मुकुल रॉय: बंगाल की राजनीति में फ़र्श से अर्श पर छाने के बाद गुमनाम हो जाने वाले नेता

मुकुल रॉय

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इमेज कैप्शन, 71 वर्ष की आयु में मुकुल रॉय का निधन हुआ है
    • Author, प्रभाकर मणि तिवारी
    • पदनाम, कोलकाता से बीबीसी हिन्दी के लिए
  • पढ़ने का समय: 10 मिनट

पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के सबसे प्रमुख चेहरों में शुमार रहे पूर्व रेल मंत्री मुकुल रॉय का रविवार को कोलकाता के एक अस्पताल में निधन हो गया. वो 71 साल के थे.

राजनीति में फ़र्श से अर्श तक पहुंचने वाले मुकुल रॉय को किसी दौर में पश्चिम बंगाल की राजनीति का 'चाणक्य' कहा जाता था.

वो उस दौर में तृणमूल कांग्रेस प्रमुख और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बाद पार्टी और सरकार में नंबर दो थे. लेकिन तृणमूल कांग्रेस छोड़कर भाजपा में जाने के कारण राजनीति में उनका रुतबा घटता रहा.

तृणमूल कांग्रेस में उनके क़रीबी रहे कई नेता मानते हैं कि भाजपा में शामिल होना इस 'चाणक्य' के राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी ग़लती साबित हुई. दोबारा तृणमूल में लौटने पर भी वो हाशिए पर ही रहे.

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साल 2021 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के टिकट पर जीत कर तृणमूल कांग्रेस में वापसी के बावजूद वो दोबारा कभी पहले जैसी स्थिति में नहीं पहुंच सके.

पत्नी की मौत ने उनको गहरा धक्का पहुंचाया और बीते क़रीब पांच साल से वो घर और अस्पताल के बीच ही सिमट कर रह गए थे.

राजनीतिक करियर तेज़ी से परवान चढ़ा

मुकुल रॉय

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इमेज कैप्शन, मुकुल रॉय का जन्म 17 अप्रैल, 1954 को उत्तर 24-परगना ज़िले में हुआ था

तृणमूल कांग्रेस की लगातार कामयाबी के कारण उनको बंगाल की राजनीति का 'चाणक्य' कहा जाने लगा था. उनको संगठन में महारत हासिल थी.

साल 1998 से 2015 तक पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव के तौर पर उनके कार्यकाल के दौरान तृणमूल कांग्रेस ने बंगाल के बाहर असम और त्रिपुरा समेत दूसरे पूर्वोत्तर राज्यों में अपने पांव पसारे थे.

लेकिन जीवन के आख़िरी दौर में यह 'चाणक्य' बंगाल की राजनीति में लगभग अप्रासंगिक से हो गए थे.

मुकुल रॉय का जन्म 17 अप्रैल, 1954 को उत्तर 24-परगना ज़िले के बैरकपुर औद्योगिक इलाके़ के कांचरापाड़ा में हुआ था. वहां से राज्य और केंद्र की राजनीति में उन्होंने गहरी छाप छोड़ी थी.

ममता बनर्जी से जुड़ने के बाद मुकुल का राजनीतिक करियर जिस तेज़ी से परवान चढ़ा वह किसी भी नेता के लिए ईर्ष्या का विषय हो सकता है. लेकिन वो जिस तेज़ी से उभरे थे, उनका ग्राफ़ भी उतनी ही तेज़ी से गिरा था.

मुकुल रॉय की शुरुआती पढ़ाई कांचरापाड़ा हार्नेट हाई स्कूल में हुई थी. उसके बाद नैहाटी स्थित ऋषि बंकिम चंद्र कॉलेज से उन्होंने ग्रेजुएशन किया था. रॉय ने बाद में कामराज विश्वविद्यालय से पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन में पोस्ट-ग्रेजुएशन किया.

सिर्फ़ दो ही चीज़ों में थी दिलचस्पी

मुकुल रॉय

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इमेज कैप्शन, मुकुल रॉय के क्रिकेट के बड़े फ़ैन थे. उन्हें टेस्ट मैच देखना पसंद था.

रॉय के क़रीबी बताते हैं कि कॉलेज में पढ़ाई के दौरान मुकुल की दो ही चीज़ों में दिलचस्पी थी. पहली राजनीति और दूसरी क्रिकेट. लेकिन उनको टेस्ट मैच ही पसंद था.

राजनीतिक व्यस्तता के बावजूद वो अक्सर कोलकाता के ईडन गार्डन में टेस्ट मैच देखने के लिए समय निकाल लेते थे.

राजनीति में वो दूसरे राजनीतिक दलों के नेताओं को तृणमूल कांग्रेस में शामिल करने के लिए मशहूर रहे थे. उन्होंने पार्टी के दरवाज़े उनके लिए खोल दिए थे. बाद में भाजपा में शामिल होने के बाद भी उन्होंने यही रणनीति अपनाई थी.

साल 2019 के लोकसभा चुनाव में तो पार्टी की सीटें दो से बढ़कर 18 तक पहुंचने के कारण रॉय की यह रणनीति कामयाब होती नज़र आई. लेकिन साल 2021 के चुनाव में यह फ़्लॉप साबित हुई.

रॉय को संगठन बनाने का माहिर समझा जाता था. वो हमेशा पर्दे के पीछे रहकर काम करने में यकीन करते थे. कहा जाता है कि राजनीति में रातों-रात किस्मत बदल सकती है. वही रॉय के साथ भी हुआ.

कभी थे रेल मंत्री, आख़िरी वक़्त में बीमारियों में घिरे

ममता बनर्जी और मुकुल रॉय

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इमेज कैप्शन, कभी ममता बनर्जी के क़रीबी नेताओं में शामिल थे मुकुल रॉय

साल 2012 में तत्कालीन यूपीए सरकार में तृणमूल कांग्रेस के दिनेश त्रिवेदी के इस्तीफ़ा देने के बाद मुकुल को रेल मंत्री बनाया गया था.

लेकिन वो छह महीने ही इस पद पर रह सके. उससे पहले भी वो केंद्र में मंत्री रहे थे. लेकिन राजनीतिक करियर के आख़िरी दौर में उनको विधायकी से ही संतोष करना पड़ा.

ख़ासकर आख़िरी क़रीब पांच साल से तो वो विभिन्न बीमारियों और मानसिक अवसाद से ही जूझ रहे थे.

70 के दशक में बंगाल में वाम राजनीति अपने उभार पर थी. मुकुल रॉय भी कॉलेज की पढ़ाई के दौरान वामपंथी छात्र संगठन एसएफ़आई से जुड़ गए थे. लेकिन वो ज़्यादा दिन तक वहां नहीं टिक सके.

बैरकपुर इलाक़े के तत्कालीन कांग्रेस नेता मृणाल सिंह रॉय उनको कांग्रेस में ले आए थे. बंगाल कांग्रेस में उस दौर में ग़नी ख़ान चौधरी और सोमेन मित्र का बोलबाला था. कांग्रेस में रहने के दौरान मुकुल का राजनीतिक करियर ख़ास आगे नहीं बढ़ सका.

ममता से मुलाक़ात रहा टर्निंग पॉइंट

मुकुल रॉय

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इमेज कैप्शन, ममता ने साल 2006 में पार्टी के एक वरिष्ठ नेता की दावेदारी की अनदेखी कर मुकुल को राज्यसभा में भेजा था

उसी दौर में बंगाल की राजनीति में ममता बनर्जी का तेज़ी से उभरना मुकुल के राजनीतिक करियर का टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ. वो सोमेन का ख़ेमा छोड़कर ममता के साथ चले आए.

ममता से मुकुल की पहली मुलाक़ात 90 के दशक की शुरुआत में हुई थी. धीरे-धीरे वो ममता के सबसे भरोसेमंद बन गए. साल 1992 में ममता के प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव लड़ने के दौरान मुकुल ने उनका खुलकर समर्थन किया था.

साल 1996 के विधानसभा चुनाव के बाद ममता की कांग्रेस नेतृत्व के साथ दूरियां बढ़ने लगीं. उसके बाद मुकुल ने नई पार्टी बनाने के विचार पर काम शुरू कर दिया था.

तृणमूल कांग्रेस के गठन में उनकी भूमिका अहम रही थी. यही वजह है कि पार्टी के गठन के बाद मुकुल को पार्टी का पहला राष्ट्रीय महासचिव नियुक्त करने पर किसी को हैरत नहीं हुई थी.

ममता ने साल 2006 में पार्टी के एक वरिष्ठ नेता की दावेदारी की अनदेखी कर मुकुल को राज्यसभा में भेजा था.

साल 2006 के चुनाव में तृणमूल कांग्रेस को महज़ 30 सीटें मिली थी. मुकुल रॉय भी चुनाव हार गए थे.

सिंगूर और नंदीग्राम आंदोलन से केंद्रीय मंत्री बनने तक

मुकुल रॉय

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इमेज कैप्शन, साल 2011 में तृणमूल कांग्रेस के पश्चिम बंगाल की सत्ता में आने के बाद मुकुल का प्रभाव और उनके राजनीतिक करियर का ग्राफ़ तेज़ी से बढ़ने लगा

इसके बाद सिंगूर और नंदीग्राम के आंदोलन हुए जिसे बंगाल की राजनीति का टर्निंग प्वाइंट माना जाता है. इस आंदोलन के दौरान मुकुल छाया की तरह ममता के साथ रहे.

उसके बाद साल 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के साथ गठबंधन में भी मुकुल रॉय की अहम भूमिका रही थी. उस चुनाव में तृणमूल कांग्रेस को 19 सीटें मिली थी.

इसके बाद केंद्र की यूपीए सरकार में तृणमूल कांग्रेस शामिल हुई और ममता रेल मंत्री बनीं. मुकुल भी उस समय केंद्रीय जहाजरानी राज्य मंत्री बने थे.

साल 2011 के चुनाव में बड़ी जीत हासिल कर तृणमूल कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद मुकुल का प्रभाव और उनके राजनीतिक करियर का ग्राफ़ तेज़ी से बढ़ने लगा. ममता के मुख्यमंत्री होने की वजह से पार्टी के सांसद दिनेश त्रिवेदी को रेल मंत्री बनाया गया था.

लेकिन रेल बजट में किराया बढ़ाने के दिनेश के फ़ैसले से नाराज़ होकर उन्होंने उनको इस्तीफ़ा देने का निर्देश दिया. उसके बाद मुकुल को रेल मंत्री बनाया गया. लेकिन यूपीए गठबंधन से नाता तोड़ने के ममता के फ़ैसले के कारण मुकुल को भी यह पद छोड़ना पड़ा.

आरोपों से भी नहीं रहे अछूते

मुकुल रॉय और पीएम मोदी

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इमेज कैप्शन, साल 2017 में राज्यसभा से इस्तीफ़ा देकर मुकुल भाजपा में शामिल हो गए थे
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हालांकि उसी दौर में मुकुल पर बिना सोचे-समझे दूसरे दलों के नेताओं को पार्टी में शामिल करने के आरोप लगते रहे.

तृणमूल कांग्रेस के नेता उन पर दूसरे नेताओं और ममता के बीच दूरी बढ़ाने के आरोप भी लगाते रहे. लेकिन इससे मुकुल पर ममता का भरोसा कम नहीं हुआ.

साल 2014 के लोकसभा चुनाव में पार्टी को 34 सीटें मिलने के बाद पार्टी में मुकुल रॉय की तूती बोलने लगी थी और उनके आलोचकों ने भी चुप्पी साध ली थी.

लेकिन वही मुकुल के राजनीतिक करियर का शीर्ष था. उसके बाद ही पार्टी में मुकुल का बुरा समय शुरू हो गया.

पार्टी के एक वरिष्ठ नेता बताते हैं, "साल 2014 के चुनाव में अभिषेक बनर्जी ने डायमंड हार्बर सीट से चुनाव जीता था और उसी साल अक्तूबर में उनको पार्टी की युवा शाखा का अध्यक्ष बना दिया गया."

"लेकिन मुकुल अभिषेक को चुनाव लड़ाने और युवा संगठन की ज़िम्मेदारी देने के ख़िलाफ़ थे. उसके बाद ममता से उनकी दूरी बढ़ने लगी."

साल 2015 में यह दूरी काफ़ी बढ़ गई थी. उसी समय ममता ने उनको राष्ट्रीय महासचिव पद से भी हटा दिया. उस दौर में तृणमूल कांग्रेस में यह चर्चा तेज़ हो गई थी कि सारदा चिटफ़ंड मामले से बचने के लिए मुकुल रॉय भाजपा में शामिल होने का प्रयास कर रहे हैं.

ममता ने साल 2016 के विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले मुकुल को पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया था.

उस चुनाव में दो सौ से ज़्यादा सीटें जीतकर पार्टी दोबारा सत्ता में लौटी. लेकिन मुकुल के साथ ममता के रिश्ते पहले जैसे स्वाभाविक नहीं हो सके.

भाजपा में गए और फिर वापस भी लौटे

मुकुल रॉय

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इमेज कैप्शन, मुकुल रॉय बीते कुछ साल से बीमारियों से घिरे हुए थे

आख़िर अक्तूबर 2017 में राज्यसभा से इस्तीफ़ा देने के बाद नवंबर में मुकुल ने दिल्ली जाकर भाजपा का हाथ थाम लिया.

साल 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की कामयाबी का श्रेय भी मुकुल को दिया गया था.

मुकुल के क़रीबी बताते हैं कि वो कभी भाजपा की राजनीति के साथ तालमेल नहीं बिठा सके, लेकिन उनके सामने दूसरा कोई विकल्प नहीं था.

साल 2021 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के टिकट पर चुनाव जीतने के कुछ दिनों बाद ही वो तृणमूल कांग्रेस में लौट आए. लेकिन ममता के साथ संबंधों में ठंडापन बना रहा.

भाजपा में रहते उन पर तृणमूल कांग्रेस के नेताओं को तोड़ कर भगवा पार्टी में शामिल करने के आरोप लगते रहे थे.

विधायक के तौर पर अपनी आख़िरी पारी में मुकुल कोई छाप नहीं छोड़ सके. उन्होंने विधानसभा की पब्लिक अकाउंट कमेटी के अध्यक्ष पद से भी कुछ दिनों बाद ही इस्तीफ़ा दे दिया था.

इसके बाद पत्नी कृष्णा रॉय के निधन ने उनको लगभग तोड़ दिया और वो राजनीति से लगातार दूर होते गए.

बीमारी के कारण स्मृति भी उनका साथ छोड़ गई थी. बीते कुछ साल से घर से निकलना लगभग बंद था. वो घर से सिर्फ़ अस्पताल जाने के लिए ही निकलते थे.

उनके तृणमूल कांग्रेस में शामिल होने के बाद भाजपा ने उनकी विधायकी रद्द करने के लिए अदालत में मामला दायर किया था.

कलकत्ता हाईकोर्ट ने विधायक पद रद्द करने का निर्देश दिया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस फ़ैसले पर अंतरिम रोक लगा दी थी.

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि सारदा और नारदा जैसे घोटाले में नाम सामने आने के बाद से ही ममता और मुकुल के रिश्तों में दूरियां बढ़ने लगी थीं. उसके बाद दोनों के बीच कभी पहले जैसे संबंध बहाल नहीं हो सके.

हालांकि तृणमूल कांग्रेस की कामयाबी में मुकुल रॉय के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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