नफ़रत के दौर में हम अपने बच्चों को प्यार का सबक़ कैसे सिखायें

बच्चों की परवरिश

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    • Author, नताशा बधवार
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए

मां बनने का सपना मैं हमेशा से देखा करती थी. मुझे अपने ऊपर पूरा यक़ीन था. पता था कि मैं अच्छी मां बनूंगी. मैं अपने बच्चे का हाथ पकड़कर चलने की कल्पना करती थी. हम दोनों, चुस्त चाल में क़दम बढ़ाते हुए. ख़ुशी हमारे दिल में हिलोरें लेती हुई.

मेरा पहला बच्चा हुआ, उसके कई साल पहले से मैं इस तरह के नोट्स बना रही थी कि अपने बच्चों को मैं कैसे पालूंगी. और ये नोट्स अच्छे थे.

मैं डिलिवरी टेबल पर ही थी, जब पहली बार मैंने अपनी बेटी को गोद में लिया. मैंने उसके लिए हलके से गाना शुरू कर दिया.

एक नवजात शिशु की तरह वह लगातार रोए जा रही थी. लेकिन मेरे गाने से उसका रोना थम गया. वह सुन रही है, ऐसा मुझे विश्वास था. मेरी आवाज़ वह पहचानती थी. यह गाना मैं तभी से उसके लिए गाती आ रही थी, जब वह मेरी कोख में थी.

लेकिन समय के साथ मुझे एहसास होता गया कि मेरी आवाज़ उसे हमेशा शांत नहीं कर पाएगी. बच्ची क्यों रो सकती है, ऐसी एक चेकलिस्ट सिर्फ़ दो हफ़्तों के अंदर मेरे पति, मेरी मां और मैंने मिलकर तैयार कर डाली. यह इस प्रकार थी-

1. क्या उसे भूख लगी है?

2. क्या उसे डकार दिलाने की ज़रूरत है?

3. क्या उसकी नैपी गीली है?

4. क्या उसे सोने के लिए धीरे-धीरे हिलाने की ज़रूरत है?

5. क्या उसकी नाक बंद है?

6. और फिर वापस पहले सवाल पर

कभी-कभी बच्चों को किसी भी तरह चुप कराना मुश्किल होता है. और जब सारी कोशिशें बेकार हो जातीं तब हम अपने एक मुलायम नीले बांधिनी दुपट्टे में अपने बच्चे को लपेट लेते और मोटरसाइकिल की सवारी पर निकल पड़ते. इससे सभी का मन शांत हो जाता था.

बच्चों की परवरिश

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दुनिया की बातें सुनने की प्रैक्टिस

मुझे ऐसी ही एक घटना याद है जब एक शाम ऐसे ही घूमने के दौरान बारिश होने लगी और हमें सड़क के किनारे एक चाय के ढाबे पर शरण लेनी पड़ी. हमारे आसपास मौजूद लोग भुनभुना रहे थे कि ये नए-नए मां-बाप इतने छोटे से बच्चे को लेकर इधर चले आए. मैंने बच्ची को हिफ़ाज़त से अपनी छाती पर बांध रखा था, फिर भी हम ख़ुद को कटघरे में खड़ा महसूस कर रहे थे.

जैसे-जैसे साल बीतते गए, ज़िंदगी की सड़क पर हमारा सफ़र आगे बढ़ता गया, ऋतुएं बदलती रहीं और बड़े प्यार से से पाली हुई मेरी कई गलतफहमियां दूर होने लगी. मैंने सीख लिया कि लोग घूरते हैं तो घूरते रहें. लोगों की छींटाकशी को दिल पर न लेना भी मैंने सीख लिया.

अजनबियों की टिप्पणियों, उनकी सलाहों और यहां तक कि उनकी डांट पर भी सिर्फ़ मुस्कुरा देने की प्रैक्टिस मैंने कर डाली. बच्चे जब अपने तरीक़े से दुनिया की खोजबीन करने निकले तो मैंने दिल कड़ा कर लिया. सबसे ख़ास बात यह कि हमारी मानसिक सुरक्षा के लिए मैंने ऐसे घर बनाने की शुरुआत की जो हमारा घोंसला हो. जहां हम सुरक्षित रहने के लिए, ज़ोर से हंसने के लिए और ख़ुद को तरोताज़ा करने के लिए वापस लौट सकें.

वीडियो कैप्शन, तेलंगाना का एक ऐसा मूवी थियेटर, जहां फिल्में तो सभी देखते हैं पर इसे चलाती हैं महिलाएं.

मां-बाप होने का अर्थ क्या है?

मां-बाप बनने का संबंध सिर्फ़ बच्चे पैदा करने से नहीं है. कुछ नया बनाने का काम तो बाद में शुरू होता है. पहले कई चीज़ों का विनाश ज़रूरी है. आपके अहं का बिना कोई आवाज़ किए ध्वस्त हो जाना. गर्भधारण से पहले आप जो भी थे, उसे अलविदा कहना.

आत्म का जो भी बोध आप में है, उसको नए सिरे से पारिभाषित करना. हमारे बीच में एक बच्चा आने से पहले हम साथ-साथ जो कुछ भी हुआ करते थे, उसकी एक धुंधली सी याद भर बचाए रखना.

माता-पिता होने का अर्थ है एक ही साँस में गर्व और ख़लिश, दोनों महसूस करना. कुछ खो देने का एहसास होना. आपने इस दौरान क्या खोया है, यह बता पाना मुश्किल होता है. अपने बचपन की स्मृतियों को आप बार-बार खंगालते हैं, यह पता लगाने के लिए कि आख़िर हम क्या ढूंढ रहे हैं.

यह काम आप उन सदमों, उन भयों को पहचानने के लिए भी करते हैं, जिन्हें आप अपने बच्चे के हिस्से नहीं आने देना चाहते. इस क्रम में आप उन चोटों से परिचित होते हैं, जिन्हें आप नकारते आए हैं लेकिन जो अब तक हरी हैं.

एक इंसान जब बड़ा हो जाता है और उसके बच्चे हो जाते हैं तब उसका खोया बचपन उसकी चेतना की खिड़की खटखटाता है और अपना इलाज किए जाने की माँग करता है. अपने बच्चों की परवरिश के दौरान ही हमें यह पता चलता है कि हमें अपने अंदर के खोए हुए बच्चे को फिर से ज़िंदा करने की ज़रूरत है.

जैसे-जैसे मेरे बच्चे बड़े हो रहे हैं, मैं इस बात पर ग़ौर करने से ख़ुद को नहीं रोक पा रही हूं कि उनके इर्द-गिर्द का परिवेश घर से लेकर बाहर तक कितना अस्त-व्यस्त हो चुका है. उनकी अनुभूतियों पर बुरी ख़बरों, टकरावों और शोर की बमबारी हो रही है.

टीवी के पर्दों से आने वाली चीख़-पुकार, मोबाइल में भरे वीडियो, बड़ों की तेज़ आवाज़ में बातचीत, दुख पहुँचाने वाली टिप्पणियां, दूसरों का अपमान. कोई आश्चर्य नहीं कि उनमें से ज़्यादातर अपने परिवेश से कटे हुए युवा के रूप में बड़े होते हैं. ऐसे युवा जो हर तरह की हिंसा के प्रति सुन्न हो चुके हैं और जिन लोगों पर वे निर्भर थे, उन्हें अजनबी मानने लगे हैं.संवेदनशील बच्चे ख़ुद को अपने इर्द-गिर्द की दुनिया से हमेशा के लिए काट लेते हैं.

चिंता, घबराहट और उदासीनता का यह दौर हमने अपने ऊपर थोप रखा है. लेकिन माता-पिता के रूप में हमें यह समझने की ज़रूरत है कि इस मामले में हम लाचार नहीं हैं. अपने बच्चों का बचपन बचाने में हमें भी एक भूमिका निभानी है.

बच्चों की परवरिश

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बच्चे वही करते हैं जो आपको करते देखते हैं

अपने जीवन के मध्य में जब मैंने पेरेंटिंग का सफ़र शुरू किया तो इसके पीछे कहीं से भी यह सोच मौजूद नहीं थी कि मैं किसी आत्म-सुधार कार्यक्रम पर हस्ताक्षर कर रही हूं. मुझे कुछ बातें सिखानी थीं, ख़ुद कुछ सीखना नहीं था. लेकिन जल्द ही मुझे एहसास हो गया कि पैरेंटिंग में अपने माता-पिता से अलग रास्ता पकड़ने की इच्छा रखना कितना आसान है, लेकिन अपने सामाजिक-सांस्कृतिक पूर्वाग्रहों से आज़ाद होना कितना मुश्किल है.

अपनी नैतिक शिक्षा के पाठ मुझे याद थे. चाल-चलन और संस्कार की जानकारी भी मुझे थी. इंटरनेट पर जवाब खोजना मुझे खूब आता था. यहां तक कि पैरेंटिंग पर कुछ किताबें भी मेरे पास पड़ी थीं, जिनमें तमाम ज़रूरी संदर्भ तस्वीरों के साथ छपे थे. लेकिन ज़िंदगी के जो मूल्य किताबें और कक्षाओं में बहुत अच्छे लगते हैं, वो हक़ीक़त में ज़्यादा कारगर नहीं होते. हर पल उनकी परीक्षा लेने और उन पर सवाल खड़े करने की ज़रूरत पड़ती है.

क्या बड़ों की बात हमेशा माननी चाहिए? क्या शिक्षक हमेशा सही होते हैं? कितनी आइसक्रीम को ज़्यादा आइसक्रीम माना जाए? क्या मैं लहंगे के साथ अपनी हवाई चप्पलें पहन सकती हूं?

अपनी मिसाल के ज़रिए रास्ता दिखाने के मामले में यह सबसे ज़्यादा असुविधाजनक पाठ सिद्ध हुआ है. आपको याद है कि कैसे हमारे पैरेंट्स कहते थे, "बड़े होने पर तुम्हारा जो दिल करे सो करना."

वे ऐसा कहते ज़रूर थे लेकिन उनका मतलब यह नहीं होता था. अगर मैं चाहती हूं कि मेरे बच्चे अच्छे से सोएं, हेल्दी खाना खाएं और सीधे बैठें, तो यह सब पहले मुझे ख़ुद करना होगा. वे वह करते हैं जो मैं करती हूं, वह नहीं जो मैं उन्हें करने को कहती हूं.

ऐसा नहीं हो सकता कि मैं ख़ुद तो हमेशा ऑनलाइन रहूं लेकिन अपने बच्चों से उम्मीद करूं कि वे कंप्यूटर लॉग ऑफ़ करके पार्क में खेलने चले जाएं. हर काम मुझे ख़ुद से करके दिखाना होता है.

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उलझी हुई बातों को भी पकड़ लेते हैं बच्चे

आख़िरी बात एक ऐसे उपहार की, जिसकी कोई उम्मीद भी नहीं की जाती. बच्चों की ज़हानत. इससे मेरा काफ़ी दबाव हट जाता है. मुझे सिर्फ़ सुनने की ज़रूरत होती है. बड़ों की बातचीत में जो झूठ का उलझा हुआ जाला लगा रहता है, बच्चे उसे बहुत आसानी से देख सकते हैं.

मेरी सबसे छोटी बच्ची जब चार साल की थी तो उसने कहा, "सब लोग मुझसे प्यार करते हैं. मेरे घर में आने वाले सारे मेहमान मुझसे प्यार करते हैं."

'सुनने में तो यह बात बहुत अच्छी लग रही है', मैंने उससे कहा. उसके लहजे में कुछ ऐसा था, जैसे की उसके दिल में कोई तकलीफ हो.

'मुझे यह अच्छा नहीं लगता', उसने कहा.

'तुम्हें अच्छा क्यों नहीं लगता', मैंने पूछा.

उसने कहा, "कल बुआ ने मुझसे अच्छे से बात की लेकिन उसके थोड़ी ही देर बाद उन्होंने अपनी बेटी को डांटा. मेरी बहन को कैसा लग रहा होगा, वह सोचकर मुझे अच्छा नहीं लगा."

मैंने उसे गले से लगा लिया. एक मां-बाप की हैसियत से मुझे सिर्फ़ इतना ही करना है कि मैं अपने बच्चों पर भरोसा करूं. ताकि बच्चों का ख़ुद में ख़ुद में भरोसा बना रहे.

सही क्या है, इंसाफ़ क्या है? इसकी समझ बच्चों में क़ुदरती होती है. जो लोग भी उनके लिए मायने रखते हैं, वे उन्हीं की तरफ़ देखते हैं. हमें कोई चोट पहुँचती है तो उन्हें भी चोट पहुँचती है. वे अपने इर्द-गिर्द की दुनिया का ध्यान रखते हैं. हमारे बच्चे ऐसी पीढ़ी बनेंगे, जो प्यार की ठंडी बयार से नफ़रत के बादलों को उड़ा ले जाएगी.

वीडियो कैप्शन, बच्चों से कैसे बात की जाए ?

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