नीला क्यों दिखता है आसमान, क्या हमेशा ये रंग बरक़रार रहेगा

दो बहुमंजिला इमारतों के पार दिखता नीला आकाश

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इमेज कैप्शन, नीली रोशनी की वेवलेंथ अन्य रंगों की तुलना में छोटी होती है
    • Author, कैथरीन हीथवुड
    • पदनाम, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस
  • पढ़ने का समय: 8 मिनट

नीला आकाश ऐसी चीज़ है जिस पर हममें से ज़्यादातर लोग ध्यान ही नहीं देते. लेकिन हो सकता है कि पृथ्वी के इतिहास में इसका रंग नाटकीय रूप से बदला हो और वैज्ञानिकों का कहना है कि यह फिर से बदल सकता है.

यूके के रॉयल ऑब्ज़र्वेटरी ग्रीनविच में साइंस कम्यूनिकेटर फ़िन बरिज के अनुसार, दिन के समय आकाश के नीला दिखने के दो मुख्य कारण हैं.

वह बताते हैं, "पहला कारण है सूर्य. सूर्य का सामान्य प्रकाश सफ़ेद होता है, जिसका मतलब है कि उसमें इंद्रधनुष के सभी रंग होते हैं- लाल, पीला, हरा और नीला."

दूसरा कारण है वायुमंडल की संरचना. आकाश में नाइट्रोजन, ऑक्सीजन और जलवाष्प जैसे असंख्य सूक्ष्म कण मौजूद होते हैं, जो प्रकाश को अलग-अलग दिशाओं में बिखेरते हैं. नीली रोशनी की वेवलेंथ अन्य रंगों की तुलना में छोटी होती है और यह अधिक बिखरती है, जिससे पूरा आकाश नीला दिखाई देता है.

इस प्रक्रिया को रेली स्कैटरिंग कहा जाता है. इसका नाम 1870 के दशक में इस सिद्धांत को विकसित करने वाले ब्रिटिश भौतिक विज्ञानी लॉर्ड रेली के नाम पर पर पड़ा है.

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सूर्योदय और सूर्यास्त के समय सूर्य की किरणों को वायुमंडल से होकर ज़्यादा गुज़रना पड़ता है क्योंकि उस समय सूर्य आकाश में नीचे होता है. उस समय नीली रोशनी इतनी अधिक बिखर जाती है कि वह हमारी ओर नहीं पहुंचती.

इसके विपरीत, लाल और नारंगी रंग, जो उतने नहीं बिखरते, हमारी आँखों तक पहुंचते हैं और वह सुंदर आकाश रचते हैं जो हमें दिखता है.

मंगल का आकाश दिन में आमतौर पर हल्का पीला‑सा (बटरस्कॉच जैसा रंग) दिखाई देता है और सूर्योदय व सूर्यास्त के समय सूर्य के पास नीला हो जाता है

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इमेज कैप्शन, मंगल का आकाश दिन में आमतौर पर हल्का पीला‑सा (बटरस्कॉच जैसा रंग) दिखाई देता है और सूर्योदय व सूर्यास्त के समय सूर्य के पास नीला हो जाता है

अन्य ग्रह

बरिज कहते हैं कि पृथ्वी का चमकीला नीला आकाश सौरमंडल में अद्वितीय है. कुछ ग्रहों, जैसे बृहस्पति, के ऊपरी वायुमंडल को पृथ्वी जैसा हल्का नीला माना जाता है, लेकिन वह उतना जीवंत नहीं है.

बरिज बताते हैं कि सूर्य से दूर होने के कारण बृहस्पति को पृथ्वी की तुलना में सूर्य का प्रकाश लगभग 4% ही मिलता है.

"इसलिए वहाँ वैसा गहरा, सुंदर नीला आकाश नहीं मिलता जैसा पृथ्वी पर मिलता है."

कुछ ग्रहों पर तो स्थिति बिल्कुल अलग है.

मंगल का वायुमंडल बहुत पतला है, इसलिए रेली स्कैटरिंग बहुत कम होती है. इसके बजाय वहाँ मौजूद असंख्य धूलकण- जो हमारे वायुमंडल के नाइट्रोजन और ऑक्सीजन से बड़े होते हैं- प्रकाश को अलग ढंग से बिखेरते हैं.

इसे 'मी स्कैटरिंग' कहा जाता है और इसका परिणाम होता है लाल या पीला सा आकाश, जिसमें सूर्यास्त नीले होते हैं.

ग्राफ़िक्स

क्या आकाश हमेशा से नीला रहा है?

पृथ्वी पर आज हमें जो नीला आकाश दिखता है, वह इस ग्रह के लंबे इतिहास में अपेक्षाकृत नई घटना है.

हालाँकि निश्चितता के साथ यह जानने का कोई तरीक़ा नहीं है कि अतीत में आकाश कैसा दिखता रहा होगा. वैज्ञानिकों का अनुमान है कि इसका रंग उस समय वायुमंडल में मौजूद गैसों के आधार पर बदलता रहा होगा.

लगभग 4.5 अरब वर्ष पहले जब पृथ्वी बनी, तब इसकी सतह मुख्यतः पिघली हुई थी. एक सिद्धांत के अनुसार जैसे जैसे ग्रह ठंडा हुआ, शुरुआती वायुमंडल मुख्य रूप से ज्वालामुखी विस्फोटों और अन्य भूवैज्ञानिक गतिविधियों से निकली गैसों से बना- जैसे कार्बन डाइऑक्साइड और नाइट्रोजन, थोड़ी मात्रा में मीथेन, और बहुत कम ऑक्सीजन.

ग्राफ़िक्स

समय के साथ, पृथ्वी पर जीवन प्राचीन बैक्टीरिया के रूप में विकसित हुआ, जिसने वायुमंडल में बड़ी मात्रा में मीथेन बढ़ा दी. इस मीथेन पर पड़ने वाली रोशनी ने इसे अधिक जटिल कार्बनिक यौगिकों में बदल दिया, जिससे आकाश में नारंगी धुंध बनने लगी- कुछ हद तक स्मॉग जैसी.

लगभग 2.4 अरब वर्ष पहले एक बड़ा बदलाव आया, जिसे ग्रेट ऑक्सिडेशन इवेंट कहा जाता है. उस समय साइनोबैक्टीरिया नामक शुरुआती जीवों ने प्रकाश संश्लेषण का उपयोग करके सूर्य के प्रकाश को ऊर्जा में बदलना शुरू किया और इस प्रक्रिया में बड़ी मात्रा में ऑक्सीजन छोड़ी.

ऑक्सीजन धीरे-धीरे वायुमंडल में महत्वपूर्ण स्तर तक बढ़ने लगी और आख़िरकार मीथेन की धुंध साफ़ हो गई. जैसे जैसे हमारा आधुनिक वायुमंडल आकार लेने लगा, आकाश आज के नीले रंग वाला हो गया.

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क्या यह हमेशा नीला रहेगा?

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समाप्त

निकट भविष्य में पृथ्वी का नीला आकाश कहीं नहीं जा रहा. हालाँकि प्रदूषण, जंगल की आग, ज्वालामुखी विस्फोट और धूल भरी आँधियाँ अस्थायी रूप से आकाश का रंग बदल सकती हैं, लेकिन ये प्रभाव अल्पकालिक होते हैं.

1883 में इंडोनेशिया के क्राकाटोआ ज्वालामुखी के विशाल विस्फोट के बाद शानदार लाल सूर्यास्त, यहाँ तक कि हरे सूर्यास्त और नीले चाँद भी देखे गए थे. माना जाता है कि यह वायुमंडल में मौजूद सल्फ़ेट और राख जैसे कणों के कारण हुआ, जो प्रकाश को हमारी ओर अलग ढंग से बिखेरते हैं.

यूके की यूनिवर्सिटी ऑफ़ रीडिंग में मौसम विज्ञान की एसोसिएट प्रोफ़ेसर डॉक्टर क्लेयर राइडर कहती हैं कि वायुमंडल में मौजूद एरोसॉल्स- ठोस या अर्ध ठोस कणों- का समग्र रंग प्रभाव उनके आकार पर निर्भर कर सकता है.

"अगर सभी एरोसॉल कण एक ही आकार के हों तो हमें विशेष रूप से सूर्यास्त के समय बहुत गहरे रंग दिखाई देते हैं."

डॉक्टर राइडर के अनुसार ऐसा इसलिए होता है क्योंकि वे एक ही तरह से प्रकाश को अधिक बिखेरते हैं.

वह बताती हैं, "जहाँ कणों के आकार अलग अलग होते हैं, वहाँ हर आकार का कण अलग अलग वेवलेंथ के साथ अलग ढंग से प्रतिक्रिया करता है, जिससे रंगों का मिश्रण बनता है."

अगर यह सब एक साथ होता है, तो यह मिलकर 'सफ़ेद सा या भूरा सा धुंधलापन' पैदा कर सकता है. यह कभी कभी ज्वालामुखी विस्फोटों, धूल भरी आँधियों या वायु प्रदूषण के कारण भी हो सकता है.

प्रदूषण की वजह से हवा में घुलने वाले कणों की वजह से आकाश सफ़ेद दिख सकता है

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वह कहती हैं कि यह विचार करना महत्वपूर्ण है कि भविष्य में जलवायु परिवर्तन हमारे आकाश के रंग को कैसे प्रभावित कर सकता है.

उन्हें लगता है कि "जैसे जैसे तापमान बढ़ेगा, वायुमंडल में जलवाष्प की मात्रा बढ़ेगी. इससे एरोसॉल कण नमी के साथ मिलकर फूल सकते हैं, जिससे उनके प्रकाश बिखेरने की क्षमता बढ़ेगी और आकाश के सफ़ेद होने का प्रभाव ज़्यादा होगा."

इसके साथ वह कहती हैं, "इसके विपरीत, अगर भविष्य में प्रदूषण का उत्सर्जन कम होता है, तो आकाश और नीला हो सकता है."

लेकिन ये सारे बदलाव खगोलीय समय मान पर शायद उतने मायने नहीं रखते.

एक अरब वर्ष

बरिज कहते हैं कि हमारे आकाश के रंग में स्थायी परिवर्तन के लिए वायुमंडल की संरचना में भारी परिवर्तन की ज़रूरत होगी, "ऐसा कुछ निकट भविष्य में नहीं होने वाला है, जब तक कि हमारी बदकिस्मती चरम पर न हो और हम किसी विशाल उल्का से न टकरा जाएँ."

"लेकिन शायद ऐसा नहीं होने जा रहा है."

उनका अनुमान है कि आकाश के नीले रंग के चले जाने में कम से कम एक अरब वर्ष का समय है.

बरिज कहते हैं कि जैसे जैसे सूर्य बूढ़ा होगा, वह धीरे धीरे और चमकदार होता जाएगा. लगभग एक अरब साल बाद सूर्य आज की तुलना में लगभग 10% ज़्यादा प्रकाश उत्सर्जित करेगा.

"यह पृथ्वी को गर्म करेगा, वायुमंडल से कार्बन डाइऑक्साइड को बाहर निकाल देगा और अंततः हमारे महासागरों को उबालना शुरू कर देगा."

करीब एक अरब साल बाद इस तारे की तरह सूर्य भी एक बड़ा लाल तारा बन जाएगा

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उनका मानना है कि इससे वायुमंडल में बड़ी मात्रा में ऑक्सीजन निकल सकती है, जिससे थोड़े समय के लिए आकाश और भी गहरा नीला हो सकता है. लेकिन जब वह ऑक्सीजन समाप्त हो जाएगी, तो आकाश बदलकर 'सफ़ेद, पीला सा, बहुत गर्म, शुक्र ग्रह के वायुमंडल जैसा' हो जाएगा.

सुदूर भविष्य में, लगभग पाँच अरब साल बाद, सूर्य का ईंधन ख़त्म होना शुरू होगा और वह एक रेड जायंट या लाल दानव में बदल जाएगा.

बरिज कहते हैं, "जैसे ही पृथ्वी का समय समाप्त होगा, आप पहला घटक खो देंगे, यानी सूर्य से आने वाली नीली रोशनी."

"जब सूर्य का अंतिम समय शुरू होगा और यह एक बहुत, बहुत, बहुत लाल, विशाल तारे में बदल जाएगा, तब पृथ्वी पर जो भी वायुमंडल बचा होगा, उसमें गहरा लाल रंग होगा."

बरिज कहते हैं, "उसे देखने के लिए जीवन शेष नहीं होगा. उम्मीद है कि तब तक इंसान सितारों की ओर निकल चुके होंगे- कहीं और एक नया नीला आकाश खोजने के लिए."

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