दिल्ली में प्रदूषण से निपटने में कृत्रिम बारिश वाक़ई कारगर होगी, इसे कराना कितना जटिल

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    • Author, शर्लिन मोलन
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

दिल्ली में वायु प्रदूषण चरम पर है. राजधानी और इससे सटे इलाक़े में रहने वाले लोग स्मॉग की मोटी चादर तले जहरीली सांस लेने को मजबूर हैं.

पिछले सप्ताह दिल्ली के पर्यावरण मंत्री ने कहा कि राज्य सरकार प्रदूषण कम करन के लिए क्लाउड सीडिंग के बारे में सोच रही है.

क्लाउड सीडिंग से कृत्रिम बारिश कराई जाती है ताकि प्रदूषण का स्तर कम हो सके.

लेकिन ये योजना सुप्रीम कोर्ट की मंज़ूरी और अलग-अलग केंद्रीय मंत्रालयों पर निर्भर करेगी.

अगर ऐसा होता है तो ये योजना अगले महीने लागू हो सकती है. वैसे मौसम के मिजाज पर भी बहुत कुछ निर्भर है.

ये पहली बार नहीं है, जब राजधानी दिल्ली में प्रदूषण कम करने के लिए क्लाउड सीडिंग का नुस्खा सुझाया गया है. लेकिन कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि ये एक जटिल और खर्चीला इंतज़ाम है.

इसके अलावा ये प्रदूषण से पूरी तरह लड़ने में कितना कारगर है ये भी साबित नहीं हो पाया है.

पर्यावरण पर पड़ने वाले इसके दीर्घकालिक असर को समझने के लिए अभी और रिसर्च की ज़रूरत है.

लेकिन दिल्ली में बढ़ते वायु प्रदूषण से जिस तरह से लोगों का दम घुट रहा और ये अंतरराष्ट्रीय मीडिया में चर्चा का विषय बना हुआ है, उससे भारत में राजनीतिक नेतृत्व इसका हल निकालने के लिए बेताब नज़र आ रहा है.

दिल्ली की जहरीली हवा

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दिल्ली में पिछले दो सप्ताह से एयर क्वॉलिटी इंडेक्स (एक्यूआई) लगातार 450 से ऊपर बना हुआ है.

(एक्यूआई हवा में पीएम यानी पर्टिकुलेट मैटर 2.5 को मापता है). ये लेवल पीएम 2.5 की स्वीकार्य सीमा से दस गुना ज़्यादा है.

राजधानी में दिल्ली से पहले हुई बारिश ने वायु प्रदूषण का स्तर थोड़ा कम किया था लेकिन दिवाली के पटाखों और आतिशबाजी की वजह से एयर क्वॉलिटी इंडेक्स फिर ख़तरनाक स्तर पर पहुँच गया.

दिल्ली में वाहनों और औद्योगिक इकाइयों से होने वाले उत्सर्जन और धूल की वजह से प्रदूषण का स्तर लगभग सालों भर बढ़ा रहता है.

लेकिन ठंड के दिनों में ये समस्या और जटिल हो जाती है क्योंकि पड़ोसी राज्यों में किसान फसल कटने के बाद पराली जला कर खेत साफ करने लगते हैं ताकि अगली फसल लगाई जा सके.

इससे उठने वाला धुआं दिल्ली की तरफ़ आकर यहाँ की हवा को और जहरीली बना देता है.

क्लाउड सीडिंग क्या है?

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क्लाउड सीडिंग एक ऐसी तकनीक है जो बादलों में मौजूद नमी में संघनन की प्रक्रिया को तेज़ कर देती है. इस वजह से बारिश होने लगती है.

इस प्रक्रिया में बादलों में सिल्वर आयोडाइड और क्लोराइड जैसे लवणों (नमक) का स्प्रे किया जाता है. अमूमन ये छिड़काव विमानों से या फिर ज़मीन पर मौजूद मशीनों से किया जाता है.

स्प्रे में मौजूद लवणों के महीन कण आइस न्यूक्लियेटिंग पार्टिकल की तरह काम करते हैं.

इससे बर्फ़ के क्रिस्टल बादल में बदलने लगते हैं. इसके बाद बादलों में मौजूद नमी बर्फ के क्रिस्टल को घेर लेती है और इन्हें संघनित कर बारिश में बदल देती है.

दिल्ली में हवा की गुणवत्ता के स्तर और स्वास्थ्य पर रिसर्च करने वाले स्वतंत्र रिसर्चर पलाश मुखर्जी बताते हैं, ''ऐसी बारिश के लिए बादल में सही मात्रा में नमी और आर्द्रता होनी चाहिए ताकि आइस न्यूक्लि ठीक से बन सके.''

वो कहते हैं इसके अलावा हवा की गति भी पर काफ़ी कुछ निर्भर करता है. दिल्ली में इस मौसम में हवा की गति में काफ़ी बदलाव भी होता है.

2018 में 'डाउन टु अर्थ' पत्रिका के साथ बात करते हुए जलवायु विशेषज्ञ एसके बनर्जी ने बताया था कि इस तरह की बारिश करने की प्रक्रिया दशकों पुरानी है.

बनर्जी भारत के मौसम विभाग के पहले महानिदेशक थे और 1952 में उन्होंने इसका प्रयोग किया था.

1960 में अमेरिका ने इस तकनीक का इस्तेमाल वियतनाम युद्ध में किया था ताकि वियतनामी सेना की सैन्य सप्लाई रुक जाए. उस समय इस पर काफ़ी विवाद हुआ था.

चीन और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश और कई बार भारत के कुछ राज्यों ने भी इसका इस्तेमाल किया है ताकि सूखे से निपटा जा सके.

दिल्ली सरकार क्या करना चाहती है?

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इमेज कैप्शन, क्लाउड सीडिंग की तैयारी

आईआईटी कानपुर के शोधकर्ताओं ने दिल्ली में कृत्रिम बारिश की लिए परियोजना रिपोर्ट सौंपी है.

योजना के मुताबिक़ यह परियोजना दो चरणों में चलेगी. पहली परियोजना के तहत 300 वर्ग किलोमीटर के इलाक़े को कवर किया जाएगा.

विशेषज्ञों का कहना है कि ये परियोजना 20 और 21 नवंबर को शुरू की जाए. उनके हिसाब से उस समय मौसम इसके काफ़ी मुफीद होगा.

इस परियोजना का नेतृत्व कर रहे मणिंद्र अग्रवाल ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स से कहा, ''क्लाउड सीडिंग से इतने बादल नहीं बन पाएंगे कि पूरी दिल्ली कवर हो सके. कुछ ही किलोमीटर को कवर करना बेहतर होगा.''

क्या क्लाउड सीडिंग से दिल्ली का प्रदूषण कम हो पाएगा?

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इमेज कैप्शन, दिल्ली की पर्यावरण मंत्री गोपाल राय

इस तकनीक को आजमाने का तर्क तो यही है कि बारिश पर्टिकुलेट मैटर को बहा ले जाएगी और हवा साफ़ और सांस लेने लायक हो जाएगी.

दिल्ली में पिछले सप्ताह हुई थोड़ी बारिश ने प्रदूषण का स्तर थोड़ा कम हुआ है, इसलिए लोगों का कहना है कि ये तकनीक कारगर साबित होगी.

लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि ये तकनीक प्रदूषण कम करने मे में कितनी मददगार होगी ये अभी साफ़ नहीं है.

मुखर्जी कहते हैं कि दूसरे देशों में क्लाउड सीडिंग का इस्तेमाल एयर क्वॉलिटी मैनेजमेंट और धूल को नीचे दबाने के लिए होता रहा है. लेकिन इसका बेहतर इस्तेमाल कड़ी दर कड़ी करना होता है.

वो कहते हैं, ''अगर आप एयर क्वॉलिटी पर बारिश का असर देखें तो पाएंगे कि इससे प्रदूषण का स्तर तो कम हो जाता है लेकिन 48 से 72 घंटों में ये फिर लौट कर आ जाता है.''

मुखर्जी का कहना है कि क्लाउड सीडिंग एक महंगी प्रक्रिया है और ये पहले से कम मात्रा में मौजूद संसाधनों को एक ऐसी गतिविधि की ओर मोड़ देती है, जिसका कोई फौरी या स्थायी असर अभी साबित नहीं हो पाया है.’’

उनका कहना है कि इस मुद्दे पर अच्छी तरह बातचीत और विचार-विमर्श होना चाहिए.

वो कहते हैं, ''ये कोई अस्थायी फैसला नहीं हो सकता. आपको प्रोटोकॉल की पूरी श्रृंखला से होकर गुजरना होता है. इसे संभव बनाने के लिए आपको अलग-अलग विशेषज्ञों की टीम बनानी होती है. इनमें मौसम विशेषज्ञों, एयर क्वॉलिटी पॉलिसी एक्सर्ट, महामारी विशेषज्ञ होने चाहिए.''

क्लाउड सीडिंग जो साबित नहीं कर पाई है

कुछ विशेषज्ञ इस तकनीक के इस प्रक्रिया के अनजान पहलुओं के बारे में जानकारी न होने को लेकर चिंतित हैं.

क्लाइमेट चेंज और सस्टेनिबिली एक्सपर्ट अबिनाश मोहंती कहते हैं, ''अभी तक इस क्लाउड सीडिंग से एयर क्वॉलिटी इंडेक्स कितना नीचे गिरता है. ये भी पता नहीं है कि इसका क्या असर होता है तो क्योंकि आख़िर आप प्रकृति की प्रक्रिया को ही पलटने की कोशिश करते हैं. इसकी भी एक सीमा होती है.''

वो कहते हैं कि सिर्फ़ इस तरह की बारिश करा कर या हवा की गति में बदलाव से प्रदूषण की समस्या ख़त्म नहीं होगी.

सिर्फ़ इस तरह तुक्कों और जब-तब किए जाने वाले प्रयोगों के बजाय हमें प्रदूषण ख़त्म करने के लिए लगातार कोशिश करनी होगी.

अतिरिक्त रिपोर्टिंग : जोया मतीन

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