इसराइल के मामले में पीएम नरेंद्र मोदी ने कई परंपराओं की दीवार क्यों तोड़ी

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- Author, रजनीश कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- पढ़ने का समय: 7 मिनट
इसराइल के मामले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारतीय विदेश नीति की पुरानी पंरपराओं को तोड़ने वाले साबित हुए हैं.
भारत की विदेश नीति में कोई भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरह इसराइल को लेकर इतना खुलकर सामने नहीं आया.
17 सितंबर 1950 को भारत ने इसराइल को संप्रभु राष्ट्र के रूप में मान्यता दी थी. इसके बाद से किसी प्रधानमंत्री ने इसराइल का दौरा नहीं किया था. यानी क़रीब 76 साल बाद जुलाई 2017 में नरेंद्र मोदी इसराइल दौरा करने वाले पहले प्रधानमंत्री बने. यानी मोदी ने इसराइल नहीं जाने की परंपरा तोड़ी.
2017 में मोदी जब इसराइल गए तो कूटनीतिक परंपरा से अलग क़दम उठाते हुए रामल्ला में फ़लस्तीनी प्राधिकरण की अनदेखी की, जो नेतन्याहू के यरूशलम स्थित परिसर से मुश्किल से 30 मिनट की दूरी पर है.
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मोदी के दौरे में न तो फ़लस्तीन को लेकर समर्थन दिखा था, न ही इसराइल के साथ एक स्वतंत्र फ़लस्तीनी स्टेट का कोई उल्लेख हुआ था. पहले कोई भी अहम भारतीय नेता इसराइल का दौरा करता था तो रामल्ला भी ज़रूर जाता था.
दूसरे विश्व युद्ध के बाद ब्रिटिश साम्राज्य के पतन के दौरान नौ महीने के अंतर में भारत और इसराइल का आधुनिक राष्ट्र राज्य के रूप में जन्म हुआ था. लेकिन शुरू में भारत इसराइल से परहेज़ करता रहा.

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इसराइल पर भारत की दुविधा
शुरू में भारत ने इसराइल के गठन के ख़िलाफ़ वोट किया था. 1950 में भले भारत ने इसराइल को मान्यता दे दी थी लेकिन राजनयिक वनवास पीवी नरसिम्हा राव ने 1992 में ख़त्म किया था.
1984 के बाद भारत में पहली बार 2014 में किसी एक पार्टी को पूर्ण बहुमत मिला. ऐसे में नरेंद्र मोदी के पास वह आज़ादी थी कि इसराइल को लेकर अपने मन का फ़ैसला कर सकें और अब करते दिख रहे हैं.
नरेंद्र मोदी आठ साल बाद प्रधानमंत्री के रूप में दूसरी बार इसराइल के दौरे पर हैं. यह दौरा तब हो रहा है, जब इसराइल जिस ईरान को अपना दुश्मन मानता है, उस पर अमेरिका के हमले का ख़तरा मंडरा रहा है.
वेस्ट बैंक में इसराइली बस्तियों को लेकर यूएन प्रस्ताव के ज़रिए कई देशों ने निंदा की है. ईरान में भारत रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण चाबहार पोर्ट से बाहर होता दिख रहा है. इसके अलावा यूएई और सऊदी के बीच तनातनी की स्थिति है. सऊदी अरब और पाकिस्तान ने डिफेंस पैक्ट किया है, जिसमें एक पर हमला दोनों पर हमला माना जाएगा. ऐसे में पीएम मोदी का इसराइल दौरा काफ़ी अहम हो जाता है.
दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के पश्चिम एशिया अध्ययन केंद्र में असोसिएट प्रोफ़ेसर मोहम्मद मुदस्सिर क़मर कहते हैं, ''पश्चिम एशिया में इतना कुछ चल रहा है, जहाँ इसराइल कई मामलों में अलग-थलग दिख रहा है. ऐसे में पीएम मोदी का जाना, पहली नज़र में लगता है कि समय कुछ और हो सकता था. लेकिन मेरा मानना है कि यह दौरा पूरी तरह से द्विपक्षीय है और इसमें बाक़ी घटनाक्रमों को जोड़ना उचित नहीं है.''

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भारत की ख़त्म होती दुविधा
मोहम्मद मुदस्सिर क़मर कहते हैं, ''इसमें कोई शक नहीं है कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद इसराइल से क़रीबी बढ़ी है लेकिन दूसरा तथ्य यह भी है कि खाड़ी के देशों से भी संबंधों में गर्मजोशी आई है. भारत की सुरक्षा चिंताएं हैं और इसराइल एक अहम साझेदार के रूप में उभरा है.''
इसराइल के मामले में भारत की एक दुविधा अरब के देशों को लेकर रही है. लेकिन इस दुविधा से 1992 में पीवी नरसिम्हा राव पार निकल गए थे और इसराइल से राजनयिक संबंध कायम करने का फ़ैसला किया था.
दरअसल यह दुविधा 1978 में ही ख़त्म होने लगी थी. 1978 में इसराइल का मिस्र और अन्य अरब देशों के साथ कैंप डेविड समझौता हुआ.
इसके तहत अरब के कुछ देशों ने इसराइल से राजनयिक रिश्ता स्थापित करने का फ़ैसला किया. भारत को कैंप डेविड समझौते से भी इसराइल को लेकर अपनी नीति बदलने में मदद मिली.
जाने-माने राजनयिक और भारत के विदेश सचिव रहे जेएन दीक्षित ने अपनी किताब 'माई साउथ ब्लॉक इयर्स: मेमरीज़ ऑफ़ अ फ़ॉरन सेक्रेटरी' में लिखा है, ''अरब देशों के कुछ राजदूतों ने इसराइल से राजनयिक संबंध कायम करने के फ़ैसले को लेकर आपत्ति जताई और कहा कि भारत को इसका ख़ामियाज़ा भुगतना पड़ेगा. हमने फ़ैसला किया कि जो आपत्ति जता रहे हैं, उन्हें सीधा जवाब देना है, झुकना नहीं है.''
दीक्षित ने लिखा है, ''मैंने कहा कि भारत ने अंतरराष्ट्रीय मसलों पर कई इस्लामिक देशों का समर्थन किया लेकिन कश्मीर के मामले में हमें समर्थन नहीं मिला. मैंने ये भी कहा कि भारत अपनी संप्रभुता में किसी किस्म की दख़लअंदाज़ी के सामने नहीं झुकेगा और अपने हितों के लिए काम करना जारी रखेगा. अरब जगत के मीडिया में भारत की आलोचना हुई. कुछ लोगों ने भारत के इस फ़ैसले पर सवाल उठाए. लेकिन इससे भारत और अरब के संबंध प्रभावित नहीं हुए.''

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पीएम मोदी के फ़ैसले की वजह
2017 में जब पीएम मोदी ने इसराइल का दौरा किया था तो अमेरिकी मीडिया आउटलेट ब्लूमबर्ग ने अपनी रिपोर्ट में लिखा था, ''भारत ने परंपरागत रूप से इसराइल के साथ संबंधों को कम महत्व दिया है. यह आशंका रहती थी कि इससे देश के 17 करोड़ मुसलमान अलग-थलग पड़ सकते हैं. लेकिन मोदी एक हिंदू राष्ट्रवादी नेता हैं, जिनकी पार्टी ने भारी जीत हासिल की. देश में विपक्ष बहुत कमज़ोर है. ऐसे में उन्हें घरेलू राजनीतिक प्रभावों की बहुत कम चिंता है.''
बेंगलुरु स्थित तक्षशिला इंस्टीट्यूशन थिंक-टैंक के फेलो रोहन जोशी ने ब्लूमबर्ग से कहा था, "भारत के मुसलमानों के मतदान व्यवहार पर घरेलू नीतियों का अधिक प्रभाव पड़ता है, बजाय उन नीतियों के जो व्यापक इस्लामी मुद्दों के प्रति अपनाई जाती हैं."
मोहम्मद मुदस्सिर भी मानते हैं कि नरेंद्र मोदी की सरकार में ये चिंताएं अब बहुत पीछे छूट चुकी हैं.
तर्क यह दिया जाता है कि सोवियत संघ के पतन के बाद भारत इसराइल के क़रीब आया. एक वक़्त था कि अमेरिका के क़रीब आना है तो इसराइल के क़रीब आना लाज़िमी हो जाता था.
लेकिन मोहम्मद मुदस्सिर मानते हैं कि आतंकवाद को लेकर साझा चिंताओं ने दोनों देशों के बीच ख़फ़िया सहयोग को बढ़ावा दिया. हाईटेक हथियारों के प्रति भारत की मांग और उन्हें बेचने की इसराइल की तत्परता ने मज़बूत रक्षा-व्यापार संबंध को जन्म दिया.
स्वतंत्रता के शुरुआती दशकों में भारत के वाम-झुकाव वाले नेताओं ने इसराइल के प्रति कोई विशेष लगाव नहीं दिखाया. जब भारत ब्रिटिश उपनिवेश था, तब जवाहरलाल नेहरू ने 1917 की बैलफोर घोषणा का विरोध किया था, जिसमें ब्रिटेन ने फ़लस्तीन में यहूदी लोगों के लिए अलग देश का मार्ग प्रशस्त किया था.
भारत की नीति को अंतरराष्ट्रीय कारकों और घरेलू राजनीति दोनों ने आकार दिया.
मोहम्मद मुदस्सिर कहते हैं, ''इसराइल का विरोध भारत के लिए नैतिक मुद्रा अपनाने का सुविधाजनक मंच था. इससे तेल-समृद्ध अरब देशों के साथ संतुलन बनाए रखना भी आसान रहा. लेकिन फ़लस्तीनियों के साथ एकजुटता की बयानबाज़ी के पीछे एक आदर्शवादी विचार भी था: उन रूढ़िवादियों को नाराज़ न करना, जो भारत के बड़े मुस्लिम अल्पसंख्यक के वोटों पर प्रभाव का दावा करते थे.''
जब सोवियत संघ के पतन के बाद भारत की गुटनिरपेक्ष विदेश नीति उदार होने लगी तब 1992 में भारत ने इसराइल के साथ पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित किए.
उस समय के प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव कांग्रेस पार्टी से थे लेकिन नेहरू-गांधी परिवार से नहीं. इसके तुरंत बाद रक्षा, कृषि और आतंकवाद-रोधी सहयोग तेज़ी से बढ़ा. 1998 में दक्षिणपंथ-झुकाव वाली भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद यह प्रक्रिया और तेज़ हो गई. 2003 में एरियल शेरोन भारत का दौरा करने वाले पहले इसराइली प्रधानमंत्री बने. लेकिन अब चीज़ें बदल रही हैं.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.















