उत्तराखंड के जागेश्वर में देवदार के सैकड़ों पेड़ों पर क्यों मंडरा रहा है ख़तरा

इमेज स्रोत, ROHIT JOSHI
- Author, रोहित जोशी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए, नैनीताल से
उत्तराखंड में देवदार के शांत जंगल के बीच बसे जागेश्वर में स्थानीय लोग पिछले हफ़्ते उस वक़्त आशंकाओं से घिर गए जब कुछ सरकारी कर्मचारियों ने सड़क किनारे जंगल के 888 पेड़ों पर कट लगाकर उन पर क्रमवार संख्याएं लिखनी शुरू कीं.
यह कवायद अल्मोड़ा ज़िले में राष्ट्रीय राजमार्ग 309-बी से जागेश्वर धाम की ओर जाने वाली सड़क को चौड़ा करने के लिए की जा रही है.
इस मुद्दे पर स्थानीय लोगों और पर्यावरण-प्रेमियों के बीच आक्रोश देखा जा रहा है. हालांकि, स्थानीय प्रशासन का कहना है कि अब तक इस बारे में कुछ भी कहना संभव नहीं है.
लेकिन स्थानीय निवासियों के बीच इसे लेकर चिंताएं और आशंकाएं बनी हुई हैं.
स्थानीय निवासी विपिन भट्ट कहते हैं, ''यह हमारा सुबह-शाम का रास्ता है. हम इसके एक-एक पेड़ को पहचानते हैं. उन्हें नाम लेकर पुकारते हैं. एक ही जड़ से निकले पांच वृक्षों को हम पंच-पांडव कहते हैं. ऐसे ही कुछ अर्धनारिश्वर रूप में हैं, कुछ को गणेश बुलाते हैं और कुछ को सप्तर्षि. हम मानते हैं कि ये ऋषि आज भी यहां वृक्षों के रूप में तप कर रहे हैं. हम इन तपस्वियों को सड़क चौड़ीकरण के नाम पर नहीं कटने देंगे.''
पर्यटन व्यवसाय से जुड़े जागेश्वर के भुवन चंद्र पेड़ काटे जाने का विरोध करते हुए कहते हैं, ''देवदार के एक पेड़ को बड़ा होने में बहुत समय लग जाता है. मैंने खुद कई पेड़ लगाए हैं.10 साल पहले जो पेड़ मैंने लगाए थे वे अभी तक चार से पांच फ़ीट के भी नहीं हो पाए हैं. ऐसे में आठ सौ से ज़्यादा वयस्क पेड़ों को काट देना, जिनमें ऐसे भी पेड़ हैं जिनकी ऊँचाई 80 से 100 फ़ीट तक है, बिल्कुल ठीक नहीं है. सरकार को दूसरे विकल्पों के बारे में सोचना चाहिए.''
कहां हैं ये देवदार के पेड़?
जागेश्वर धाम देवदार के जंगल के बीचों-बीच 124 छोटे-बड़े मंदिरों का समूह है जिनका निर्माण कत्यूरी और चंद राजवंशों के दौर में 7वीं से लेकर 18वीं शताब्दी ईसवी के बीच हुआ है.
इसका मुख्य मंदिर जागेश्वर महादेव (ज्योतिर्लिंग जागेश्वर) है जिसे देशभर में फैले, हिंदू देवता शिव के 64 ज्योतिर्लिंगों में से एक माना जाता है.
जागेश्वर से 3 किलोमीटर की दूरी पर आरतोला से तक़रीबन 4 मीटर चौड़ी एक सड़क राष्ट्रीय राजमार्ग से कटती हुई देवदार के इस घने और शांत जंगल में दाख़िल होती है.
धार्मिक और प्रकृति प्रेमी पर्यटकों के लिए इस ख़ूबसूरत सड़क से जागेश्वर मंदिर तक पहुंचने का अनुभव जागेश्वर धाम की यात्रा का एक ख़ास आकर्षण है.

इमेज स्रोत, ROHIT JOSHI
इसी सड़क को वाहनों के आसान परिवहन के लिए 12 मीटर चौड़ा करने की योजना है. सड़क किनारे चिह्नित किए गए 888 पेड़ इसी दायरे में हैं जिनमें से तक़रीबन 80 प्रतिशत से अधिक पेड़ देवदार के हैं और कुछ दूसरी प्रजाति के पेड़ हैं.
देवदार के इन पेड़ों को चिह्नित किए जाने की ख़बर पर सोशल मीडिया में भी कई प्रतिक्रियाएं देखने को मिली हैं.
कई पर्यावरण प्रेमियों और पत्रकारों ने अपने सोशल मीडिया हैंडल्स से उत्तराखंड की पुष्कर धामी सरकार की इस पहल के लिए आलोचना की है.
पेड़ काटने के पक्ष में कौन है?

इमेज स्रोत, ROHIT JOSHI
हालांकि, कुछ स्थानीय निवासी और व्यवसायी सड़क चौड़ीकरण की इस परियोजना को जागेश्वर क़स्बे के लिए बेहद महत्वपूर्ण मान रहे हैं.
जागेश्वर मंदिर के पास ही पूजन सामग्री बेचने वाले पूरन भट्ट मानते हैं कि रोड चौड़ी होना बेहद ज़रूरी है
वह कहते हैं, ''इन दिनों तो ये सड़क सुनसान लगती है लेकिन मार्च-अप्रैल के बाद टूरिस्ट सीज़न शुरू होता है तो यहां पर्यटकों और गाड़ियों की भीड़ बढ़ जाती है. लोग यहां-वहां गाड़ियां पार्क करते हैं और लंबा जाम लग जाता है. बहुत दिक्कत का सामना करना पड़ता है.''
पास ही एक दूसरी दुकान चलाने वाले बाला दत्त भी यही बात दोहराते हैं.

वह कहते हैं, ''अगर विकास होगा तो कुछ तो क़ीमत चुकानी होगी. कुछ पेड़ भी कटेंगे और कुछ ज़मीन भी.''
उत्तराखंड में पर्यटन का बड़ा हिस्सा धार्मिक पर्यटन है. मशहूर चार धामों के गढ़वाल क्षेत्र में होने के चलते अब तक ज़्यादातर धार्मिक पर्यटक गढ़वाल क्षेत्र में ही आते रहे हैं. इसे कुमाऊँ के साथ बैलेंस करने के लिए धामी सरकार ने एक महत्वाकांक्षी 'मानसखंड कॉरिडोर' परियोजना तैयार की है.
इस परियोजना के तहत स्कंद पुराण के मानसखंड में जिन मंदिरों का ज़िक्र है उन्हें चौड़ी सड़कों के साथ जोड़ा जाएगा और दूसरे इन्फ़्रास्ट्रक्चर को भी बेहतर किया जाएगा. जागेश्वर इस मानसखंड कॉरिडोर का सबसे प्रमुख मंदिर है और इस सड़क को चौड़ा करना इसी महत्वाकांक्षी परियोजना का हिस्सा है.
क्या कहती है सरकार?

इमेज स्रोत, ROHIT JOSHI
अल्मोड़ा ज़िले के ज़िलाधिकारी विनीत तोमर ने बीबीसी को बताया, ''चिह्नित किए गए पेड़ों को काटा जाना है या नहीं, इस विषय में अभी कुछ कहना संभव नहीं है. लेकिन मानसखंड कॉरिडोर के तहत पिछले साल शासन स्तर से यह निर्णय लिया गया था कि पहले फ़ेज़ में उन सड़कों के बारे में सर्वे कराया जाए जो कि मानसखंड कॉरिडोर को जोड़ती हैं. ''
वो कहते हैं, ''उन्हें कैसे बेहतर बनाया जाए और उनका चौड़ीकरण किया जाए. उसी क्रम में ये सर्वे किया गया था और पेड़ों की गणना की गई है कि कितने पेड़ किस प्रजाति के इस दायरे में आएंगे. यह डेटा अभी हमारे पास नहीं आ पाया है. जब ये डेटा आ जाएगा उसके बाद ही कुछ कहा जा सकता है. अगर पेड़ों की संख्या ज़्यादा हुई तो इस पर पुनर्विचार भी किया जा सकता है.''
ज़िलाधिकारी कहते हैं कि यह पहले फ़ेज़ का सर्वे है, जबकि अभी सारी निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन किया जाना बाकी है और उसके अनुसार मंजूरियां लेनी होती हैं.
मानसखंड कोरिडोर परियोजना के इसी सिलसिले में जागेश्वर क़स्बे के लिए एक मास्टर प्लान भी बनाया जा रहा है. स्थानीय लोगों में इस मास्टर प्लान को लेकर भी काफ़ी आशंकाएं हैं.
पिछले साल अक्टूबर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जागेश्वर धाम का दौरा किया था. मंदिर परिसर में ही धामी सरकार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए जागेश्वर का मास्टर प्लान डिस्प्ले किया था.

जागेश्वर मंदिर प्रबंधन समिति में मंदिर के पुजारियों के प्रतिनिधि नवीन चंद्र भट्ट कहते हैं, ''मास्टर प्लान डिस्प्ले तो किया गया था. केवल मोदी जी को दिखाया गया लेकिन स्थानीय लोगों को नहीं दिखाया गया है. ना पुजारी वर्ग को उसके बारे में बताया गया है, ना मंदिर समिति को कुछ बताया गया है, ना ही स्थानीय लोगों को. इसलिए लोग डरे हुए हैं कि उनकी कितनी ज़मीनें, भवन, दुकानें या दूसरे व्यावसायिक प्रतिष्ठान उसकी चपेट में आएंगे. हम कहां रहेंगे? कहां हमारा व्यापार जाएगा? क्या भविष्य होगा? लोगों को विश्वास में लेने के लिए उनके साथ कोई मीटिंग नहीं की गई है.''
इसी तरह की चिंता स्थानीय व्यापार संघ के अध्यक्ष मुकेश चंद्र की भी है.
वे कहते हैं, ''हमने सुना है कि सड़क का चौड़ीकरण होना है. धर्मशालाएं बननी हैं. एक झील बननी है. आरती के घाट बनने हैं. लेकिन इस सबके लिए पुराने मकानों, दुकानों, होटलों, इन सबको हटाया जाना है. हम लोग तब से यहां है जब यहां कुछ नहीं था. मास्टर प्लान की बात तो अब की जा रही है जब पर्यटन यहां बढ़ने लगा है. ऐसे में हमारे साथ मास्टर प्लान को लेकर कोई बात नहीं की जा रही है. हमें कुछ भी नहीं पता कि हमारा आगे क्या होगा.''
हालांकि, ज़िलाधिकारी विनीत तोमर का कहना है कि मास्टर प्लान को लेकर किसी को भी घबराने की ज़रूरत नहीं है और लोगों को जो भी जानकारी चाहिए प्रशासन उन्हें उपलब्ध कराएगा.
वे बताते हैं, ''ये मास्टर प्लान तीन फ़ेज़ में डेवलप किया जाना है. अभी पहले फ़ेज़ का शुरुआती काम चल रहा है और बाक़ी फ़ेज़ अंडर डेवलप्ड हैं. तो उसमें जब भी ऐसा कुछ होगा कि जो लोग वहां रहते हैं उनकी कोई एक्टिविटी प्रभावित होती है तो उन्हें विश्वास में लेकर ही आगे बढ़ा जाएगा.''
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)















