ईरान के साथ अमेरिका और इसराइल की जंग में क्या पानी हथियार बन गया है

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- Author, निक एरिक्सन
- पदनाम, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस
- पढ़ने का समय: 9 मिनट
काल्पनिक फ़िल्मों और उपन्यासों में प्राकृतिक संसाधनों की कमी को लेकर जिस तरह से संघर्षों के दृश्य दिखाए जाते हैं, अब शायद वे हक़ीकत से बहुत दूर नहीं हैं. ख़ासकर जब अमेरिका और इसराइल की ईरान के साथ जंग तेज़ हो गई है.
अनुमान लगाया गया था कि यह जंग आंशिक तौर पर तेल के इर्द-गिर्द रहेगी. तेल इस क्षेत्र का ऐसा संसाधन है, जिसमें लंबे समय से पश्चिम का हस्तक्षेप रहा है.
लेकिन, जैसे-जैसे यह संघर्ष फैल रहा है और खाड़ी के पड़ोसी देश इसकी चपेट में आ रहे हैं, कुछ विश्लेषकों का कहना है कि एक और संवेदनशील संसाधन संभावित संकट का केंद्र बन गया है. वह है पानी.
खाड़ी क्षेत्र के पास दुनिया के रिन्यूएबल फ़्रेशवाटर (मीठा पानी) का सिर्फ़ 2 फ़ीसदी हिस्सा है और यह क्षेत्र बड़े पैमाने पर समुद्री पानी को मीठा बनाने की प्रक्रिया यानी डिसैलिनेशन पर निर्भर है.
विशेष रूप से 1950 के दशक से तेल उद्योग के विस्तार के कारण सीमित जल संसाधनों पर पड़ने वाले दबाव ने इस निर्भरता को और बढ़ाया है.
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फ़्रेंच इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंटरनेशनल रिलेशन्स के मुताबिक़, कुवैत का 90 फ़ीसदी पानी डिसैलिनेशन से आता है. ओमान में यह 86 फ़ीसदी, सऊदी अरब में 70 फ़ीसदी और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) में 42 फ़ीसदी है.
ओमान में सेंटर फ़ॉर एनवायरन्मेंट, फ़िशरीज़ एंड एक्वाकल्चर साइंस से जुड़े डॉक्टर विल ले क़ुएस्ने ने बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के न्यूज़डे कार्यक्रम में कहा, "2021 में खाड़ी क्षेत्र में डिसैलिनेशन प्लांट्स का कुल उत्पादन प्रतिदिन 2 करोड़ क्यूबिक मीटर से ज़्यादा था. यह हर दिन ओलंपिक के लगभग आठ हज़ार स्विमिंग पूल भरने के बराबर है."
वाटर इन्फ़्रास्ट्रचर को निशाना बनाना ईरान की रणनीति?

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खाड़ी क्षेत्र में खेती और खाद्य उत्पादन भी बड़े पैमाने पर डिसैलिनेशन किए गए पानी पर निर्भर है क्योंकि ग्राउंडवाटर पूरे क्षेत्र में काफ़ी हद तक समाप्त हो चुका है.
आम तौर पर सिंचाई के लिए ग्राउंडवाटर का ही इस्तेमाल किया जाता है.
पानी की इस निर्भरता के कारण वाटर इन्फ़्रास्ट्रक्चर एक रणनीतिक कमज़ोरी बन गया है, जिसका फ़ायदा अमेरिका और ईरान दोनों उठाने को तैयार दिख रहे हैं.
विश्लेषक ईरान की रणनीति को "हॉरिज़ोन्टल एस्केलेशन" बताते हैं, यानी सीधे अमेरिका और इसराइल से टकराने की बजाय संघर्ष का दायरा विभिन्न क्षेत्रों में बढ़ाना.
और वाटर इन्फ़्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाना ईरान की इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है. हालांकि इसे जवाबी कार्रवाई के रूप में पेश किया जा रहा है.
क़तर में नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर मार्क ओवेन जोन्स कहते हैं, "अगर खाड़ी देशों की सरकारों को लगता है कि वाटर इन्फ़्रास्ट्रक्चर निशाने पर हैं तो वे अमेरिका पर जंग ख़त्म करने के लिए दबाव डालने की ज़्यादा कोशिश करेंगी."
उनके मुताबिक़, ईरान के हमलों का मक़सद "डर का माहौल पैदा करना" भी है, जिससे कि नागरिकों के बीच यह दुविधा रहे कि वे वहां "रहें या चले जाएं."
किन देशों के वाटर इन्फ़्रास्ट्रचर पर हमले हुए?

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बहरीन ने ईरान पर सीधे तौर पर एक डिसैलिनेशन प्लांट पर हमला करने का आरोप लगाया है. वहीं ईरान का कहना है कि पहले अमेरिका के हमले में होर्मुज़ स्ट्रेट में क़ेश्म द्वीप पर स्थित एक वाटर प्लांट को नुक़सान पहुंचा था.
दुबई के जेबेल अली बंदरगाह पर ईरान के हमलों के बारे में माना जा रहा है कि यह हमले दुनिया के सबसे बड़े डिसैलिनेशन प्लांटों में से एक के काफ़ी क़रीब हुए.
यूएई के फ़ुजैरा एफ़1 इंडिपेंडेंट वाटर एंड पावर प्लांट के पास भी आग लगने की रिपोर्ट आई है. हालांकि, अधिकारियों का कहना है कि यह अब भी काम कर रहा है.
कुवैत के दोहा वेस्ट प्लांट को भी नुक़सान पहुंचने की रिपोर्ट्स आई हैं. हालांकि, यह भी बताया जा रहा है कि पास के बंदरगाह पर हमलों की वजह से मलबा गिरने से इस प्लांट को नुक़सान पहुंचा है.
यूनाइटेड नेशंस यूनिवर्सिटी इंस्टिट्यूट फ़ॉर वाटर, एनवायरन्मेंट एंड हेल्थ के प्रमुख प्रोफ़ेसर कावेह मदानी ने बीबीसी वर्ल्ड सर्विस से कहा, "ईरान के लिए यह ज़्यादा संकेत देने वाली बात है."
ईरान ने अपनी किसी भी कार्रवाई को "जायज़" प्रतिक्रिया के रूप में भी पेश किया है. ख़ासतौर पर बहरीन पर हमले को क़ेश्म द्वीप पर अमेरिकी हमले के जवाब के रूप में बताया गया.
महत्वपूर्ण वाटर इन्फ़्रास्ट्रक्चर पर कोई भी हमला ईरान की क्षमता को दिखाता है. इसके साथ ही ये यह भी बताता है कि ईरान अमेरिकी और इसराइली सैन्य कार्रवाई के जवाब में कितना आगे जाने को तैयार है.
हालांकि, मदानी का कहना है कि खाड़ी के बहुमूल्य जल संसाधनों पर लगातार और टारगेटेड हमलों की धमकी का असर काफ़ी है. यह ज़रूरी नहीं कि भविष्य में ईरान हमला करेगा.
वह कहते हैं, "पानी का इस्तेमाल ऐतिहासिक रूप से हमेशा धमकी देने के हथियार के रूप में किया गया है."

मदानी जिनेवा कन्वेंशन के अनुच्छेद 45 का भी ज़िक्र करते हैं. उनका कहना है कि यह क़ानून एक वजह हो सकता है कि ईरान खाड़ी के डिसैलिनेशन प्लांटों पर सीधे और स्पष्ट हमले करने से कुछ हद तक सावधानी बरत रहा है और अपने हमलों को जवाबी कार्रवाई के रूप में पेश कर रहा है.
मदानी ईरान के विदेश मंत्री के एक बयान का ज़िक्र करते हुए कहते हैं, "यह क़ानून कहता है कि आप नागरिक इन्फ़्रास्ट्रक्चर पर हमला नहीं कर सकते. लेकिन इसकी शुरुआत ईरान ने नहीं की. यही बात अब्बास अराग़ची की सोशल मीडिया पोस्ट में भी कही गई थी."
अराग़ची ने क़ेश्म द्वीप पर हमले को "गंभीर परिणामों वाला ख़तरनाक क़दम" बताया था. इस हमले की वजह से कई गांवों की वाटर सप्लाई सीमित हो गई.
ये घटनाएं दिखाती हैं कि पानी की सुरक्षा के मामले में अमेरिका के सहयोगी देशों की स्थिति कितनी नाज़ुक है. हालांकि ईरान भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं है.
मदानी बताते हैं कि ईरान की जल आपूर्ति खाड़ी देशों के मुक़ाबले ज़्यादा विविधता भरी है, इसलिए वह डिसैलिनेशन पर उतना निर्भर नहीं है.
फिर भी कुछ अन्य पर्यवेक्षकों का कहना है कि अगर ईरान खाड़ी क्षेत्र के महत्वपूर्ण वाटर इन्फ़्रास्ट्रक्चर पर हमला करता है तो उसके जवाब में उसके अपने वाटर इन्फ़्रास्ट्रक्चर पर भी हमले हो सकते हैं.
ईरान कुछ समय से "गंभीर जल संकट" के क़रीब पहुंच रहा है. ऊर्जा मंत्री अब्बास अलीआबादी के मुताबिक़ कम बारिश, 'राजधानी की सौ साल पुरानी जल व्यवस्था में रिसाव' और पिछले साल इसराइल के साथ 12 दिन की जंग ने भी पानी की कमी को बढ़ाया है.
ईरान के नेशनल सेंटर फ़ॉर क्लाइमेट एंड ड्रॉट क्राइसिस मैनेजमेंट के अहमद वज़ीफ़ेह के मुताबिक़, देश के बांध पहले से ही "चिंताजनक स्थिति" में हैं. बड़े जलभंडारों से ज़रूरत से ज़्यादा पानी निकाला जा चुका है. ज़ायंदेह रूद जैसी नदियां और उर्मिया झील का आकार काफ़ी हद तक सिकुड़ गया है.
पर्यावरण विशेषज्ञ फ़्रेड पियर्स के मुताबिक़, दशकों से बांध निर्माण, पानी ज़्यादा इस्तेमाल करने वाली खेती और ख़राब प्रबंधन ने स्थिति को और बदतर किया है. कुछ इलाक़ों में अंडरग्राउंड वाटर बहुत ज़्यादा निकाले जाने से ज़मीन धंसने की समस्या भी पैदा हो गई है.
अधिकारियों ने यह चेतावनी भी दी है कि एक दिन तेहरान में लोगों के लिए पानी सीमित किया जा सकता है या उन्हें आंशिक रूप से शहर छोड़ने के लिए कहा जा सकता है.
ईरान में 'गंभीर जल संकट'

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कुछ शोधकर्ताओं के मुताबिक़, यह सिर्फ़ पर्यावरण का मुद्दा नहीं है, बल्कि इससे राष्ट्रीय सुरक्षा का भी ख़तरा है, जो ईरान की आंतरिक स्थिरता और आर्थिक क्षमता को प्रभावित करता है.
अमेरिका और इसराइल के साथ कई हफ़्तों से चल रहे संघर्ष ने इसे और गंभीर बना दिया है.
जंग से पहले भी पानी की कमी ने ईरान में घरेलू अशांति को बढ़ाया था. ख़ुज़ेस्तान, इस्फ़हान और दूसरे इलाक़ों में हुए विरोध प्रदर्शनों में महंगाई और राजनीतिक मुद्दों के साथ पानी का मुद्दा भी उठाया गया था.
ईरान की पानी से जुड़ी चुनौतियां क्षेत्रीय तनाव से भी जुड़ी हैं. अफ़ग़ानिस्तान के साथ हेलमंद नदी को लेकर, तुर्की के साथ टिगरिस और यूफ्रेट्स नदियों पर बने बांधों को लेकर और इराक़ के साथ साझा जलमार्गों को लेकर उसके लंबे समय से विवाद रहे हैं.
विश्लेषकों का कहना है कि यह जंग दिखा रही है कि मध्य पूर्व की जल व्यवस्था कितनी नाज़ुक हो चुकी है और यह संघर्ष की दिशा और समय को भी प्रभावित कर सकती है.
तेल और गैस जैसे मुद्दों के साथ अब पर्यावरण से जुड़ा दबाव भी संघर्ष बढ़ने के जोखिम में शामिल हो गया है.
भविष्य में इस क्षेत्र के संघर्ष सिर्फ़ पाइपलाइनों और तेल टैंकरों से नहीं बल्कि नदियों, जल भंडारों और डिसैलिनेशन प्लांटों से भी तय हो सकते हैं.
इस संघर्ष में और इसके आगे भी पानी शायद तेल से ज़्यादा अहम साबित हो सकता है.
अतिरिक्त रिपोर्टिंग: बीबीसी न्यूज़ पर्शियन
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
















