शोर और प्रदूषण से मुक्त शांत और सुंदर हो ऐसी दिवाली

बस्तर के जंगल में बैठी महिला

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    • Author, नताशा बधवार
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए

जब छत्तीसगढ़ के बस्तर के घने जंगल में बने सर्किट हाउस में ठहरी थी तब मैंने अपने जीवन में दिवाली की पहली रंगोली बनायी थी.

उस साल, मैं भिलाई में रह रही थी और कुछ युवाओं को डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म का पाठ्यक्रम पढ़ा रही थी. इस साल की तरह, उस साल दिवाली सप्ताह के अंत में थी और मुझे दिल्ली स्थित अपने घर आने का समय नहीं मिल पाया था. अपने सहकर्मी मार्ग्रेट और अजय के साथ मिलकर मैंने बस्तर के अंदर, जहां तक हम जा सकते थे, वहां तक जाने का फ़ैसला किया. हम अपने काम से एक ब्रेक की ज़रूरत थी और जंगल हमें आमंत्रित कर रहा था.

हमने दुर्ग-भिलाई-रायपुर के औद्योगिक इलाके से यात्रा शुरू की. जब हमने जगदलपुर पार किया, तब हमने खुद को दुनिया के सबसे जैव विविधता वाले जंगलों के गहरे अंदर पाया, जो काफी हद तक जादुई लग रहा था.

चित्रकूट जलप्रपात की लहरों के इंद्रावती नदी में गिरने वाले दृश्य को देखकर जो महसूस हो रहा था, उसे शब्दों में व्यक्त कर पाना बहुत मुश्किल है. गहरी खाई में नदी के गिरने से जो शोर हो रहा था, उसमें मेरे दिमाग़ के सारे विचार डूब गए थे. हम पहाड़ के किनारे खड़े हो कर देखते रहे कि नदी किसी तरह पथरीली ज़मीन पर टकरा रही है. हम बूंदों की नरम धुंध से घिरे हुए थे. ख्याल यह भी आ रहा था कि क्या स्वर्ग ऐसा ही होता है?

हम निर्जन जंगल के और अंदर गए और रात में लगभग खाली पड़े सर्किट हाउस पहुंच गए. दिवाली की सुबह अजय, केयरटेकर के साथ मिलकर खाने के इंतज़ाम में जुट गए. मार्ग्रेट लंदन से आयीं फ़िल्म मेकर थीं, उन्होंने मेरी ओर देखते हुए पूछा कि तुम दिवाली पर क्या कर रही हो?

मैंने इससे पहले अकेले कभी कुछ नहीं किया था. घर में दूसरे लोग जो करते थे, वही मैं किया करती थी. ऐसे में, मैं अचरज में सोचने लगी कि मैं इस दिवाली के मौके को कैसे हम सब के लिए कैसा बना सकती हूं?

बस्तर का एक झरना

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पहली बार, ऐसा मौका था जहां मैं अपने अंदाज़ में दिवाली मना सकती थी. जंगल में जो नीरव शांति थी, उसे मैंने पहले ही अपना लिया था.

मुझे तीन रंग मिले- भूरा रंग, लाल मिट्टी और सफेद चॉक पाउडर. हम जहां रह रहे थे, उसके दरवाजे के बाहर के सीमेंटेड फर्श और गलियारों में मैंने डिज़ाइन बनाना शुरू कर दिया. रंगोली में मैंने फूल, जानवरों और एक जैसी आकृति वाली पैटर्न बनाए.

जल्दी ही, दंडाकरण्य के जंगलों में रात हो गई. पौराणिक रामायण के मुताबिक इस जंगल में 14 साल के वनवास के दौरान राम, सीता और लक्ष्मण रहे थे. रात में अंधेरे में पेड़ पौधों पर मंडराते जुगनू ही रोशनी के एकमात्र स्रोत थे. अपनी दुनिया को रौशन बनाने के लिए हमें दिवाली की लड़ियों की ज़रूरत नहीं थी. प्रकृति ने हमें बेहतरीन दिवाली का तोहफ़ा दिया था.

पक्षी अपने घोंसलों में लौट कर चहकने लगे थे, जबकि झाड़ियों से कीड़े मकौड़ों की आवाज़ आ रही थी. इन्हीं आवाज़ में राम, सीता और लक्ष्मण के अयोध्या वापसी का जश्न मनाया जा रहा था. हमलोग आपस में हंस रहे थे कि दिवाली का जश्न मनाने भी हम लोग उस जगह पर आए हैं जहां राम, सीता और लक्ष्मण को अपने वनवास में रहना पड़ा था.

मुझे परिवार की कमी तो महसूस हो रही थी, लेकिन मेरी अपनी भरी पूरी दिवाली संपन्न हो चुकी थी.

दिवाली का दिया

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इस साल मैं, आस-पास दिवाली के महौल पर लिख रही हूं. अब मैं मेट्रो सिटी में रहने वाली एक मां हूं. बच्चों के स्कूलों में उन्हें बताया गया है कि पहले से प्रदूषित वातावरण में दिवाली के मौक़े पर शोर और प्रदूषण को बढ़ाना नहीं है. कजिन्स के बीच सुंदर और आकर्षक पटाखों के इस्तेमाल की होड़ भी है जो अनार, चरखी और रॉकेट जैसी कम आवाज़ करते हैं.

मेरी मां और बड़ी बेटी, दोनों लंबे समय से अस्थमा से पीड़ित हैं, हर साल दिल्ली की दिवाली के दौरान उनकी मुश्किल बढ़ जाती है. इस साल सुप्रीम कोर्ट ने पटाखों की बिक्री पर रोक लगाई है लेकिन सोशल मीडिया पर इस फ़ैसले को हिंदू संस्कृति पर हमला बताते हुए आलोचना की जा रही है.

अपने परिवार वालों और ख़ुद के लिए ज़्यादा से ज़्यादा लोग शोर मुक्त, रचनात्मक और बेहतर दिवाली बनाएं, मैं तो ये चाहती हूं. इसके लिए हमें महंगे उपहारों के लेन देन से भी बचने की ज़रूरत है. हमें पटाखे और जंक फूड हैंपरों पर ख़र्च करने से बचना होगा, हमें ये पैसा किसी अच्छे काम के लिए दान दे देना चाहिए. हम में से कईयों के लिए पटाखों के प्रदूषण के चलते शहर से दूर और फिर से जंगलों की सुरक्षा घेरे में जाने की ज़रूरत हो सकती है.

ऐसे में हम सब को फिर अपने आनंद, उत्सव, भक्ति इन सबको आंकने की ज़रूरत है. मेरा यक़ीन है कि एक समाज और भारतीय नागरिक के तौर पर हम सब इसके लिए तैयार हैं. हमें यह ख़ुद के लिए, अपने बच्चों के लिए और हम सबको देख रहे ईश्वर के लिए करना चाहिए.

(लेख में लेखिका के निजी अनुभव हैं, नताशा बधवार को अन्य लेख यहां पढ़ें.)

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