'रक्षा बंधन पर निर्भर नहीं है भाई-बहन का सच्चा रिश्ता'

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- Author, नताशा बधवार
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
मेरे दो भाई हैं. बड़े भइया को मैं भाई बुलाती हूं. हमारा रिश्ता जटिल भी है और दिलचस्प भी- एक अच्छे उपन्यास की तरह.
मेरा छोटा भाई मनु, जितना विनोदी है, उतना ही गंभीर. हम दोनों संक्षिप्त कहानियों के किसी संकलन की तरह हैं.
दोनों भाई मेरे जीवन का हिस्सा हैं, कहानी हैं. कुछ ही दिन पहले रक्षा बंधन था. यह मौक़ा हर साल हमें याद दिलाता है कि हमारा आपस में कितना ख़ास रिश्ता है.
जब हम छोटे थे, तो मुझे हमेशा लगता था कि राखी की परंपरा मुझे, मेरे भाइयों से अलग करती है. मेरे दिमाग़ में उन दिनों की यादें किसी फ़िल्म की तरह चल रही हैं. हम तीनों आपस में कुश्ती करते थे, खेलते थे, साइकलिंग करते थे.
इनके अलावा गानों के धुनों की रिकॉर्डिंग, टीवी प्रतियोगिताओं के लिए स्लोगन लिखना, क्विज़ नोट बुक में आंकड़े लिखना, एक दूसरे को डराने के लिए भूत की कहानियां सुनाना भी होता था. कभी कभी हम लोग एक दूसरे को चिढ़ाने के लिए जम्हाई लेने और पादने को लेकर चुटकुले भी सुनाते थे.
भाई हमलोगों का लीडर था. वह थोड़ा थोड़ा साइंटिस्ट भी था. उसे क्विज़ खेलने और सामान्य ज्ञान की किताबों से बेहद प्रेम था. वह अपने जादू वाले शो, साइंस प्रोजेक्ट, अब्दुल क़ादिर की गेंदबाज़ी की नकल और मदर डेयरी बूथ तक आने जाने के दौरान शेक्सपीयर के नाटकों को सुनाकर, हमारा मनोरंजन भी करता था और जानकारी भी देता था.
मनु हमेशा असीम ऊर्जा से भरा रहता था. गर्मी की दोपहर में वह अपने नीले स्केटबोर्ड से घर के अनगिनत चक्कर लगा लेता था. उसने डीडीए फ्लैट की छत पर मुझे फुटबॉल और हॉकी खेलना सिखाया, ताकि उसे किसी का साथ मिल सके. हालांकि जब मेरी कोहनी टूट गई थी तो फिजियोथेरेपी के लिए वह मेरे साथ बैडमिंटन खेलता था. वह बहुत अच्छा खेलता था और मेरा धीमा खेल उसे पसंद नहीं था लेकिन मेरी तकलीफ़ को देखते हुए, वह यह करता रहा.

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परंपरा का हम पर असर
रक्षाबंधन की सुबह हमलोग अचानक से भाई और बहन बन जाते थे. मुझे हमेशा लगता था कि राखी की परंपरा मुझे, मेरे भाइयों से अलग करती है. लड़का एवं लड़की. परिवार, संस्कृति और समाज अचानक से हमारे रिश्ते में आ धमकते. हमें बताया गया था कि बहनें भाइयों को राखी इसलिए बांधती हैं क्योंकि वे उनकी रक्षा करते हैं. बहनों को कमज़ोर, असहाय और सुरक्षा के लिए भाइयों पर निर्भर बताया जाता था.
जबकि भाइयों को मज़बूत और योद्धा के तौर पर पेश किया जाता था. उनकी भूमिका बहनों की लाज बचाने की होती थी. इस नैरेटिव से भाइयों की उदारता और बहनों की उनके प्रति कृतज्ञता को बल मिलता है. हर साल रक्षा बंधन पर हमें यह याद दिलाया जाता था कि भाई बलशाली हैं और बहनें कमजोर.
जब हम एडल्ट हुए तो इसको लेकर मेरा उत्साह जाता रहा. मुझे अपने भाइयों के साथ ख़ूबसूरत और स्वत: स्फूर्त रिश्ते के लिए रक्षाबंधन की कोई ज़रूरत नहीं थी.
जब मनु की स्कूल की पढ़ाई पूरी हुई, तो वह इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ाई करने के लिए जमशेदपुर गया. वह इंजीनियर नहीं बनना चाहता था. लेकिन उसे कोई विकल्प नहीं दिया गया. मेरे माता-पिता ने एक बेटे को डॉक्टर और एक इंजीनियर बनाना तय कर रखा था. भाई दिल्ली के मेडिकल कॉलेज में डॉक्टरी की पढ़ाई कर रहे थे.

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जब भाई था मुश्किल में
दो महीने बाद, मनु जब कॉलेज से पहली बार घर लौटा था, उसके होंठ सुजे हुए थे, उसके चेहरे पर थप्पड़ों के निशान थे, यह सब कॉलेज के रूटीन रैगिंग के चलते हुआ था. वह खुद को एक आक्रामक, हिंसक और जातिगत दबंगता वाले वातावरण में फंसा हुआ पा रहा था. वह काफ़ी डरा हुआ था.
वह वापस जाना नहीं चाहता था. लेकिन उसके पास कोई विकल्प नहीं था. उसे यह सब कुछ झेलना ही था. उसे कहा गया कि तुम्हें कमजोर नहीं होना है, चीज़ें जल्दी ही बेहतर हो जाएंगी.
जब अगली बार वह कॉलेज से आया तो मैं देर रात तक उसके पास बैठ कर, भयावह अनुभव सुनती रही. वह महिलाओं के यौन उत्पीड़न, जातिगत रानजीति और छात्र हिंसा से जुड़ी कहानियां बता रहा था. मैं जितना बेहतर कर सकती थी, उसी रूप में मैंने उसे दिलासा देने की कोशिश की.
उसी साल जब वह तीसरी बार कॉलेज से घर लौटा तो मनु वापस नहीं जाने के लिए अड़ा हुआ था. कॉलेज कैंपस में जातिगत समूहों के बीच हिंसा के चलते कॉलेज प्रशासन ने कॉलेज को बंद कर दिया था और छात्रावास में रहने वालों को घर भेजा था.
मैंने उसे समझाते हुए कहा था, "ये शुरुआती समस्याएं हैं, तुम अपनी जगह बनाने का रास्ता निकाल लोगे." दरअसल, हम दोनों ही पिताजी की प्रतिक्रिया से डरे हुए थे.
मनु ने तब कहा था, "आपको कुछ मालूम नहीं हैं, वहां जिस तरह से लड़के लड़कियों के बारे में बातें करते हैं, बाज़ार और सिनेमाघरों में जिस तरह से उन्हें छेड़ते हैं, मैं उस जगह पर पढ़ना तो दूर रह नहीं सकता. मैं पागल हो जाऊंगा."
यह हमदोनों के बीच रक्षाबंधन का पल था. मैं जान गई थी कि मुझे अपने भाई का पक्ष लेना होगा. उसे सुरक्षा के लिए मेरी ज़रूरत थी. बहन के तौर पर मुझे उसकी मदद करनी थी ताकि वह अपनी सुरक्षा कर सके.
हमलोगों ने माता-पिता से बात की. हमने उन्हें शांतिपूर्ण ढंग से सारी बातें बतायीं. मनु ने वाद किया कि वह आईआईटी या फिर दिल्ली कॉलेज ऑफ़ इंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षा पास करने के लिए ज़्यादा मेहनत करेगा. माता-पिता ने हमारी बात सुनी और मान गए.

मनु दोबारा उस इंजीनियरिंग कॉलेज में नहीं गया. 18 साल की छोटी उम्र में, बेहद कम समय में मनु ने जीवक की कठोरता के बारे में काफ़ी कुछ सीख लिया था.
कुछ साल बाद, मैं मुंबई के केंप्स कॉर्नर स्थित होटल के कमरे में थी, तब मेरी लैंडलाइन वाले फ़ोन की घंटी बजी थी. तब मैं वीडियो जर्नलिस्ट के तौर पर काम कर रही थी और काम के सिलसिले में यात्राएं भी करती थी. भाई तब न्यूयार्क में स्पेशलिस्ट डॉक्टर बन चुके थे और मेडिकल कॉलेज में आगे की पढ़ाई कर रहे थे. उन्होंने अमेरिका से मुंबई फ़ोन किया था.
वह अपने जीवन में बेहद ख़ास से मिल चुके थे और उसके प्यार की गिरफ़्त में थे. वह उसको अपने परिवार के बारे में बताना चाहते थे. उन्होंने कहा, "क्या तुम हम लोगों के बारे में उसे लिखोगी? मैं कहां से हूं, वह यह जानना चाहती है."
जिनसे मैं अब तक मिली नहीं थी, भाई उनको पत्र लिखने के लिए कह रहे थे. वह अपनी प्रेम कहानी में मुझे एक भूमिका निभाने को कह रह थे. वह दिन भी हम दोनों के लिए रक्षाबंधन का दिन था.
आपस में जोड़ने वाली परंपराओं का मैं सम्मान करती हूं. ऐसी परंपराएं बताती हैं कि इतने अंतर के बाद भी हम कैसे एकसमान हैं? लेकिन मैं उन परंपराओं का सम्मान नहीं करती जो हम पर भूमिका और विकल्पों को थोपता है, जो स्पष्ट तौर पर झूठ लगता है और हमारी जीवन की वास्तविकताओं से मेल नहीं खाता है.

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भाई की रक्षा का भाव
अपने भाइयों के साथ मेरा जीवन का सबसे पवित्र रिश्ता है. हम हमेशा एक दूसरे के लिए मौजूद होंगे. चाहे ऑनलाइन स्टोर ने समय से भाई को राखी भेजी है या नहीं, चाहे मैं मनु के ऑफ़िस की लॉबी में पहुंचकर उसे राखी बांधूं या नहीं बांधूं.
जब भी हम वक़्त निकाल कर एक दूसरे को कॉल करते हैं, हमारे लिए वह मौक़ा रक्षाबंधन होता है. हर बार हम एक-दूसरे के बच्चों को देखते हैं और उन्हें कस कर गले लगाते हैं क्योंकि वे हमें, हमारे बचपन की याद दिलाते हैं, वह मौक़ा राखी है. हर बार हम एक-दूसरे के लिए तोहफे़ ख़रीदने की जहमत नहीं उठाते क्योंकि हमें प्यार ही चाहिए, पैसे से ख़रीदी चीज़ें नहीं.
सभी बहनें अपने भाइयों के प्रति असाधारण रूप से रक्षा करने का भाव लिए रहती हैं. हमें एक ऐसा त्योहार चाहिए जो इस भावना का भी सम्मान करे. जब मैं लाल कुमकुम पाउडर में लिपटे चावल के तीन दाने उठाती हूं और उस तिलक को अपने भाई के माथे पर लगाती हूं, तो मेरे दिमाग़ में यह विचार आता है, "जाओ भाई, अपने आप का सबसे अच्छा रूप बनो, मैं यहां तुम्हारी रक्षा करने के लिए मौजूद हूं, तुम्हें संभालने के लिए मौजूद हूं."
(नताशा बधवार 'माय डॉटर्स मॉम' और 'इमॉर्टल फ़ॉर ए मूमेंट' की लेखिका हैं. वह फ़िल्म मेकर, टीचर और तीन बेटियों की माँ हैं.)
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