लिव-इन रिलेशन से जन्मे बच्चे को भी मिलेगी पैतृक संपत्ति में हिस्सेदारी

सुप्रीम कोर्ट

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    • Author, सुचित्र के. मोहंती
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए

सुप्रीम कोर्ट ने हिंदुओं में संपत्ति के बँटवारे को लेकर एक अहम फ़ैसला सुनाया है. सर्वोच्च अदालत के फ़ैसले मुताबिक़ बगैर शादी के लंबे समय तक साथ रहे जोड़े से पैदा संतान की पैतृक संपत्ति में हिस्सेदारी होगी.

सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस एस अब्दुल नजीर और जस्टिस विक्रम नाथ ने ये फ़ैसला सुनाया. सुप्रीम कोर्ट ने ये फ़ैसला देते हुए केरल हाई कोर्ट के उस फ़ैसले को दरकिनार कर दिया, जिसमें कहा गया था कि बगैर शादी के साथ रहे जोड़े की संतान को परिवार की संपत्ति में हिस्सा नहीं मिल सकता.

सुप्रीम कोर्ट ने हाल में अपने फ़ैसले में कहा, ''लंबे समय तक बगैर शादी के साथ रहे जोड़े से पैदा अवैध संतान को परिवार की संपत्ति में हिस्सा मिलेगा.''

जिस जोड़े का मामला सुप्रीम कोर्ट के पास आया था, उसके बारे में बेंच ने कहा कि ये जोड़ा लंबे समय से साथ रह रहा था. इसने अपने रिश्ते को एक शादी-शुदा जोड़े की तरह ही बनाए रखा. इसलिए इनका बेटा पैतृक संपत्ति में उचित हिस्से का हक़दार होगा.

पहले ये मामला केरल की एक निचली अदालत में पहुँचा था. इसके बाद ये मामला पहले केरल हाई कोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट पहुँचा. सुप्रीम कोर्ट ने बच्चे के हक़ में फ़ैसला सुनाया.

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा,'' हमने प्रतिवादियों के सबूतों का अध्ययन किया है. हमारा विचार है कि दामोदरन और चिरुथाकुट्टी साथ रहे हैं. ऐसे में प्रतिवादी ये साबित करने में असफल रहे हैं कि दोनों में शादी नहीं हुई है. ''

सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के उस फ़ैसले को बरकरार रखा, जिसने पैतृक संपत्ति में बँटवारा करने और इसका उचित हिस्सा इस जोड़े से पैदा बच्चे को देने को कहा था.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कथित अवैध संतान ने जो दस्तावेज इसके सामने पेश किए गए हैं, वे दोनों पक्षों में विवाद पैदा होने से पहले के हैं. इस मामले में दूसरा पक्ष इस कथित अवैध संतान के भाई के बच्चे थे.

सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा, ''ये दस्तावेज और इनके साथ एक गवाह के साक्ष्य बताते हैं कि दामोदरन और चिरुथाकुट्टी लंबे समय तक पति और पत्नी की तरह रहे हैं. पहला वादी 1963 में सेना में भर्ती हुआ था और वह 1979 में रिटायर हो गया. इसके बाद उसने निर्धारित संपत्ति में बँटवारे के लिए मुक़दमा किया'' .

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क्या था मामला?

इस मामले में याचिकाकर्ता, कट्टुकंडी इडाथी कृष्णन और दूसरे लोग वादी थे जबकि कट्टुकंडी इडाथी करुणाकरन प्रतिवादी. इनकी मौत मुक़दमे के लंबित रहने के दौरान ही हो गई थी. लिहाजा उनके क़ानूनी वारिसों को केस में प्रतिवादियों के तौर पर रिकार्ड पर लाया गया.

वादियों का कहना था जिस संपत्ति के लिए मुक़दमा चल रहा था वह कट्टूकंडी इडाथिल कनरन वैद्यर की थी. उनके चार बेटे थे- दामोदरन, अच्युतन, शेखरन और नारायणन.

पहला वादी दामोदरन का बेटा है, जो चिरुथाकुट्टी के गठबंधन से पैदा हुआ था. दूसरा वादी पहले वादी का बेटा है. इन वादियों ने मुक़दमे में फँसी संपत्ति का आधा हिस्सा मांगा था.

केरल हाई कोर्ट ने कहा था कि वादियों को साझा ज़मीन में हिस्सा नहीं मिलेगा क्योंकि दामोदरन और चिरुथाकुट्टी की शादी वैध नहीं थी. हाई कोर्ट ने इस फ़ैसले को मामले पर दोबारा विचार करने के लिए वापस ट्रायल कोर्ट में भेज दिया था. लेकिन याचिका दायर करने वालों ने सुप्रीम कोर्ट में इसे चुनौती दी थी.

क़ानूनविदों ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले पर टिपप्णी करते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट के पूर्व जस्टिस सखा राम सिंह ने इसे एक अच्छा फ़ैसला बताया. उन्होंने बीबीसी से कहा,'' निश्चित तौर पर इस फ़ैसले ने बच्चे के हक़ को बरकरार रखा है.''

उन्होंने कहा, '' लंबे समय तक बगैर शादी के साथ रह रहे जोड़े के अवैध बच्चे को परिवार की संपत्ति में हक़ दिया गया है. यह अच्छा फ़ैसला है. ''

जस्टिस सिंह ने कहा कि इससे पहले भी सुप्रीम कोर्ट ने इस तरह का फ़ैसला सुनाया था कि कथित अवैध बच्चे को क़ानून के तहत पैतृक संपत्ति में हक़ मिलना चाहिए.

उन्होंने कहा, ''मेरे विचार से यह फ़ैसला बिल्कुल सही है, भले ही यह स्थापित न होता हो कि पर्सनल लॉ ( उदाहरण के लिए हिंदू मैरिज एक्ट 1956) के मुताबिक़ वैध शादी से जुड़े समारोह शादी समारोह नहीं हुए हैं. ऐसे में लंबे समय तक साथ रह रहे पुरुष और महिला से पैदा बच्चा संपत्ति में हिस्से का हक़दार है.''

इलाहाबाद हाई कोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस गोविंद माथुर ने कहा कि यह अच्छा फ़ैसला है. हालांकि ये कोई नया फ़ैसला नहीं है लेकिन यह अच्छा फ़ैसला है क्योंकि ये लंबे समय तक बगैर शादी के साथ रहे जोड़े से पैदा बच्चे में विश्वास को स्थापित करता है.

उन्होंने बीबीसी से कहा, ''इस तरह के कथित अवैध बच्चों की विरासत के अधिकार हिंदू मैरिट एक्ट 1955 के तहत संचालित होते हैं, जो ये कहता है कि ऐसे बच्चे अपने माता-पिता की संपत्ति में हिस्सेदार होंगे. ''

हालांकि उन्होंने ये भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने कुछ पहलुओं को स्पष्ट नहीं किया है. जैसे क्या चिरुथाकुट्टी की पहली शादी सही है या नहीं, इस पर कुछ नहीं कहा गया है. साथ ही उसने उनकी दूसरी शादी पर भी कुछ नहीं कहा है.

कामिनी जायसवाल

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क्या होगा फैसले का असर?

पटना हाई कोर्ट की रिटायर्ड जज और सुप्रीम कोर्ट की सीनियर वकील अंजना प्रकाश ने बीबीसी से कहा कि हिंदू उत्तराधिकार क़ानून में कथित अवैध बच्चों को संपत्ति का अधिकार देने का प्रावधान है. इसमें उनके इन क़ानूनी अधिकारों को मान्यता दी गई है.

उन्होंने कहा, ''हिंदू उत्तराधिकार क़ानून ऐसे बच्चों के बारे में कहता है कि उन्हें क़ानूनी तौर पर संपत्ति और दूसरे अधिकार दिए जाएं. शादी के बाहर पैदा बच्चों को भी पारिवारिक संपत्ति में अधिकार मिलेगा. यह इस देश क़ानून है''

आपराधिक मामलों की देश की जानी-मानी वकील कामिनी जायसवाल ने कहा कि निश्चित तौर पर सुप्रीम कोर्ट ने एक अच्छा फ़ैसला दिया. उन्होंने बीबीसी से कहा, ''हालांकि ये कोई नया फ़ैसला नहीं है. पहले से ही उन्हें ये अधिकार था. शादी के बाहर पैदा बच्चे को पैतृक या पारिवारिक संपत्ति में हिस्सा लेने का अधिकार है.

उन्होंने सवाल किया कि शादी के बाहर पैदा बच्चे को नुक़सान क्यों हो? बच्चे के मां-बाप ने उसे बगैर शादी के इस दुनिया में लाने का फ़ैसला किया है. इसमें बच्चे की कोई ग़लती नहीं है. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसमें अच्छा फ़ैसला दिया है. इससे इस दुनिया में ऐसे बच्चों को उनका वाजिब हक़ मिलेगा. ''

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