चारधाम सड़क परियोजना में पर्यावरण चिंताओं के बीच क्यों हुई चीन की चर्चा

चारधाम परियोजना

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    • Author, कमलेश
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

चारधाम परियोजना में सड़क की चौड़ाई को लेकर लंबे समय से बहस छिड़ी हुई है. फिलहाल ये मामला सुप्रीम कोर्ट में है और सुनवाई के बाद कोर्ट ने अपना फ़ैसला सुरक्षित रख लिया है. लेकिन, सुनवाई के दौरान परियोजना को लेकर देश की रक्षा ज़रूरतों और पर्यावरण संबंधी चिंताओं के बीच एक बहस पैदा हो गई.

ये मुद्दा ऐसे समय में उठ रहा है जब संयुक्त राष्ट्र का जलवायु परिवर्तन सम्मेलन चल रहा है और जलवायु संकट से निपटने की कोशिशें जारी हैं. भारत ने भी जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए भी अपनी कुछ प्रतिबद्धताएं ज़ाहिर की हैं.

पर्यावरण और विकास इन दोनों के बीच टकराव हमेशा से देखने को मिला है. विकास संबंधी ज़रूरतों के लिए सरकारों के अपने तर्क होते हैं और पर्यावरणविद धरती के बढ़ते तापमान और आपदाओं को लेकर चिंता जताते हैं.

ऐसी ही स्थिति चारधाम परियोजना को लेकर बनी हुई है. चारधाम परियोजना के तहत सड़क के चौड़ीकरण का मसला लंबे समय से विवाद में बना हुआ है.

फिलहाल इस मामले पर केंद्र सरकार और पर्यावरण पर काम करने वाले एनजीओ 'सिटिजंस ऑफ़ ग्रीन दून' आमने-सामने हैं और सुप्रीम कोर्ट को इस पर फैसला लेना है.

चारधाम परियोजना

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इस पूरे विवाद को जानने से पहले ये जानते हैं कि चारधाम परियोजना क्या है-

• चारधाम परियोजना उत्तराखंड के चार प्रमुख तीर्थों यमुनोत्री, गंगोत्री, बद्रीनाथ और केदारनाथ को सड़क मार्ग से जोड़ेगी. 12 हज़ार करोड़ की इस परियोजना के तहत सड़क के चौड़ीकरण का काम किया जाना है.

• पहले इसका नाम ऑल वेदर रोड प्रोजेक्ट था जिसे बदलकर चारधाम परियोजना कर दिया गया.

• इसकी शुरुआत साल 2016 में सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने की थी. इसके तहत दो सुरंगें, 15 पुल, 25 बड़े पुल, 18 यात्री सेवा केंद्र और 13 बायपास आदि बनाए जाने हैं.

• इसी के तहत पीएम नरेंद्र मोदी ने देहरादून के परेड ग्राउंड में दिसंबर 2016 में चारधाम महामार्ग परियोजना की नींव रखी थी.

• 899 किलोमीटर के इस हाइवे प्रोजेक्ट से पूरे उत्तराखंड में सड़कों का जाल विकसित होगा.

• चीन के साथ बढ़ते तनाव के बीच यह सामरिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण परियोजना है.

• इस परियोजना के तहत कुल 53 परियोजनाओं पर काम होना है.

सड़क निर्माण

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क्या है विवाद

साल 2018 में एक गैर सरकारी संस्था ने सड़क चौड़ीकरण की इस परियोजना को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी.

एनजीओ का कहना था कि सड़क चौड़ीकरण के लिए जो पेड़ काटे जाएंगे, पहाड़ों में विस्फोट होगा और मलबा फेंका जाएगा उससे हिमालय की पारिस्थितिकी को नुक़सान पहुंचेगा. इससे भूस्खलन, बाढ़ का ख़तरा बढ़ जाएगा और वन्य व जलीय जीवों को नुक़सान पहुंचेगा.

परियोजना के पर्यावरण पर संभावित प्रभावों की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट ने अगस्त 2018 में पर्यावरणविद रवि चोपड़ा के नेतृत्व में एक उच्चाधिकार प्राप्त समिति (हाई पावर कमिटी- एचपीसी) का गठन किया था.

एचपीसी ने जुलाई 2020 में जांच के बाद दो रिपोर्ट सौंपी थीं. समिति के सदस्यों के बीच सड़क की चौड़ाई को लेकर सहमति ना बन पाने के कारण दो रिपोर्ट दी गई थीं. सितंबर 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने कम सदस्यों वाली रिपोर्ट में दी गई सिफारिशों को लागू करते हुए सड़क 5.5 मीटर चौड़ी करने की अनुमति दी थी. इस रिपोर्ट के सदस्यों में रवि चोपड़ा भी शामिल थे.

ये सिफारिश पर्वतीय राजमार्गों के लिए सड़क, परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के मार्च 2018 के दिशानिर्देशों के आधार पर थी. हालांकि, दिसंबर 2020 में मंत्रालय ने इन दिशानिर्देशों में बदलाव कर दिया.

जबकि 21 सदस्यों वाली रिपोर्ट में 12 मीटर चौड़ाई के पक्ष में राय दी गई थी. सरकार की परियोजना में दो लेन वाले इस हाईवे पर 10 मीटर चौड़ाई की बात की गई है.

लेकिन, पर्यावरणविदों का कहना है कि सड़क जितनी चौड़ी होगी उसके लिए उतने ही पेड़ काटने, रास्ते खोदने, पहाड़ों में ब्लास्ट करने और मलबा फेंकने की ज़रूरत होगी.

पहाड़

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क्या कहती है एचपीसी रिपोर्ट

एचपीसी की रिपोर्ट के मुताबिक समिति के सदस्यों में केवल इस बात को लेकर विभाजन था कि सड़क कितनी चौड़ी की जानी चाहिए.

लेकिन, दोनों ही समूह इस बात पर सहमत थे कि परियोजना ने पहले ही अवैज्ञानिक और अनियोजित होने के कारण हिमालय की परिस्थितियों को नुक़सान पहुंचाया है.

रिपोर्ट के कुछ अंश-

  • पर्याप्त विश्लेषण के बिना कई जगहों पर लंबवत कटौती देखी गई है जिससे सड़क खिसकने का ख़तरा बढ़ सकता है.
  • साल 2020 के पहले चार महीनों में किनारे से सड़क खिसकने की 11 घटनाएं हुई हैं. लगभग हर हफ़्ते एक घटना.
  • निर्माणकार्य में उठने वाली धूल को नीचे बैठाने के लिए पानी छिड़कने के बहुत कम प्रयास. उच्च हिमालयी इलाक़ों में ट्रैफ़िक के कारण बढ़ने वाले प्रदूषण की कोई निगरानी नहीं हो रही है.
  • कई परियोजनाओं में निर्माणकार्य से निकले कचरे के निपटान के लिए जगह और क्षमताओं की कमी है. सड़क खिसकने से निकले मलबे के सुरक्षित निपटान के लिए प्रावधान नहीं किए गए हैं.
  • मलबे को ग़लत निपटान के कारण वो नदियों में चला जाता है जिससे नदियां रुक जाती हैं.
  • एचपीसी ने ये भी कहा है कि लगभग 900 किमी. की चारधाम परियोजना को 100 किमी. की 53 छोटी-छोटी परियोजनाओं में बांटा गया है ताकि पर्यावरण प्रभाव आकलन की ज़रूरत ना पड़े. 100 किमी. से बड़ी परियोजनाओं के लिए ही पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव का आकलन करना ज़रूरी होता है.
हिमालय

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सितंबर 2020 के सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के दायरे में वो परियोजनाएं नहीं आतीं जिनका काम पहले से ही शुरू हो चुका है. शेष परियोजनाओं पर ही 5.5 मीटर की सड़क का नियम लागू होना था.

अब केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से अपने 5.5 मीटर की चौड़ाई वाले फ़ैसले को बदलने की अपील की है और सड़क 10 मीटर चौड़ी करने की अनुमति मांगी है.

सिटिजंस फॉर ग्रीन दून एनजीओ ने इस अपील का विरोध किया है. उनका कहना है कि हिमालय क्षेत्र संवेदनशील है इसलिए सड़क की चौड़ाई की सीमा को नहीं बढ़ाया जाना चाहिए.

न्ययाधीश सूर्यकांत, डीवाई चंद्रचूड़ और विक्रम नाथ इस मामले की सुनवाई कर रहे हैं.

पहाड़

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पर्यावरण को लेकर दलीलें

एडवोकेट कॉलिन गोंज़ालविज़ ने कोर्ट से कहा कि भारत-चीन सीमा पर मौजूद मुख्य सड़कों से जुड़ने वालीं सहायक सड़कों के चौड़ीकरण को केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बताया है. लेकिन, ये केवल धोखा है और सेना ने ऐसी किसी ज़रूरत के बारे में नहीं बताया है. सेना ने सड़क, परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के 2018 के निर्देशों के मुताबिक सड़क की मांग की थी जो 5.5 मीटर है.

उन्होंने कहा कि ये इसलिए हो रहा है क्योंकि चारधाम यात्रा को केंद्र सरकार की प्रमुख परियोजना घोषित किया गया है. हाईवे इसलिए चौड़ा करना चाहते हैं ताकि एसयूवी हिमालय की पहाड़ियों पर तेज़ी से ऊपर-नीचे दौड़ सकें. पहले तीर्थयात्री पैदल यात्रा करते थे. बाद में जो सड़कें चौड़ी की गईं उसमें कार और ट्रक जा सकते हैं. लेकिन, अब ये चाहते हैं कि शहरों में तेज़ गाड़ी चलाने का अहसास हो और आप चारधाम पर हैलिकॉप्टर ले जा सकें.

कॉलिन गोंज़ालविज़ ने कहा कि आप जितनी चाहें उतनी चौड़ी सड़कें बना सकते हैं लेकिन असल मुद्दा ये है कि क्या हिमालय इस स्थिति में हैं कि उन्हें सहन कर सकें या वो इससे टूट जाएंगे? ये सब बहुत बड़े नुक़सान की कीमत पर होगा.

हिमालय

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चीन की चुनौती और सेना की ज़रूरतें

केंद्र सरकार के मुताबिक ये परियोजना सिर्फ़ यात्रियों की सुविधा और आवाजाही की सुगमता के लिए महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि चीन से मिल रही चुनौती को देखते हुए रणनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है.

2 दिसंबर, 2020 को रक्षा मंत्रालय ने राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए चौड़ी सड़कों की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि तीन राष्ट्रीय राजमार्ग- ऋषिकेश से माना, ऋषिकेश से गंगोत्री और टनकपुर से पिथौरागढ़- चीन के साथ उत्तरी सीमा तक जाते हैं और सहायक (फीडर) सड़कों की तरह काम करते हैं.

केंद्र सरकार के पक्ष को रखते हुए अटॉरनी जनरल के के वेणुगोपाल ने कहा कि रणनीतिक और सामरिक दृष्टि के मद्देनजर सड़कों का चौड़ीकरण ज़रूरी है ताकि सहयक सड़कों को सीमा पर बनी सड़कों के लिए इस्तेमाल किया जा सके. अदालत पांच मीटर की तय सीमा को बढ़ाकर 10 मीटर करे.

अटॉर्नी जनरल ने कहा, "युद्ध की स्थिति में सेना को 42 फ़ीट लंबी ब्रह्मोस मिसाइल तक ले जानी पड़ेगी. उसके लिए बड़ी जगह की ज़रूरत होगी. अगर भूस्खलन होता है तो सेना उससे निपट लेगी. अगर सड़कें ही चौड़ी नहीं होंगी तो हम कैसे जाएंगे?"

उन्होंने इस बात पर ज़ोर देते हुए कहा कि हमें देश की रक्षा करनी है और भूस्खलन, बर्फबारी या कुछ भी होने के बावजूद हमें सड़कें वास्तविक नियंत्रण सीमा तक ले जानी होंगी. "हम ख़तरे में हैं और हम जो कर सकते हैं हमें करना होगा."

सुप्रीम कोर्ट

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सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा

सुप्रीम कोर्ट ने भी रक्षा ज़रूरतों के नज़रिए से इस मामले में टिप्पणियां कीं और सवाल पूछे.

न्यायाधीश चंद्रचूड़ ने पूछा, "क्या हम इस तथ्य को नज़रअंदाज़ कर सकते हैं कि ये सड़कें सीमा से जुड़ने वालीं सहायक सड़के हैं? मान लीजिए आपको ऋषिकेश से मेरठ और फिर सीमा पर जाना हो. मुझे नहीं लगता कि इस बात में कोई संदेह है कि ये सीमा तक जाने वालीं रणनीतिक सहायक सड़कें हैं. हम निश्चित रूप से पर्यावरण के मसले से भी जूझ रहे हैं."

"वो छह या आठ लेन का हाईव नहीं बना रहे हैं, वो केवल दो लेन की सड़क बना रहे हैं. इससे गाड़ियों को आने-जाने में मदद मिलेगी वरना एक ही रास्ते पर अगर आमने-सामने से गाड़ियां आ रही हों तो ऊपर चढ़ रही गाड़ी को रुकना पड़ता है."

न्यायाधीश ने कहा, "आप सही हैं कि हिमालय के पहाड़ नाजुक हैं, यहां होने वाले किसी भी निर्माण कार्य में पूरी सावधानी बरतनी चाहिए. लेकिन, जिन चिंताओं को न्यायालय के सामने व्यक्त किया गया है क्या उन्हें पूरी तरह उपेक्षित किया जा सकता है."

न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़

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इस पर कॉलिन गोंज़ालविस ने कहा, "एचपीसी की रिपोर्ट में कहा गया है कि भले ही हम कितने ही बड़े और अच्छे इरादों से सभी तरह की या खास तरह की सड़कें लाना चाहते हैं लेकिन हिमालय इसे स्वीकार नहीं कर पाएगा. कोर्ट ने उन्हें 2018 के दिशानिर्देशों का पालन करने के लिए कहा था लेकिन वो इससे आगे बढ़ गए हैं और जो घटनाएं अभी हुई हैं ये उसका सबूत है."

इस पर न्यायधीश चंद्रचूड़ ने कहा, "लेकिन आपके पास एक विरोधी(चीन) है जिसने सीमा के दूसरी तरफ़ उस छोर तक बुनियादी ढांचा विकसित किया है?"

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा कि उनके अनुरोध में ये स्पष्ट नहीं है कि उन्हें वाकई कितनी चौड़ाई चाहिए.

केके वेणुगोपाल ने इससे सहमति जताते हुए कहा कि अनुरोध और स्पष्ट होना चाहिए था. हमें दो लेन वाली सड़क चाहिए.

शुक्रवार को सुनवाई पूरी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और 'सीटीजन फॉर ग्रीन दून' से दो दिनों में लिखित में सुझाव देने को कहा है और अपना फ़ैसला सुरक्षित रख लिया है.

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