'हम अपनी मां को कितने अच्छे से जानते हैं?'

इमेज स्रोत, Praveenkumar Palanichamy
- Author, नताशा बधवार
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
अक्सर मुझे लगता है कि मेरी मां, सुधा, जो सबकी बातें और ज़रूरतें समझती हैं, वो अपनी निजी बातों को हमें ठीक से समझा नहीं पाती हैं. शायद असल सच यह है कि हम मां को ठीक से समझने की कोशिश नहीं करते.
मेरी मां मेरे दोस्तों में बहुत पॉपुलर हैं. मेरे दोस्त उनसे बातें करना पसंद करते हैं और जब भी वे मुझसे मिलने आते हैं, वे मेरी मां से मिलने की कोशिश विशेष रूप से करते हैं. वे एकसाथ हंसते हैं और एक-दूसरे की सराहना करते हैं और कभी-कभी मेरा मज़ाक भी उड़ाते हैं.
जो मेरी मां से पहली बार मिलते हैं वो भी कहते हैं कि मैं कितनी लकी हूँ कि मुझे ऐसी मां मिली हैं.
निश्चित तौर पर इससे मुझे खुशी मिलती है लेकिन यह मेरे लिए थोड़ा सरप्राइज़ जैसा भी होता है. उनकी बेटी होने के चलते, मैं सहजता से भूल जाती हूं कि उनका व्यक्तित्व कितना ख़ास है. जब भी मां के बारे में दूसरे लोगों से सुनती हूं तब-तब मैं उन्हें नए तरह से देखती हूं.
हाल ही में, मेरी दोस्त संध्या ने उनसे मिलने के बाद कहा, "अब मैं देख सकती हूं कि तुम कहां से आयी हो. मैं तुम्हारे माता-पिता को जानना चाहती थी." मुझे हमेशा याद भी नहीं रहता है कि सुधा और मेरा आपसी रिश्ता कितना स्पष्ट और मज़बूत है. मैं जानती तो हूं लेकिन मैं इसे भूल भी जाती हूं.

इमेज स्रोत, Umesh Negi
मां का व्यक्तित्व
मेरी मां चार साल की उम्र में शरणार्थी बन गई थीं. उनका जन्म लाहौर में हुआ था और वे अपने माता-पिता की छठी संतान थीं. जब मेरी नानी लाहौर से अपने परिवार के साथ भारत के पंजाब की ओर चली थीं, तब आठ महीने की गर्भवती थीं. मेरी मौसी का जन्म सितंबर, 1947 में हुआ था.
अनिश्चितता के दौर में मेरी मां बड़ी हो रही थीं, उन्होंने अपने बचपन के कई साल दूसरे रिश्तेदारों के यहां रहकर गुज़ारे क्योंकि मेरे नाना-नानी कई शहरों में बसे और उजड़े. मेरे नाना कारोबार जमाने के साथ-साथ नया घर बनाने की कोशिश कर रहे थे ताकि उनका परिवार फिर से सुरक्षित हो.
मेरी मां काफी खुले दिमाग़ की हैं और वह लोगों पर भरोसा करना जानती हैं. वह बिना किसी झिझक के अपने जीवन की कहानी किसी को भी सुना सकती हैं.
एकदम अजनबी लोगों से भी उनकी सहजता से कई बार पापा और हम लोग हैरत में पड़ जाते हैं, हमें लगता है कि सबसे दोस्ताना व्यवहार के चलते वे किसी मुसीबत में ना पड़ जाएं. लेकिन मेरी मां स्थितियों और समस्याओं का हल तलाशना जानती हैं. वह समुदाय का निर्माण कर लेती हैं.
जब हम लोग भिलाई और रांची जैसे छोटे शहर में फुरसत में होते थे तो मेरी मां कई कहानियां सुनाती थीं. युवावस्था में माएं अपनी छोटी बेटियों से सुख-दुख बांटती हैं. उनकी सुनाई एक कहानी हमेशा के लिए मेरे मन में गहरे तक उतर चुकी है.
उन्होंने बताया था कि शादी और विदाई के बाद जब वह अपना घर छोड़कर, मेरे पिता के घर और परिवार में रहने आ रही थीं तो उनके भतीजे और भतीजी कितना रोए थे. यह उनके प्रति प्यार को भी दर्शाता है. मेरी मां को दोनों परिवारों से प्यार और सम्मान मिला.
जब मैं बड़ी हो रही थी तो मेरी मां हमेशा मुझे सलाह दिया करती थीं, 'सबकी सुनो, अपनी करो.'
जब मैं टीनएज में थी, तब इस सलाह का मुझ पर कोई असर नहीं था. यह कोई परंपरागत या फिर बोल्ड सलाह नहीं थी. यह एक तरह से निष्क्रिय सलाह जैसी थी. मैं लोगों को उनके शब्दों के लिए ज़िम्मेदार ठहराते हुए जवाब देना चाहती थी. मैं चाहती थी कि लोग कहें कि गुस्सा होना भी ठीक है.
जब मैं वयस्क हुई तो मैंने दूसरे लोगों से अपने ग़ुस्से को सुरक्षित रूप में ज़ाहिर करना सीखा. सुधा के लिए यह पर्याप्त था कि उन्होंने अपनी बेटी को वह करने की अनुमति दी है, जो वह करना चाहती है. वह कहा करती थीं कि ज़्यादा पंख मत फड़फड़ाओ, दूसरों के साथ बहस मत करो. अपना रास्ता चुनो और उस पर आगे बढ़ो.

इमेज स्रोत, shylendrahoode
इतने सालों में क्या बदला
इतने सालों में मेरी मां क्या बन गई? टीनएज के सालों में, मैं जब गुस्सा होती थी, तो कंफ्यूज़ और अपनी मां से दूर दिखाई देती थी. हमारे बीच एक दूरी महसूस होती थी.
जब मैं 20 साल से अधिक उम्र की हुई तो मुझे अपने व्यवहार में दोष दिखाई देने लगा था. मुझे अपनी मां की उपेक्षा पर चिंता होने लगी थी. मैं उनसे क्या चाहती थी, इसको लेकर मैं निश्चित नहीं हूं लेकिन मैं इतना जानती हूं कि मैं कोई आज्ञाकारी, आदर्श बेटी नहीं थी.
शायद सुधा भी इसी तरह चिंतित थी. अब जब मैं खुद को दुनिया के सामने आत्मविश्वासी, स्पष्टतावादी और सुलझे हुए व्यक्तित्व के तौर पर पेश करती हूं तो मुझे लगता है यह सब मेरी मां पर कहीं बेहतर ढंग से फिट बैठता है.
सालों तक एक-दूसरे को ठीक ढंग से नहीं समझ पाने के बाद भी हम लोग देख रहे हैं कि एक-दूसरे पर हमारा कितना असर है. ऐसा लगता है कि हम दोनों एक-दूसरे के दर्पण हैं, जहां एक-दूसरे को देख सकते हैं.
मैं और मेरे भाई, अमूमन देखते हैं कि मेरी मां उन दिनों की कमी को पूरा करने की कोशिश करती है जब उनके पास हमारी ज़रूरतों को पूरा करने के संसाधन नहीं थे.
जब हम लोग अपने मां-पिता के घर जाते हैं, तो हम लोग अपने गैजेट्स और फिल्मों या फिर पसंदीदा टीवी शो की बातों में रम जाते हैं. लेकिन मेरी मां की चिंता होती है कि हम लोग, यानी मैं, मेरे पति और बच्चे क्या खाएंगे?
70 साल की उम्र में भी वह सबका ख्याल रखती हैं. जब हम लोग मिलते हैं तब उनमें कहीं ज़्यादा ऊर्जा देखने को मिलती है. जब हम लोग वहां से लौट आते हैं, तब उन्हें मौका मिलता है कि वह खुद का ख्याल कर सकें.
मेरी मां किसी से भी राजनीति पर बहस नहीं करतीं. व्यवहार में वह सहज रूप से उदार और समतावादी है. सालों से उन्होंने अपने ख़र्चों को नियंत्रण में रखा है, उन्हें यह भी मालूम है कि बचत का इस्तेमाल कैसे करना है. वह स्थानीय दर्ज़ी, सब्ज़ीवाले, बिजली मिस्त्री, पलंबर, घर पर आने वाले ब्यूटीशियन और उसके पोते-पोतियों को ज़रूरत पड़ने पर आर्थिक मदद देती हैं, वह भी लंबे समय तक के लिए बिना किसी ब्याज के.
हम लोग अपनी मां को कंजूस होने के लिए जज करते थे, वह आज हमारी पहचान में सबसे उदार शख़्स हैं. पैसों को लेकर वह बेहद स्मार्ट हैं, हमारे पूरे परिवार की तुलना में वह अकेले कहीं ज़्यादा स्मार्ट हैं. उन्होंने ना केवल मेरे कामकाजी वेंचर के लिए फंड दिया है बल्कि कई और उपयुक्त लोगों के आइडिया में उन्होंने निवेश किया है.

इमेज स्रोत, Umesh Negi
मेरी फेवरिट मां
मेरी सबसे छोटी बेटी ने पूछा, "आप किनके बारे में लिख रही हैं?"
मैंने कहा, "अपनी मां के बारे में."
"क्या वह आपके लिए दुनिया की सबसे फेवरिट शख्स हैं?"
मैंने कहा, "हां, लेकिन मेरी मां ये नहीं जानती हैं." मेरी सोच में इसको लेकर अफ़सोस का भाव भी उमड़ आया.
मेरी बेटी ने फिर से कहा, "आपके लिए पूरी दुनिया में सबसे-सबसे ज़्यादा फेवरिट कौन है?"
"नसीम है." मैंने उसका नाम लेते हुए कहा. मैंने अपने सिर से उसके सिर को सटाया, वह मुस्कुराते हुए बोली, "और, नसीम यह जानती है."
जब मैं छोटी थी, तब शायद ही सुधा और मैंने एक-दूसरे को गले लगाया होगा. लेकिन अब जब मैं, उनसे मिलती हूं, मैं उन्हें गले लगाना और उनके मुलायम गालों को छूना नहीं भूलती. यह मेरा उनसे बात करने का तरीक़ा है. मैं चाहती हूँ कि मेरी सब अनकही बातें माँ सुन ले और अपने दिल में ढाल ले. मैं आपको प्यार करती हूं मां और मुझे गढ़ने के लिए बहुत शुक्रिया.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)















