीं होने चाहिए. हालाँकि एक हिसाब से यह फ़ैसला ठीक भी है, हर किसी की आर्थिक स्थिति एक जैसी नहीं होती."

'सामाजिक समानता का प्रयास'

कन्दाड़ गाँव की ज्यादातर महिलाएँ गहने के फ़ैसले पर बात करने से बचती हैं. कविता रावत (सबसे दायीं ओर) फ़ैसले से सहमति जताती हैं.

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इमेज कैप्शन, एक पुरानी एल्बम दिखाती हुईं सुनीता देवी गाँव के रीति-रिवाज़ों के बारे में बताती हैं

साल 2000 में सोने का भाव क़रीब 5,000 रुपए प्रति 10 ग्राम से भी कम था.

2025 आते-आते एक लाख रुपए प्रति 10 ग्राम का आँकड़ा पार हो गया. जिस तेज़ी से सोने के भाव बढ़े, किसानों की आमदनी कहीं पीछे छूट गई.

दोपहर के भोजन के बाद अमृता रावत काम करने के लिए खेतों की तरफ जाती दिखीं.

वह कहती हैं, "खेती में बहुत आमदनी नहीं होती. नौकरीपेशा वाले ही अब गहने बना सकते हैं. बाहर की औरत सुंदर होती है. गाँव की औरत बेचारी धूप में काम कर तप जाती है. सबको लगता है कि काश हमारे पास ऐसा गहना होता. अब सब तीन गहने ही पहन सकते हैं. इससे समानता आएगी और दूसरे गाँवों में भी सीख जाएगी."

जौनसार बावर अपनी उन्नत खेती के लिए भी जाना जाता है.

यहाँ की काश्तकार कविता रावत बताती हैं, "हम सुबह 5 बजे उठ जाते हैं, खाना बनाकर खेतों में आ जाते हैं और दोपहर 12 बजे वापस घर लौटकर खाना खाते हैं और फिर खेतों में आ जाते हैं. हमें सुबह-शाम पशुओं को चारा देना होता है. हमारे पास आराम करने का कोई समय नहीं होता."

"जब त्योहार या शादियाँ होती हैं, तो गाँव की सारी महिलाएँ इकट्ठा होती हैं. हम गीत गाते हैं. अपने गहने पहनते हैं. ज़रूरत पड़ने पर काम भी आता है."

हालाँकि गाँव की ज़्यादातर महिलाएँ इस मुद्दे पर चुप ही रहना चाहती हैं.

गाँव के पुरुष किसान महसूस कर रहे हैं कि सोने के गहने गाँव में अमीर-ग़रीब की खाई को गहरा कर रहे हैं.

'साल भर की कमाई जितना है एक तोला सोना'

उत्तराखंड

कन्दाड़ गाँव के जीत सिंह रावत खेती करते हैं, जबकि उनका एक भाई देहरादून शहर में बैंक में मैनेजर है. दूसरा भाई सरकारी नौकरी में है.

वह कहते हैं, "एक तोला सोना क़रीब सवा लाख का है और सवा लाख हमारी साल भर की कमाई है. हम कहाँ से ले पाएँगे सोना. शादी-ब्याह में जब परिवार की सारी महिलाएँ इकट्ठा बैठती हैं, तो शहरों में रह रही हमारी भाभियों के पास रानीहार होता है, बड़ी-बड़ी कंडुड़ियाँ (कान के झुमके) होती हैं, कोई बड़ी नथ लगाती हैं."

"हम लोग जो दिन रात खेतों में मेहनत करते हैं, सब्ज़ियाँ उगाते हैं, ये रानीहार ख़रीदना हमारे बस का नहीं. इसीलिए हमने यह फ़ैसला किया ताकि किसी महिला के दिल में ये न रहे कि मेरे पास कम गहने हैं और किसी के पास ज़्यादा गहने हैं."

सामाजिक कार्यकर्ता और चकराता समेत जौनसार बावर क्षेत्र के गाँवों में आजीविका को लेकर महिलाओं के साथ काम कर चुकी दीपा कौशलम कहती हैं, "सोशल मीडिया समेत बहुत जगह ये कहा जा रहा है कि महिलाओं के साथ अत्याचार हो रहा है और उन पर यह थोपा जा रहा है, मुझे लगता है कि ऐसी प्रतिक्रिया देने में जल्दबाज़ी है."

दीपा कहती हैं, "जौनसार बावर बहुत संगठित समाज है. यह इलाक़ा अपने फ़ैसले ख़ुद करता आया है. घरों में गहनों को लेकर झगड़े रहे होंगे तभी इस तरह का फ़ैसला हुआ. सांस्कृतिक समझ के साथ देखें कि इसका भावनात्मक पक्ष क्या है. जब आप अपने आप को किसी के सामने छोटा महसूस करते हैं, तो यह भावना बताई नहीं जा सकती, सिर्फ़ महसूस की जा सकती है."

'गहनों के लिए ज़मीन नहीं बेचेंगे'

चकराता के कन्दाड़ गांव की तस्वीर

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इमेज कैप्शन, गाँव वालों का कहना है कि देखा-देखी में गहने ख़रीदने का इतना दबाव बन जाता था कि कई लोग इसकी वजह से खेत बेच रहे थे या गिरवी रख रहे थे

दीपा कौशलम कहती हैं, "सोना एक तरह की संपत्ति है, ज़रूरत पड़ने पर जिसका लाभ पुरुष भी लेते हैं. लेकिन ये महिलाओं के अस्तित्व से नहीं जुड़ा है. महिलाओं की असल संपत्ति उनका आत्मविश्वास, शिक्षा, समाज में उनका स्थान और फ़ैसले लेने की ताक़त है, न कि सोना पहनना."

इंद्रौली गाँव के अरविंद सिंह चौहान कन्दाड़ ग्राम सभा के ग्राम प्रधान हैं और वह गाँव के सामूहिक फ़ैसले से निर्विरोध प्रधान चुने गए.

अरविंद गाँव की महिलाओं का धन्यवाद देते हैं कि उन्होंने इस फ़ैसले में अपनी हामी भरी.

वह कहते हैं, "यह गाँव में समानता लाने का प्रयास है. हमारे यहाँ परिवार के पहले बेटे की शादी बहुत धूमधाम से की जाती है. किसी ने 10-20 लाख रुपए के गहने लिए, तो दूसरे परिवारों पर गहने ख़रीदने का दबाव बन जाता था. कई लोग इसकी वजह से खेत बेच रहे थे या गिरवी रख रहे थे. गहनों के लिए ज़मीन बेचनी पड़े तो क्या फायदा."

अरविंद बताते हैं कि कन्दाड़ ग्रामसभा के दो अन्य गाँव बांगियासेड़, सैंतोली ने भी सीमित गहनों का ये फ़ैसला मान लिया है.

इसके साथ ही, क्षेत्र के अन्य गाँव भी सामूहिक बैठकें कर ये फ़ैसला अपने गाँवों में लागू कर रहे हैं.

'जनजातीय महिलाओं के अधिकार'

कन्दाड़ गांव की सुनीता देवी घास लेने के लिए खेत जाती हुईं

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इमेज कैप्शन, जनजातीय क्षेत्र जौनसार में महिलाओं को अलग तरह के अधिकार और आज़ादी हासिल है

इन्हीं में से एक, ये फ़ैसला लागू करने वाला, चकराता तहसील का खारसी गाँव भी है.

गाँव के युवा सुरेश चौहान कहते हैं, "कन्दाड़ गाँव के सीमित गहनों के फ़ैसले के बाद से ही हमारे गाँव में भी इस पर विचार शुरू कर दिया गया. बाहर के लोगों को लग रहा है कि हम महिलाओं पर दबाव बना रहे हैं कि आप कम गहने पहनें. हमारे क्षेत्र में महिलाओं का बहुत सम्मान है. हम जनजातीय समाज हैं और महिलाओं के फ़ैसले का सम्मान करते हैं. अगर कोई महिला किसी मुद्दे को लेकर सर पर पहनने वाला अपना पग उतार दे तो उस समय वो जो कुछ कहेगी, सभी को मानना ही होगा."

अपने तर्क को पुख़्ता करने के लिए सुरेश पारंपरिक प्रथा का उदाहरण देते हैं, "हमारे क्षेत्र में अगर महिला को कोई पुरुष पसंद नहीं है, तो वह उससे शादी करने के लिए मना कर सकती है और दोबारा शादी करने के लिए स्वतंत्र है, अगर वह भी पसंद नहीं आया तो उसे भी छोड़ सकती है, इतनी आज़ादी कौन सा समाज दे सकता है."

दीपा के मुताबिक़ जिस तरह युवाओं की नीति बनाने से पहले युवाओं को शामिल किया जाना चाहिए, वैसे ही महिलाओं से जुड़ी नीति बनाने में महिलाओं को शामिल करना ही चाहिए.

'शराब पर प्रतिबंध क्यों नहीं'

कन्दाड़ गाँव की अनारी देवी अपी गोद में लिए बच्चे को एक खिलौने से बहलाती हुईं.

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इमेज कैप्शन, गहनों से जुड़े इस फ़ैसले से जौनसार बावर के गाँवों में ख़ूब हलचल है, अब कई गाँवों में 'पक्की शराब' पर भी प्रतिबंध लगाया गया है

गहने से जुड़े इस फ़ैसले से जौनसार बावर के गाँवों में ख़ूब हलचल है. एक मांग यह भी उठ रही है कि जब घरेलू झगड़ों और ख़र्च की वजह से गहने सीमित किए जा रहे हैं, तो शराब क्यों नहीं?

कन्दाड़ गाँव के टीकम सिंह हामी भरते हैं कि क्षेत्र के युवा नशे में बर्बाद हो रहे हैं, "हम पक्की शराब (वाइन शॉप से ख़रीदी गई) की रोकथाम की तैयारी कर रहे हैं. हालाँकि ऐसा कोई फ़ैसला अभी लागू नहीं हुआ है."

वहीं, खारसी गाँव में पक्की शराब पीना और पिलाना प्रतिबंधित किया गया है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.