उत्तराखंड त्रासदी: चाहकर भी रो नहीं पाता...

- Author, शालिनी जोशी
- पदनाम, बीबीसी हिन्दी डॉट कॉम के लिए, देहरादून
उत्तराखंड में जून में आए जल प्रलय ने हजारों जिंदगियां छीन ली, हजारों घरों को बरबाद कर दिया और पूरे पहाड़ में तबाही मचा दी.
इस तबाही का मंजर इतना भयावह था कि जिन्होंने इसे अपने सामने घटित होते देखा उनमें से कुछ को ऐसा सदमा लगा है कि वे अपनी याददाश्त और होश खो बैठे हैं.
<link type="page"><caption> तस्वीर पर टिकी उम्मीद</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/07/130717_uttarakhand_missing_helpless_va.shtml" platform="highweb"/></link>
उन्हें इतना गहरा धक्का लगा है और उनमें इतना डर आ गया है कि वे न कुछ बोल पाते हैं और न सुन ही पाते हैं बस इधर से उधर टकटकी लगाए शून्य में देखते रहते हैं.
18 साल के शुभम को देखकर पता नहीं लगता कि इसके दिल दिमाग में कैसा तूफान चल रहा होगा. लेकिन शुभम एक गहरे मानसिक दबाव से गुजर रहा है. गुप्तकाशी में आई प्रलंयकारी बाढ़, उससे हुए नुकसान और मौतों को देखने के बाद ये किशोर हिल गया है. न कुछ बोलता है न कुछ सुनता है.
उसकी दिमागी हालत ऐसी है कि वो मुश्किल से अपना नाम लिखकर बता सकता है. लिखने में कोई तारतम्य नहीं है और उसके लिखने के ढंग से अंदाजा लग सकता है कि उसके भीतर कितनी हलचल है.
<link type="page"><caption> बर्बादी की दास्तान</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/indepth/uttarakhand_flood_special_ml.shtml" platform="highweb"/></link>
सेना के हेलिकाप्टर से इसे बचाया गया और अब पर्वतीय बाल मंच नाम की एक संस्था की देखरेख में देहरादून के दून अस्पताल में भर्ती है, जहां उसका इलाज चल रहा है.
मोरी में तबाही

पर्वतीय बाल मंच के राकेश सिंह का कहना है कि शुभम के परिजन कौन हैं, कहां के हैं, कुछ पता नहीं चल पाया है. इसके लिए इश्तहार दे दिए गए हैं. ये भी पता नहीं कि शुभम पहाड़ का है या दूसरे राज्य से आए किसी तीर्थयात्री या सैलानी परिवार से बिछड़ा हुआ.
<link type="page"><caption> एक कस्बा जो टापू बन गया</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/07/130729_uttarakhand_flood_story_vr.shtml" platform="highweb"/></link>
इसी तरह की एक और दर्दनाक कहानी है दस साल के यशपाल की. उत्तरकाशी जिले में चीन की सीमा से लगे दूरस्थ गांव मोरी से आया ये लड़का दून अस्पताल के बिस्तर पर पड़ा है.
मोरी में भारी तबाही और खेत मकान के ज़मींदोज़ होने के दृश्यों ने इस मासूम को इतना विचलित किया कि उसे गहरा सदमा लग गया. उसके पिता सहदर सिंह से बेटे का ये सदमा देखा नहीं जाता. वह रोना चाहता है लेकिन रो नहीं पाता है. रोना जैसे उसके मन में जमा हो गया है.
मानसिक रोग

सहदर सिंह का कहना है कि उन्होंने आपदा प्रभावितों के तहत नाम लिखाकर इलाज कराने से बेहतर ये समझा कि किसी तरह बेटे की जान बचाई जाए. जान तो बच गई लेकिन इस हालत से वो कैसे बाहर निकलेगा कहना मुश्किल है
<link type="page"><caption> अंतिम संस्कार शुरू</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/07/130730_uttarakhand_last_rites_vt.shtml" platform="highweb"/></link>
मनोचिकित्सकों के लिए ऐसे मामलों से निपटना एक चुनौती की तरह है क्योंकि न तो इन्हें कोई मानसिक रोग है न ही कोई शारीरिक कमजोरी. ये एक कठिन हालत है और जाहिर है नाजुक दिलों पर ज्यादा असर करती है.
मनोवैज्ञानिक सरस्वती सिंह का कहना है कि ऐसे मामलो में अक्सर देखा गया है कि मरीज ठीक हो जाते हैं और वापस सामान्य जिंदगी में लौट आते हैं. लेकिन ये निर्भर करता है कि उनकी देखभाल और सेवा किस तरह की जा रही है और उनके बहलाव के लिए जरूरी चीजों का ख्याल रखा जा रहा है या नहीं.
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