अमेरिका-ईरान की बातचीत बेनतीजा होने पर मेज़बान पाकिस्तान को क्या मिला?

12 अप्रैल 2026 को इस्लामाबाद में अमेरिका-ईरान शांति वार्ता से जुड़े एक होर्डिंग के पास से एक पाकिस्तानी रेंजर गुज़रता हुआ दिखाई देता है. मध्य पूर्व में युद्ध खत्म करने को लेकर ईरान और अमेरिका किसी समझौते पर नहीं पहुंच सके

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    • Author, असद सुहैब
    • पदनाम, बीबीसी उर्दू डॉट कॉम, इस्लामाबाद
  • पढ़ने का समय: 9 मिनट

पाकिस्तान ने 'इस्लामाबाद टॉक्स' के बेनतीजा रहने के बावजूद इस इरादे को दोहराया है कि वह अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाता रहेगा.

पाकिस्तान के विदेश मंत्री इसहाक़ डार ने उम्मीद जताई है कि दोनों पक्ष युद्धविराम के लिए अपनी प्रतिबद्धता जारी रखेंगे. इसहाक़ डार का कहना था कि उन्होंने सेना प्रमुख फ़ील्ड मार्शल आसिम मुनीर के साथ दोनों पक्षों के बीच हुए 'कठिन लेकिन सकारात्मक वार्ता' के कई दौर में उनकी मदद की.

अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और ईरानी शिष्टमंडल ने भी वार्ता के लिए मध्यस्थता की कोशिशों की तारीफ़ करते हुए पाकिस्तान को एक 'अच्छा मेज़बान' क़रार दिया.

दोनों देशों के बीच जंग रुकवाने और इस्लामाबाद में वार्ता की मेज़ सजाने को ही कई हलक़े पाकिस्तान की बड़ी कूटनीतिक सफलता मान रहे थे जिससे वैश्विक स्तर पर पाकिस्तान का क़द बढ़ा है. लेकिन अंतिम समझौता न होने पर इस्लामाबाद में निराशा भी है.

पाकिस्तान को 'इस्लामाबाद वार्ता' से क्या हासिल हुआ और क्या वह अब भी दोनों पक्षों के बीच शांति समझौता कराने की क्षमता रखता है? अगर युद्ध दोबारा शुरू हुआ तो पाकिस्तान के लिए आगे का रास्ता क्या होगा? यह जानने के लिए बीबीसी ने कई विशेषज्ञों से बात की है.

मध्य पूर्व मामलों के विशेषज्ञ और पंजाब यूनिवर्सिटी (लाहौर) के राजनीति विज्ञान विभाग के पूर्व प्रमुख डॉक्टर फ़ारूक़ हसनात कहते हैं कि इन वार्ताओं को बेनतीजा नहीं कहा जा सकता क्योंकि इस तरह की बातचीत में बहुत वक़्त लगता है.

बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने कहा कि दोनों पक्षों ने यह नहीं कहा है कि ये वार्ता नाकाम हो गई है बल्कि वह अपनी कुछ शर्तों पर समझौता नहीं कर पा रहे हैं.

अमेरिका और ईरान ने खुली रखी है एक खिड़की

एक्सपर्ट्स मानते हैं कि ईरान और अमेरिका के बीच आगे बातचीत होने के रास्ते बंद नहीं हुए हैं

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ध्यान रहे कि ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने वार्ता के बाद कहा था कि इस्लामाबाद में अमेरिका के साथ हुई बातचीत में कई बिंदुओं पर सहमति बनी है, हालांकि दो-तीन अहम बिंदुओं पर मतभेद के कारण अभी तक व्यापक समझौता नहीं हो सका है.

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ईरान के प्रवक्ता इस्माइल बक़ाई का कहना था कि वार्ता 'अविश्वास के माहौल' में शुरू हुई थी और एक ही बैठक में समझौता होने की उम्मीद कम थी.

डॉक्टर फ़ारूक़ हसनात कहते हैं कि पाकिस्तान ने इस पूरे विवाद में ख़ुद को एक तटस्थ पक्ष साबित किया है. "यही वजह है कि दोनों पक्ष इस्लामाबाद आने के लिए तैयार हुए."

उनका कहना था कि भले ही समझौता नहीं हुआ लेकिन दोनों पक्ष यह मान रहे हैं कि कुछ मामलों में बात आगे बढ़ी है.

उनका कहना था कि पाकिस्तान की यही कामयाबी बहुत बड़ी है कि उसने दो ऐसे पक्षों को आमने-सामने बिठा दिया, जिन्होंने 1979 के बाद कभी सीधी बातचीत नहीं की थी.

"दोनों पक्षों को आमने-सामने बैठाना ही पाकिस्तान की बड़ी कामयाबी है"

वरिष्ठ राजनेता और पूर्व सीनेटर मुशाहिद हुसैन सैयद कहते हैं कि इस ऐतिहासिक वार्ता प्रक्रिया को जारी रखने के लिए अमेरिका और ईरान ने एक खिड़की खुली रखी है और ऐसा पाकिस्तान की कोशिशों से ही हुआ है.

बीबीसी से बातचीत में मुशाहिद हुसैन सैयद ने कहा कि इस्लामाबाद में हुई वार्ता का महत्व तीन गुना है.

उनके अनुसार 21 घंटे तक बातचीत चलने का मतलब है कि दोनों पक्षों ने बहुत विस्तार से चर्चा की है और इसमें दोनों देशों के तकनीकी विशेषज्ञ भी शामिल थे.

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मुशाहिद हुसैन सैयद का कहना था कि दूसरी अहम बात इन वार्ताओं में उच्च स्तरीय नेताओं की भागीदारी है जिसमें अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बाक़र ग़ालीबाफ़ शामिल हुए.

मुशाहिद हुसैन सैयद का कहना था कि दोनों पक्षों की ओर से पाकिस्तान की भूमिका को सकारात्मक बताना इस बात का सबूत है कि पाकिस्तान ने शांति प्रयासों के लिए कितनी गंभीरता से कोशिश की.

वरिष्ठ पत्रकार और विश्लेषक ज़ाहिद हुसैन कहते हैं कि इस्लामाबाद वार्ता में कोई 'ब्रेकथ्रू' नहीं हुआ, "हालांकि यह बातचीत ख़त्म भी नहीं हुई है जो एक अच्छा संकेत है."

बीबीसी उर्दू से बात करते हुए उन्होंने कहा, "पाकिस्तान की वह भूमिका बनी रहेगी जिसकी दोनों पक्ष तारीफ़ कर रहे हैं. लेकिन अब देखना यह होगा कि अगर वार्ता का अगला दौर होता है तो वह पाकिस्तान में होगा या नहीं."

ज़ाहिद हुसैन कहते हैं, "वार्ता के बाद पाकिस्तान का महत्व और भी बढ़ गया है क्योंकि पाकिस्तान 21 घंटे तक चलने वाली पेचीदा बातचीत का हिस्सा रहा है और अगले किसी भी दौर में दोनों पक्ष पाकिस्तान से ही संपर्क करेंगे."

उनके अनुसार इस वक़्त ऐसा कोई देश नहीं है जो पाकिस्तान की जगह ले सके.

पाकिस्तान की बड़ी सफलता

अमेरिका और ईरान को आमने-सामने बातचीत के लिए तैयार करने को पाकिस्तान की सफलता माना जा रहा है

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मुशाहिद हुसैन सैयद भी डॉक्टर फ़ारूक़ हसनात से सहमत होते हुए कहते हैं कि दोनों पक्षों को आमने-सामने बैठाना ही पाकिस्तान की एक बहुत बड़ी सफलता है.

उनके मुताबिक़ कोई समझौता न होने के बावजूद दोनों पक्षों के बयान संतुलित और नपे-तुले थे, इसलिए सावधानी बरतते हुए उम्मीद रखी जा सकती है.

वरिष्ठ पत्रकार और विश्लेषक तलत हुसैन कहते हैं कि पाकिस्तान ने उस समय क़दम उठाया जब दुनिया को इसकी सबसे ज्यादा ज़रूरत थी.

'एक्स' (ट्विटर) पर अपनी पोस्ट में तलत हुसैन ने कहा कि अफ़रातफ़री के बीच एक युद्ध को रुकवाकर पाकिस्तान ने मध्यस्थ के रूप में अपनी भूमिका को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मनवाया और साबित किया कि स्थायी शांति केवल बातचीत के ज़रिए आती है.

उनका कहना था कि पाकिस्तान की सबसे बड़ी कामयाबी यही है कि उसने 28 फ़रवरी को अमेरिका और ईरान के बीच टूटी हुई बातचीत की कड़ी को दोबारा जोड़ दिया. कूटनीति एक मैराथन दौड़ की तरह है.

मुशाहिद हुसैन सैयद कहते हैं कि अब गेंद अमेरिका के पाले में है और अब यह राष्ट्रपति ट्रंप पर निर्भर करता है कि वह ख़ुद को ईरान युद्ध के 'दलदल' से निकालते हैं या नेतन्याहू जैसे जंग के जुनून में रहने वाले नेताओं की बातों में आते हैं.

अटलांटिक काउंसिल में दक्षिण एशिया के सीनियर फ़ेलो माइकल कुगलमैन कहते हैं कि अमेरिका अपनी आंतरिक राजनीतिक स्थितियों के कारण एक ऐसा समझौता चाहता था जिसके जरिए वह इस युद्ध से निकल सके.

'एक्स' पर अपने बयान में उन्होंने कहा कि उपराष्ट्रपति के नेतृत्व में उच्च स्तरीय शिष्टमंडल भेजने से अमेरिकी संकल्प का पता चलता था.

उनके मुताबिक़, "उपराष्ट्रपति वेंस की प्रेस कॉन्फ़्रेंस के बावजूद यह (संकल्प) अभी ख़त्म नहीं हुआ है. अभी और बातचीत हो सकती है लेकिन यह साफ़ नहीं है कि यह वार्ता पाकिस्तान में होगी या कहीं और."

अगर लड़ाई दोबारा शुरू हुई तो पाकिस्तान कहां खड़ा होगा?

युद्ध दोबारा शुरू होने की स्थिति में पाकिस्तान को दुविधा का सामना भी करना पड़ सकता है

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शनिवार को सऊदी रक्षा मंत्रालय ने पुष्टि की थी कि पाकिस्तान से एक सैन्य दस्ता पूर्वी क्षेत्र में स्थित शाह अब्दुल अज़ीज़ एयरबेस पर पहुंचा है.

सऊदी रक्षा मंत्रालय की तरफ़ से शनिवार को 'एक्स' पर जारी बयान के अनुसार, "यह तैनाती दोनों बरादर मुल्कों के बीच हुए संयुक्त रणनीतिक रक्षा समझौते के तहत की गई है."

बयान में आगे कहा गया कि पाकिस्तानी दस्ते में पाक वायुसेना के लड़ाकू और सहायक विमान शामिल हैं. "इसका मक़सद दोनों देशों के सशस्त्र बलों के बीच मिलिट्री कोऑर्डिनेशन को मज़बूत करना, कार्रवाई की तैयारी में तेज़ी लाना, और क्षेत्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शांति व स्थिरता को बढ़ावा देने में मदद करना है."

डॉक्टर फ़ारूक़ हसनात कहते हैं कि अगर युद्ध दोबारा शुरू होता है तो पाकिस्तान को मुश्किल स्थिति का सामना करना पड़ेगा. उनके मुताबिक़, "अगर अमेरिका ने ईरान पर दोबारा हमले शुरू किए तो ईरान भी क्षेत्र में अमेरिका के सहयोगी देशों पर हमले करेगा."

वह कहते हैं कि अब तक ईरान ने सऊदी अरब पर बहुत कम हमले किए हैं लेकिन अगर युद्ध फिर से शुरू हुआ और ईरान ने सऊदी अरब पर भी हमले किए तो पाकिस्तान पर दबाव बढ़ेगा.

उनके अनुसार, "अगर सऊदी अरब और ईरान के बीच सीधी लड़ाई शुरू हुई तो हो सकता है कि यमन के हूती सऊदी अरब पर हमले शुरू कर दें."

डॉक्टर फ़ारूक़ हसनात कहते हैं कि अगर ऐसा हुआ तो पाकिस्तान की सेना यमन के हूती विद्रोहियों की कार्रवाइयों को रोकेगी, इसलिए पाकिस्तान की सीधी लड़ाई ईरान से नहीं होगी.

'पाकिस्तान ईरान के साथ किसी संघर्ष का जोखिम नहीं उठा सकता'

ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में पाकिस्तान की नजदीकियां अमेरिका के साथ बढ़ी हैं

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याद रहे कि साल 2015 में सऊदी अरब ने यमन पर हमले से पहले पाकिस्तान से अपनी सेना भेजने का अनुरोध किया था जिसे संसद में प्रस्ताव पेश होने के बाद ख़ारिज कर दिया गया था. उस दौरान पाकिस्तान और सऊदी अरब के संबंधों में कड़वाहट भी आ गई थी.

फ़ारूक़ हसनात कहते हैं कि पिछले साल सऊदी अरब के साथ हुए रक्षा समझौते की भी संसद से मंज़ूरी नहीं ली गई थी और अब अतिरिक्त सेना भेजने से पहले भी संसद से इजाज़त नहीं ली गई.

उनका कहना था कि पाकिस्तान ईरान के साथ किसी संघर्ष का जोखिम नहीं उठा सकता क्योंकि दोनों पड़ोसी देश हैं. "अगर पाकिस्तान को किसी स्तर पर पक्षकार बनना पड़ा तो उसे संसद को विश्वास में लेकर फ़ैसले करने चाहिए."

ध्यान देने की बात यह है कि इससे पहले 2018 में पाकिस्तान की फ़ौज ने ऐलान किया था कि उसने सेना की अतिरिक्त टुकड़ियों को सलाह और ट्रेनिंग देने के मिशन पर सऊदी अरब में तैनात करने का फ़ैसला लिया है. तब पाकिस्तानी संसद के उच्च सदन 'सीनेट' ने सरकार से इस पर जवाब तलब किया था.

उस समय पाकिस्तानी सेना ने अपने बयान में कहा था कि सऊदी अरब में 1180 पाकिस्तानी सैनिक पहले से तैनात हैं, जो 1982 में हुए एक द्विपक्षीय समझौते के तहत वहां भेजे गए थे.

ज़ाहिद हुसैन कहते हैं कि पाकिस्तान और सऊदी अरब का रक्षा समझौता नौ महीने पहले हुआ था और इसके बारे में सबको पता है.

वह कहते हैं कि 'इस्लामाबाद वार्ता' बेनतीजा रहने के बावजूद दोनों पक्षों ने युद्धविराम समाप्त करने की घोषणा नहीं की है क्योंकि दोनों पक्ष अब और लड़ाई नहीं चाहते.

"इसलिए फ़िलहाल ऐसा नहीं लगता कि दोबारा युद्ध शुरू होगा और ईरान, सऊदी अरब को निशाना बनाएगा."

ज़ाहिद हुसैन कहते हैं कि ईरान और पाकिस्तान के संबंध जिस स्तर पर पहुंच चुके हैं, उसे देखते हुए ईरान भी ऐसा कोई क़दम नहीं उठाएगा जो पाकिस्तान को इस विवाद में शामिल होने के लिए मजबूर करे.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.