24 दिन, कई मौतें और एक गांव का रहस्य: हरियाणा के छांयसा में आख़िर क्या हुआ?

लिवर फ़ेल होने से मारे गए दिलशाद की मां हारुनी कहती हैं 48 घंटे में ही सब ख़त्म हो गया
इमेज कैप्शन, लिवर फ़ेल होने से मारे गए दिलशाद की मां हारुनी कहती हैं कि 48 घंटे में ही सब ख़त्म हो गया
    • Author, दिलनवाज़ पाशा
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पलवल से
  • पढ़ने का समय: 10 मिनट

सुबह की ठंडी हवा में फ़ज्र की अज़ान की आवाज़ धीरे-धीरे आ रही थी. नल्हड़ मेडिकल कॉलेज अस्पताल के आईसीयू के बाहर बैठी आशूबी की आंखें दरवाजे़ पर टिकी थीं.

कुछ घंटे पहले तक उन्हें यक़ीन था कि उनका 14 साल का बेटा शारिक़ जल्द ठीक हो जाएगा. उनके लिए आख़िर यह सिर्फ़ बुख़ार ही तो था.

लेकिन उस सुबह डॉक्टरों ने उन्हें बताया कि अब कुछ नहीं किया जा सकता. वह धीमी आवाज़ में कहती हैं, "रात तक तो ठीक था… सुबह देखा तो डॉक्टर पंपिंग कर रहे थे."

चौदह साल के शारिक़ 25 जनवरी को अचानक बीमार पड़ने से पहले तक बिल्कुल ठीक थे. बुख़ार आने के 48 घंटों के भीतर ही उनकी मौत हो गई. शारिक़ का लिवर फे़ल हुआ था.

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हरियाणा के पलवल ज़िले का छांयसा गांव पिछले कुछ हफ्तों से ऐसी ही कहानियों से भरा हुआ है. अचानक बीमारी, तेज़ी से बिगड़ती सेहत और कुछ ही दिनों में मौत.

19 जनवरी से 11 फ़रवरी के बीच छांयसा में कम से कम 15 मौतें हुईं, इनमें चार नाबालिग़ बच्चे हैं. प्रशासन ने इन मौतों में से कम से कम सात को पीलिया और हेपेटाइटिस बी से जोड़ा है.

अब छांयसा की हवा में सिर्फ़ धूल ही नहीं बल्कि अनिश्चितता और डर भी घुले नज़र आते हैं.

गांव में डर और सवाल

यहां लोगों की बातचीत में ‘मौत’ और ‘डर’ जैसे शब्द बार-बार सुनाई देते हैं
इमेज कैप्शन, यहां लोगों की बातचीत में 'मौत' और 'डर' जैसे शब्द बार-बार सुनाई देते हैं

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से क़रीब 90 किलोमीटर दूर छांयसा गांव की आबादी क़रीब छह हज़ार है.

गांव की गलियों में बच्चे खेल रहे हैं, लेकिन यहां बड़े लोगों की बातचीत में 'मौत' और 'डर' जैसे शब्द बार-बार सुनाई देते हैं.

जनवरी के आख़िरी हफ्ते से गांव में अचानक कई लोग बीमार पड़ने लगे. परिवारों के मुताबिक़, शुरुआत अक्सर बुख़ार से होती थी, कुछ को पेट दर्द, कुछ को पीलिया जैसे लक्षण होते थे फिर अचानक हालत बिगड़ जाती थी.

11 साल के हुज़ैफ़ा की मां बताती हैं, "एक दिन बुख़ार आया था. दवा ली तो ठीक लग रहा था. उसी रात तबियत बिगड़ गई. अस्पताल पहुंचे तो बोले लिवर काम नहीं कर रहा."

डॉक्टरों ने लिवर ट्रांसप्लांट की सलाह दी तो हुज़ैफ़ा की मां तुरंत तैयार हो गईं. लेकिन उसके लिए भी वक़्त नहीं था.

आंखों में आंसू लिए वह कहती हैं, "मैं अपना लिवर देने को तैयार थी, लेकिन बाद में डॉक्टरों ने कहा कि बच्चा अब नहीं बच पाएगा."

48 घंटों में मौत और बढ़ती बेचैनी

हकीमुद्दीन
इमेज कैप्शन, हकीमुद्दीन कहते हैं कि उन्होंने पहले ऐसा नहीं देखा कि बुख़ार आए और चार-पांच दिन में आदमी की मौत हो जाए

टिन पड़े बिना प्लास्टर के अधबने मकान के खुले दरवाज़े से मोटा पर्दा पड़ा दिखाई देता है.

22 साल के दिलशाद की कुछ महीने पहले ही शादी हुई थी. उनकी बीवी अब इद्दत कर रही हैं.

दिलशाद चेन्नई में काम करते थे और 9 फ़रवरी को बुख़ार की हालत में घर लौटे. परिजनों में पहले गांव में इलाज कराया और फिर नल्हड़ मेडिकल कॉलेज ले गए.

उनकी मां कहती हैं, "आईसीयू में रखा… 48 घंटे में ख़त्म हो गया सब."

उनके पिता हकीमुद्दीन कहते हैं, "हमने ऐसा कभी नहीं देखा. बुख़ार आए और चार-पांच दिन में आदमी ख़त्म."

दिलशाद का भी मरने वाले बाक़ी लोगों की ही तरह लिवर फे़ल हुआ था.

शहनाज़ चारपाई पर बैठे हुए
इमेज कैप्शन, शहनाज़ के 11 साल के बेटे हुज़ैफ़ा की भी लिवर फ़ेल होने से मौत हो गई

गांव में मौतों की संख्या को लेकर अलग-अलग बातें भी सुनाई देती हैं. कुछ लोग कहते हैं कि पंद्रह तो कुछ बीस तक मौतों का दावा करते हैं.

बीबीसी न्यूज़ हिन्दी को 19 जनवरी से 11 फ़रवरी के बीच गांव में कम से कम पंद्रह मौतों का पता चला है, जिनमें कई बुज़ुर्ग थे जिनकी मौत घर पर ही बीमारी से हुई.

लेकिन प्रशासन के अनुसार, कम से कम सात मौतें अचानक बीमार पड़ने से हुई हैं और अभी तक इन मौतों के स्पष्ट कारण की पुष्टि नहीं की जा सकती.

यहीं से शुरू होती हैं- जांच और खड़े होते हैं कई सवाल भी.

प्रशासन क्या कर रहा है?

सहायक मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉक्टर संजय शर्मा के अनुसार करीब 1100 सैंपल लिए गए हैं. 2100 से ज्यादा घरों की स्क्रीनिंग की गई है
इमेज कैप्शन, सहायक मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉक्टर संजय शर्मा के अनुसार क़रीब 1100 सैंपल लिए गए हैं. 2100 से ज़्यादा घरों की स्क्रीनिंग की गई है

स्वास्थ्य विभाग ने 2 फ़रवरी से गांव में हेल्थ कैंप लगाया है और अब तक एक हज़ार से अधिक लोगों की स्क्रीनिंग की गई है. ब्लड सैंपल लिए जा रहे हैं ताकि जांच की जा सके.

सहायक मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉक्टर संजय शर्मा बताते हैं, "क़रीब 1100 सैंपल लिए गए हैं. 2100 से ज़्यादा घरों की स्क्रीनिंग की गई है."

वह कहते हैं, "हमने गांव में क्लोरीनेशन भी किया है, बीमारी से बचाने के लिए हेपेटाइटिस बी की वैक्सीन भी 209 लोगों को लगा दी है. इसके अलावा पानी की जांच भी की जा रही है, हेवी मेटल टेस्ट किए गए हैं."

ज़िला उपायुक्त डॉक्टर हरीश वशिष्ठ कहते हैं, "अब तक सात मौतें हुई हैं, मरने वालों में चार केस हेपेटाइटिस-बी पॉज़िटिव थे. इसके अलावा जांच के दौरान गांव में 17 हेपेटाइटिस-सी के कंफ़र्म केस मिले हैं. फ़िलहाल स्थिति नियंत्रण में है."

लेकिन प्रशासन के दावों और गांव के लोगों की बेचैनी के बीच एक फ़ासला महसूस होता है.

गांव वाले पूछ रहे हैं, अगर बीमारी पहले से थी, तो अचानक इतनी मौतें क्यों हुईं?

क्या पानी है मौतों की वजह?

गांव के पास से गुजरती गुरुग्राम नहर का पानी काला, बदबूदार है
इमेज कैप्शन, गांव के पास से गुज़रती गुरुग्राम नहर का पानी काला, बदबूदार है

छांयसा में मीठा भूजल नहीं है. गांव में लगभग हर घर के बाहर पानी के टैंक दिखते हैं.

शारिक़ की मां आशूबी एक बाल्टी से लौटे में पानी निकालकर दिखाते हुए कहती हैं, "पीने का पानी ख़रीदना पड़ता है."

वह गांव में एक टैंक से रोज़ाना दो बाल्टी पानी भरकर लाती हैं.

घरों तक पाइपलाइन तो बिछी है, लेकिन लोगों का कहना है कि उसमें पीने का पानी नहीं आता.

दिलशाद के पिता हक़ीमुद्दीन कहते हैं, "मौतों की एक वजह पानी भी हो सकता है. हमारे गांव में लोग बासी पानी पीते हैं, एक बार टैंक में पानी डलवाते हैं और महीना भर उसी पर गुज़ारा करना होता है."

यही नहीं, छांयसा गांव के आस-पास भरा पानी भी एक बड़ी समस्या है. गांव के बाहर एक बड़े इलाक़े में बारिश का पानी ठहरा है.

गांव के पास से गुज़रती गुरुग्राम नहर पर खड़े होकर पानी को देखते हुए साफ़ समझ आता है कि लोग चिंतित क्यों हैं. पानी काला और बदबूदार है.

छांयसा और आसपास के गांवों की पचास हज़ार एकड़ ज़मीन बारिश के पानी में डूबी है
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स्थानीय कार्यकर्ता रामेश्वर कहते हैं, "इसमें इंडस्ट्रियल केमिकल आता है. अगर पानी में हाथ डाल दो तो खुजली हो जाती है. छांयसा और आसपास के गांवों की पचास हज़ार एकड़ ज़मीन बारिश के पानी में डूबी है. पानी यहां से बाहर निकल ही नहीं पाता है."

क्या इस पानी का लिवर की बीमारी से कोई संबंध है? प्रशासन अभी इसकी पुष्टि नहीं करता.

हालांकि, ज़िला उपायुक्त डॉक्टर हरीश वशिष्ठ कहते हैं, "हमने पानी के टेस्ट कराए हैं, अभी रिपोर्ट नहीं आई है."

गांव के बाहर बरसाती पानी जमा है. खेतों में पानी भरा है. कुछ किसान बताते हैं कि खेती प्रभावित हो चुकी है.

एक स्थानीय व्यक्ति कहते हैं, "12 महीने पानी खड़ा रहता है. खेती ख़त्म हो गई."

गांव की भौगोलिक स्थिति और पर्यावरणीय बदलाव बीमारी की कहानी में एक नई परत जोड़ते हैं.

स्थानीय कांग्रेस विधायक के बेटे नाज़िम चौधरी कहते हैं, "इस समस्या की जड़ नहर में आ रहा प्रदूषित पानी है. इंडस्ट्रियल वेस्ट की वजह से इलाक़े में ज़मीन में एक परत बन गई है और ज़मीन पानी को सोख नहीं पा रही है. जब तक गंदा पानी साफ़ नहीं होगा, यहां समस्याएं बनीं रहेंगी."

बजट का इंतज़ार

ज़िला उपायुक्त
इमेज कैप्शन, ज़िला उपायुक्त कहते हैं कि उन्हें उम्मीद है कि पानी साफ़ करने के प्लांट लगाने के लिए और बजट मिलेगा ताकि पानी साफ़ करके लोगों के उपयोग के लिए भेज पाएं

वहीं ज़िला उपायुक्त डॉक्टर हरीश वशिष्ठ दावा करते हैं कि सरकार लोगों तक साफ़ पानी पहुंचाने के लिए प्रतिबद्ध है.

डॉक्टर वशिष्ठ कहते हैं, "मुख्यमंत्री का निर्देश साफ़ है, जहां भी इस तरह का प्रदूषित पानी आता है, वहां एसटीपीज़ बनाए जाएं. सरकार इस पर काम कर रही है, हम उम्मीद करते हैं कि पानी साफ़ करने के प्लांट लगाने के लिए हमें और बजट मिलेगा, ताकि पानी को साफ़ करके ही हम आगे खेत में और लोगों के उपयोग के लिए भेज पाएं."

लेकिन नाज़िम चौधरी कहते हैं कि जब तक दिल्ली से प्रदूषित पानी आना नहीं रुकेगा तब तक इन ग्रामीण इलाक़ों में प्रदूषित पानी का समाधान नहीं होगा.

हालांकि ऐसी कोई वैज्ञानिक शोध रिपोर्ट नहीं है जो पलवल के गांवों में हो रही मौतों या पानी के जमाव को सीधे तौर पर यमुना नदी के प्रदूषण से जोड़ती हो.

गांव में सरकारी अस्पताल लेकिन इलाज कर रहे झोलाछाप

प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र
इमेज कैप्शन, ग्रामीणों का कहना है कि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचने का रास्ता पानी से भरा रहता है, लोग किसी तरह अस्पताल पहुंचें भी तो डॉक्टर मौजूद नहीं रहते

गांव से क़रीब एक किलोमीटर दूर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र है. वहां तक जाने वाली सड़क कच्ची है.

ग्रामीण कहते हैं कि डॉक्टर नियमित नहीं मिलते.

मुस्तकीम नाम के एक ग्रामीण कहते हैं, "यहां पहुंचने का रास्ता ही पानी से भरा रहता है, लोग किसी तरह अस्पताल पहुंचें भी तो डॉक्टर मौजूद नहीं रहते. मजबूरी में लोग झोलाछाप से इलाज कराते हैं."

यहां मौजूद कई और ग्रामीण भी ऐसे ही आरोप लगाते हैं.

मुस्तकीम कहते हैं, "सब कह रहे हैं कि पानी की वजह से लोग मरे हैं, यह एक वजह हो सकती है लेकिन ऐसा भी तो हो सकता है कि संक्रमण झोलाछाप डॉक्टरों के यहां से फैला हो."

गांव में हाल के दिनों में जान गंवाने वाले लोगों में एक समानता है- लगभग सभी ने पहला इलाज गांव में अवैध डॉक्टर से लिया था.

प्रशासन भी मौतों के ग़लत इलाज से जुड़े होने की आशंका से इनकार नहीं कर रहा है.

सहायक मुख्य चिकित्सा अधिकारी संजय शर्मा कहते हैं, "हम झोलाछाप डॉक्टरों पर भी कार्रवाई कर रहे हैं, यह जांच भी की जा रही है कि कहीं संक्रमण उनके यहां से तो नहीं फैला."

प्रशासन मौतों के ग़लत इलाज़ से जुड़े होने की आशंका से इनकार नहीं कर रहा है
इमेज कैप्शन, प्रशासन मौतों के ग़लत इलाज से जुड़े होने की आशंका से इनकार नहीं कर रहा है

ज़िला उपायुक्त डॉक्टर हरीश वशिष्ठ कहते हैं, "हेपेटाइटिस बी और सी ब्लड बॉर्न संक्रमण हैं. ऐसी आशंका भी है कि झोलाछाप डॉक्टरों ने एक ही सीरिंज का बार-बार इस्तेमाल किया हो. हमने कुछ झोलाछाप डॉक्टरों पर कार्रवाई भी की है."

मौतों की वजह तक पहुंचने के लिए यहां राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र की टीम ने भी जांच की है. दिल्ली के आरएमएल अस्पताल की टीमों ने भी गांव का दौरा किया है.

डॉक्टर वशिष्ठ कहते हैं, "कई बार कोई आउटब्रेक होता है तो उसको तुरंत डायग्नोज़ करना इतना आसान नहीं होता है, क्योंकि जो मौतें हुई हैं, वह पहले हो चुकी हैं. सभी टीमें वहां पर हैं, नेशनल सेंटर फ़ॉर डिज़ीज़ कंट्रोल की टीम है, गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज नल्हड़ की टीम ने भी सैंपल लिए हैं, दिल्ली के राम मनोहर लोहिया हॉस्पिटल की टीम ने भी दौरा किया है. सभी डॉक्टर और एपिडेमियोलॉजिस्ट अपना काम कर रहे हैं."

वह कहते हैं, "जब तक सभी रिपोर्टें नहीं आ जातीं तब तक पुख़्ता तौर पर नहीं कहा जा सकता कि अचानक हुई इन मौतों की असली वजह क्या है."

'सबसे तंदुरुस्त था मेरा बेटा'

आशूबी
इमेज कैप्शन, आशूबी को यकीन ही नहीं हो रहा कि उनके बेहद तंदुरुस्त बेटे की यूं मामूली से बुख़ार से मौत हो गई

पीलिया, हेपटाइटिस बी और लिवर फेल होने से अचानक हुई ये मौतें सिर्फ़ छांयसा गांव तक सीमित हैं.

ज़िला उपायुक्त डॉक्टर हरीश वशिष्ठ और स्वास्थ्य अधिकारी संजय शर्मा के मुताबिक़, आसपास के गांवों से ऐसा कोई मामला रिपोर्ट नहीं हुआ है.

फिलहाल, छांयसा गांव में मौतों का सिलसिला थम गया है लेकिन यह सवाल और गंभीर हो जाता है कि एक ही गांव में, अचानक इतनी मौतें कैसे हुईं?

गांव के जिन परिवारों ने अपनों को खोया है, उनकी ज़िंदगी उजड़ गई है.

आशूबी सवाल करती हैं, "मेरा बेटा गांव में सबसे तंदुरुस्त था, उसके अब्बा उसे पहलवान बनाना चाहते थे, मैं कैसे मान लूं कि वह बुख़ार से मर गया, उसका लिवर अचानक कैसे फे़ल हो गया?"

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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