केदारनाथ त्रासदी के 10 साल: वो ख़ौफ़नाक रात जब चारों तरफ़ छा गई थी तबाही
शरण्या ऋषिकेश
बीबीसी संवाददाता

16 जून, 2013 यानी ठीक 10 साल पहले उत्तराखंड में बादल फटने से आई विनाशकारी बाढ़ ने कई शहरों और गांवों को तबाह कर दिया.
इस बाढ़ में हज़ारों की संख्या में लोग बह गए जिनमें से कई लोगों के शव कभी मिले ही नहीं.
10 साल बाद, तबाही के केंद्र में रहे केदारनाथ की उस विभीषिका को याद करते हुए राम करण बेनिवाल बताते हैं कि किस तरह उस बाढ़ ने उनके परिवार को हमेशा के लिए तोड़ दिया.
पढ़ें, उन्होंने बीबीसी को इस घटना के बारे में क्या बताया...
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मैं अपनी पत्नी और पांच अन्य लोगों (मेरे दो भाई, उनकी पत्नियां और एक अन्य व्यक्ति) के साथ 9 जून 2013 को राजस्थान के अपने गृह नगर जोधपुर से केदारनाथ के लिए चला था.
मेरे बच्चे पढ़ाई और अन्य कामों में व्यस्त थे लिहाजा उन्होंने हमारे साथ नहीं आने का फ़ैसला किया था.
मेरी पत्नी छोटा देवी और मैं उस विभीषिका के दिन से पहले तक तीन मुख्य धाम बद्रीनाथ, यमुनोत्तरी और गंगोत्री जा चुके थे. तब केवल केदारनाथ ही जाना बचा था.
16 जून को हम केदारनाथ के पवित्र मंदिर पहुंचे. वहां पूजा, अर्चना करने के बाद हम नीचे की तरफ़ रामबाड़ा चल पड़े थे.
अभी हम रास्ते में ही थे कि बहुत तेज़ बारिश होने लगी. हम क़रीब शाम पांच बजे रामबाड़ा पहुंचे और रात वहीं गुज़ारने का फ़ैसला किया.
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इमेज स्रोत, Photo courtesy: Beniwal family
रात को हम अलकनंदा नदी के किनारे पर बैठकर राम नाम का जप कर रहे थे कि अचानक मुझे नदी और पास की चट्टानों से बहुत तेज़ आवाज़ सुनाई पड़ी.
नदी के साथ बहुत बड़े - बड़े पत्थर लुढ़कते हुए नीचे आ रहे थे और वो इतनी उग्र हो चुकी थी कि उसने अपनी चपेट में इंसानों को ले लिया था.
मेरी पत्नी और एक भाभी भी उसमें बह गईं. फिर नदी मेरे एक भाई को भी बहा ले गई.
मेरे बाकी रिश्तेदार भी कहीं नहीं दिख रहे थे.

मैं दौड़कर एक बड़े पत्थर के पास खड़ा हुआ ताकि उस भूस्खलन की वजह से नदी में ऊपर से आते पत्थरों की चपेट में आने से बच सकूं.
मैंने देखा कि जिन पहाड़ों पर पेड़ थे वो उतनी आसानी से नहीं दरक रहे थे जितने कि वो पहाड़ जिन पर कुछ नहीं था या केवल पत्थर मौजूद थे.
मैं तेज़ी से दौड़कर उन पेड़ों वाली एक पहाड़ी के एक पेड़ पर चढ़कर उसकी शाखा से लिपट गया.
मेरी आंखों के सामने कुछ ही दूरी पर पूरा का पूरा पहाड़ नदी में समा रहा था.

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ये देख कर मेरा दिमाग सुन्न पड़ गया. जो सब देखा वो मेरा दिमाग प्रोसेस ही नहीं कर पा रहा था.
वहां जम जाने वाली ठंड थी और मेरे कपड़े भी गीले हो चुके थे.
मेरे आसपास कुछ और लोग भी पेड़ों से चिपके हुए थे.
लेकिन कोई एक शब्द भी नहीं बोल रहा था.
सभी उदास और निराश थे. पेड़ पर चढ़ने के दौरान मेरा कंधा उखड़ गया था लेकिन किसी तरह मैंने उसे ठीक किया. आज भी मेरे कंधे में दर्द होता है.
वो प्राकृतिक आपदा थी जो भगवान की मर्ज़ी से हुई थी.
मैं उसे एक ट्रेन यात्रा की तरह याद करता हूं जहां सफ़र के दौरान सभी यात्री आपस में बातें करते हैं, पर अपना स्टेशन आने पर उतर जाते हैं.

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शायद केदारनाथ मेरी पत्नी का वो आख़िरी स्टेशन था.
अब मैं अपना समय ध्यानयोग और भगवान का नाम लेकर गुज़ारता हूं ताकि वो घटना मेरा ध्यान न खींचे.
अगर आप मुझसे पूछें कि क्या मैं दोबारा केदारनाथ जाउंगा तो मेरा जवाब स्पष्ट तौर पर ‘हां’ होगा.
डर में जीने का कोई मतलब नहीं है और अब मुझे कोई डर भी नहीं है. वास्तव में, मैं वहां अपने बच्चों को भी ले जाना चाहूंगा.
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केदारनाथ कहां है?
केदारनाथ उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग ज़िले में स्थित है जो समुद्रतल से 3,584 मीटर की ऊंचाई पर हिमालय के गढ़वाल क्षेत्र में पड़ता है.
केदारनाथ को हिन्दुओं के पवित्र चार धामों में से एक माना जाता है. हिंदू धार्मिक ग्रंथों में जिन बारह ज्योतिर्लिंगों का उल्लेख है, केदारनाथ उनमें सबसे ऊंचाई पर स्थित ज्योतिर्लिंग है.
केदारनाथ मंदिर के पास ही मंदाकिनी नदी बहती है. गर्मियों में यहां बड़ी संख्या में तीर्थ यात्री और पर्यटक आते हैं.
यह मंदिर क़रीब एक हज़ार साल पुराना बताया जाता है जिसे चतुर्भुजाकार आधार पर पत्थर की बड़ी बड़ी पट्टियों से बनाया गया है.
इसमें गर्भगृह की ओर ले जाती सीढ़ियों पर पाली भाषा के शिलालेख देखने को मिलते हैं.
यह मंदिर गर्मियों के दौरान क़रीब छह महीने के लिए ही खुला रहता है, सर्दियों में इसे बंद कर दिया जाता है.
सर्दियों में यहां भारी बर्फ़बारी होती है जिससे यह बर्फ़ की एक मोटी परत से ढक जाता है.
मान्यता है कि देश भर में अद्वैत वेदान्त के प्रति जागरूकता फ़ैलाने वाले हिंदुओं के प्रसिद्ध संत आदि शंकराचार्य ने चारों धामों की स्थापना के उपरांत 32 वर्ष की आयु में इसी स्थान पर समाधि ली थी.
उत्तराखंड में स्थित गंगोत्री, यमनोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ की यात्रा को चार धाम यात्रा के नाम से जाना जाता है.
हिंदुओं में धार्मिक तीर्थयात्रा के रूप में इसकी बहुत मान्यता है.
हिमालय की पश्चिम दिशा में उत्तरकाशी ज़िले में स्थित यमनोत्री चार धाम का पहला पड़ाव है.
चार धाम के दर्शन के लिए जाने वाले श्रद्धालु पहले यमनोत्री फिर गंगोत्री और फिर बद्रीनाथ और केदारनाथ जाते हैं.
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