सुप्रीम कोर्ट ने दिया संपत्ति में हक़, क्या मिलेगा इससे बेटियों को?

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पैतृक संपत्ति में हिंदू महिलाओं को अधिकार देने वाले क़ानून पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले से क्या बदला है?
ये एक ऐसा सवाल है जिससे ज़्यादातर महिलाएं जूझ रही हैं. क्योंकि भारत में महिलाओं को पिता की संपत्ति में अधिकार की माँग करने के लिए क़ानून से पहले एक लंबी सामाजिक जंग को जीतना पड़ता है.
महिलाएं जब सामाजिक रिश्तों को ताक पर रखकर अपने पिता की संपत्ति में हिस्सेदारी की माँग करती भी थीं तो हिंदू उत्तराधिकार संशोधन क़ानून 2005 कई महिलाओं के सामने अड़चन पैदा किया करता था.
वजह ये थी कि क़ानून पास होने के बाद कई स्तर पर ये सवाल खड़ा हुआ कि क्या ये क़ानून रेट्रोस्पेक्टिवली यानि बीते हुए समय से लागू होगा?
यानी क्या इस क़ानून के तहत वो महिलाएं भी पैतृक संपत्ति की माँग कर सकती हैं जिनके पिता क़ानून संशोधन के वक़्त ज़िंदा नहीं थे.
इस वजह से बीते 15 सालों में महिलाओं की एक बड़ी संख्या पैतृक संपत्ति में अपना अधिकार माँगने से वंचित रह गई.
कई महिलाएं कोर्ट तक पहुंची लेकिन उन्हें निराशा हाथ लगी. वहीं, दन्नमा बनाम अमर मामले में कोर्ट ने महिलाओं के हक़ में फैसला दिया.
ऐसे में अब तक इस क़ानून को लेकर एक भ्रम की स्थिति बनी हुई थी जो कि सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ के फ़ैसले के बाद ख़त्म होती दिख रही है.

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कोर्ट ने क्या कहा है?
जस्टिस अरुण मिश्रा की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा है कि एक हिंदू महिला को पैतृक संपत्ति में संयुक्त उत्तराधिकारी होने का अधिकार जन्म से मिलता है.
कोर्ट ने ये भी कहा कि इस अधिकार पर ये शर्त लागू नहीं होती है कि साल 2005 में हिंदू उत्तराधिकार क़ानून में संशोधन के वक़्त अधिकार माँगने वाली महिला के पिता जीवित थे या नहीं.
ये फ़ैसला संयुक्त हिंदू परिवारों के साथ साथ बौद्ध, सिख, जैन, आर्य समाज और ब्रह्म समाज समुदाय पर लागू होगा.
इस फ़ैसले के तहत वे महिलाएं भी अपने पिता की संपत्ति में उत्तराधिकार की माँग कर सकती हैं जिनके पिता का 9 सितंबर 2005 से पहले निधन हो चुका हो
अब तक क्या होता था?
साल 2005 में हिंदू उत्तराधिकार क़ानून में संशोधन करके ये व्यवस्था की गई थी कि महिलाओं को पिता की संपत्ति में बराबर का अधिकार मिलना चाहिए.
लेकिन जब महिलाओं की ओर से अधिकारों की माँग की गई तो ये मामले कोर्ट पहुंचे.
और कोर्ट पहुंचकर भी महिलाओं के हक़ में फ़ैसले नहीं हुए.
हाई कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट ने इस मसले पर फैसले दिए और इन फ़ैसलों में काफ़ी विरोधाभास देखा गया.

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साल 2015 में प्रकाश बनाम फूलवती केस में दो जजों की एक बेंच ने स्पष्ट रूप से कहा कि अगर पिता की मौत हिंदू उत्तराधिकार संशोधन क़ानून के 9 सितंबर, 2005 को पास होने से पहले हो गई है तो बेटी को पिता की संपत्ति में कोई अधिकार नहीं मिलेगा.
लेकिन इसके बाद साल 2018 में दन्नमा बनाम अमर मामले में दो जजों की एक अन्य बेंच ने अपने फैसले में कहा कि भले ही पिता की मौत क़ानून लागू होने के बाद हुई हो तब भी बेटी को पिता की संपत्ति में बराबर का अधिकार मिलना चाहिए.
इस मामले में संपत्ति के मालिक की मौत 2001 में हो गई थी.
इसके बाद जस्टिस एके सीकरी के नेतृत्व वाली बेंच ने इन विरोधाभासी फैसलों को देखते हुए फ़ैसला किया कि एक तीन सदस्यीय बेंच इस पर अपना फ़ैसला दे.
और अब जस्टिस अरुण मिश्रा, जस्टिस अब्दुल नज़ीर और जस्टिस एमआर शाह ने इस मसले पर ये फ़ैसला सुनाकर महिलाओं के सामने खड़े उस सवाल को हल कर दिया है कि उन्हें पिता की संपत्ति या देयताओं में कितनी हिस्सेदारी हासिल है.
कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि अब महिलाओं को वही हिस्सेदारी हासिल होगी जितनी उसे उस स्थिति में होती अगर वह एक लड़के के रूप में जन्म लेती. यानी लड़के और लड़की को पिता की संपत्ति में बराबर का उत्तराधिकार मिलेगा चाहें उसके पिता की मौत कभी भी हुई हो.
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