ब्लॉग: 'मुझसे ग़लती हो गयी, लड़की की मां से मुझे ये नहीं पूछना चाहिए था'

इमेज स्रोत, RAVI PRAKASH/BBC
- Author, रवि प्रकाश
- पदनाम, जहानाबाद से, बीबीसी हिंदी के लिए
पहले कभी ऐसा नहीं हुआ. कभी नहीं लगा कि किसी रिपोर्ट के लिए ग्राउंड वर्क करते वक्त मुझसे कुछ ग़लती हो गयी हो.
कई रिपोर्ट्स लिखी हैं. सैकड़ों गांवों-शहरों में गया हूं. हज़ारों लोगों से बातचीत की है. लाशों के बीच भी इंटरव्यू किए हैं. ऐसे मौके भी आए हैं, जब जिससे बात की, उसकी कुछ देर बाद मौत हो गई. लेकिन, पहली दफ़ा इतना अफ़सोस हुआ है और जब लगा कि मुझसे ग़लती हो गयी है. मेरा तरीका ग़लत था. मुझे यह नहीं करना था. नहीं पूछना था. आदि-आदि...
वह तारीख थी तीन मई. दोपहर करीब एक बजे. मैं एक 'मां' से मुखातिब था.

इमेज स्रोत, RAVI PRAKASH/BBC
मुझसे बड़ी ग़लती हो गई
मैंने महसूस किया कि मुझसे बड़ी ग़लती हो गयी है. मेरी एक हरकत (नादानी) के बाद वह मुझे घर से बाहर कर चुकी थीं. मैं शर्मिंदा था. मुझे अफ़सोस था. इसका नहीं कि मेरा एक एक्सक्लूसिव होते-होते रह गया, बल्कि इसका कि मेरे व्यवहार से वो असहज हुईं. मैं क्योंकि पुरुष हूं, पिता हूं. ईश्वर ने मुझे मां बनने की ताक़त नहीं दी. लिहाज़ा, मैं मां की पीड़ा का सिर्फ़ अंदाज़ा लगा सकता हूं. उसे महसूस नहीं कर सकता.
तब मैं उस लड़की के घर में था, जिनके कपड़े फाड़ने का वीडियो देश भर के करोड़ों मोबाइल और सोशल साइट्स से गुजर चुका था.
उस फ़ुटेज के जरिए लोग 'चीख' और 'चिल्लाहट' के साथ उस बहादुर लड़की के 'संघर्ष' से भी वाकिफ़ हो चुके थे. दर्जन भर लड़कों से घिरी लड़की ने कभी हार नहीं मानी. संघर्ष किया. अंत-अंत तक अपनी इज़्ज़त और वज़ूद बचाने की लड़ाई लड़ी. अंततः वह इसमें सफल भी हुईं. उनकी इतनी उम्र भी नहीं कि भारतीय संविधान उसे वोटिंग का अधिकार दे सके. फिर भी उन्होंने मैच्योरिटी दिखायी.

इमेज स्रोत, RAVI PRAKASH/BBC
कोई केस ब्लाइंड नहीं होता
उस हादसे को भयावह सपना समझ कर भूलने की कोशिश की. लेकिन, उस छेड़खानी के फ़ुटेज वायरल हो चुके थे. फिर फ़ुटेज में दिख रही बाइक के रजिस्ट्रेशन नंबर, लोगों की बोली और बिजली के पोल के नंबर ने यह मामला उजागर कर दिया.
बिहार पुलिस भी प्रो-एक्टिव हुई और फिर कुछ ही घंटे में अभियुक्तों की गिरफ़्तारी के बाद पीड़िता का पता लगा लिया गया.
पुलिस उनके घर पहुंची तो उन्होंने धैर्य के साथ सारी बातें बतायी. इस कारण आज सभी अभियुक्त जेल में हैं. इस बहाने देश में बड़ा मैसेज गया है कि कोई केस 'ब्लाइंड' नहीं होता. उसकी आंखें होती हैं, बशर्ते पुलिस में उन आंखों से अपनी आंखें मिलाने का माद्दा हो. खैर.
काफी कोशिशों के बाद मैं उनके घर के अंदर पहुंच सका था.

इमेज स्रोत, RAVI PRAKASH/BBC
वो जानती थीं कि हर मोबाइल में कैमरा होता है
उनकी मां से बातचीत होने लगी. कुछ बातें उन्होंने खुद बतायीं. कुछ सवाल मैंने किए. कुछ मिनटों के बाद मुझे लगा कि वो सहज हैं. समझदार हैं. सो, इस बातचीत की रिकार्डिंग कर लेनी चाहिए.
मैंने अपना मोबाइल निकालकर उनसे चल रही बातचीत आगे बढ़ानी चाही. लेकिन, मोबाइल का वीडियो बटन चालू होते हीं वे चुप हो गयीं. उनका किताबी अक्षरों से कोई परिचय नहीं है, लेकिन वे जानती थीं कि हर मोबाइल में कैमरा होता है. और हर पॉकेट में घूमने वाले ये कैमरे घातक साबित हो सकते हैं. वे यह पीड़ा झेल चुकी थीं.
हम दोनों गोबर से लिपे गए कच्चे फर्श पर बैठे थे.
उन्होंने अपनी एक उंगली से दूसरे को दबाया. सिर नीचे किया. पीछे मुड़ीं. फिर सामने देखा. चुप रहीं. मैंने कहा- बोलिए न. नहीं बोलेंगी तो कैसे जानेंगे लोग. इंसाफ़ कैसे मिलेगा. वे तब भी चुप रहीं.

इमेज स्रोत, RAVI PRAKASH/BBC
दरवाज़ा पहले की तरह बंद हो गया
कुछ मिनटों बाद मगही में बोलीं, "पता होता कि आप वीडियो बनाएंगे या मेरी आवाज़ रिकॉर्ड करेंगे, तो गेट ही नहीं खोलते. अब निकलिए यहां से. जल्दी निकलिए. वो गुस्से मे थीं. उनके होठ थरथराने लगे."
हमलोग बाहर निकले और दरवाज़ा पहले की तरह दोबारा बंद हो गया.
इससे पहले उन्होंने कहा था कि वो नहीं चाहतीं कि कोई उनकी बेटी की पहचान जान सके. मुझे अपनी बेटी को पढ़ाना-लिखाना है. बड़ा अफसर बनाना है. बन जाएगी, तो किसी को पुरानी बातें याद नहीं रहेंगी.
इसलिए हमारे चेहरे मत दिखाइए. मैंने कहा, हमलोग चेहरा नहीं दिखाते हैं. उसको धूमिल (हेजी) कर देंगे. निश्चिंत रहिए. लेकिन, मां के सपने को मेरी हरकत से चुनौती मिल गयी थी शायद. वो नहीं मानीं.

इमेज स्रोत, RAVI PRAKASH/BBC
जब मुझे पता चला मदर्स डे है
उन्होंने कहा था कि उन्हें किसी की मदद की जरूरत नहीं. अकेली रहना चाहती हैं. उन्हें उस दिन का इंतजार है, जब उनकी बेटी फिर से स्कूल जाएगी. उन्हें इंतजार है रिजल्ट का. उस बहादुर लड़की ने इस साल मैट्रिक (दसवीं) की परीक्षा दी है. अभी इसका परिणाम आना बाकी है.
मैं तबतक उस मां की पीड़ा और अपनी नादानी दोनों से वाकिफ़ हो चुका था.
जब यह ब्लॉग लिखने बैठा. तभी मोबाइल में एसएमएस की घंटी बजी. दरअसल, वह एक विज्ञापन था. लिखा था कि मदर्स डे पर अपनी मां को गिफ़्ट कीजिए. वह भारत की एक नामी डिजाइनर के आउटलेट का पुश एसएमएस था. गूगल किया, तो पता चला कि 13 मई को मदर्स डे है.

इमेज स्रोत, RAVI PRAKASH/BBC
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता
बहरहाल, मुझे इस ग्लानि से निकलने में कुछ वक्त लगेगा. लेकिन, कहना चाहूँगा कि हम जिस देश में रहते हैं वहां 'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता' की बात होती है. हमें अपने समाज में देवताओं को रखना है, तो नारी की पूजा करनी ही होगी.
बहरहाल, मां तुझे सलाम. क्योंकि, तुम हो तो हिम्मत है. हौसला है. ज़िंदगी है. सपने हैं. हो सके तो मुझे माफ़ कर देना.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)













