अक्षर पटेल को दक्षिण अफ़्रीका के ख़िलाफ़ टीम इंडिया से बाहर रखना क्या थी बड़ी चूक?

अक्षर पटेल

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इमेज कैप्शन, दक्षिण अफ़्रीका के ख़िलाफ़ अहमदाबाद में हुए मैच में अक्षर प्लेइंग-11 में नहीं थे
    • Author, मीनाक्षी राव
    • पदनाम, वरिष्ठ खेल पत्रकार, अहमदाबाद
  • पढ़ने का समय: 8 मिनट

मोटेरा में भारत ने सिर्फ़ ख़राब खेल नहीं दिखाया, बल्कि उसकी योजना और रणनीति भी बेहद अदूरदर्शी साबित हुई. सुपर 8 मुक़ाबले में दक्षिण अफ्रीका के ख़िलाफ़ ऑलराउंडर अक्षर पटेल को प्लेइंग 11 से बाहर किए जाने से हर कोई हैरान था.

भारतीय टीम प्रबंधन की इस सोच ने यह भी दिखाया कि चयन का एक ग़लत फ़ैसला, कैसे टीम की स्पष्टता, खेल समझ और अहम दौर में उसकी स्थिति को प्रभावित करता है.

इस घरेलू मैदान पर उपकप्तान अक्षर पटेल को बेंच पर बैठाने का फ़ैसला केवल एक बार की चूक नहीं थी. यह ड्रेसिंग रूम की उलझी हुई सोच की झलक थी, जो अक्सर मैदान पर खिलाड़ियों के व्यक्तिगत प्रदर्शन के पीछे छिप जाती है.

यह भी दिखा कि टीम ने एक तरह के मैच की तैयारी की थी, लेकिन जब परिस्थितियां बदलीं तो वह ख़ुद को ढाल नहीं सकी. मोटेरा में ऐसा ही हुआ, जिसका फ़ायदा दक्षिण अफ़्रीका ने उठाया.

आख़िरकार भारत का ग़लत शॉट पूरे पतन का प्रतीक बन गया, जबकि दक्षिण अफ़्रीका ने मुश्किल हालात से वापसी की. उनके नियमित स्पिनर केशव महाराज ने ज़िम्मेदारी निभाई. वह न सिर्फ़ चयन में भरोसे के काबिल थे, बल्कि प्रदर्शन भी किया, ठीक वैसे ही जैसे पटेल करते हैं.

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अपने ही मैदान पर टीम से बाहर

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इमेज कैप्शन, पाकिस्तान के ख़िलाफ़ मैच में अक्षर पटेल ने दो विकेट लिए थे

सोचिए, मोटेरा अक्षर का घरेलू मैदान है. वह यहां की पिच की गति, उसकी पकड़ और एंगल को समझते हैं. रात में रोशनी के नीचे पिच का मिज़ाज कैसे बदलता है, कब ढीली पड़ती है, कब नियंत्रण मांगती है, ख़ासकर मिडिल ओवर में दबाव बनाने की ज़रूरत हो, यह सब उन्हें पता है. सफ़ेद गेंद क्रिकेट में उनका करियर इसी समझ पर बना है.

फिर भी जब भारत को गेंदबाज़ी में नियंत्रण और मध्यक्रम में स्थिरता की ज़रूरत थी, तो उसी खिलाड़ी को बाहर कर दिया गया.

सहायक कोच रयान टेन डूशेट ने माना कि वॉशिंगटन सुंदर को चुनने की योजना उलटी पड़ गई.

उन्होंने कहा कि यह फ़ैसला मैच से पहले- दक्षिण अफ्रीका के बाएं हाथ के बल्लेबाज़, पावरप्ले में ऑफ़ स्पिन की संभावना और मैच-अप का गणित जैसी थ्योरी पर आधारित था

लेकिन मैच उस योजना के मुताबिक़ नहीं चला. सुंदर को पावरप्ले में गेंदबाज़ी का मौक़ा नहीं मिला और बाद में वह मिडिल ओवर के दबाव में फंस गए, जहां मिलर की अगुवाई में दक्षिण अफ़्रीकी बल्लेबाज़ों ने खुलकर खेला.

टेन डूशेट ने कहा, "आज रणनीति का बड़ा हिस्सा यह था कि वह पावरप्ले में अच्छी गेंदबाज़ी करें. हमने सोचा था कि वह वहां दो ओवर डालेंगे."

लेकिन टी-20 क्रिकेट किसी स्क्रिप्ट के मुताबिक़ नहीं चलता है. दक्षिण अफ्रीका का स्कोर पांच ओवर में 3 विकेट पर 30 रन था. जिस पावरप्ले चरण को ध्यान में रखकर भारत ने चयन किया था, वह उम्मीद के मुताबिक़ नहीं आया.

सुंदर की जगह अक्षर कैसे किफ़ायती होते?

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इमेज कैप्शन, अक्षर की ख़ासियत मिडिल ओवर में नियंत्रण बनाना है
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मशहूर हस्तियों की कहानी पूरी तसल्ली और इत्मीनान से इरफ़ान के साथ.

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मैच दूसरे चरण में पहुंच गया, जहां मिडिल ओवर में नियंत्रण और बल्लेबाज़ी में गहराई की ज़रूरत थी. यही वह चरण है, जिसके लिए अक्षर पटेल जाने जाते हैं.

आगे चलकर मुख्य कोच गौतम गंभीर और कप्तान सूर्यकुमार यादव के लिए पहला नियम व्यवहारिक सोच होना चाहिए, क्योंकि चयन अनुमान के आधार पर नहीं, परिस्थितियों के अनुसार होना चाहिए.

अक्षर की ख़ासियत मिडिल ओवर में नियंत्रण बनाना है. वह लंबाई और गति में बदलाव कर बल्लेबाज़ों को बांधते हैं.

उन्होंने पहले कहा था, "मुझे पता है कब लंबाई पीछे खींचनी है और कब फुल गेंद डालनी है."

टॉस के समय कप्तान सूर्यकुमार ने अक्षर को बाहर करने के फ़ैसले को "कठोर" बताया. यह "नासमझ" होने का एक दूसरा रूप है.

इसके बाद जो हुआ, वह उसी फ़ैसले का नतीजा था. टेन डूशेट से लेकर बल्लेबाज़ी कोच सितांशु कोटक तक के पास इसे सही ठहराने के लिए ठोस शब्द नहीं थे.

कोटक ने कहा, "सूर्या और गौतम ने इस पर बात की. इस मैच के लिए हमें लगा कि ऑफ़ स्पिनर ज़रूरी है." लेकिन योजना जल्द ही बिखर गई.

सुंदर को पावरप्ले में गेंदबाज़ी नहीं मिली और मिडिल ओवर में उनका प्रभाव सीमित रहा, जहां अक्षर आमतौर पर बेहतर विकल्प होते हैं.

अक्षर क्या कर सकते थे?

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इमेज कैप्शन, अक्षर पटेल ने ग्रुप मैचों में पाकिस्तान, अमेरिका और नामीबिया के ख़िलाफ़ दो-दो विकेट लिए थे

जब दक्षिण अफ्रीका ने मिलर और ब्रेविस के ज़रिए पारी संभाली, तब भारत को ऐसे गेंदबाज़ की जरूरत थी जो रफ़्तार बदल सके और रन रोक सके. अक्षर यह भूमिका कई बार निभा चुके हैं.

और भी अहम यह था कि रोहित शर्मा और विराट कोहली के बिना भारतीय बल्लेबाज़ी पहले ही कमज़ोर दिख रही थी. ऐसे में नंबर 6 या 7 पर स्थिरता की ज़रूरत थी. अक्षर यह भूमिका शांति से निभाते रहे हैं.

इसके बजाय भारत का मध्यक्रम अस्थिर नज़र आया.

जब लक्ष्य का पीछा करते हुए स्कोर 57 पर 5 हुआ, तब अक्षर की गैर-मौजूदगी रणनीतिक नहीं, बल्कि संरचनात्मक ख़ामी बन गई.

टेन डूशेट ने सीधे शब्दों में नहीं माना लेकिन कहा कि "हम बड़े पैमाने पर उलझ गए थे. उन्होंने माना कि भारत ने एक तरह के मैच की योजना बनाई थी और हालात बदलने पर ख़ुद को ढाल नहीं सका.

कोटक ने भी कहा, "अगर सब योजना के अनुसार होता, तो बात अलग थी. लेकिन ऐसा नहीं हुआ."

अब सवाल मुख्य कोच और कप्तान दोनों से है, जिन्होंने यह फ़ैसला लिया.

टूर्नामेंट उन योजनाओं से नहीं जीते जाते जो केवल सब कुछ सही होने पर काम करें. जीत उन टीमों को मिलती है जो मुश्किल हालात में भी टिक सके.

अक्षर केवल एक स्पिन विकल्प नहीं हैं. वह टीम संतुलन का अहम हिस्सा हैं. उन्होंने पहले कहा था, "टीम में मुझे अलग-अलग भूमिकाएं दी जाती हैं, यह दिखाता है कि मेरे काम की जरूरत है."

अक्षर को बाहर कर भारत ने अपनी प्लेइंग 11 की तीन परतों से समझौता किया. इनमें मिडिल ओवर में गेंदबाज़ी पर नियंत्रण, निचले मध्यक्रम में टिकाऊ बल्लेबाज़ी और बाएं-दाएं हाथ की बल्लेबाज़ी के संयोजन का लचीलापन शामिल है.

यह सब एक ऐसी पावरप्ले योजना के लिए हुआ, जो 30 गेंदों में अप्रासंगिक हो गई. यह केवल चयन की ग़लती नहीं थी, बल्कि सोच की ग़लती थी. भारत को क्रिकेट मैच के लिए नहीं, बल्कि "मैच-अप चार्ट" के आधार पर चुना गया.

अक्षर पटेल को लेकर जो मामला उठ रहा है, उससे भी ज़्यादा चिंताजनक बात है टीम इंडिया की लगातार ग़लत रणनीतियां.

ऐसी सोच, जो मैच शुरू होने से पहले ही खेल की स्क्रिप्ट लिख देती है, बजाय इसके कि परिस्थितियों के हिसाब से प्रतिक्रिया दे. ये साफ़ बताती है कि भविष्यवाणियों पर बनी प्लेइंग इलेवन के बजाय अनुकूलन-क्षम संरचना की ज़रूरत है.

ऐसी सोच जो मैच शुरू होने से पहले ही खेल की स्क्रिप्ट लिख देती है, न कि उस पर जवाब देती है, यह दिखाती है कि बिना सोचे-समझे अंदाज़ों पर प्लेइंग इलेवन बनाने के बजाय, एडजस्ट होने वाले स्ट्रक्चर पर टिके रहने की ज़रूरत है. दक्षिण अफ़्रीका के ख़िलाफ़ इसने कड़वी सच्चाई सामने ला दी और भारत को करो या मरो वाली मुश्किल स्थिति में डाल दिया.

दूसरी तरफ़ दक्षिण अफ्रीका ने केशव महाराज की स्पिन से शुरुआत की. भारत का बाएं हाथ के बल्लेबाज़ों वाला टॉप ऑर्डर जल्दी ढह गया. मिडिल ओवर्स में नियंत्रण चाहिए था. लक्ष्य का पीछा करने के लिए धैर्य चाहिए था. लेकिन भारत की मशहूर बल्लेबाज़ी इनमें से कुछ भी नहीं जुटा सकी.

इन सभी मौकों पर अक्षर पटेल बल्ले और गेंद दोनों से बेहद प्रासंगिक होते. वो 150 और 187 के स्कोर के अंतर को मिटाने वाले खिलाड़ी साबित हो सकते थे.

और इससे भी बड़ा दुर्भाग्य यह हो जाता है कि ये सब अक्षर के घरेलू मैदान अहमदाबाद में हुआ.

मोटेरा की खासियतों को कुछ ही खिलाड़ी बेहतर समझते हैं. भारत में इतने भरोसेमंद ऑलराउंडर भी कम हैं, जो ऐसी विकेटों पर उपयोगी हों, जहां हर इनिंग में पिच का स्वभाव हल्का-सा बदल जाता है.

लेकिन जिस रात भारत को इस ज्ञान की सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी, भारतीय ड्रेसिंग रूम में रणनीतिकारों और फ़ैसले लेने वालों ने जान-पहचान के बजाय थ्योरी को और मौजूदगी के बजाय प्रोजेक्शन को चुना.

इस सोच और फ़ैसले ने क्या उजागर किया?

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इमेज कैप्शन, दक्षिण अफ़्रीका के ख़िलाफ़ भारत को 76 रनों से मात मिली

यह हार रिकॉर्ड में दक्षिण अफ्रीका से 76 रन की शिकस्त के रूप में लिखी जाएगी. लेकिन असली कहानी यह है कि यह हार कैसे गढ़ी गई.

  • एक टीम जिसने मैच की शुरुआत में 20/3 पर पकड़ बना ली थी, वही नियंत्रण खो बैठी.
  • 187 के लक्ष्य का पीछा करने उतरी बल्लेबाज़ी 111 रन पर सिमट गई.
  • और इन दोनों असफलताओं के सेंटर में एक ग़ैर-हाज़िर कड़ी थी, वह खिलाड़ी जो एक पारी में नियंत्रण देता और दूसरी में स्थिरता- अक्षर पटेल.

आखिरकार यह केवल एक खिलाड़ी को ड्रॉप करने का मामला नहीं था.

यह एक ऐसे मैनेजमेंट का मामला था जो अपनी पहचान को लेकर उलझा हुआ है. क्या वह 'मैच-अप आधारित टी-20 टीम' है या 'कंडीशन पढ़कर खेलने वाली क्रिकेट टीम?'

जब तक यह सवाल हल नहीं होगा, ऐसे फ़ैसले टीम को परेशान करते रहेंगे.

क्योंकि मोटेरा की उस चोट पहुंचाने वाली रात ने दिखा दिया कि बैलेंस ग़लत बैठा तो उसका नुक़सान मामूली नहीं होता, बल्कि टीम इंडिया की जीत की राह पर भारी साबित होता है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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