लद्दाख के ‘आइस मैन’ जिन्होंने हिमालय में कृत्रिम ग्लेशियर बनाकर किसानों की ज़िंदगी आसान बनाई

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- Author, कणिका गुप्ता
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
लद्दाख में एक स्थानीय व्यक्ति ने किसानों की फ़सलों की सिंचाई के लिए कृत्रिम ग्लेशियर बनाए हैं.
इस तरीके ने फ़सलों की बुआई के समय पानी की कमी को दूर करने का आसान हल मुहैया कराया है.
लद्दाख के गांव थिक्से से संबंध रखने वाले आलू किसान डोलकर ने पुराने दिनों को याद करते हुए बताया, "मुझे याद है कि बचपन में यहां बहुत ज़्यादा बर्फ़ पड़ती थी जो लगभग मेरे घुटनों के बराबर आती थी लेकिन अब न तो बारिश होती है और न ही इतनी बर्फ़बारी होती है."
डोलकर के पूर्वज आलू की खेती करते थे.लेकिन उन्होंने अपनी पारिवारिक आमदनी को बीते सालों में वैसे ही कम होते देखा है जैसे कि उनके पैतृक शहर के आसपास पहाड़ों पर बर्फ़ के ढेर में कमी देखने को मिली है.
डोलकर का गांव लद्दाख की राजधानी लेह से पूरब में 19 किलोमीटर दूर है. वह कहते हैं, "आलू किसान के तौर पर हमारी मासिक आमदनी 70 हज़ार रुपए तक थी जो अब घटते-घटते 20 हज़ार रुपये तक आ गई है."
पिघलते ग्लेशियर

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30 लाख हेक्टेयर के रक़बे पर फैले हुए 55 हज़ार हिमालयी ग्लेशियर 'पोलर कैप्स' के बाहर बर्फ़ के सबसे बड़े टीले हैं. पृथ्वी के ध्रुवों के बर्फ़ से ढंके होने को 'पोलर कैप्स' कहा जाता है.
लेकिन अब जलवायु परिवर्तन से हिमालय की संवेदनशील पर्यावरणीय व्यवस्था बुरी तरह प्रभावित होने के ख़तरे का सामना कर रही है. इससे क्षेत्र की अर्थव्यवस्था,पर्यावरण और पारिस्थितिकी पर भी असर पड़ेगा.
अगली सदी के आख़िर तक हिमालय के ग्लेशियरों का एक तिहाई हिस्सा ख़त्म होने की आशंका जताई गई है. ऐसा होने से एशिया की नदी-जल व्यवस्था में बड़े बदलाव आएंगे जो लगभग डेढ़ अरब लोगों को पानी उपलब्ध कराती है.
इन ग्लेशियरों के पिघलने से जहां फ़सलों की उपज प्रभावित होगी वहीं लगभग 13 करोड़ किसानों की रोज़ी-रोटी भी दांव पर लग जाएगी जो उन ग्लेशियरों से पिघलने वाले पानी पर निर्भर रहते हैं.
लद्दाख की जलवायु ठंडी और शुष्क है. यहां औसतन 86.8 मिलीमीटर सालाना बारिश होती है. इसलिए इस क्षेत्र के 80 फ़ीसद किसान अपनी फ़सलों की सिंचाई के लिए ग्लेशियर पर निर्भर रहते हैं.
लेकिन पिछले 30 वर्षों के दौरान बर्फ़बारी में काफ़ी कमी आई है जिसकी वजह से पहाड़ों पर बर्फ़ का क्षेत्र कम हुआ है. नदी का पानी आबादी के लिए कम पड़ रहा है और हिमालय के देहातों में पानी की बहुत क़िल्लत है.
फसलों की बुआई में कैसे काम आ रहे हैं ग्लेशियर

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लेकिन डोलकर के गांव में एक स्थानीय इंजीनियर ने एक आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करते हुए ग्लेशियरों के इस संकट का सामना करने की ठान ली.
चेवांग नॉर्फ़ेल को ‘आइस मैन ऑफ़ लद्दाख’ के नाम से भी पहचाना जाने लगा है. उन्होंने थिक्से के पास नांग गांव में एक कृत्रिम ग्लेशियर बना डाला है.
अपने इस मिशन के लिए कई देहातों का दौरा किया.
उन दौरों के दौरान उन्होंने जाना कि 80 फ़ीसद किसान बर्फ़ पिघलने से मिलने वाले पानी पर बहुत अधिक निर्भर करते हैं.
ग्लेशियरों से आने वाला पानी किसानी के लिए महत्वपूर्ण है लेकिन यह जून के मध्य में बहना शुरू होता जबकि बुआई का मौसम अप्रैल में ही शुरू हो जाता है.
सर्दियों की लंबी अवधि के चलते ग्लेशियर का पानी इस्तेमाल नहीं हो पाता और वह नदियों में बह जाता है.
अलग-अलग समुदायों के लिए इस महत्वपूर्ण संसाधन को सुरक्षित रखने के लिए नॉर्फ़ेल ने एक कृत्रिम ग्लेशियर बनाने का फ़ैसला किया. इस सोच को परवान चढ़ा कर लद्दाख के इलाक़े के 10 दूसरे देहातों में भी उन्होंने कृत्रिम ग्लेशियर बना डाले हैं.
नॉर्फ़ेल कहते हैं, "हम पानी ख़ुद नहीं बना सकते. इसलिए हमारे पास एक ही रास्ता है कि जो संसाधन हैं उन्हीं का इस्तेमाल किया जाए."
कहां से आया आइडिया

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इस क्षेत्र के बहुत से देहातों की तरह नांग में भी कोई स्थाई ग्लेशियर नहीं है और पानी झरनों और नदियों से मिलता है. लेकिन यह पानी किसानों की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए काफ़ी नहीं है.
ख़ास तौर पर अप्रैल और मई में फ़सलों की बुआई के मौसम में पानी की बहुत क़िल्लत हो जाती है.
यह स्थिति खेती के लिए एक चुनौती बनकर सामने आती है. विशेष कर वसंत ऋतु के दौरान गेहूं,आलू और दूसरी फ़सलों के खेतों की सिंचाई में उन्हें परेशानी होती है क्योंकि गर्मी आने तक बर्फ़ का पिघलना शुरू नहीं होता है.
इस साल किसानों को अनिश्चित मौसम की वजह से अपनी खेती की योजना बनाने में परेशानी का सामना करना पड़ा.
इस दौरान किसान इस ऊहापोह का शिकार रहे कि आने वाले मौसम के लिए बुआई की जाए या नहीं.
अगर वे फ़सल ना लगाते तो उन्हें आमदनी के नुक़सान का ख़तरा था और अगर बुआई की जाती तो इसके लिए पानी की कमी का ख़तरा था.
जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को देखते हुए 87 साल के इंजीनियर नॉर्फ़ेल ने एक आधुनिक तकनीक लागू करवाई जो किसानों को उनकी उपज में कमी से बचाती है और ग्लेशियरों को उनके गांव के पास लाती है.
नॉर्फ़ेल कहते हैं कि ग्लेशियर के पानी को संसाधन के तौर पर इस्तेमाल करने का विचार उनके पास वहां से आया जहां से उन्हें इसकी सबसे कम उम्मीद थी और वह जगह थी उनके घर के पीछे मौजूद बाग़ का नल.
वह कहते हैं, "हम सर्दियों में पानी को जारी रखने के लिए नलकों को खुला रखते हैं वर्ना पानी पाइप में जम जाता है और उनके फटने का ख़तरा होता है. इसलिए आम तौर पर यह पानी बहकर बर्बाद हो जाता है."
एक दिन नॉर्फ़ेल ने बर्फ़ के छोटे से टुकड़े को देखा जो उनके चालू नलकों में से एक के नीचे बन गया था. पानी एक छायादार जगह के नीचे जमा हुआ और फिर वहां जम रह गया, क्योंकि उस पर सीधे धूप नहीं पड़ रही थी.
उन्हें ख़्याल आया कि अगर वह बर्बाद हुए पानी को जमा करके उन्हें बर्फ़ की तरह जमा सकें तो वह पूरे गांव के लिए एक कृत्रिम ग्लेशियर बना सकते हैं.
नॉर्फ़ेल ने एक योजना के तहत अलग-अलग ऊंचाइयों पर कई ग्लेशियर बना डाले जो पूरे एक गांव को फ़ायदा पहुंचाने के लिए काम करने वाले थे.
वे कहते हैं कि गांव के सबसे पास सबसे कम ऊंचाई पर बनाया हुआ ग्लेशियर सबसे पहले पिघलता है और इससे वसंत ऋतु में बुआई के शुरू में ज़रूरी सिंचाई के लिए पानी मिलता है.
जैसे-जैसे तापमान बढ़ता है वैसे-वैसे अधिक ऊंचाई पर मौजूद ग्लेशियर पिघलने लगते हैं और इस तरह नीचे के खेतों को पानी लगातार और समय पर मिलने लगता है.
‘आइस वॉल’ तकनीक क्या है?

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नांग गांव बेहद ऊंचे पहाड़ों के नीचे बसा हुआ है जहां आने वाले मेहमानों का स्वागत यहां लगा वह बोर्ड करता है जो नॉर्फ़ेल के मशहूर कृत्रिम ग्लेशियर की ओर इशारा करता है.
इस ग्लेशियर तक पहुंचने के लिए 30 मिनट के टेढ़े-मेढ़े रास्ते को तय करना पड़ता है जो यहां के ख़ास तरह के पहाड़ पर है.
सूर्यनारायण बालासुब्रमण्यम ‘एकर्स ऑफ़ आइस’ कंपनी के सह संस्थापक हैं. यह कंपनी कृत्रिम ग्लेशियरों समेत जल प्रबंधन की सुविधा उपलब्ध कराती है.
सूर्यनारायण स्विट्ज़रलैंड की यूनिवर्सिटी ऑफ़ फ़्रीबो में कृत्रिम बर्फ़ के भंडारों पर पीएचडी कर रहे हैं. वे आजकल इस बात पर शोध कर रहे हैं कि कैसे बर्फ़ के ग्लेशियर्स जल संरक्षण को बढ़ा सकते हैं.
नांग गांव से संबंध रखने वाले बालासुब्रमण्यम का कहना है कि गांव में जल भंडारण की एक विशेष व्यवस्था है जिसमें पहाड़ के ऊपर जमी हुई नहर शामिल है जो घाटी तक फैली हुई है. नहर के साथ चट्टान की दीवारें ख़ास ढंग से पानी की रफ़्तार कम कर देती हैं जिससे इसके जमने की संभावना बढ़ जाती है.
इन चट्टानी दीवारों का मक़सद पानी जमने की दर को बढ़ाना है जिसके नतीजे में पूरी घाटी बर्फ़ की चादर ओढ़ लेती है.
बालासुब्रमण्यम का कहना है कि यह ख़ास आधुनिक तरीक़ा कामयाब रहा है. उनके अनुसार गांव में अब 20 फ़ीसद अधिक पानी मिलने लगा है.
वे कहते हैं,'' यह ग्लेशियर अप्रैल के महत्वपूर्ण महीने में अब तक लगभग 10 गांव को पानी उपलब्ध करा कर फ़ायदा पहुंचा रहा है. हम दो और ग्लेशियर बना रहे हैं. यह ज़मीन के पानी को रिचार्ज करने का एक बहुत अच्छा हल भी है जो लद्दाख में अधिक पर्यटन की वजह से तेज़ी से कम हो रहा है."
मुश्किल काम को अंजाम देने का तरीका

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नांग के किसान ग्लेशियर बनाने की इस विधि पर बहुत ख़ुश हैं. इससे उनके गांव में पानी बेहतर ढंग से मिलने लगा है.
रिग्ज़ेन वांगयाल नांग गांव के किसान हैं जिनकी उम्र 44 साल है. उनका कहना है कि इस विधि से सबसे पहले फ़सलों के लिए ज़रूरी पानी मिलना मुश्किल था.
उनका कहना है,"कृत्रिम ग्लेशियर होने से पहले हमारे लिए ज़रूरत के हिसाब से पानी मिलना मुश्किल था.
हालांकि वहां बहुत अधिक बर्फ़ थी जो बहुत दूर गिरती थी इसलिए उसे पिघलने में काफी समय लगता था और हमारे पास आने में उससे भी अधिक समय लगता था. इस देरी का मतलब था कि हमारी फ़सल देर से तैयार होती और कभी-कभी हमारे खेत सूख जाते थे क्योंकि हमारे पास पानी नहीं होता था."
लद्दाख के गांव में इन कृत्रिम ग्लेशियरों की योजना को लागू करने के लिए ग़ैर सरकारी संगठन लेह न्यूट्रिशन प्रोगाम (एलएनपी) सक्रिय है. वांगयाल सन 2013 में बनाई गई इसकी टीम के कार्यकर्ताओं में से एक हैं.
वह कहते हैं, "हमने पानी के बहाव को मोड़ने जैसे मुश्किल काम को अंजाम देने के लिए उस वक़्त बेलचा उठाया जब तापमान बर्फ़ जमाने वाला था. मेरे पास उस वक़्त गर्म जूते भी नहीं थे लेकिन मैंने यह काम समाज के लिए किया. अब कृत्रिम ग्लेशियर हमारे लिए पानी का पहला स्रोत है."
नॉर्फ़ेल 1995 में इस संगठन में इसलिए शामिल हुए ताकि वह अपने कृत्रिम ग्लेशियर प्रोग्राम को ज़्यादा प्रभावी ढंग से आगे बढ़ा सकें. उनकी सफलता को हर जगह सराहा गया और उनकी सेवाओं के लिए उन्हें पद्मश्री सम्मान भी दिया गया है.
उनकी इस सृजनात्मक सोच ने कई दूसरे प्रोजेक्ट के लिए प्रेरणा का काम किया जिसमें लद्दाख के सोनम वांगचुक का आइस स्तूप (हिम स्तूप) भी शामिल है.
इसमें जमा हुआ पानी बर्फ़ के स्तूप का रूप ले लेता है और खेती के मौसम में पिघल कर सिंचाई के काम आता है.
हालांकि नॉर्फ़ेल को वांगचुक के इस प्रोजेक्ट के बारे में कुछ चिंताएं भी हैं.
उनका कहना है, "बर्फ़ के स्तूप भी एक हल हैं और इसके लिए आपको ग्लेशियर के उलट सतर्कता से जगह चुनने की ज़रूरत नहीं है लेकिन यह सरल और कम क़ीमत वाले कृत्रिम ग्लेशियर के मुक़ाबले में बहुत महंगे और पेचीदा भी हैं."
अंतरराष्ट्रीय समस्या का स्थानीय हल

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विशेषज्ञों का कहना है कि कृत्रिम ग्लेशियर जल संसाधन प्रबंधन का एक कारगर उपाय है. हालांकि वह ग्लेशियर पिघलने की वैश्विक समस्या को हल नहीं कर सकते लेकिन वह उन ख़तरों से प्रभावित ढंग से निपट सकते हैं जिनका सामना दुनिया भर के कई समुदायों को करना पड़ रहा है और जो ग्लेशियरों पर बहुत अधिक निर्भर रहते हैं.
अमेरिका की कार्नेगी मेलॉन यूनिवर्सिटी के सिविल ऐंड एनवायरंमेंटल इंजीनियरिंग विभाग के असिस्टेंट प्रोफ़ेसर डेविड रौंस का कहना है कि यह बहुत कारगर उपाय है.
प्रोफ़ेसर रौंस ने अपने हाल के एक शोधपत्र में यह बात सामने लाए हैं कि इक्कीसवीं सदी के अंत तक ग्लेशियर का भार 25 फ़ीसद से 40 फ़ीसद तक कम हो सकता है.
रौंस कहते हैं कि उन क्षेत्रों में इस्तेमाल किए जाने वाले आइस स्तूप और कृत्रिम ग्लेशियर जैसे तरीक़े कारगर होते नज़र आ रहे हैं.
उनका कहना है,"इन उपायों से काफ़ी पानी स्टोर किया जा सकता है. इनसे ऊंचे पहाड़ों में रहने वाली आबादियों के लिए मीठे पानी का बढ़िया संसाधन मिलता है लेकिन जब हम इस समस्या के बारे में सोचते हैं तो यह बात समझ में आती है कि जब तक हम बतौर अंतरराष्ट्रीय समुदाय कोशिश नहीं करते तब तक तापमान तो बढ़ता ही रहेगा."
हिमालय में जलवायु के लचीलेपन पर काम करने वाले नेपाल के अंतर-शासकीय संगठन ‘इंटरनेशनल सेंटर फ़ॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट’ (आईसीआईएमओडी) ने हाल ही में एक रिपोर्ट जारी की है.
रिपोर्ट में नीति निर्धारकों को सावधान किया गया है कि वह क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन के बढ़ते दुष्प्रभावों से निपटने की तैयारी करें.
रिपोर्ट में कहा गया है कि इन परिवर्तनों से मानव जीवन और प्रकृति के लिए गंभीर संकट पैदा होंगे.
लाखों लोगों का रोजगार बरकरार रखते कृत्रिम ग्लेशियर

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आईसीआईएमओडी की डिप्टी डायरेक्टर जनरल इज़ाबेला कोज़ील कहती हैं, "एशिया में दो अरब लोग पानी के लिए ग्लेशियर और बर्फ़ के पिघलने पर निर्भर रहते हैं और यहां क्रायोस्फ़ेयर के ख़त्म होने के बाद जो भयानक नतीजा निकलेगा उसका अंदाज़ा भी नहीं लगाया जा सकता."
क्रायोस्फ़ेयर ज़मीन की सतह के उस हिस्से को कहते हैं जहां जमे हुए पानी का भंडार रहता है. उनका कहना है, "इस महासंकट को रोकने के लिए ज़रूरी है कि हमारे नेता इस पर ध्यान दें."
सन 2023 में किया गया रौंस का अध्ययन पानी की उपलब्धता और लाखों लोगों की रोज़ी-रोटी को बरक़रार रखने में छोटे ग्लेशियरों के महत्व को उजागर करता है. ख़ास तौर पर मध्य यूरोप और ऊंचे पहाड़ वाले एशियाई क्षेत्र में यह महत्व और भी बढ़ जाता है.
रौंस कहते हैं, "ये छोटे ग्लेशियर उन पहाड़ी समुदायों के लिए बेहद अहम हैं जो नांग और थिक्से जैसे गांव में रहते हैं."
उनका कहना है, "विश्व स्तर पर (नॉर्फ़ेल की) तकनीक पर ग़ौर करना बहुत ज़रूरी है क्योंकि दुनिया भर में बहुत से समुदाय ऐसे जल संसाधनों पर निर्भर रहते हैं. इनमें चिली और मध्य यूरोप के देश भी शामिल हैं. इसलिए दुनिया भर के समुदाय जल संबंधी जिन चुनौतियों का सामना कर रहे हैं उनके लिए यह एक प्रभावी स्थानीय हल हो सकता है."
लेकिन वह कहते हैं कि छोटे पैमाने के ऐसे प्रोजेक्ट जलवायु संकट का हल नहीं बल्कि उसे कम करने की एक तकनीक है. वे कहते हैं, "यह सोचना कि इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ग्लेशियरों को होने वाले नुकसान को रोका जा सकता है, सही नहीं है. दुर्भाग्य से ऐसा होगा नहीं."
नॉर्फ़ेल की राय है कि उनकी सरल और कम लागत वाली तकनीक लंबे समय तक काम आएगी.
वे कहते हैं, "हम पानी पैदा नहीं कर सकते लेकिन हम उपलब्ध संसाधनों का इस्तेमाल कर सकते हैं. गांव के लोगों को शामिल करके हम योग्य लोगों को यह ट्रेनिंग दे सकते हैं कि वह इसकी देखभाल ख़ुद कर सकें. यह कृत्रिम ग्लेशियर गांव में नदियों को दोबारा पानी से भरने में मदद करते हैं जो पानी का दूसरा महत्वपूर्ण स्रोत है."
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