तस्वीरों में देखिए- 150 साल पहले कैसा दिखता था भारत?

20वीं सदी की शुरुआत में महिला डांसर. यह फ़ोटो एडवर्ड टॉरिन्स ने ली थी, जो बॉम्बे (अब मुंबई) में एक स्टूडियो वाले पहले यूरोपियन फ़ोटोग्राफ़रों में से एक थे, जो पश्चिमी देशों के ऑडियंस के लिए ख़ास फ़ोटोग्राफ़ी करते थे

इमेज स्रोत, DAG

इमेज कैप्शन, 20वीं सदी की शुरुआत में महिला डांसर. यह फ़ोटो एडवर्ड टॉरिन्स ने ली थी, जो बॉम्बे (अब मुंबई) में एक स्टूडियो वाले पहले यूरोपियन फ़ोटोग्राफ़रों में से एक थे, जो पश्चिमी देशों के ऑडियंस के लिए ख़ास फ़ोटोग्राफ़ी करते थे
    • Author, सुधा जी तिलक
  • पढ़ने का समय: 5 मिनट

19वीं सदी के उत्तरार्ध में, फोटोग्राफी भारत को जानने और इसे अलग-अलग तरीके से बांट कर समझने के लिहाज से ब्रिटिश साम्राज्य के सबसे अच्छे तरीकों में से एक बन गई.

एक नई प्रदर्शनी को दिल्ली स्थित आर्ट गैलरी डीएजी ने आयोजित किया है. इसे टाइपकास्टिंग: फोटोग्राफिंग द पीपल्स ऑफ इंडिया, 1855-1920 कहा जाता है.

यह उस दौर की लगभग 200 दुर्लभ तस्वीरों को सामने लाई है जब समुदायों को वर्गीकृत करने, पहचान तय करने और भारत के जटिल सामाजिक भेद को ब्रिटिश सरकार आसानी से समझ सके, इस मक़सद से कैमरे का इस्तेमाल किया गया था.

65 साल के इस दौर से जुड़ी यह प्रदर्शनी एक विशाल मानव भूगोल का नक्शा बनाती है. उत्तर-पूर्व में लेप्चा और भूटिया समुदायों से लेकर उत्तर-पश्चिम में अफरीदी तक; नीलगिरी में टोडा से लेकर पश्चिमी भारत में पारसी और गुजराती अभिजात वर्ग तक.

यह औपनिवेशिक सामाजिक व्यवस्था के निचले पायदान पर रखे गए लोगों पर भी अपनी नज़र डालती है.

नर्तकियां, खेतिहर मजदूर, नाई और सपेरे-उन्होंने इसे पूरी सक्रियता से एक आकार दिया, बदलती, जीती हुई सच्चाइयों को साफ़ तौर पर स्थिर और जानने लायक बनाया.

इतिहासकार सुदेशना गुहा की क्यूरेटेड एग्ज़िबिशन, 'द पीपल ऑफ़ इंडिया' के फ़ोलियो पर केंद्रित है, जो 1868 और 1875 के बीच पब्लिश हुआ एक असरदार आठ वॉल्यूम वाला फ़ोटोग्राफ़िक सर्वे था.

इसमें सैमुअल बॉर्न, लाला दीन दयाल, जॉन बर्क और स्टूडियो शेफ़र्ड एंड रॉबर्टसन जैसे फ़ोटोग्राफ़रों के एल्बुमिन और सिल्वर-जिलेटिन प्रिंट शामिल हैं. ऐसे लोग, जिन्होंने उस समय की तस्वीरों की भाषा को परिभाषित करने में मदद की.

डीएजी के सीईओ आशीष आनंद कहते हैं, "एक साथ लिया जाए, तो यह मटीरियल एथनोग्राफ़िक फ़ोटोग्राफ़ी के इतिहास और ब्रिटिश प्रशासन और भारतीय आबादी पर इसके असर को बताता है."

"साइज़ और गहराई में भारत में ऐसा प्रोजेक्ट पहले कभी नहीं देखा गया."

एग्ज़िबिशन से कुछ चुनिंदा तस्वीरें यहां दी गई हैं:

बॉम्बे में 1890 में गाय के गोबर के उपले ले जाती औरतों की यह तस्वीर एडवर्ड टॉरिन्स ने ली थी. यहां औरतों को घर का काम करते हुए दिखाया गया है. औरतें आम तौर पर घर के भीतर काम में लगी होती थीं लेकिन कैमरे के लिए उन्हें बाहर की तरफ़ दिखाया गया है

इमेज स्रोत, DAG

इमेज कैप्शन, बॉम्बे में 1890 में गाय के गोबर के उपले ले जाती औरतों की यह तस्वीर एडवर्ड टॉरिन्स ने ली थी. यहां औरतों को घर का काम करते हुए दिखाया गया है. औरतें आम तौर पर घर के भीतर काम में लगी होती थीं-लेकिन कैमरे के लिए उन्हें बाहर की तरफ़ दिखाया गया है
फेलिक्स मोरिन ने 1890 में भारतीय महिला की ये फ़ोटो खींची. फ़ोटो में महिलाएं खास तौर पर दिखाई देती हैं. ध्यान से बनाया गया यह ब्रिटिश काल का पोर्ट्रेट उस समय के एथनोग्राफ़िक नज़रिए और शुरुआती फ़ोटोग्राफ़ी की फ़ॉर्मल खूबसूरती, दोनों को दिखाता है.

इमेज स्रोत, DAG

इमेज कैप्शन, फेलिक्स मोरिन ने 1890 में भारतीय महिला की ये फ़ोटो खींची. फ़ोटो में महिलाएं खास तौर पर दिखाई देती हैं. ध्यान से बनाया गया यह ब्रिटिश काल का पोर्ट्रेट उस समय के एथनोग्राफ़िक नज़रिए और शुरुआती फ़ोटोग्राफ़ी की फ़ॉर्मल खूबसूरती, दोनों को दिखाता है.
1862 में 'खैबर दर्रे में आफ़रीदियों के ग्रुप' की यह तस्वीर चार्ल्स शेफ़र्ड ने ली थी. इसमें अफ़गानिस्तान बॉर्डर पर रहने वाले एक पठान कबीले के लोग दिख रहे हैं, जिन्हें अंग्रेज़ों ने "बहुत आज़ाद स्वभाव" का बताया था.

इमेज स्रोत, DAG

इमेज कैप्शन, 1862 में 'खैबर दर्रे में आफ़रीदियों के ग्रुप' की यह तस्वीर चार्ल्स शेफ़र्ड ने ली थी. इसमें अफ़गानिस्तान बॉर्डर पर रहने वाले एक पठान कबीले के लोग दिख रहे हैं, जिन्हें अंग्रेज़ों ने "बहुत आज़ाद स्वभाव" का बताया था.
एक अनजान फोटोग्राफर की ली हुई एक गली की तस्वीर. ऐसी तस्वीरों में अक्सर गली के काम और रोज़ाना की ज़िंदगी को दिखाया जाता था, जिससे साधारण परिश्रम से एथनोग्राफिक सब्जेक्ट बन जाती थी

इमेज स्रोत, DAG

इमेज कैप्शन, एक अनजान फोटोग्राफर की ली हुई एक गली की तस्वीर. ऐसी तस्वीरों में अक्सर गली के काम और रोज़ाना की ज़िंदगी को दिखाया जाता था.
विलियम जॉनसन बॉम्बे फ़ोटोग्राफ़िक सोसाइटी के फ़ाउंडिंग मेंबर थे. उन्होंने 1857 के 'द इंडियन एमेच्योर्स फ़ोटोग्राफ़िक एल्बम' के अंक में 'ब्राह्मणी लेडीज़' नाम से यह इमेज पब्लिश की थी. साथ में दिए गए टेक्स्ट में दोनों महिलाओं के नाम थे, उन्हें युवा और इंटेलिजेंट बताया गया था, और बताया गया था कि वे अपने पिता की प्रेरणा और अपने पतियों के समर्थन से बॉम्बे में एक मिशन स्कूल में इंग्लिश पढ़ने आई थीं

इमेज स्रोत, DAG

इमेज कैप्शन, विलियम जॉनसन बॉम्बे फ़ोटोग्राफ़िक सोसाइटी के फ़ाउंडिंग मेंबर थे. उन्होंने 1857 के 'द इंडियन एमेच्योर्स फ़ोटोग्राफ़िक एल्बम' के अंक में 'ब्राह्मणी लेडीज़' नाम से यह इमेज पब्लिश की थी. साथ में दिए गए टेक्स्ट में दोनों महिलाओं के नाम थे, उन्हें युवा और इंटेलिजेंट बताया गया था, और बताया गया था कि वे अपने पिता की प्रेरणा और अपने पतियों के समर्थन से बॉम्बे में एक मिशन स्कूल में इंग्लिश पढ़ने आई थीं
पारसियों का एक ग्रुप, जिसकी फोटो शायद विलियम जॉनसन ने खींची थी. ये लोग एक औपनिवेशिक बंगले के सामने बैठे हैं. एक कॉलोनियल आर्किटेक्चरल दुनिया में रहते हुए ये लोग कपड़ों और हाव-भाव से ये अपनी अलग पहचान दिखा रहे हैं

इमेज स्रोत, DAG

इमेज कैप्शन, पारसियों का एक ग्रुप, जिसकी फोटो शायद विलियम जॉनसन ने खींची थी. ये लोग एक औपनिवेशिक बंगले के सामने बैठे हैं. एक कॉलोनियल आर्किटेक्चरल दुनिया में रहते हुए ये लोग कपड़ों और हाव-भाव से ये अपनी अलग पहचान दिखा रहे हैं
सन 1890 में युवा भूटिया लोगों का एक ग्रुप. इस एलबम में सिक्किम, भूटान और तिब्बत के लोगों की तस्वीरें हैं - ये वो इलाक़े थे जो ब्रिटिश शासन से बाहर थे. लेपचा, भूटिया और तिब्बतियों की ये तस्वीरें बेंजामिन सिम्पसन ने ली थीं

इमेज स्रोत, DAG

इमेज कैप्शन, सन 1890 में युवा भूटिया लोगों का एक ग्रुप. इस एलबम में सिक्किम, भूटान और तिब्बत के लोगों की तस्वीरें हैं - ये वो इलाक़े थे जो ब्रिटिश शासन से बाहर थे. लेपचा, भूटिया और तिब्बतियों की ये तस्वीरें बेंजामिन सिम्पसन ने ली थीं
महाराष्ट्र में चट्टानों को काटकर बनाए गए प्राचीन बौद्ध मंदिरों में संगीतकार, चार्ल्स स्कॉट द्वारा खींची गई तस्वीर. इस तस्वीर की तारीख़ का ज़िक्र नहीं है

इमेज स्रोत, DAG

इमेज कैप्शन, महाराष्ट्र में चट्टानों को काटकर बनाए गए प्राचीन बौद्ध मंदिरों में संगीतकार, चार्ल्स स्कॉट द्वारा खींची गई तस्वीर. इस तस्वीर की तारीख़ का ज़िक्र नहीं है
19वीं सदी के आखिर में सिंगापुर में एक भारतीय परिवार. कुछ तस्वीरों में मलय पेनिनसुला, सिंगापुर और बांग्लादेश के चटगांव के लोग दिखते हैं

इमेज स्रोत, DAG

इमेज कैप्शन, 19वीं सदी के आखिर में सिंगापुर में एक भारतीय परिवार. कुछ तस्वीरों में मलय पेनिनसुला, सिंगापुर और बांग्लादेश के चटगांव के लोग दिखते हैं

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.