हिमाचल में मानसून की भारी बारिश के बाद अब सामने आई ये नई मुसीबत

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- Author, अर्चना फुल
- पदनाम, शिमला से, बीबीसी हिंदी के लिए
पिछले साल मानसून के दौरान भारी बारिश और इस कारण आई प्राकृतिक आपदा के बाद हिमाचल प्रदेश के लोग अब आने वाले तीन महीनों को लेकर चिंतित हैं.
लोगों को चिंता है कि आने वाले महीने शुष्क हो सकते हैं और इसकी वजह से प्रदेश में खेती के लिए पानी के साथ-साथ पीने के पानी की भी किल्लत बढ़ सकती है.
राज्य के जनजातीय इलाक़ों में भी हालात काफ़ी चिंताजनक हैं, जहां नवंबर के बाद आम तौर पर अच्छी ख़ासी बर्फबारी होती है, लेकिन इस बार ये इलाक़ा सूखा है. लोग बर्फबारी के लिए देवी-देवताओं से प्रार्थना कर रहे हैं.
26 जनवरी को लाहौल स्पीति समेत प्रदेश के कुछ हिस्सों में बर्फ़बारी से लोगों के चेहरों पर जो मुस्कान आई थी, वो जल्दी ही ग़ायब हो गई क्योंकि नाममात्र बर्फबारी हुई थी और बर्फ भी जल्दी ही पिघल गई.
फ़रवरी 2022 के बाद से ही प्रदेश के सेब उत्पादन करने वाले इलाक़ों में बर्फबारी नहीं हुई है.
सेब उगाने वाले किसान पिछले पूरे साल ख़राब मौसम की वजह से काफ़ी नुकसान झेल चुके हैं. जब फसल का मौसम आया तो उन्होंने मानसून के सबसे बुरे प्रकोप का सामना किया.

चोपाल में मझोतली के सेब किसान विनोद मेहता कहते हैं, "यह चिंताजनक है. जनवरी में बर्फबारी ज़रूरी है क्योंकि इससे सेब के पेड़ों को ज़रूरी न्यूनतम तापमान (चिलिंग ऑवर्स) मिलता है और मिट्टी में भी लंबे समय तक नमी बनी रहती है. इससे आने वाले सीज़न में पेड़ों को पोषक तत्व मिलते हैं."
सोलन ज़िले में डॉ. वाइएसपी यूनिवर्सिटी ऑफ़ हॉर्टिकल्चर एंड फ़ॉरेस्ट्री के रीजनल हॉर्टिकल्चरल रिसर्च एंड ट्रेनिंग सेंटर के पूर्व कार्यकारी निदेशक डॉ. एसपी भारद्वाज के अनुसार, सर्दियों में सेब के पेड़ों को क़रीब 800 से 1,000 घंटों के न्यूनतम तापमान की ज़रूरत होती है ताकि अप्रैल में वो फूल के लिए तैयार रहें.
वो कहते हैं, "सेब के पौधों को 7 डिग्री सेल्सियस के कम तापमान चाहिए. लेकिन बर्फबारी के इसके अलावा भी कई फायदे होते हैं. इन दिनों तापमान अधिक है और अब बर्फबारी भी नहीं है, इससे आने वाले वक्त में दिक्कतें बढ़ सकती हैं."
प्रदेश की अर्थव्यवस्था की रीढ़- सेब उत्पादन

देश में कुल सेब का 40 प्रतिशत उत्पादन हिमाचल प्रदेश में होता है. यहां सेब का कारोबार 5,000 करोड़ रुपये सालाना है और राज्य में 1.5 लाख परिवारों की आजीविका इस काम से जुड़ी है.
सेब के उत्पादन के मामले में प्रदेश में 70 फ़ीसदी सेब शिमला ज़िले में, इसके बाद किन्नौर, कुल्लू, मंडी और चंबा ज़िले में पैदा होता है.
वेराइटी नाम का पत्रिका के अनुसार, अधिकांश इलाक़ों में सेब की फसल जुलाई से सितंबर के बीच होती है. किन्नौर का सेब सबसे अंत में, अक्टूबर में आता है.
हालांकि कांगड़ा, उना और हमीरपुर जैसे निचले इलाक़ों में सब्जियां और अन्य पारंपरिक फसलें उगाने वाले किसानों को ख़ास दिक्कत नहीं है क्योंकि उनके पास सिंचाई के अन्य स्रोत होते हैं.
कांगड़ा ज़िले के जमानाबाद की एक महिला किसान रिशु कुमारी कहती हैं, "अगर मौसम का ढर्रा ऐसा ही रहा और सूखा मौसम आम बात हो गई तो ये फसलों और घरों के लिए पानी की किल्लत पैदा कर देगा."

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लाहौल स्पीति, किन्नौर और चंबा ज़िले के भारमौर में लोग इस सर्दी में बर्फबारी न होने से ख़ासे चिंतित हैं क्योंकि उनकी जिंदगी और आजीविका इसी पर निर्भर है. यहां आम तौर पर बारिश नहीं होती है.
इन जनजातीय इलाक़ों में मार्च-अप्रैल से सितंबर-अक्टूबर तक एक फसल का मौसम होता है जिसमें किसान मटर, जौ, आलू और कुछ पारंपरिक फसलें उगाते हैं.
हालांकि किन्नौर के कुछ निचले हिस्सों में सर्दियों में किसान सब्जियां उगाते हैं और कुछ किसान जौ बोते हैं.
एक एग्रीकल्चर एजेंसी के साथ काम करने वाले सुधाकर ने कहा, "इस साल बर्फ भी नहीं पड़ी और पिछले साल की तुलना में तापमान भी अधिक है. मिट्टी में नमी नहीं है. यह बुरी तरह फसलों और फलों की खेती को प्रभावित करेगा."
बर्फबारी पर निर्भरता

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स्पीति घाटी में समुद्रतल से 15,090 फ़ुट की ऊंचाई पर स्थित कुंजुम पास के एक गांव से आने वाले चेरिंग डोल्कर ने कहा, "दिसंबर-जनवरी में होने वाली बर्फबारी यहां के चश्मों और भूजल स्रोतों को चार्ज करता है. अगर बर्फबारी देर से होती है तो इसका असर पड़ता है और ये लंबे समय तक रह सकता है."
पास के लोसार गांव की तेन्ज़िन डोल्मा ने कहा कि बर्फ न होने की वजह से यहां के इस साल मैदान सूखे पड़े हैं.
वो कहती हैं, "हमारी अर्थव्यवस्था एक फसल के सीज़न पर निर्भर है. सर्दियों में अच्छी बर्फबारी से हमें अच्छी फसल मिलती है क्योंकि इससे सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी मिल जाता है."
कठिन हालात को देखते हुए लोसार पंचायत और आसपास के गांव वाले पिछले हफ़्ते कुंज़ुम पास पर स्थित कुंज़ुम माता मंदिर बर्फबारी की मन्नत मांगने गए थे.
पास के काज़ा नाम की जगह में मौजूग मुख्य मोनास्ट्री में भी इसके लिए विशेष प्रार्थनाएं आयोजित की गईं.
उन्होंने बताया कि पिछले साल 6 से 7 इंच बर्फबारी हुई थी, जो पर्याप्त थी.
जनजातीय इलाकों में लोग मौसम के इस बदलते रूप से तालमेल बिठाने की कोशिश कर रहे हैं. कुछ इलाकों में जागरूक लोग चश्मों से निकलने वाले पानी को जमा करते हैं और जम गए पानी को आईस स्तूप के रूप में जमा करते हैं. ग्लेशियर पिघलना शुरू होने से पहले उनकी पानी की ज़रूरत कुछ हद तक इस तरह से पूरी होती है.
बड़ी संख्या में पर्यटकों से बढ़ा प्रदूषण

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लाहौल स्पीति के स्थानीय लोगों को लगता है कि इन इलाक़ों में पर्यटकों की भारी आमद के चलते प्रदूषण बढ़ा है जिससे वातारण में गर्मी बढ़ रही है. ग़ौरतलब है कि 2020 में अटल टनल के मार्फ़त यह हिस्सा शेष हिमाचल से जुड़ गया है.
अटल टनल के पास के गांव सिस्सो में रहने वाले श्याम लाल ने कहा, "अगर अटल टनल के ज़रिए आने वाले ट्रैफ़िक को नियंत्रित नहीं किया गया तो आने वाले समय में यह जलवायु परिवर्तन का सबब बन सकता है."
शिमला में मौसम विज्ञान केंद्र के डायरेक्टर सुरेंद्र पॉल के मुताबिक़, "इतना लंबा सूखा मौसम पहले से बिल्कुल अलग है क्योंकि इस साल जनवरी में पहाड़ों में न बारिश हुई न बर्फबारी, सिवाय कुछ जगहों पर छिटपुट बर्फबारी के जिसका कोई ख़ास असर पड़ेगा, ऐसा नहीं लगता."
"रिकॉर्ड बताता है कि पहले 2007-2008 में जनवरी के महीने में बारिश की 90 फ़ीसदी कमी हुई थी. लेकिन इस साल यह 99 फ़ीसदी है."
उन्हें उम्मीद है कि जनवरी के अंत में बर्फबारी होगी. वो कहते हैं कि ग्लोबल वार्मिंग की वजह से समूचे जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम के आगे-पीछे होना अब आम होता जा रहा है.
उनके अनुसार, "जनवरी की बर्फबारी से कई तरह के फायदे होते हैं. जैसे-जैसे गर्मी बढ़ेगी, बर्फ और तेजी से पिघलेगी. ज़मीन में पानी कम जाएगा और इसका असर कम होगा."

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जल विद्युत परियोजनाओं पर असर
नदियों में पानी की कमी की वजह से राज्य की जल विद्युत परियोजनाएं भी अपनी क्षमता से कम बिजली उत्पादन कर रही हैं. हालांकि एक्सपर्ट का कहना है कि बिजली उत्पादन में कमी इतना महत्वपूर्ण मुद्दा नहीं है.
शिमला में एसजेवीएन द्वारा संचालित 1500 मेगावॉट नाथ्पा झाकरी हाईड्रोपावर प्रोजेक्ट के कार्यकारी निदेशक मनोज कुमार ने कहा, "सूखे की वजह से इन दिनों नाथ्पा झाकरी प्रोजेक्ट में 10-15 फ़ीसदी कम बिजली पैदा हो रही है. हालांकि जनवरी-फरवरी महीने में बिजली कम बनती है और हम इस दौरान मरम्मत आदि का काम करते हैं."
उन्होंने बताया कि 17 साल बाद उन्होंने यहां ऐसा सूखा देखा है. वो कहते हैं, "अगर सूखे की अवधि लंबी रही और ऐसी स्थिति बार-बार आती रही तो बिजली उत्पादन के लिए ये चिंताजनक है क्योंकि नदियों में पानी बर्फ से ही आता है."
पर्यावरणविद कहते हैं कि पिछले मानसून के दौरान भारी बारिश हुई थी लेकिन अधिकांश पानी बेकार बह गया. पानी बहने के कारण रास्ते में आने वाली ज़मीन और आधारभूत ढांचा नष्ट हो गया. अब सर्दियों में सूखे की स्थितियां और संकट पैदा कर सकती हैं.
उनका मानना है कि, "ग्लोबल वार्मिंग के बड़े कारणों के अलावा मौसम को गरम करने में योगदान देने वाले स्थानीय कारकों को भी देखने और उन पर निगरानी रखने की ज़रूरत है."
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