बांग्लादेश: शेख हसीना सरकार के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन, आम चुनाव से पहले कितनी बड़ी चुनौती?- दुनिया जहान

ढाका में सरकार विरोधी प्रदर्शन

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बांग्लादेश एशिया प्रशांत क्षेत्र की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है.

पश्चिमी देशों की कई बड़ी फ़ैशन कंपनियों के लिए बांग्लादेश का कपड़ा उद्योग सबसे बड़ा सप्लायर है. लेकिन बांग्लादेश में लगातार विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं. बढ़ती महंगाई देश की आर्थिक सफलता पर सवालिया निशान लगा रही है.

अगले साल जनवरी में बांग्लादेश में आम चुनाव होने वाले हैं मगर उससे पहले बांग्लादेश की नेता शेख हसीना की सत्ता पर मजबूत होती पकड़ से जनता को चुनौती मिल रही है.

विपक्षी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) उन पर इस्तीफ़ा देने के लिए दबाव डाल रही है. बीएनपी का कहना है कि अगर चुनाव से पहले तटस्थ अंतरिम सरकार नहीं बनी तो वो चुनाव का बहिष्कार करेगी.

उधर, शेख हसीना की सरकार लोकतंत्र को कमज़ोर करने के आरोपों का खंडन कर रही है.

सरकार हज़ारों प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ कड़े कदम उठा रही है. सरकार और विपक्ष अपनी-अपनी बात पर अड़े हुए हैं. तो इस हफ्ते दुनिया जहान में हम यही जानने की कोशिश करेंगे कि बांग्लादेश में उथल पुथल क्यों है?

ढाका में सरकार विरोधी प्रदर्शन

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कैसे बना बांग्लादेश

लगभग 200 सालों के ब्रिटिश शासन के बाद 1947 में जब भारत आज़ाद हुआ तो दो देश बने. भारत और पाकिस्तान. पाकिस्तान में अधिकतर मुसलमान आबादी थी.

बीबीसी की बांग्ला सेवा के पूर्व संपादक साबिर मुस्तफा कहते हैं कि पाकिस्तान दो धड़ों में बंटा था.

एक हिस्सा भारत के पूर्व में और दूसरा पश्चिम में था. पाकिस्तान के इन दो धड़ों के बीच भारत की लगभग डेढ़ हज़ार किलोमीटर भूमि थी. हालांकि इन दोनों धड़ों में समान बात वहां का मज़हब था लेकिन संस्कृति और भाषा अलग थी.

साबिर मुस्तफ़ा कहते हैं कि जब पाकिस्तान के नेताओं ने उर्दू को आधिकारिक राष्ट्रभाषा घोषित किया तो विद्रोह भड़क उठा.

पूर्व पत्रकार साबिर मुस्ताफा

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उर्दू को आधिकारिक राष्ट्रभाषा बनाने के फ़ैसले के ख़िलाफ़ पूर्वी पाकिस्तान में जो भाषा आंदोलन शुरू हुआ वो बाद में स्वायत्तता की मांग के आंदोलन में बदल गया. पश्चिमी पाकिस्तान के नेताओं ने इसे बलपूर्वक कुचलने की कोशिश की. मगर आंदोलन जारी रहा और उसका नेतृत्व करिश्माई नेता शेख़ मुजीबुर्ररहमान के हाथों में आ गया.

साबिर मुस्तफा कहते हैं, “वो बहुत प्रभावशाली वक्ता और कुशल संगठनकर्ता थे. लोग उन्हें पसंद करते थे. अपनी पार्टी पर ही नहीं बल्कि जनता पर भी उनकी अच्छी पकड़ थी. मध्यवर्ग के बुद्धिजीवियों में भी वो लोकप्रिय थे क्योंकि वो स्वायत्तता का मुद्दा उठा रहे थे.”

शेख़ मुजीबुर्ररहमान की लोकप्रियता इस कदर बढ़ती गयी कि जब 1971 में पाकिस्तान में आम चुनाव हुए तो बड़ी आबादी वाले पूर्वी पाकिस्तान में उनकी पार्टी अवामी लीग ने लगभग सभी सीटों पर जीत हासिल की जिसके चलते पूरे पाकिस्तान में शेख़ मुजीबुर्रहमान को बहुमत हासिल हो गया.

उनकी विचारधारा पश्चिमी पाकिस्तान के नेताओं के साथ मेल नहीं खाती थी. पाकिस्तान के गठन में धर्म की बड़ी भूमिका थी जबकि शेख़ मुजीबुर्ररहमान की विचारधारा में उसे वैसी प्राथमिकता नहीं मिल रही थी.

बांग्लादेश का नक्शा

साबिर मुस्तफा कहते हैं, “पाकिस्तान की सेना को लगा कि बंगालियों को धर्मनिरपेक्ष विचारों ने भ्रष्ट कर दिया है. और अब वो सही मायने में मुसलमान नहीं रहे हैं. इसलिए पहले से मुसलमान रहे बंगालियों के इस्लामीकरण की मुहिम शुरू की गयी जो कि एक अजीब बात थी."

"चूंकि बंगाली राष्ट्रवाद की जड़ में धर्मनिरपेक्षता थी तो पूर्वी पाकिस्तान में उसे कुचलने के लिए धर्मनिरपेक्षता के हर निशान को मिटाने की कोशिश की गयी.”

नतीजतन जंग शुरू हो गयी. नौ महीनों तक चली हिंसा के बाद पड़ोसी देश भारत ने पूर्वी पाकिस्तान की जनता की अलग होने की आकांक्षाओं का समर्थन करते हुए युद्ध में हस्तक्षेप किया.

16 दिसंबर 1971 को एक नए देश, बांग्लादेश का जन्म हुआ. उसके पहले नेता शेख़ मुजीबुर्रहमान थे. लेकिन कुछ ही सालों के बाद देश में सूखे और कम्युनिस्ट आंदोलन के दौरान उनकी सरकार का तख़्ता पलट दिया गया.

साबिर मुस्तफा ने बताया कि 1975 में सेना के अधिकारियों के एक गुट ने उनकी हत्या कर दी और उनके साथ उनके लगभग पूरे परिवार को मौत के घाट उतार दिया.

वे बताते हैं कि मगर उनकी बेटियां शेख़ हसीना और रेहाना बच गयीं क्योंकि वो उस समय जर्मनी में थीं. लेकिन बाकी परिवार की हत्या कर दी गयी जिसमें शेख़ मुजीबुर्ररहमान का दस साल का बेटा भी शामिल था.

अगले लगभग पंद्रह सालों तक बांग्लादेश सैनिक तानाशाही की गिरफ़्त में रहा. 1990 में देश में लोकतंत्र बहाल हुआ. इसका श्रेय काफ़ी हद तक दो ताकतवर महिलाओं के प्रयासों को जाता है.

इनमें से एक थी ख़ालिदा ज़िया जो पूर्व सैन्य शासक ज़ियाउर्ररहमान की पत्नी थीं. ज़ियाउर्ररहमान की भी हत्या कर दी गयी थी.

दूसरी नेता थीं शेख़ मुजीबुर्ररहमान की बेटी, शेख़ हसीना. साबिर मुस्तफ़ा कहते हैं कि शुरूआत में इन दोनो नेताओं के बीच संबंध ठीक थे. लेकिन धीरे धीरे राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के चलते मुक़ाबला और कटुता बढ़ती गयी.

कटुता की एक वजह यह थी कि शेख़ हसीना मानती थीं कि उनके पिता की हत्या में ख़ालिदा ज़िया के पति ज़ियाउर्ररहमान भी शामिल थे. बांग्लादेश में इन्हीं दोनो नेताओं की पार्टियां प्रमुख राजनीतक दल थे. इस वजह से आने वाले तीस सालों तक चुनाव के बाद सत्ता एक से दूसरे नेता के हाथों में आती जाती रही.

बीएनपी के समर्थक

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ख़ालिदा ज़िया और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी

1975 में शेख़ मुजीबुर्ररहमान की हत्या के बाद बांग्लादेश सैनिक शासन की गिरफ़्त में आ गया. 1981 में सैनिक शासक ज़ियाउर्ररहमान की भी हत्या कर दी गयी. वो बांग्लादेश की एक प्रमुख पार्टी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के नेता भी थे.

उनकी पत्नी ख़ालिदा ज़िया तब तक राजनीति से दूर थीं. लेकिन पति की मौत के बाद पार्टी को आगे ले जाने की ज़िम्मेदारी उन पर आ गयी.

सोएस यूनिवर्सिटी में रीडर अविनाश पालीवाल कहते हैं, “ 1980 के दशक में जब ख़ालिदा ज़िया ने राजनीति में प्रवेश किया तो उन्हें पार्टी के बीच गुटबंदी और पुरुषों के वर्चस्व का सामना करना पड़ा. लेकिन उन्होंने पार्टी को दोबारा संगठित किया. आम जनता में पैठ जमायी और बांग्लादेश की पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं."

अविनाश पालीवल कहते हैं कि इस सफ़लता का एक कारण ख़ालिदा ज़िया का व्यक्तित्व भी था.

वो कहते हैं, “माना जाता है कि नब्बे के दशक में प्रधानमंत्री बनने के बाद पहले कुछ सालों तक वो परिवार और पार्टी के गिने-चुने लोगों की सलाह पर काम करती थीं. बीएनपी में इस्लामी रूढ़िवादी गुट और बांग्लादेशी वामपंथी गुटों का प्रभाव भी था. उनमें पार्टी के विभिन्न गुटों के साथ समन्वय और संतुलन बना कर काम करने की क्षमता थी. वो कम बोलती थीं और पृष्ठभूमि में रहकर काम करना पसंद करती थीं. शायद यही उनकी कामयाबी का राज़ भी था.”

1991 में देश का नेतृत्व संभालने के बाद उन्होंने पाकिस्तान से नज़दीकी संबंध बनाए और भारत से कुछ दूरी बना ली.

अविनाश पालीवाल

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अविनाश पालीवाल कहते हैं कि बांग्लादेश में भारत विरोधी भावनाओं को चुनाव में भुनाने में बीएनपी को कोई झिझक नहीं रही है.

अब आम चुनाव सामने हैं और बीएनपी के पास सत्ता में लौटने का मौका है. मगर उसके सामने सबसे बड़ी समस्या है ज़मीन पर नेताओं की कमी.

अविनाश पालीवाल के अनुसार बीएनपी के संगठन पर पिछले दस सालों में सुनियोजित तरीके से हमले किए गए हैं. बीएनपी के लगभग दस हज़ार नेताओं और कार्यकर्ताओं को जेल में बंद कर दिया गया है. पार्टी का बांग्लादेश का लगभग पूरा का पूरा नेतृत्व जेल में बंद है. सरकार, पुलिस और ख़ुफ़िया एजेंसियों ने उनके ख़िलाफ़ जमकर अपनी ताकत का इस्तेमाल किया है.

बांग्लादेश की मौजूदा सरकार ने हज़ारों विपक्षी कार्यकर्ताओं को जेल में बंद कर दिया है जिससे उसकी लोकतांत्रिक विश्वसनियता पर सवाल उठने लगे हैं.

सवाल यह है कि सरकार इस बात से चिंतित क्यों नहीं है? इसका जवाब ढूंढने के लिए हमें उस दूसरी महिला को गहराई से समझना होगा जो 'देश के राष्ट्रपिता' की बेटी हैं और पिछले पंद्रह सालों से बांग्लादेश पर शासन कर रही हैं.

बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना

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सत्ता का मोह

शेख़ हसीना जब छोटी थीं तब किसी को उम्मीद नहीं थी कि वो बड़ी होकर राजनीति में अपने पिता की जगह लेंगी क्योंकि उनके दो बड़े भाई भी थे. लेकिन अपनी प्रतिद्वंद्वी ख़ालिदा ज़िया की तरह त्रासदी के कारण वो राजनीति में आयीं.

अपने माता पिता और भाइयों की हत्या के बाद शेख़ हसीना कई सालों तक विदेश में रहीं. लेकिन सैनिक शासन के दौरान ही 1981 में वो बांग्लादेश आ गयीं और अवामी लीग पार्टी का नेतृत्व संभाल लिया.

इलनॉय यूनिवर्सिटी में राजनीति शास्त्र के प्रोफ़ेसर अली रियाज़ कहते हैं कि जब शेख हसीना बांग्लादेश पहुंची तब पार्टी को उनकी ज़रूरत थी.

अली रियाज

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जब 1991 में बांग्लादेश में लोकतंत्र बहाल हुआ तो चुनाव में जीत ख़ालिदा ज़िया की हुई. मगर पांच साल बाद शेख़ हसीना सत्ता पाने में कामयाब हो गयीं.

अली रियाज़ के अनुसार अपने पहले कार्यकाल में 1996 से 2001 तक उन्होंने नरमपंथी नीतियां अपनाई थीं. उन्होंने अन्य गुटों के साथ मिल कर काम करने की कोशिश की और संसद का कामकाज चलता रहा. देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी थी. कुछ हद तक देश लोकतांत्रिक तरीके से काम करता रहा.

लेकिन एक ही कार्यकाल के बाद अगले चुनाव में उनकी हार हुई. 2004 में उन पर एक जानलेवा हमला भी हुआ मगर वो बच गयीं. उसके बाद 2006 में वो दोबारा चुनाव जीत कर सत्ता में आयीं. इस बार वो तय कर चुकी थीं कि अब वो सत्ता नहीं छोड़ेंगी.

अली रियाज़ का मानना है कि धीरे धीरे उनका नेतृत्व तानाशाहों जैसा बनता गया. विचारों की अभिव्यक्ति पर अंकुश लगा दिए गए. लोगों के इकठ्ठा होने पर पाबंदियां लग गयीं.

प्रोफ़ेसर अली रियाज़ कहते हैं कि शेख़ हसीना ने यह कह कर इन कदमों का जायज़ ठहराया कि इनके चलते देश आर्थिक तरक्की की राह पर निकल पड़ा है.

2009 के आते आते बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था दक्षिण एशिया की सबसे मज़बूत अर्थव्यवस्था बन गयी थी. लेकिन वो अब जवान नहीं हैं तो यह सवाल उठने लाज़मी है कि उनके बाद नेतृत्व उनके परिवार में से किसी को मिलेगा या कोई और नेता आ सकता है?

दूसरी चिंता यह है कि जनवरी 2024 में होने वाले चुनाव, क्या लोकतांत्रिक और निष्पक्ष तरीके से हो पाएंगे?

अली रियाज़ इस पर संदेह जताते हुए कहते हैं, “विपक्ष के लगभग सभी बड़े नेता और कार्यकर्ता जेल में बंद हैं. मुझे नहीं लगता कि जब चुनाव होंगे तो मैदान में कोई ताकतवर विपक्ष होगा.”

ढाका में इस्लामी आंदोलन बांग्लादेश के कार्यकर्ताओं का प्रदर्शन

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बांग्लादेश पर दुनिया की नज़र

स्टेट्स पीस इंस्टीट्यूट के दक्षिण एशिया विशेषज्ञ डॉक्टर जेफ़्री मैक्डोनाल्ड कहते हैं कि बांग्लादेश के आगामी चुनावों में बांग्लादेशी जनता ही नहीं बल्कि दुनिया की गहरी रुचि है.

वो कहते हैं, “बांग्लादेश की सड़कों पर विरोध प्रदर्शन बढ़ रहे हैं. पहले उनका स्तर छोटा था लेकिन अब वो फैल रहा है, हड़ताल का आह्वान किया जा रहा है."

"लोग बड़ी संख्या में सड़कों पर उतर रहे हैं. इसका अर्थ है कि विपक्ष की लोकप्रियता बढ़ रही है. जनता में सरकारी तंत्र के ख़िलाफ़ नाराज़गी दिखाई दे रही है और वो चुनाव में उसको जवाब देने की तैयारी कर रही है.”

बांग्लादेश के चुनाव में केवल उसकी जनता ही नहीं बल्कि पड़ोसी देशों की भी गहरी रुचि हैं. ख़ास तौर पर भारत की.

डॉक्टर जेफ़्री मैक्डोनाल्ड कहते हैं, “भारत के बांग्लादेश की सत्ताधारी अवामी लीग पार्टी के साथ घनिष्ठ संबंध हैं. व्यापार, ऊर्जा, संपर्क और अतिवादी गतिविधियों संबधी कई मुद्दों पर वो बांग्लादेश के साथ सहयोग चाहता है."

जेफ्री

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जेफ़्री मैक्डोनाल्ड के अनुसार जिस प्रकार भारत के हित बांग्लादेश के साथ जुड़े हुए हैं उसी वजह से चीन को लिए भी बांग्लादेश महत्वपूर्ण है और उसके भी संबंध अवामी लीग के साथ अच्छे हैं.

चीन के प्रभाव को देखते हुए अमेरिका के लिए भी बांग्लादेश महत्वपूर्ण है. बांग्लादेश के आगामी चुनावों पर अमेरिका की भी नज़र होगी और वह चाहेगा कि चुनाव लोकतांत्रिक तरीके से हों. अगर ऐसा नहीं होता तो क्या अमेरिका उस पर आर्थिक और कूटनीतिक दबाव डालेगा या नहीं यह देखने वाली बात है.

यूरोपीय संघ भी चाहता है कि बांग्लादेश में लोकतंत्र बरकरार रहे. लेकिन अगर विपक्षी दल बीएनपी चुनाव का बहिष्कार करती है तो क्या यह संभव हो पाएगा?

डॉक्टर जेफ़्री मैक्डोनाल्ड ने कहा, “दोनों पक्ष अपनी बात पर अड़े हुए हैं. नज़दीकी भविष्य में इसका हल निकलता नहीं दिख रहा. ऐसे चुनावों की संभावना भी दूर लगती है जिसमें बांग्लादेशी जनता की लोकतांत्रिक आकांक्षा पूरी हो पाएं. ऐसे में देश में अस्थिरता फैलने की संभावना बढ़ जाएगी.”

अब लौटते हैं अपने मुख्य प्रश्न की ओर- बांग्लादेश में उथल पुथल क्यों है?

1971 से ही बांग्लादेश में लोकतंत्र की जड़ें मज़बूत नहीं हो पायी थीं. देश की वर्तमान नेता शेख़ हसीना 2009 से सत्ता में हैं और सत्ता पर अपनी पकड़ मज़बूत कर चुकी हैं. वहीं मुख्य विपक्षी दल बीएनपी की नेता ख़ालिदा ज़िया की सेहत ठीक नहीं है और उनकी पार्टी के कई बड़े नेता और कार्यकर्ता जेल में बंद हैं. आम जनता महंगाई की मार से तंग आ गयी है और निष्पक्ष चुनाव की मांग के लिए सड़कों पर प्रदर्शन कर रही है.

बांग्लादेश में उथल-पुथल का एक कारण यह भी है कि देश की दो प्रमुख नेताओं के बीच तीस साल लंबी प्रतिद्वंद्विता अब अपने अंतिम चरण में पहुंच गई है. शेख़ हसीना भी सत्तर वर्ष से अधिक की हो चुकी हैं और उत्तराधिकार का मुद्दा भी सामने है. हाल में तरक्की करने के बाद अब बांग्लादेश में एक नया युग शुरू होने जा रहा है जिसे लेकर कई अनिश्चितताएं हैं.

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