बांग्लादेश: राष्ट्रपति के मोहम्मद यूनुस पर लगाए गए गंभीर आरोपों की हो रही है चर्चा

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बांग्लादेश में करीब 18 महीने की अस्थिरता और उथल-पुथल के बाद बीते सप्ताह तारिक रहमान के नेतृत्व में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) गठबंधन ने चुनाव जीत कर सत्ता संभाली थी. लेकिन अब राष्ट्रपति मोहम्मद शहाबुद्दीन के एक इंटरव्यू ने सियासी हलकों में तूफ़ान खड़ा कर दिया है.
राजधानी से प्रकाशित बांग्ला दैनिक 'कालेर कंठो' को दिए इस इंटरव्यू में राष्ट्रपति ने अंतरिम सरकार के कुछ कदमों को असंवैधानिक करार देते हुए उस पर पूरी तरह असहयोग करने का आरोप लगाया है.
उनके इंटरव्यू पर बढ़ते विवाद पर मोहम्मद यूनुस ने तो अब तक कोई टिप्पणी नहीं की है. लेकिन सरकार के सूचना और प्रसारण मंत्री जहीरुद्दीन स्वप्न ने पत्रकारों से कहा कि राष्ट्रपति की टिप्पणियों के अध्ययन के बाद ही सरकार इस पर औपचारिक बयान जारी करेगी.
बंग भवन में बीते शुक्रवार को हुई बातचीत के दौरान मोहम्मद शहाबुद्दीन ने अंतरिम सरकार के कार्यकाल के दौरान बार-बार अपमानित होने का आरोप लगाया है. उनका दावा है कि अहम राष्ट्रीय फ़ैसले लेने के मामले में भी उनको अंधेरे में रखा गया.
हालांकि मोहम्मद यूनुस या उनके किसी सहयोगी ने राष्ट्रपति के आरोपों पर कोई प्रतिक्रिया अब तक नहीं दी है.
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राष्ट्रपति का कहना था, "अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार डॉक्टर मोहम्मद यूनुस ने संविधान के कई प्रावधानों का उल्लंघन किया है. डेढ़ साल के कार्यकाल में मुझे अंतरिम सरकार की ओर से कई बार अपमानित होना पड़ा."
उन्होंने कहा कि अंतरिम सरकार के कार्यकाल के दौरान 132 अध्यादेश में से कई मेरी नज़र में ज़रूरी नहीं थे हालांकि उन्होंने माना कि तत्कालीन परिस्थितियों में कुछ अध्यादेश ज़रूरी थे. लेकिन संविधान के तहत मुख्य सलाहकार के साथ जो न्यूनतम तालमेल अनिवार्य था, उसका कभी पालन नहीं किया गया. उनको कई अहम फ़ैसलों की जानकारी तक नहीं दी गई.
बीएनपी और सेना के कारण बची थी कुर्सी

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मोहम्मद शहाबुद्दीन ने दावा किया कि संविधान के मुताबिक मुख्य सलाहकार को अपने विदेश दौरे के बाद राष्ट्रपति से मुलाकात कर उनको अपने दौरों, वहां होने वाली बातचीत और संभावित समझौतों के बारे में लिखित जानकारी देनी चाहिए. लेकिन मोहम्मद यूनुस ने 14-15 विदेशी दौरे करने के बावजूद उनको कोई जानकारी नहीं दी. उन्होंने मुलाकात तक नहीं की.
राष्ट्रपति ने दावा किया कि चुनाव से ठीक पहले अमेरिका के साथ जिस समझौते पर हस्ताक्षर किए गए, उसके बारे में भी उनको कोई जानकारी नहीं थी. उनके मुताबिक, ऐसे छोटे-बड़े राष्ट्रीय समझौतों के बारे में राष्ट्रपति को सूचित करना संवैधानिक रूप से अनिवार्य है.
उनका कहना था कि पहले की सरकारों में मुखिया रहे नेता इसका पालन करते थे. लेकिन अंतरिम सरकार के मुखिया ने कभी इसका पालन नहीं किया.
मोहम्मद शहाबुद्दीन ने कहा, "मुझे मौखिक या लिखित रूप से कोई सूचना नहीं दी गई. मेरे साथ कभी कोई सामान्य शिष्टाचार मुलाकात भी नहीं की गई."
उन्होंने देश के संचालन में पारस्परिक तालमेल के सवाल पर कहा कि उनकी पहल पर ही अंतरिम सरकार के गठन की प्रक्रिया शुरू की गई थी. लेकिन सरकार के गठन के बाद मुख्य सलाहकार ने उनसे कोई तालमेल नहीं रखा.
राष्ट्रपति के मुताबिक, मुख्य सलाहकार उनसे एक बार भी मिलने नहीं आए और उन्होंने जानबूझकर उनको (राष्ट्रपति को) देश चलाने की प्रक्रिया से दूर रखने की कोशिश की.
मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार के साथ अपने संबंधों की खाई का जिक्र करते हुए राष्ट्रपति ने कहा, "सरकार ने एक बार मेरी जगह असंवैधानिक तरीके से एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश को राष्ट्रपति बनाने की साजिश रची थी. लेकिन उस मुश्किल दौर में बीएनपी और सेना के समर्थन के कारण ही संविधान की रक्षा हो सकी थी."
यहां इस बात का जिक्र प्रासंगिक है कि मोहम्मद शहाबुद्दीन ने 24 अप्रैल, 2023 को देश के 22वें राष्ट्रपति के तौर पर अपने पद की शपथ ली थी.
वह उसी साल 13 फरवरी को तत्कालीन सत्तारूढ़ अवामी लीग के उम्मीदवार के तौर पर निर्विरोध रूप से इस पद के लिए चुने गए थे.
राष्ट्रपति पद पर चुनाव से पहले वह अवामी लीग की सलाहकार परिषद के सदस्य रहे थे.
राष्ट्रपति पर लगा था झूठ बोलने का आरोप

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इस इंटरव्यू के दौरान राष्ट्रपति ने अपने जीवन के उतार-चढ़ाव और राजनीतिक परिस्थितियों पर भी खुल कर बात की. उन्होंने कहा कि बुरे दौर में बीएनपी ने उनका समर्थन किया था.
साल 2024 की जुलाई में देश में बड़े पैमाने पर आंदोलन शुरू होने और पांच अगस्त को शेख हसीना के इस्तीफ़ा देकर देश छोड़ने के बाद से ही शहाबुद्दीन को राष्ट्रपति पद से हटाने की मांग तेज़ होने लगी थी. हालांकि यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार को उन्होंने ही शपथ दिलाई थी.
राष्ट्रपति का दावा है कि मुख्य सलाहकार के तौर पर शपथ लेने के बाद यूनुस ने बंग भवन में उनसे मुलाकात नहीं की थी.
मोहम्मद शहाबुद्दीन ने अंतरिम सरकार की प्रेस शाखा पर राष्ट्रपति की प्रेस शाखा बंद करने का भी आरोप लगाया है.
अपने इंटरव्यू में उन्होंने बिना किसी पूर्व सूचना के विदेश स्थित बांग्लादेश के मिशन से राष्ट्रपति की तस्वीर हटाने पर भी नाराज़गी जताई है.
अंतरिम सरकार के गठन के कुछ महीने बाद उसी साल 19 अक्तूबर को ढाका से प्रकाशित होने वाले 'दैनिक मानवजमीन' अखबार में राष्ट्रपति का एक इंटरव्यू छपा था. इसमें उन्होंने दावा किया था, "मैंने सुना है कि शेख हसीना ने प्रधानमंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया है. लेकिन मेरे पास इसका कोई दस्तावेज़ी सबूत नहीं है."
अंतरिम सरकार के तत्कालीन विधि सलाहकार आसिफ नजरूल ने उसके बाद मोहम्मद शहाबुद्दीन पर झूठ बोलने का आरोप लगाया था.
वैसे, शेख हसीना सरकार के पतन के बाद यह सवाल उठता रहा है कि आखिर राष्ट्रपति अपने पद पर कैसे बने रह सके? इसकी वजह यह थी कि उसके बाद प्रशासन से सुप्रीम कोर्ट के जजों तक तमाम लोगों ने इस्तीफ़े दे दिए थे. उनमें सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश के अलावा संसद के स्पीकर शिरीन सारमीन चौधरी भी शामिल थे.
अब राष्ट्रपति ने अपने इंटरव्यू में कहा है कि बीएनपी और सशस्त्र बलों के समर्थन से ही उनकी कुर्सी बची रही थी.
'अभिव्यक्ति का अधिकार सुनिश्चित किया जाएगा'

शहाबुद्दीन ने अपने इंटरव्यू में दावा किया है कि अंतरिम सरकार के कार्यकाल के दौरान कम से कम दो बार उनको हटाने या उनके इस्तीफ़े की मांग में बंग भवन के घेराव और बड़े पैमाने पर दबाव बनाने की कोशिश की गई थी. लेकिन वह अपने पद पर बने रहे.
वैसे राष्ट्रपति पद से शहाबुद्दीन को हटाने की मांग उठने पर बीएनपी के वरिष्ठ नेताओं ने सार्वजनिक रूप से इसका विरोध किया था.
राजनीतिक विश्लेषक मोहिउद्दीन अहमद बीबीसी बांग्ला से कहते हैं, "बीएनपी हसीना सरकार के पतन के बाद से ही चुनाव कराने की मांग करती रही थी. इसलिए वह ऐसे किसी फ़ैसले के लिए तैयार नहीं थी जिससे चुनाव पर ख़तरा पैदा हो."
मोहिउद्दीन का कहना था, "बीएनपी नहीं चाहती कि राष्ट्रपति के मुद्दे पर चुनाव पर अनिश्चितता पैदा हो जाए. वह शीघ्र चुनाव कराने के पक्ष में थी. मुझे लगता है कि इसी वजह से पार्टी राष्ट्रपति को हटाने के ख़िलाफ़ थी."
साल 2024 में 22 अक्तूबर को राष्ट्रपति के इस्तीफे की मांग में बंग भवन के घेराव के अगले दिन बीएनपी के तीन वरिष्ठ नेताओं ने मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस से मुलाकात कर इस मुद्दे पर बातचीत की थी. उस बैठक के बाद बीएनपी की स्थायी समिति के सदस्य नज़रुल इस्लाम खान ने पत्रकारों से कहा था, पार्टी ने अंतरिम सरकार से इस बात का ख्याल रखने को कहा है कि देश में नए सिरे से संवैधानिक संकट न पैदा हो.
उसी दिन बीएनपी अध्यक्ष के दफ्तर में पार्टी की स्थायी समिति के सदस्य सलाहुद्दीन अहमद ने कहा था, "राष्ट्रपति पद खाली होने की स्थिति में संवैधानिक संकट पैदा होगा और राष्ट्रीय चुनावों के आयोजन में देरी होगी. इसलिए बीएनपी फिलहाल राष्ट्रपति को हटाना नहीं चाहती."
बीएनपी सरकार में गृह मंत्री सलाहुद्दीन अहमद ने राष्ट्रपति के ताजा इंटरव्यू पर पूछे सवाल पर कहा, "देश में सबको अपनी बात कहने का अधिकार है. संविधान के तहत अभिव्यक्ति का अधिकार सुनिश्चित किया जाएगा. सरकार किसी भी परिस्थिति में इस पर अंकुश नहीं लगाएगी."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.















