एलपीजी संकट दूर करने के लिए केरोसीन बंटवाएगी सरकार, लेकिन डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क कहां है?

इमेज स्रोत, Getty Images
- Author, अरशद अफ़ज़ाल ख़ान
- पदनाम, बीबीसी हिन्दी के लिए
- पढ़ने का समय: 7 मिनट
भारत में तेल और गैस सप्लाई पर ईरान और इसराइल-अमेरिका के बीच युद्ध का असर अब किसी से छुपा नहीं है. सोशल मीडिया पर गैस की किल्लत से जूझते लोगों के वीडियो छाए हुए हैं.
केंद्र सरकार भी मान रही है कि एलपीजी की कमी है लेकिन साथ ही यह भी कह रही है कि यह किल्लत पैनिक बुकिंग या घबराहट में बुकिंग की वजह से है.
इसके साथ ही केंद्र सरकार का दावा है कि एलपीजी की कमी से निपटने के लिए वैकल्पिक इंतज़ाम भी किए हैं. सरकार के अनुसार खाना बनाने और रोशनी करने के लिए 48 हज़ार लीटर से ज़्यादा केरोसीन का इंतज़ाम किया गया है.
लेकिन सवाल यह है कि ये केरोसीन या मिट्टी का तेल लोगों तक पहुंचेगा कैसे? 2020 में केरोसीन का वितरण बंद होने के बाद इसका डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क ख़त्म हो चुका है.
बीबीसी हिन्दी को केरोसीन के डिस्ट्रीब्यूशन से जुड़े कुछ पुराने डीलर्स ने बताया कि अब उस नेटवर्क को खड़ा करना आसान नहीं है और यह सवाल भी पूछा कि इस अल्पकालिक व्यवस्था से कोई क्यों जुड़ना चाहेगा?
हालांकि सरकार ने कहा है कि 48,000 किलो लीटर अतिरिक्त केरोसीन का आवंटन किया गया है और राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से कहा गया है कि वे ज़िलों में एक या दो स्थान चिह्नित करें जहां इसका वितरण किया जा सके.
एक अधिसूचना में ये भी कहा गया है कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के तहत केरोसीन का वितरण किया जाएगा.
अभी क्या हालात हैं?

इमेज स्रोत, Arshad Afzaal Khan
लेकिन इस सारी कसरत के बावजूद एक बड़ा सवाल अब भी खड़ा है कि यह केरोसीन या मिट्टी का तेल लोगों के पास तक पहुंचेगा कैसे?
उत्तर प्रदेश केरोसीन ऑयल डीलर्स एसोसिएशन (जो अब निष्क्रिय है) के अध्यक्ष चंद्र शेखर सिंह कहते हैं, "खाना पकाने की गैस की कमी से निपटने के लिए सरकार मिट्टी का तेल आख़िर उपलब्ध कैसे कराएगी? पेट्रोलियम मंत्रालय के जो शीर्ष अधिकारी नीतियां तय करते हैं, क्या उनमें ज़रा-सी भी समझ नहीं है कि जिन मिट्टी तेल डीलरों की व्यवस्था को मंत्रालय ने छह साल पहले बिना किसी औपचारिक विदाई के खत्म कर दिया था, उसे अब दोबारा खड़ा करना लगभग नामुमकिन है."

इमेज स्रोत, Getty Images
बता दें कि मिट्टी के तेल का वितरण मंत्रालय और तेल कंपनियों की ओर से नियुक्त डीलरों की एक श्रृंखला के ज़रिए किया जाता था.
मिट्टी के तेल के वितरण के लिए डीलरों को कई तरह के लाइसेंस लेने पड़ते थे, जिनमें फ़ायर सेफ़्टी लाइसेंस, ज़िलाधिकारी से एनओसी, लेबर लाइसेंस और स्थानीय फ़ायर विभाग की एनओसी शामिल थी.
इन सभी लाइसेंसों और अनुमतियों के साथ-साथ डीलरों को मिट्टी का तेल ज़मीन के नीचे बने टैंकों में स्टोर करना होता था और उसे ऐसे डिस्पेंसिंग मशीनों के ज़रिए बेचना होता था, जिन्हें बाट-माप विभाग की ओर से सील किया जाता था.
साल 2020 में मिट्टी के तेल की सप्लाई बंद होने के बाद से बीते छह साल में,वे सभी एनओसी, लाइसेंस और अनुमतियां ख़त्म हो चुकी हैं, जिनके ज़रिये केरोसीन वितरण किया जाता था.
इसके अलावा, इन वक्फ़े में रख-रखाव के अभाव में ज़मीन के नीचे लगे टैंक और डिस्पेंसिंग मशीनें भी जर्जर हो चुकी हैं.
ऐसी स्थिति में कितने पूर्व डीलर इस मिट्टी के तेल के वितरण की इस व्यवस्था में शामिल होना चाहेंगे?
ज़मीनी हकीकत

इमेज स्रोत, Arshad Afzaal Khan
इस बारे में पूछने पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक पूर्व मिट्टी तेल डीलर भुवेश चंद्र कहते हैं, "सरकार ने बस अस्थायी तौर पर मिट्टी के तेल का आवंटन किया है. यह केवल दो-तीन महीनों के लिए एक अस्थायी इंतज़ाम है, सिर्फ़ तब तक, जब तक संकट बना रहेगा. ऐसी व्यवस्था में कोई क्यों शामिल होगा, जहां से कुछ हासिल ही नहीं होना."
बिहार के कटिहार ज़िले के मयंक गुप्ता भी पहले मिट्टी तेल के डीलर रहे हैं.
वह कहते हैं, "ज़मीन के नीचे बने टैंकों और डिस्पेंसिंग मशीनों की मरम्मत में ही लाखों रुपये लगेंगे. फिर तेल कंपनी से तेल उठाने में 10 से 12 लाख रुपये का खर्च आएगा, और मेरे पास इतना पैसा है ही नहीं."
वह आगे कहते हैं, "आपको कोई भी ऐसा पूर्व मिट्टी तेल डीलर नहीं मिलेगा, जो इस तरह के हवा-हवाई फ़ैसले में दिलचस्पी ले. ये फ़ैसले एयर-कंडीशंड दफ़्तरों में बैठने वाले ऐसे नौकरशाह करते हैं, जिन्हें ज़मीनी हक़ीक़त की कोई जानकारी नहीं होती."
सरकार की इस कवायद पर सवाल सिर्फ़ पूर्व डीलर या डिस्ट्रीब्यूटर ही नहीं उठा रहे हैं. उपभोक्ताओं को भी समझ नहीं आ रहा है कि अगर मिट्टी का तेल मिल गया तो फ़ायदा क्या होगा?
पुराने लखनऊ के निवासी लक्ष्मी नारायण पूछते हैं, "अब मिट्टी के तेल से चलने वाले चूल्हे और मिट्टी के तेल से जलने वाले लैम्प न तो बाज़ार में मिलते हैं और न ही घरों में बचे हैं. ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि लोग इस ईंधन का इस्तेमाल आखिर करेंगे कैसे?"
केरोसीन सप्लाई को लेकर सरकार के क्या दावे

इमेज स्रोत, @PIB_India
मध्यपूर्व के मौजूदा हालात पर शनिवार को भी विदेश मंत्रालय, पेट्रोलियम मंत्रालय और शिपिंग मिनिस्ट्री के अधिकारियों ने एक संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस की.
इसमें पेट्रोलियम मंत्रालय की संयुक्त सचिव सुजाता शर्मा ने कहा था, "एलपीजी सप्लाई के बारे में मेरा कहना है कि जियो पॉलिटिकल हालात को देखते हुए यह अब भी हमारे लिए चिंता का विषय है. लोग घबराहट में गैस बुक कर रहे हैं. कल 75 लाख बुकिंग हुई थी जो आज 88 लाख हो गई, यह कुछ और नहीं बल्कि पैनिक बुकिंग है."
इससे पहले शुक्रवार को प्रेस ब्रीफ़िंग में उन्होंने बताया था, "48,000 किलो लीटर अतिरिक्त केरोसीन का आवंटन किया गया है, जो नियमित आवंटन से अलग है. राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से कहा गया है कि वे ज़िलों में एक या दो स्थान चिह्नित करें जहां इसका वितरण किया जा सके."
पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने गुरुवार (12 मार्च, 2026) को ही एक अधिसूचना जारी की थी.
इसके तहत साल 2025–26 के दौरान सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के तहत 'सुपीरियर केरोसीन ऑयल' (एसकेओ) का अस्थाई आवंटन किया गया है. पूरे देश के लिए कुल 48,240 किलोलीटर मिट्टी का तेल आवंटित किया गया है.
अधिसूचना के अनुसार, "दुनिया भर में ऊर्जा आपूर्ति को प्रभावित कर रही मौजूदा भू-राजनीतिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए, इन आपात जोखिमों को कम करने के लिए राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को खाना पकाने और रोशनी के उद्देश्य से पीडीएस एसकेओ का अस्थायी आवंटन करने का निर्णय लिया गया है."
पत्र में यह भी बताया गया है कि यह पीडीएस मिट्टी का तेल सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत उचित मूल्य की दुकानों (फ़ेयर प्राइस शॉप्स) के ज़रिए किया जाएगा. वितरण का पैमाना और मानदंड संबंधित राज्य और केंद्र शासित प्रदेश तय करेंगे.
मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया है कि राज्य और केंद्र शासित प्रदेश यह सुनिश्चित करें कि आवंटन के 45 दिनों के भीतर पूरा वितरण हो जाए.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.















