मौत से पहले इंसान के दिमाग में क्या चल रहा होता है?

मस्तिष्क

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    • Author, मार्गरिटा रोडरिग्ज़
    • पदनाम, बीबीसी मुंडो

न्यूरोसाइंटिस्ट हिमो बोरहिईन उस वक़्त हैरान रह गईं, जब उन्हें ये एहसास हुआ कि इंसान को इस बात की लगभग कोई जानकारी नहीं है कि जब कोई मरता है तो उसके दिमाग़ में क्या होता है?

हिमो बोरहिईन ने बीबीसी मुंडो से कहा, ‘'हम चूहों पर प्रयोग कर रहे थे और सर्जरी के बाद उनके दिमाग़ से होने वाले रिसाव पर नज़र रख रहे थे.’'

अचानक उनमें से दो चूहों की मौत हो गई. इस वजह से हिमो को उन चूहों के दिमाग़ में मौत की प्रक्रिया पर नज़र रखने का मौक़ा मिल गया.

हिमो ने बताया, ‘'उनमें से एक चूहे के मस्तिष्क से सेरोटिनिन नाम के केमिकल का भारी रिसाव हुआ. तो मेरे मन में सवाल उठा कि क्या वो चूहा मतिभ्रम का शिकार था?’'

उन्होंने समझाया, ‘'सेरोटिनिन का ताल्लुक़ मतिभ्रम या हैलुसिनेशन से होता है.’'

सेरोटिनिन जीवों के मूड को नियंत्रित करने वाला केमिकल है. उस चूहे के दिमाग़ में सेरोटिनिन की बाढ़ देखने पर हिमा के ज़हन में कई सवाल उठे.

इसके बाद हिमो ने इस बारे में पहले से मौजूद जानकारी पर रिसर्च करना शुरू कर दिया. हिमो ने सोचा कि सेरोटिनिन के रिसाव के पीछे कोई तो वजह होगी.

हिमो ने बताया, ''इस रिसर्च के दौरान मैं ये जानकर हैरान रह गई कि हमें मरने की प्रक्रिया के बारे में बहुत कम जानकारी है.''

डॉक्टर हिमो बोरहिईन, अमेरिका की मिशिगन यूनिवर्सिटी में मॉलीकुलर ऐंड इंटेरोगेटिव फिज़ियोलॉजी और न्यूरोलॉजी विभाग में एसोसिएट प्रोफ़ेसर हैं.

चूहों की मौत पर रिसर्च करते करते अब डॉक्टर हिमो ने इस बात की स्टडी करनी शुरू कर दी कि जब इंसान मरते हैं, तो दिमाग़ में क्या क्या होता है.

डॉक्टर हिमो का कहना है कि अपनी रिसर्च के दौरान उन्होंने जो कुछ पाया, वो मौत को लेकर हमारी समझ और जानकारी के बिल्कुल उलट है.

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मौत की परिभाषा

डॉक्टर हिमो ने समझाया कि लंबे समय से यही माना जाता रहा है कि अगर दिल का दौरा पड़ने के बाद किसी की नाड़ी नहीं मिल रही है, तो उन्हें डॉक्टरी लिहाज़ से मरा हुआ माना जाता है.

इस प्रक्रिया में ज़ोर दिल पर होता है. वो कहती हैं कि इसे दिल का दौरा पड़ना कहते हैं, दिमाग़ का दौरा पड़ना नहीं बोलते.

हिमो कहती हैं, ''वैज्ञानिकों की समझ ये है कि दिमाग़ ऐसा दिखता है मानो उसमें कोई काम न हो रहा हो. क्योंकि, उससे कोई रिएक्शन नहीं मिलता. मरते हुए लोग न बात कर सकते हैं, न खड़े हो सकते हैं. न ही वो उठकर बैठ सकते हैं.''

हमारे मस्तिष्क को काम करने के लिए ढेर सारी ऑक्सीजन चाहिए. अगर हमारा हृदय ख़ून को पंप नहीं करता, तो मस्तिष्क तक ऑक्सीजन नहीं पहुंच पाती है.

हिमो समझाती हैं, ''ऊपरी तौर पर सारे लक्षण यही दिखाते हैं कि दिमाग़ काम नहीं कर रहा है या वो निष्क्रिय पड़ा है, सक्रिय नहीं है.''

हालांकि डॉक्टर हिमो और उनकी टीम की रिसर्च से बिल्कुल अलग ही जानकारी निकलकर सामने आई है.

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मस्तिष्क ‘बड़ी तेज़ी से भाग रहा’ होता है

2013 में चूहों पर किए गए एक अध्ययन में लोगों ने पाया कि जब चूहों के दिलों ने काम करना बंद कर दिया, तो उनके दिमाग़ की कई तंत्रिकाओं में ज़बरदस्त गतिविधियां होती देखी गई थीं.

‘'मर चुके चूहों के दिमाग़ में सेरोटिनिन का रिसाव 60 गुना बढ़ गया था और अच्छा एहसास कराने वाले केमिकल डोपामाइन के रिसाव में भी 40 से 60 गुना का ज़बरदस्त इज़ाफ़ा हो गया था.’'

‘'वहीं, जीवों को बहुत चौकन्ना बनाने वाले रसायन नोर्पिनेफ्राइन की तादाद तो 100 गुना तक बढ़ गई थी.’

हिमो कहती हैं, ''जब कोई जानवर ज़िंदा होता है, तो उसके मस्तिष्क में इन केमिकल्स की इतनी ज़्यादा तादाद होना लगभग नामुमकिन होता है.''

2015 में उस टीम ने मरते हुए चूहों के दिमाग़ पर की गई एक और स्टडी के नतीजे प्रकाशित किए.

‘'दोनों ही मामलों में 100 प्रतिशत जानवरों के मस्तिष्क में ज़बरदस्त गतिविधियां होते हुए रिकॉर्ड किया गया. दिमाग़ बहुत तेज़ी से भाग रहा था. मौत के वक़्त दिमाग़ बेहद सक्रिय था.’'

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गामा तरंगें

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2023 में हिमा और उनकी टीम ने एक और रिसर्च पेपर प्रकाशित किया. ये रिसर्च चार ऐसे इंसानों पर की गई थी, जो कोमा में थे और उनकी धड़कनें लाइफ सपोर्ट सिस्टम के भरोसे चल रही थीं. इन मरीज़ों को इलेक्ट्रोएनसेफेलोग्राफी के इलेक्ट्रोड या प्लेटें लगाई गईं,

ताकि उनके मस्तिष्क की गतिविधियों को रिकॉर्ड किया जा सके.

ये चार लोग मर रहे थे. डॉक्टर और उनके परिवार के लोगों ने मिलकर ये तय किया कि ‘इन चारों लोगों को अब किसी तरह की मदद से बचाया नहीं जा सकता, तो उन्होंने तय किया कि अब उनकी जान बचाने की कोशिश छोड़ देनी चाहिए.’

रिश्तेदारों की इजाज़त से वो वेंटिलेटर हटा दिए गए, जिनकी मदद से इन चारों लोगों को ज़िंदा रखा जा रहा था.

इस दौरान शोधकर्ताओं ने देखा कि दो मरीज़ों के दिमाग़ में काफ़ी तेज़ गतिविधियां हो रही थीं. इससे दिमाग़ में समझ भरी गतिविधियों का पता चला.

इस दौरान उनके मस्तिष्क में गामा तरंगों को भी रिकॉर्ड किया गया. इन्हें दिमाग़ की सबसे तेज़ तरंगें कहा जाता है. गामा वेव्स, इंसानों के मस्तिष्क में जानकारी और याददाश्त को समझने की बेहद जटिल प्रक्रिया का हिस्सा होती हैं.

एक और मरीज़ के मस्तिष्क की निगरानी के दौरान, उसके दिमाग़ के टेंपोरल लोब यानी दोनों कानों के पीछे स्थित मस्तिष्क के हिस्से में काफ़ी तेज़ गतिविधियां होती देखी गईं.

डॉक्टर हिमों कहती हैं- इंसान के मस्तिष्क का जो हिस्सा दाहिने कान के पीछे स्थित होता है, उसे हमदर्दी के लिए काफ़ी महत्वपूर्ण माना जाता है.

‘'बहुत से मरीज़ जो दिल का दौरा पड़ने के बाद बच जाते हैं और जो लोग मौत के बेहद क़रीब पहुंचने के तजुर्बे से गुज़र चुके होते हैं. वो बताते हैं कि उस तजुर्बे ने उन्हें बेहतर इंसान बना दिया और अब वो दूसरों के प्रति ज़्यादा हमदर्दी महसूस करने लगे हैं.’'

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मौत के बेहद क़रीब पहुंचने का तजुर्बा

कुछ लोग जो मौत के मुहाने पर पहुंचकर लौट आए हैं, वो कहते हैं कि उनकी आंखों में पूरी ज़िंदगी की तस्वीर घूम गई थी, या फिर उन्हें ज़िंदगी के बेहद अहम लम्हे उस वक़्त याद आ गए थे.

बहुत से लोग ये भी बताते हैं कि उन्हें बहुत तेज़ रौशनी दिखाई दी थी. वहीं, कुछ लोगों का ये भी दावा था कि उन्हें ऐसा लगा कि वो अपने शरीर से बाहर निकल गए और दूर खड़े होकर सब-कुछ देख रहे थे.

तो डॉक्टर हिमो ने अपने अध्ययनों में दिमाग़ की जो बेहद सक्रियता, जो हाइपर एक्टिविटी होते देखी, क्या मौत के मुहाने पर खड़े लोगों को उसी वजह से ऐसे ज़बरदस्त अनुभव हुए थे?

डॉक्टर हिमों कहती हैं, ‘हां. मुझे तो ऐसा ही लगता है.’

‘'दिल के दौरे के शिकार कम से कम 20 से 25 प्रतिशत लोगों ने बताया कि उन्हें सफ़ेद रौशनी दिखाई दी. कुछ अजीब सा दिखाई दिया. ज़ाहिर है उनके दिमाग़ में तस्वीर बनाने वाला हिस्सा सक्रिय हो गया था.’'

जिन दो मरीज़ों के वेंटिलेटर हटाए जाने के बाद उनके दिमाग़ में बेहद तेज़ गतिविधियां होती देखी गई थीं, उनके बारे में शोधकर्ताओं का कहना है कि उन मरीज़ों के मस्तिष्क के विज़ुअल कॉर्टेक्स (जो देखने की समझ में मददगार होता है) में काफ़ी तेज़ गतिविधि होती देखी गई थी.

इसका मतलब है, ‘उन्हें इस तरह कुछ दिखाई देने का अनुभव हुआ होगा.’

डॉक्टर हिमो बोरहिईन मानती हैं कि उनके अध्ययन में बहुत कम इंसानों को शामिल किया गया था और ये समझने के लिए अभी और बहुत रिसर्च करने की ज़रूरत है कि जब कोई इंसान मर रहा होता है, तो उसके मस्तिष्क में क्या चल रहा होता है.

हालांकि, इस बारे में दस साल से ज़्यादा रिसर्च करने के बाद, डॉक्टर हिमो के लिए एक बात तो बिल्कुल साफ़ हो गई है, ‘'मुझे लगता है कि जब दिल का दौरा पड़ता है, तो मस्तिष्क शांत नहीं होता, बल्कि वो बेहद एक्टिव हो जाता है.’'

लेकिन, तब क्या होता है, जब दिमाग़ को ये एहसास होता है कि उसे अपने काम करने के लिए ज़रूरी ऑक्सीजन नहीं मिल रही है?

हिमो कहती हैं, '‘हम ये बात समझने की कोशिश अभी कर रहे हैं. इस बारे में बहुत ज़्यादा जानकारी उपलब्ध नहीं है. सच तो ये है कि इस बारे में कुछ भी नहीं मालूम.’'

डॉक्टर हिमो बोरहिईन, अमेरिका की मिशिगन यूनिवर्सिटी में मॉलीकुलर ऐंड इंटेरोगेटिव फिज़ियोलॉजी और न्यूरोलॉजी विभाग में एसोसिएट प्रोफ़ेसर

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डॉक्टर हिमो सुप्तावस्था का ज़िक्र करती हुए बताती हैं कि उनके हिसाब से कुछ ऐसा होता होगा: चूहों और इंसानों समेत तमाम जानवरों में ऑक्सीजन की कमी से निपटने के लिए अलग अलग तरह की व्यवस्था होती है.

‘'अब तक ऐसा माना जाता था कि जब दिल काम करना बंद कर देता है, तो दिमाग़ शांत पड़ जाता है और तमाशबीन बनकर सब कुछ बस देखता रहता है. यानी जब दिल काम करना बंद कर देता है, तो दिमाग़ बस बंद हो जाता है. अभी तो लोग यही मानते हैं: क्योंकि दिमाग़ ऐसे हालात से निपट नहीं सकता और बस मर जाता है.’'

हालांकि, डॉक्टर हिमो ज़ोर देकर कहती हैं कि हमें ये पक्के तौर पर नहीं पता कि ऐसा ही होता है, या कुछ और.

डॉक्टर हिमो मानती हैं कि दिमाग़ बहुत आसानी से हार नहीं मानता है. जिस तरह हमारा दिमाग़ हर मुश्किल परिस्थिति से लड़ता है, उसी तरह वो मौत का भी मुक़ाबला करता है.

‘सुप्तावस्था इसका एक अच्छा उदाहरण है. मुझे लगता है कि मस्तिष्क में इतनी क्षमता है कि वो ऑक्सीजन की कमी की इस चुनौती से जूझ सके. लेकिन, अभी इसकी और ज़्यादा जांच पड़ताल करने की ज़रूरत है.’

अभी बहुत कुछ खोजना बाक़ी है

डॉक्टर हिमो बोरहिईन को लगता है कि उन्होंने अपनी टीम के साथ मिलकर जो जानकारी खोजी है, वो तो एक तिनके की तरह है और अभी तो जानकारियों के विशाल ढेर का पता लगाना बाक़ी है.

''मैं मानती हूं कि दिमाग़ के भीतर ऑक्सीजन की कमी से निपटने की कोई ऐसी व्यवस्था है, जिसे हम नहीं समझते हैं. ऐसे में ऊपरी तौर पर हमें ये पता है कि जिन लोगों का दिल काम करना बंद कर देता है, उन्हें ये अजब और अलग अलग तरह का अनुभव होता है. और हमारे आंकड़े बताते हैं कि ऐसा दिमाग़ में चल रही गतिविधियों की वजह से होता है.’'

अब सवाल ये है कि मरते हुए मस्तिष्क में इतनी ज़्यादा गतिविधियां क्यों होती हैं?

वो कहती हैं, ''हम सबको मिलकर इस बारे में अपनी समझ बेहतर बनानी होगी. हम इसकी स्टडी करें. इस पर रिसर्च करें, ताकि इन सवालों के जवाब तलाश कर सकें. क्योंकि, हो सकता है कि हम करोड़ों लोगों को उनकी वास्तविक मौत से पहले ही मरा मान ले रहे हों. क्योंकि हमें मौत की पूरी प्रक्रिया की ठीक ठीक समझ नहीं है.’'

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