बांग्लादेश: पीएम शेख़ हसीना के ख़िलाफ़ छात्रों में इतना ग़ुस्सा क्यों है?

शेख़ हसीना

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इमेज कैप्शन, शेख़ हसीना पिछले 15 सालों से बांग्लादेश की प्रधानमंत्री हैं.
    • Author, अनबरासन एथिराजन
    • पदनाम, साउथ एशिया रीजनल एडिटर

बांग्लादेश की सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी नौकरियों में कोटा व्यवस्था में बदलाव कर स्वतंत्रता सेनानियों के बच्चों के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण को घटा दिया है.

अब तक यहां सरकारी नौकरियों में एक तिहाई नौकरियां, 1971 के युद्ध में पाकिस्तान के ख़िलाफ़ लड़ने वाले स्वतंत्रता सेनानियों के परिजनों के लिए आरक्षित थीं. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने अब इसे घटाकर 5 प्रतिशत कर दिया है.

बांग्लादेश की सरकार ने अभी तक सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय पर प्रतिक्रिया नहीं दी है.

बीते कुछ दिनों से यहां के विश्वविद्यालयों के हज़ारों छात्र सरकारी नौकरियों में कोटा प्रणाली के ख़िलाफ़ आंदोलन कर रहे हैं. शुक्रवार को विरोध प्रदर्शन हिंसक होने के बाद विपक्ष के कई नेताओं को भी हिरासत में लिए जाने की ख़बरें हैं.

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17 करोड़ की आबादी वाले बांग्लादेश के लिए सड़कों पर हो रहे विरोध प्रदर्शन कोई नई बात नहीं है. लेकिन हालिया विरोध प्रदर्शनों को अब तक का सबसे ख़राब प्रदर्शन बताया जा रहा है.

प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा में अब तक 100 से अधिक लोग मारे गए हैं. सिर्फ़ शुक्रवार को 50 से अधिक लोगों की मौत हुई है.

हालात बिगड़ते देख सरकार ने पूरे देश में इंटरनेट बंद कर दिया है और फ़ोन सेवाओं पर प्रतिबंध लगा दिया है.

विश्वविद्यालय के परिसरों में शुरू हुआ शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन अब देशव्यापी अशांति में बदल गया है.

प्रदर्शन करने वाले छात्रों का क्या कहना है?

बांग्लादेश आरक्षण आंदोलन

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इमेज कैप्शन, बांग्लादेश में शुक्रवार को प्रदर्शनकारियों ने कई सरकारी इमारतों में आग लगा दी.

बांग्लादेश में पब्लिक सेक्टर की एक तिहाई नौकरियां, साल 1971 में पाकिस्तान से आज़ादी के लिए लड़ने वाले लोगों के बच्चों के लिए आरक्षित हैं.

छात्रों का तर्क है कि यह प्रणाली भेदभावपूर्ण है. छात्र योग्यता के आधार पर भर्ती की मांग कर रहे हैं.

प्रदर्शन करने वालों का कहना है कि पुलिस और सत्ताधारी अवामी लीग की छात्र शाखा 'बांग्लादेश छात्र लीग' शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ बल का प्रयोग कर रही है. इसकी वजह से देश में बड़े पैमाने पर अशांति फैल रही है.

सरकार इन सभी आरोपों से इनकार करती रही है.

ढाका विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र की सहायक प्रोफे़सर डॉ. समीना लुथफ़ा ने बीबीसी को बताया, "अब केवल छात्र ही नहीं, बल्कि देश के सभी वर्गों के लोग इस विरोध आंदोलन में शामिल हो गए हैं."

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बांग्लादेश में कितने युवा नौकरियों की तालाश में?

बांग्लादेश दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि इस विकास से विश्वविद्यालय के छात्रों को रोज़गार नहीं मिला है.

अनुमान है कि क़रीब 1.8 करोड़ बांग्लादेशी युवा नौकरियों की तलाश में हैं. विश्वविद्यालय से निकले युवाओं को अपने साथ के कम पढ़े-लिखे साथियों की तुलना में ज़्यादा बेरोज़गारी का सामना करना पड़ता है.

बांग्लादेश रेडी-टू-वियर कपड़ों के निर्यात का एक पावर हाउस बन गया है. देश वैश्विक बाज़ार में लगभग 40 अरब डॉलर की क़ीमत के कपड़ों का निर्यात करता है.

यह क्षेत्र चालीस लाख से अधिक लोगों को रोज़गार देता है, जिनमें कई महिलाएं भी शामिल हैं. लेकिन यहां की युवा पीढ़ी का कहना है कि ये नौकरियां पर्याप्त नहीं हैं.

शेख़ हसीना पर भ्रष्टाचारियों का साथ देने का आरोप

प्रधानमंत्री शेख़ हसीना यहां 15 सालों से सत्ता पर हैं. उनके शासनकाल के दौरान बांग्लादेश की राजधानी ढाका में नई सड़कों, पुलों, कारखानों और यहां तक ​​​​कि मेट्रो रेल का निर्माण हुआ है.

पिछले एक दशक में बांग्लादेश की प्रति व्यक्ति आय तीन गुना हो गई है और विश्व बैंक का अनुमान है कि पिछले 20 वर्षों में 2.5 कोरड़ लोगों को ग़रीबी से बाहर निकाला गया है.

लेकिन कई लोग कहते हैं कि इस विकास का कुछ हिस्सा केवल शेख़ हसीना की अवामी लीग के क़रीबी लोगों की मदद कर रहा है.

डॉ. लुथफ़ा कहती हैं, "हम बहुत अधिक भ्रष्टाचार देख रहे हैं, ख़ासकर सत्ताधारी पार्टी के करीबियों के बीच. भ्रष्टाचार बेरोकटोक के लंबे समय से जारी है."

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इमेज कैप्शन, बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख़ हसीना

हाल के महीनों में बांग्लादेश के सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री शेख़ हसीना के कुछ पूर्व शीर्ष अधिकारियों के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार के आरोपों की चर्चा होती रही है. इनमें से एक पूर्व सेना प्रमुख, पूर्व पुलिस प्रमुख, वरिष्ठ कर अधिकारी और राज्य भर्ती अधिकारी शामिल हैं.

शेख़ हसीना ने पिछले हफ्ते एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था कि वह भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ कार्रवाई कर रही हैं. उन्होंने कहा कि यह काफ़ी लंबे समय से चली आ रही समस्या है.

ढाका में हुई इसी प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने कहा कि एक घरेलू सहायक (चपरासी) के ख़िलाफ़ कथित तौर पर 3.4 करोड़ डॉलर जमा करने की ख़बर के बाद कार्रवाई की गई है.

उन्होंने कहा, "वह हेलीकॉप्टर के बिना नहीं चल सकता. उसने इतने पैसे कैसे कमाए? यह जानने के बाद मैंने तुरंत कार्रवाई की."

हालांकि, पीएम शेख़ हसीना ने उस व्यक्ति का नाम नहीं बताया.

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इमेज कैप्शन, बांग्लादेश में आरक्षण के ख़िलाफ़ प्रदर्शन करते युवा.

'बांग्लादेश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव नहीं हो रहे'

बांग्लादेशी मीडिया की प्रतिक्रिया थी कि इतना पैसा केवल सरकारी ठेकों के लिए पैरवी, भ्रष्टाचार या रिश्वतखोरी से ही जमा किया जा सकता था.

बांग्लादेश में भ्रष्टाचार विरोधी आयोग ने शेख़ हसीना के सहयोगी और पूर्व पुलिस प्रमुख बेनज़ीर अहमद के ख़िलाफ़ कथित तौर पर अवैध तरीकों से लाखों डॉलर इकट्ठा करने के मामले में जांच शुरू की है. हालांकि बेनज़ीर ने आरोपों से इनकार किया है.

यह ख़बर देश के आम लोगों तक भी पहुंची, जो पहले ही महंगाई से परेशान हैं.

भ्रष्टाचार के आरोपों के अलावा, कई मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि पिछले 15 वर्षों में लोकतांत्रिक गतिविधि के लिए यहां जगह कम होती गई है.

ह्यूमन राइट्स वॉच की दक्षिण एशिया निदेशक मीनाक्षी गांगुली ने बीबीसी को बताया, "लगातार तीन बार से यहां स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव नहीं हुए हैं."

उन्होंने कहा, "शेख़ हसीना ने शायद लोगों के अपने नेता को चुनने के सबसे बुनियादी लोकतांत्रिक अधिकार से उन्हें वंचित किए जाने को लेकर उनके असंतोष के स्तर को कम करके आंका."

वीडियो कैप्शन, बांग्लादेश में बीते कई दिनों से आरक्षण के विरोध में प्रदर्शन हो रहे हैं.

सरकार पर मीडिया को भी दबाने का आरोप

यहां की मुख्य विपक्षी पार्टी, बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) ने साल 2014 और 2024 में चुनावों का बहिष्कार करते हुए कहा कि शेख़ हसीना के शासनकाल में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव संभव नहीं हैं. वे चाहते थे कि चुनाव एक निष्पक्ष कार्यवाहक प्रशासन के अधीन हो.

प्रधानमंत्री शेख़ हसीना अब तक इस मांग को नकारती आ रही हैं.

मानवाधिकार समूहों का यह भी कहना है कि पिछले 15 वर्षों में 80 से अधिक लोग लापता हुए हैं, और उनके परिवारवालों को उनके बारे में अब तक कोई जानकारी नहीं है. इनमें से कई सरकार के आलोचक रहे थे.

सरकार पर विरोधियों और मीडिया को दबाने के आरोप लगे हैं. ऐसा कहा जाता है कि शेख़ हसीना पिछले कुछ वर्षों में तेज़ी से निरंकुश हो गई हैं, लेकिन उनके मंत्री इन आरोपों से इनकार करते हैं.

डॉ. लुथफा कहती हैं, "सरकार और सत्तारूढ़ पार्टी के ख़िलाफ़ लोगों में लंबे समय से गुस्सा बढ़ रहा है. लोग अब अपना गुस्सा दिखा रहे हैं. जब लोगों के पास कोई रास्ता नहीं बचता तो वे विरोध प्रदर्शन का सहारा लेते हैं."

विरोध प्रदर्शन को लेकर सरकार का क्या रुख़ है?

शेख़ हसीना के मंत्रियों का कहना है कि प्रदर्शनकारियों के उकसाने वाली कार्रवाइयों के बावजूद सरकार ने अधिक संयम बरता है.

उनका कहना है कि विरोध प्रदर्शनों में विपक्ष और इस्लामी पार्टियों के समर्थक घुस आए हैं. सरकार का कहना है कि हिंसा की शुरुआत इन्होंने ही की है.

क़ानून मंत्री अनीसुल हक़ ने कहा कि सरकार मुद्दों पर चर्चा के लिए तैयार है.

सप्ताह की शुरुआत में उन्होंने बीबीसी से कहा था, "सरकार छात्र प्रदर्शनकारियों तक पहुंच रही है. जब कोई उचित तर्क होता है, तो हम सुनने को तैयार होते हैं."

जनवरी 2009 के बाद से बीते सप्ताह का छात्रों का विरोध प्रदर्शन पीएम शेख़ हसीना के सामने शायद अब तक की सबसे बड़ी चुनौती है.

इस मुश्किल का समाधान कैसे किया जाएगा यह इस बात पर निर्भर करेगा कि वह मौजूदा स्थिति से कैसे निपटती हैं और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वह जनता में बढ़ रहे गुस्से को कैसे कम करती हैं.

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