जब इंदिरा गांधी ने शेख हसीना को दी थी भारत में शरण

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- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी हिन्दी
बांग्लादेश में हिंसक विरोध प्रदर्शनों के बीच शेख़ हसीना ने पांच अगस्त को बांग्लादेश के प्रधानमंत्री पद से इस्तीफ़ा देकर देश छोड़ दिया है.
76 साल की शेख़ हसीना 17 करोड़ से ज़्यादा जनसंख्या वाले बांग्लादेश की साल 2009 से प्रधानमंत्री थीं.
बांग्लादेश में सरकारी नौकरियों में आरक्षण को लेकर छात्र पिछले महीने से विरोध प्रदर्शन कर रहे थे.
इस आरक्षण के तहत 1971 में बांग्लादेश की आज़ादी के लिए लड़ने वालों स्वतंत्रता सेनानियों के परिजनों को 30 फ़ीसद आरक्षण दिया जा रहा था.
हालांकि, बाद में बांग्लादेश के सुप्रीम कोर्ट ने इस कोटा व्यवस्था को लगभग समाप्त ही कर दिया. लेकिन प्रदर्शनकारी शेख़ हसीना के इस्तीफ़े की मांग पर अड़े रहे.
इस घटना से पहले शेख़ हसीना भारत में शरण ले चुकी हैं और तब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी थीं.

'इंदिरा गांधी ने खु़द वो कॉल रिसीव की'

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15 अगस्त, 1975: शेख़ हसीना, उनके पति डाक्टर वाज़ेद और बहन रेहाना ब्रसेल्स में बांग्लादेश के राजदूत सनाउल हक के यहाँ ठहरे हुए थे.
वहाँ से उनको पेरिस जाना था, लेकिन एक दिन पहले ही डाक्टर वाज़ेद का हाथ कार के दरवाज़े में आ गया.
अभी वो लोग सोच ही रहे थे कि पेरिस जाएं या न जाएं, सुबह साढ़े छह बजे राजदूत सनाउल हक के फ़ोन की घंटी बजी.
दूसरे छोर पर जर्मनी में बांग्लादेश के राजदूत हुमायूं रशीद चौधरी थे.
उन्होंने बताया कि आज सुबह ही बांग्लादेश में सैनिक विद्रोह हो गया है. आप पेरिस न जा कर तुरंत जर्मनी वापस आइए.
जैसे ही राजदूत सनाउल हक को पता चला कि सैनिक विद्रोह में शेख़ मुजीब मारे गए हैं, उन्होंने उनकी दोनों बेटियों और दामाद को कोई भी मदद देने से इंकार कर दिया.
और तो और उन्होंने उनसे अपना घर छोड़ देने के लिए भी कहा.
2016 में शेख़ मुजीब की बरसी पर आयोजित एक कार्यक्रम में उस घटना को याद करते हुए शेख़ हसीना ने कहा था, "हम जैसे उनके लिए बोझ बन गए, हालांकि उन्हें शेख़ मुजीब ने ही बेल्जियम में बांगलादेश का राजदूत बनाया था और वो एक राजनीतिक नियुक्ति थीं. उन्होंने हमें जर्मनी जाने के लिए कार देने से भी मना कर दिया."

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बहरहाल वो लोग किसी तरह जर्मनी में बांग्लादेश के राजदूत हुमायूं रशीद चौधरी की मदद से जर्मनी पहुंचे.
इसके आधे घंटे के भीतर यूगोस्लाविया के दौरे पर आए बांग्लादेश के विदेश मंत्री डॉक्टर कमाल हुसैन भी वहां पहुंच गए.
उसी शाम को जर्मन प्रसारण संस्था डॉयचेवेले और कुछ जर्मन अख़बारों के संवाददाता उनकी टिप्पणी लेने राजदूत के घर आ गए.
शेख़ हसीना और उनकी बहन रेहाना इतने सदमे में थीं कि उन्होंने उनसे कोई बात नहीं की.
विदेश मंत्री कमाल हुसैन ने भी एक शब्द नहीं कहा, हालांकि वो वहाँ मौजूद थे.
राजदूत चौधरी ने ज़रूर कहा कि शेख़ की दोनों बेटियाँ उनके पास हैं.
इस बीच यूगोस्लाविया के राष्ट्रपति मार्शल टीटो ने उनका हालचाल तो पूछा लेकिन ये तय नहीं हो पा रहा था कि ये लोग अब रहेंगे कहाँ?

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हुमायूं रशीद चौधरी के बेटे नौमान रशीद चौधरी ने मशहूर बांगलादेशी अख़बार 'द डेली स्टार' के 15 अगस्त, 2014 के अंक में एक लेख लिखा.
'बंगबंधुज़ डॉटर्स' के नाम से लिखे लेख में उन्होंने बताया, "मेरे पिता ने एक राजनयिक समारोह में पश्चिमी जर्मनी में भारत के राजदूत वाई के पुरी से पूछा कि क्या भारत शेख़ हसीना और उनके परिवार को राजनीतिक शरण दे सकता है ? ''
''उन्होंने जवाब दिया वो पता करेंगे. अगले दिन वो मेरे पिता से मिलने उनके दफ़्तर आए और बोले कि आमतौर से भारत में राजनीतिक शरण देने की प्रक्रिया लंबी होती है. उन्होंने ही सुझाव दिया कि दिल्ली में आपकी काफ़ी ख्याति है क्योंकि आप आज़ादी से पहले वहाँ के बांग्लादेश मिशन के प्रमुख रह चुके हैं. आपको इंदिरा गाँधी और उनके सलाहकार डीपी धर और पीएन हक्सर पसंद करते हैं. आप क्यों नहीं उनसे संपर्क करते?"
पुरी की उपस्थिति में ही चौधरी ने डीपी धर और हक्सर को फ़ोन लगाया. लेकिन दोनों उस समय भारत से बाहर थे.
वो इंदिरा गाँधी को फ़ोन करने से हिचक रहे थे, क्योंकि उन दोनों के ओहदे में बहुत फ़र्क था. वो एक देश की प्रधानमंत्री थी जब कि चौधरी सिर्फ़ एक मामूली राजदूत.
वो इंदिरा गांधी से कई बार मिल ज़रूर चुके थे, लेकिन पिछले तीन वर्षों से उनका उनसे कोई संपर्क नहीं था.
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राजनीति में तीन साल का समय एक लंबा समय होता है. दूसरे भारत में उस समय आपातकाल लगा हुआ था और इंदिरा गाँधी ख़ुद अपनी परेशानियों से जूझ रही थी.
नौमान रशीद चौधरी लिखते हैं, "जब कहीं से कुछ होने के आसार नहीं दिखाई दिए तो हुमायूं चौधरी ने थक-हार कर इंदिरा गांधी के दफ़्तर फोन मिलाया. ये नंबर उनको भारतीय राजदूत पुरी ने दिया था. चौधरी उम्मीद नहीं कर रहे थे कि ये कॉल टेलिफ़ोन ऑपरेटर के आगे तक जा पाएगी. लेकिन वो दंग रह गए जब इंदिरा गांधी ने खुद वो कॉल रिसीव की. उन्होंने इंदिरा गांधी को सारी बात बताई. वो बंगबंधु की बेटियों को राजनीतिक शरण देने के लिए तुरंत तैयार हो गई."
19 अगस्त को राजदूत पुरी ने चौधरी को बताया कि उन्हें दिल्ली से निर्देश मिले हैं कि शेख़ मुजीब की बेटियों और उनके परिवार के दिल्ली पहुंचाने की तुरंत व्यवस्था की जाए.
यूरोप से भारत पहुंचीं शेख़ हसीना

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24 अगस्त, 1975 को एयर इंडिया के विमान से शेख़ हसीना और उनका परिवार दिल्ली के पालम हवाई अड्डे पहुंचा.
कैबिनेट के एक संयुक्त सचिव ने उनको रिसीव किया. पहले उनको रॉ के 56, रिंग रोड स्थित सेफ़ हाउस में ले जाया गया.
बाद में उनको डिफेंस कॉलॉनी के घर में स्थानांतरित किया गया. दस दिनों के बाद 4 सितंबर को रॉ के एक अफ़सर उन्हें लेकर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के निवास 1, सफ़दरजंग रोड पहुंचे.
शेख़ हसीना ने इंदिरा गांधी से मिलने के बाद उनसे पूछा, "क्या आपको पूरी जानकारी है कि 15 अगस्त को हुआ क्या था?"
वहाँ मौजूद एक अफ़सर ने बताया कि उनके परिवार का कोई सदस्य जीवित नहीं बचा है. ये सुनते ही शेख़ हसीना रोने लगीं.
शेख़ हसीना के जीवनीकार सिराजुद्दीन अहमद लिखते हैं, "इंदिरा गाँधी ने हसीना को गले लगा कर दिलासा देने की कोशिश की. उन्होंने कहा आपके नुक़सान की भरपाई नहीं की जा सकती. आपका एक बेटा और एक बेटी है. आज से आप अपने बेटे को अपना पिता और बेटी को अपनी माँ समझिए."

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सिराजुद्दीन अहमद के अनुसार शेख हसीना के भारत प्रवास के दौरान इंदिरा गाँधी से उनकी यही एक मुलाकात थी. जबकि रॉ के ख़ुफ़िया अधिकारियों का कहना है कि शेख़ हसीना और इंदिरा गाँधी के बीच कई मुलाकातें हुई थीं.
इस मुलाकात के दस दिन बाद शेख़ हसीना को इंडिया गेट के पास पंडारा पार्क के सी ब्लाक में एक फ़्लैट आवंटित कर दिया गया. इसमें तीन शयनकक्ष थे और थोड़ा बहुत फ़र्नीचर भी था. धीरे-धीरे उन्होंने कुछ फ़र्नीचर खरीदना शुरू किया.
उनको सख़्त ताकीद की गई कि वो लोगों से मिले जुलें नहीं और न ही घर से बाहर निकलें. उनको व्यस्त रखने के लिए उन्हें एक टेलीविजन भी दिया गया.
उस ज़माने में टेलीविजन पर सिर्फ़ एक चैनल दूरदर्शन का हुआ करता था और उस पर भी सिर्फ़ दो घंटे के लिए कार्यक्रम आते थे.
पहचान बदलकर सुरक्षा में तैनात थे अधिकारी

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रॉ के एक पूर्व ख़ुफ़िया अधिकारी नाम न छापे जाने की शर्त पर बताते हैं, "शेख़ हसीना की सुरक्षा के लिए दो लोगों को तैनात किया गया था, एक थे पंश्चिम बंगाल से बुलाए गए इंसपेक्टर सत्तो घोष और दूसरे थे 1950 बैच के आईपीएस अधिकारी पी के सेन. दिलचस्प बात ये थी कि इंस्पेक्टर घोष को कर्नल बता कर हसीना की सुरक्षा में लगाया गया था जबकि आईजी स्तर के पीके सेन को इंसपेक्टर के रूप में हसीना की सुरक्षा में रखा गया था. ये दोनों अधिकारी साए की तरह हसीना के साथ रहते थे."
1 अक्तूबर, 1975 को हसीना के पति डाक्टर वाज़ेद को भी परमाणु ऊर्जा विभाग में फ़ेलोशिप प्रदान कर दी गई.
रॉ के पूर्व अधिकारी बताते हैं, "शेख़ हसीना का सारा ख़र्चा भारत सरकार उठा रही थी. उनके ख़र्चे बहुत मामूली थे और ये धन उन्हें कोलकाता में रहने वाले उनके एक सूत्र चितरंजन सूतार के ज़रिए उपलब्ध कराया जाता था."
हांलाकि हसीना के दिल्ली प्रवास को पूरी तरह गुप्त रखने की कोशिश की गई थी, लेकिन बांग्लादेश की सरकार को पता था कि शेख़ हसीना का परिवार दिल्ली में रह रहा था.
1976 में मई की शुरुआत में भारत में बांगलादेश के उच्चायुक्त शमसुर रहमान और उनकी पत्नी शेख़ हसीना और उनकी बहन रेहाना से मिलने उनके निवास स्थान पर गए थे और दोनों बहनें उनसे लिपट कर रोई भी थीं.
शेख़ रेहाना 1976 में सीनियर सेकेंड्री स्कूल की परीक्षा देने वाली थी लेकिन बांग्लादेश में हुई घटनाओं के कारण उनकी पढ़ाई रुक गई थी.
जुलाई, 1976 में शाँतिनिकेतन में उनके दाखिले की व्यवस्था कराई गई गई थी, लेकिन सुरक्षा कारणों से बाद में ये विचार त्याग दिया गया.
24 जुलाई, 1976 को शेख़ रेहाना की शादी लंदन में शफ़ीक सिद्दीकी से हो गई. लेकिन हसीना और उनके पति इस शादी में शामिल नहीं हो सके.
मोरारजी देसाई ने शेख़ हसीना की सुरक्षा घटाई

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इस दौरान इंदिरा सरकार में मंत्री प्रणब मुखर्जी और उनका परिवार लगातार हसीना और उनके परिवार के संपर्क में था. कई बार हसीना के बच्चे प्रणब मुखर्जी के सरकारी मकान में खेलते देखे जाते थे.
अपनी आत्मकथा 'ड्रेमेटिक डिकेड' में प्रणब मुखर्जी लिखते हैं कि दोनों परिवार न सिर्फ़ अक्सर मिला करते थे बल्कि पिकनिक पर दिल्ली से बाहर भी जाया करते थे.
इस बीच 1977 के चुनाव हुए और इंदिरा गाँधी चुनाव हार गईं. नए प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई रॉ के अभियानों में कोई ख़ास रुचि नहीं लेते थे.
एम ए वाज़ेद मियाँ अपनी किताब, 'बंगबंधु शेख़ मुजीबुर रहमान' में लिखते है, "शेख़ हसीना और डाक्टर वाजेद रेहाना को दिल्ली लाने के सिलसिले में मोरारजी देसाई से अगस्त, 1977 में मिले थे. मोरारजी देसाई ने रेहाना के दिल्ली आने की व्यवस्था करवाई थी. रेहाना दिसंबर 1977 के दूसरे सप्ताह में दिल्ली आई भी थीं और शेख हसीना के पंडारा पार्क वाले फ़्लैट पर उनके साथ ठहरी थीं."
लेकिन धीरे धीरे मोरारजी देसाई ने हसीना की सुरक्षा से अपना हाथ खींचना शुरू कर दिया था.

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सिराजउद्दीन अहमद लिखते हैं, "धीरे धीरे डाक्टर वाज़ेद और हसीना पर इस तरह दबाव डाला जाने लगा था कि वो खुद ही भारत छोड़ कर कहीं और चले जाएं. पहले तो उनके बिजली के बिल का भुगतान रोक दिया गया और फिर उनसे वाहन की सुविधा भी वापस ले ली गई. डाक्टर वाज़ेद ने परमाणु ऊर्जा आयोग में अपने फ़िलोशिप को एक साल तक बढ़ाने का आवेदन किया, लेकिन तीन महीने तक उसका कोई जवाब नहीं आया, जिसकी वजह से उनके सामने वित्तीय समस्याएं उठ खड़ी हुईं. आख़िरकार बहुत झिझकते हुए मोरारजी ने उनकी फ़िलोशिप को सिर्फ़ एक साल और बढ़ाने के आदेश दिए."
जनवरी 1980 में इंदिरा गाँधी एक बार फिर सत्ता में आ गईं और शेख हसीना की सारी परेशानियाँ एक बार फिर से दूर हो गईं.
4 अप्रैल, 1980 को शेख़ हसीना अपने बच्चों के साथ रेहाना से मिलने लंदन के लिए रवाना हुईं.
1980 में ही अवामी लीग के कई नेता शेख़ हसीना से मिलने दिल्ली आए और उनसे ढाका चलने का अनुरोध किया.
डाक्टर वाज़ेद हसीना के ढाका जाने के पक्ष में नहीं थे. उनका मानना था कि हसीना को सीधे तौर पर राजनीति से दूर रहना चाहिए.

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आख़िरकार 17 मई, 1981 को शेख हसीना अपनी बेटी और अवामी लीग के नेता अब्दूस्समद आज़ाद और कोरबान अली के साथ ढाका के लिए रवाना हुई.
ढाका हवाई अड्डे पर करीब 15 लाख लोगों ने उनका स्वागत किया.
फ़रवरी 1982 मे डाक्टर वाज़ेद ने बांगलादेश परमाणु आयोग में ज्वाइन करने की अर्ज़ी दी. परमाणु आयोग ने उन्हें रहने के लिए मोहाखली में दो कमरों का घर दिया.
हसीना वाजेद उसी घर में उनके साथ रहीं और उनके बच्चों ने धनमोंडी के स्कोलस्का सेकेंडरी स्कूल में दाख़िला ले लिया.
(ये स्टोरी पहली बार 7 अप्रैल 2017 को बीबीसी हिन्दी पर प्रकाशित की गई थी.)
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