कहानी उस परिवार की जो अपने बेटे के लिए मांग रहा है इच्छा मृत्यु

 निर्मला राना अपने बेटे हरीश के साथ
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    • Author, कीर्ति दुबे
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

आमतौर पर हम किसी के बुरे हालात को देखते हुए जो बात सबसे ज्यादा कहते हैं वो है- ‘ईश्वर पर भरोसा रखिए, वो मदद करेगा.’

लेकिन जब भरोसा इस हद तक ख़त्म हो जाए कि मां-बाप अपने ही बेटे की मौत की गुहार लगाने लगे तो उनकी अथाह नाउम्मीदी और निराशा को समझा पाना या उसे लिख पाना बहुत मुश्किल लगता है.

63 साल के अशोक राना और 60 साल की निर्मला राना ऐसे ही मां-बाप हैं. उनके 30 साल के बेटे हरीश राना की ज़िंदगी बीते 11 साल से एक बिस्तर पर सिमट चुकी है.

हरीश ना कुछ बोल सकते हैं, ना कुछ महसूस कर सकते हैं, मेडिकल साइंस की भाषा में इसे ‘वेजिटेटिव स्टेट’ कहते हैं.

निर्मला राना को उम्मीद थी कि एक दिन उनका बेटा ठीक हो जाएगा, लेकिन दिन-महीने और अब 11 साल बीत गए और वो दिन नहीं आया. अब उन्हें ये उम्मीद है ही नहीं कि उनका बेटा कभी ठीक होगा.

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वीडियो कैप्शन, दस साल से बिस्तर पर सिमटी जवान बेटे की ज़िंदगी को क्यों ख़त्म करना चाहते हैं माता-पिता?

निर्मला राना और अशोक राना ने बेटे की हालत देख कर बीते साल दिल्ली हाई कोर्ट में अपील की कि उनके बेटे को यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की इजाज़त दी जाए.

एक साल तक चली कानूनी कार्यवाही के बाद बीती 2 जुलाई को कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा कि हरीश राना को किसी ‘मशीन’ के सहारे ज़िंदा नहीं रखा जा रहा है, वो बिना किसी मदद के खुद से सांस ले सकते हैं और वो किसी लाइफ़ सपोर्ट सिस्टम पर नहीं हैं.

“ऐसे में किसी भी फिज़िशियन को इजाज़त नहीं है कि वो उन्हें कोई दवा दे कर मारे, भले ही ये मौत उन्हें कष्ट से बाहर निकालने के इरादे के के लिए ही क्यों ना हो.”

बात साल 2013 की है, उन दिनों हरीश राना चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी से सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे थे. 5 अगस्त 2013 को शाम के सात बजे अशोक राना को चंडीगढ़ से एक फोन आया और कहा गया- “हरीश राना गिर गया है और उसे चोट आई है.”

पता चला कि हरीश राना चंडीगढ़ में जिस पेइंग गेस्ट फैसिलिटी में रह रहे थे वहां की चौथी मंज़िल से गिर गए और उन्हें गहरी चोट आई है. शुरुआत में उनका इलाज चंडीगढ़ पीजीआई में चला लेकिन उसके बाद दिल्ली एम्स..कई प्राइवेट अस्पताल... जगहें बदलती गईं लेकिन परिवार के लिए और हरीश के लिए कुछ नहीं बदला.

हरीश राना इस हालत में कैसे पहुंचे

अशोक राना अपने बेटे हरीश के साथ
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अशोक राना कहते हैं, “ डॉक्टर ने हमें कहा कि इसके दिमाग की नसें पूरी तरह सूख गई हैं, यहां तक कि उन्होंने ये भी कहा कि सिटी स्कैन भी करवाने की ज़रूरत नहीं. हम कहां नहीं ले गए. लेकिन कुछ नहीं हुआ, हम सुनते हैं, अखबारों में पढ़ते हैं चमत्कार के बारे में हमारे साथ ना दुआओं ने काम किया और ना ही दवाओं ने.”

बेटे के इलाज के लिए उन्हें दिल्ली के द्वारका में अपना मकान भी बेचना पड़ा. वो मकान जो साल 1988 से दिल्ली में उनका घर था. अब वो गाज़ियाबाद के एक दो कमरे के फ्लैट में रहते हैं.

अब इस परिवार के लिए बेटे का इलाज चला पाना मुश्किल हो गया है. अशोक राना ने ताज केटरिंग में नौकरी की और अब रिटायर होने के बाद उन्हें हर महीने 3600 रुपये की पेंशन मिलती है.

घर का खर्च और बेटे के इलाज के लिए वो शनिवार और रविवार के दिन गाज़ियाबाद के क्रिकेट ग्राउंड में सैंडविच और बर्गर बेचते हैं.

वो कहते हैं, “ अब नहीं होगा...हम कहां से लाएं इतने पैसे. हमने दो महीने के लिए बेटे की देखभाल के लिए नर्स रखी थी वो 22 हज़ार रुपये ले रही थी. नहीं दे पाए हम उसे पैसे.”

रुंधे हुए गले से वो कहते हैं, “कौन मांग सकता है अपने बेटे की मौत...जब ये सोचता हूं तो रात को नींद नहीं आती लेकिन क्या करूं और कब तक कर पाऊंगा.”

हरीश चाहते हैं कि अगर न्याय व्यवस्था के अनुसार उनके बेटे को इच्छामृत्यु नहीं मिल सकती तो उन्हें किसी अस्पताल में सरकारी खर्चे पर रखा जाए.

हरीश की मां निर्मला देवी ने ही सबसे पहले कोर्ट में इच्छा मृत्यु यानी यूथेनेशिया की अपील करने की इच्छा ज़ाहिर की थी.

सालों से वो ही अपने बेटे की देखभाल कर रही हैं... जब हम उनसे मिले तो दोपहर के एक बज रहे थे और उन्होंने बताया कि तब तक उन्होंने खाने का एक निवाला तक नहीं खाया क्योंकि बेटे का बिस्तर बदलने से लेकर उसके कपड़े धोने और सालों तक बिस्तर पर पड़े रहने से बेटे की पीठ पर जो धाव हो गए हैं उनकी पट्टी करने में ही आधा दिन बीत गया.

एक मां के लिए बेटे की इच्छामृत्यु मांगना कितना मुश्किल है

हरीश की मां उसे फूड पाइप के ज़रिए खाना देती हैं.
इमेज कैप्शन, हरीश की मां उसे फूड पाइप के ज़रिए खाना देती हैं.

इस सवाल पर वो अपने हल्के गुलाबी दुपट्टे के कोर से आंसू पोंछते हुए कहती हैं, “ जो हमारे साथ हो रहा है वो भगवान किसी के साथ ना करे...मैं थक गई हूं...मुझे कुछ हो जाए तो कौन इसकी सेवा करेगा. हम इसके अंगों को दान करना चाहते हैं...इसके जो अंग अब इसके काम नहीं आ रहे वो लोगों को मिलें, हम उनमें अपने बेटे को देख लेंगे लेकिन इसे मुक्ति मिल जाए.”

हरीश खाना फूड पाइप के ज़रिए खाते हैं. ये पाइप भी इंडोस्कोपी के ज़रिए उनके पेट में डाली जाती है जिसका खर्चा 15 हज़ार तक आता है. हरीश के एक महीने का मेडिकल खर्च कम से कम 25-30 हज़ार रुपये है.

दोपहर के तीन बजे हैं और निर्मला मूंग दाल और सब्जियों का एक मिश्रण तैयार कर रही हैं जो हरीश को फूड पाइप के ज़रिए दिया जाएगा.

इस मिश्रण में निर्मला काली मिर्च और घी मिलाती है. मैंने उनसे पूछा कि “ये घी और काली मिर्च क्यों?”

निर्मला जवाब देती है- “थोड़ा स्वाद आ जाएगा”

-“लेकिन स्वाद का अहसास तो उन्हें सालों पहले बंद हो गया, उन्हें तो पाइप से ये खाना दिया जाना है?”

मेरा ये सवाल सुन कर निर्मला मुरझाई सी मुस्कान लिए कर कहती हैं, “हां, फिर भी मन नहीं मानता.”

यूथेनेशिया एक ऐसा मुद्दा है जिसके कई सामाजिक और नैतिक असर हो सकते हैं ऐसे में इसे लेकर कोई भी फ़ैसला देना कोर्ट के सामने बड़ा चैलेंज होता है.

यूथेनेशिया यानी इच्छा-मृत्यु

अगर कोई मरीज़ वर्षों से कोमा में हैं और उसके ठीक होने की संभावना नहीं है तो उसका लाइफ़ सपोर्ट सिस्टम हटाया जा सकता है.
इमेज कैप्शन, अगर कोई मरीज़ वर्षों से कोमा में हैं और उसके ठीक होने की संभावना नहीं है तो उसका लाइफ़ सपोर्ट सिस्टम हटाया जा सकता है.

साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने इच्छामृत्यु को लेकर कॉमन कॉज़ एनजीओ की याचिका पर सुनवाई करते हुए एक लैंडमार्क फैसला दिया था. जिसमें राइट टू डाई विद डिग्निटी यानी सम्मान से मरने के अधिकार को मौलिक अधिकार माना गया और देश में पैसिव यूथेनेशिया को लीगल बना दिया गया.

पैसिव यूथेनेशिया यानी अगर कोई मरीज़ सालों साल बिस्तर पर है, कोमा में हैं और उसके ठीक होने की संभावना पूरी तरह खत्म हो चुकी है और वो सिर्फ़ लाइफ़ सपोर्ट सिस्टम पर जिंदा है तो उसका लाइफ़ सपोर्ट सिस्टम हटाया जा सकता है.

इसका फ़ैसला मरीज़ के मां-बाप, उसके जीवनसाथी या किसी अन्य क़रीबी रिश्तेदार की सहमति के बाद ही लिया जा सकता है और उसके लिए भी हाई कोर्ट की इजाज़त ज़रूरी है. मां-बाप, जीवनसाथी या क़रीबी रिश्तेदार ना होने की स्थिति में मरीज़ के सबसे क़रीबी दोस्त की सहमति ज़रूरी है.

लेकिन देश में अभी भी एक्टिव यूथेनेशिया यानी ऐसा तरीका जिसमें मरीज़ को मरने की लिए दवा दी जाए- ग़ैरकानूनी है.

हरीश राना के वकील मनीष जैन कहते हैं, “ हमने कोर्ट से अपील की थी कि वो एक मेडिकल पैनल का गठन करें और वो पैनल देखे कि यूथेनेशिया हो या नहीं. लेकिन कोर्ट ने कहा कि मरीज़ लाइफ़ सपोर्ट सिस्टम पर नहीं है, लेकिन फूड पाइप भी तो लाइफ़ सपोर्ट ही है. कोर्ट ने बस मरीज़ के प्रति हमदर्दी जताई लेकिन फैसला हमारे हक़ में नहीं दिया. हम यही कर सकते हैं कि अब सुप्रीम कोर्ट जाएं. अगर यूथेनेशिया नहीं दे सकते तो अच्छे अस्पताल में उनका इंतज़ाम करें.”

दुनिया में कुछ ही देश ऐसे हैं जहां यूथेनेशिया की इजाज़त है- स्विट्ज़रलैंड, ऑस्ट्रिया, बेल्जियम, नीदरलैंड्स, स्पेन, कनाडा, कोलंबिया, ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड और अमेरिका के 11 राज्य.

लेकिन ज़्यादातर देशों में ये ग़ैर-क़ानूनी है. ब्रिटेन जैसे विकसित देशों में भी यूथेनेशिया की इजाज़त नहीं है.

भारत में ये मुद्दा साल 2011 में चर्चा में आया जब सुप्रीम कोर्ट ने मुंबई के किंग एडवर्ड्स मेमोरियल अस्पताल की एक नर्स अरुणा शनबाग के केस में एक मेडिकल पैनल बनाया था जिनकी रिपोर्ट में कहा गया कि शानबाग के लाइफ़ सपोर्ट सिस्टम को हटाया जा सकता है क्योंकि उनके ठीक होने की संभावना पूरी तरह खत्म हो चुकी थी.

जिस अस्पताल में वो भर्ती थीं उसके स्टाफ़ को कोर्ट ने अरुणा शानबाग का सबसे क़रीबी दोस्त माना. और चूंकि स्टाफ़ ने पैसिव यूथेनेशिया पर सहमति नहीं दी थी इसलिए अरुणा शॉनबाग के केस में इसे लागू नहीं किया गया.

साल 2015 में अरुणा शानबाग की मौत हुई.

यूथेनेशिया पर बहस

जानकार मानते हैं कि भारत जैसे समाज में यूथेनेशिया को लेकर कोई कानून बनाना बहुत चुनौतीपूर्ण है.

इमेज स्रोत, SPL

इमेज कैप्शन, जानकार मानते हैं कि भारत जैसे समाज में यूथेनेशिया को लेकर कोई कानून बनाना बहुत चुनौतीपूर्ण है.

अब लगभग एक दशक के बाद एक बार फिर ये बहस तेज़ हो गई है कि राइट टू डाई विद डिग्निटी को कैसे प्रोटेक्ट किया जा सकता है. हरीश जैसे लोग जो अपनी बात नहीं कह सकते उनकी ज़िंदगी और मौत का फैसला कैसे होगा और कौन करेगा?

आरआर किशोर पेशे से डॉक्टर हैं और अधिवक्ता भी. वह सुप्रीम कोर्ट में अधिवक्ता हैं और इंडियन सोसाइडी फॉर हेल्थ एंड लॉ एथिक्स के अध्यक्ष हैं.

वो कहते हैं, “लोगों का मानना है कि ईश्वर ने जीवन दिया है और उन्हें ही इसे लेने का हक़ है. यहां एक अनिश्चितता बनी रहती है... आज अगर वो होश में नहीं हैं तो कल को वो होश में आ सकते हैं. लेकिन अगर हम किसी को मार देंगे को उसके ठीक होने का मौका भी उससे छीन लेंगे...इस मामले में मैं हाई कोर्ट के फ़ैसले से सहमत नहीं हूं."

"ऐसे मामलों पर बीते 25-30 सालों से काम करने के नाते मुझे लगता है कि उचित होता कि एक मेडिकल बोर्ड का गठन किया जाता जिसमें कार्डियोलॉजिस्ट, फ़िज़ियोलॉजिस्ट और जनरल फिज़िशियन होते जो कई पहलुओं के आधार पर बताते कि सपोर्ट हटाया जाना चाहिए या नहीं...मूल सवाल ये है कि हाईकोर्ट के पास मरीज़ की क्लिनिकल कंडीशन की फर्स्ट-हैंड असेसमेंट ही नहीं है.”

किशोर ये भी मानते हैं कि भारत जैसे समाज में यूथेनेशिया को लेकर कोई कानून बनाना बहुत चैलेंजिंग हैं क्योंकि कई बार परिवार वाले अपने हितों के लिए इसका दुरुपयोग कर सकते हैं.

ऐसा समाज जहां संपत्ति पर अधिकार को लेकर अपराध की घटनाएं हो जाती हैं वहां ऐसे आदेश हर केस के आधार पर किए जाने चाहिए.

हरीश को इंजीनियर बनना था, बॉडी बिल्डिंग का शौक था, घर के बड़े बेटे थे तो उम्मीदें कई थीं और ज़िम्मेदारियां भी कई थीं लेकिन अब इस परिवार के पास उम्मीद तो नहीं बची, बची है तो बस कुछ यादें.

निर्मला कहती हैं, “मुझे याद आता है इसका घर में चक्कर लगाते रहना, बॉडी बनाने का बड़ा शौकीन था. हमेशा आ कर कहता मेरी बाजुओं को नापिए. मेरे लिए दलिया बना दीजिए. आज वही बॉडी खत्म हो गई.”

हरीश का बिस्तर जिस कमरे में हैं वहां कि दीवार पर एक घड़ी टंगी है और पास में एक कैलेंडर लटका है. घड़ी की सुईयां तो आगे बढ़ रही है और कैलेंडर के पन्ने भी बदल रहे हैं लेकिन इस घर में समय बीते 11 सालों से रुक गया है.

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