होर्मुज़ स्ट्रेट: अगर ईरान इस अहम तेल मार्ग को बंद कर दे तो क्या होगा?

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- Author, गैविन बटलर
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़, सिंगापुर
- Author, बीबीसी फ़ारसी
- Author, टोबी मान
- पढ़ने का समय: 7 मिनट
दुनिया के सबसे व्यस्त तेल शिपिंग मार्ग, होर्मुज़ जलडमरूमध्य, में कई जहाज़ों पर हमले होने की ख़बर है.
यूके मैरीटाइम ट्रेड ऑपरेशंस (यूकेएमटीओ) के अनुसार हाल ही में जिन जहाज़ों को निशाना बनाया गया, उनमें दो टैंकर शामिल हैं.
इन पर इराक़ के तट के पास 'अज्ञात प्रक्षेपास्त्र' से हमला किया गया है.
इसके अलावा, उन्हें संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के तट के पास एक कंटेनर जहाज़ पर हमले की रिपोर्ट भी मिली है.
ईरान ने चेतावनी दी है कि वह इस स्ट्रेट (जलडमरूमध्य) से गुजरने की कोशिश करने वाले किसी भी जहाज़ को 'आग के हवाले' कर देगा, लेकिन इसके बावजूद थोड़ा बहुत जहाज़ी आवागमन जारी है.
दुनिया का लगभग 20% तेल आमतौर पर इसी जलडमरूमध्य से होकर गुज़रता है.
युद्ध की वजह से दुनिया भर में तेल कीमतों में भारी उछाल आ गया है.
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होर्मुज़ स्ट्रेट क्या है और यह कहां पड़ता है?
होर्मुज़ स्ट्रेट (जलडमरूमध्य) दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण शिपिंग मार्गों में से एक है, ख़ासकर कच्चे तेल की सप्लाई के लिए यह सबसे अहम और नाज़ुक बिंदु माना जाता है.
इसके उत्तरी हिस्से में ईरान लगता है और दक्षिण में ओमान और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई). यह गलियारा अपने प्रवेश और निकास पर करीब 50 किलोमीटर (31 मील) चौड़ा है, और सबसे संकरे हिस्से में लगभग 33 किलोमीटर. यही मार्ग खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है.
यह जलडमरूमध्य इतना गहरा है कि दुनिया के सबसे बड़े तेल टैंकर भी आसानी से इससे गुज़र सकते हैं. मध्य पूर्व के बड़े तेल और गैस उत्पादक देश, और उनके ग्राहक, इसी रास्ते का उपयोग करते हैं.

अमेरिका के एनर्जी इन्फॉर्मेशन एडमिनिस्ट्रेशन (ईआईए) के अनुमानों के मुताबिक़, 2025 में हर रोज़ लगभग 2 करोड़ बैरल तेल होर्मुज़ जलडमरूमध्य से गुज़रा. यह सालाना लगभग 600 अरब डॉलर के ऊर्जा व्यापार के बराबर है.
यह तेल सिर्फ ईरान का नहीं होता, बल्कि खाड़ी के अन्य देशों जैसे इराक़, कुवैत, क़तर, सऊदी अरब और यूएई से भी आता है.
अगर स्ट्रेट बंद हो जाए तो क्या होगा?

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आमतौर पर हर महीने करीब 3,000 जहाज़ इस जलडमरूमध्य से होकर गुज़रते हैं.
विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि जब तक जहाज़ों के यहां से सुरक्षित रूप से गुज़रने को लेकर ख़तरा बना रहेगा, तेल की कीमतें, और उसे ढोने की लागत भी तब तक बढ़ती जाएंगी.
ऊर्जा बाज़ार से जुड़े विश्लेषण उपलब्ध कराने वाले ग्लोबल रिस्क मैनेजमेंट के मुख्य विश्लेषक आर्ने लोहमैन रासमुसेन ने पिछले हफ़्ते, बीबीसी के अमेरिकी साझेदार सीबीएस न्यूज़ को, बताया, "व्यवहारिक तौर पर यह रास्ता बंद ही है, क्योंकि कोई भी यहां से गुज़रने की हिम्मत नहीं कर रहा."
वह आगे कहते हैं, "आपको हमला झेलना पड़ सकता है, और आपको बीमा नहीं मिलता या फिर बीमा बेहद महंगा है. इसलिए सुरक्षा स्थितियां बेहतर होने तक आपको इंतज़ार करना पड़ेगा… अगर इस जलडमरूमध्य से आने वाला तेल और गैस रुक जाता है, तो बाज़ार पर इसका बड़ा असर पड़ेगा."
"भले ही कोई भौतिक नाकाबंदी नहीं है, लेकिन ईरान की धमकियां, साथ ही ड्रोन और मिसाइल हमले, इन सबका मतलब यही है कि टैंकर इस रास्ते से नहीं गुज़र रहे."

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ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता, इस्माइल बाघई, ने सोमवार को सीएनबीसी से कहा कि जो तेल टैंकर इस जलडमरूमध्य से गुज़र रहे हैं, उन्हें 'बेहद सावधान' रहना चाहिए.
युद्ध शुरू होने के बाद से ऊर्जा की कीमतों में भारी उछाल आया है.
सोमवार को कीमतें लगभग 120 डॉलर तक पहुंच गई थीं, फिर नीचे आ गईं. हालांकि संघर्ष से पहले की तुलना में ये अब भी काफ़ी ऊपर हैं.
लंदन स्टॉक एक्सचेंज ग्रुप के आंकड़ों के मुताबिक, मध्य पूर्व से चीन तक तेल ले जाने के लिए एक सुपरटैंकर किराए पर लेने की लागत पिछले हफ्ते की तुलना में लगभग दोगुनी हो गई है, और बढ़कर रिकॉर्ड 400,000 डॉलर से भी ऊपर पहुंच गई है.
इस अहम शिपिंग मार्ग के लगभग बंद होने से खाड़ी देशों, जैसे सऊदी अरब, को भी नुक़सान हुआ है, जिनकी अर्थव्यवस्थाएं ऊर्जा निर्यात पर बहुत अधिक निर्भर हैं.
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के अनुसार, तुलना के तौर पर ईरान रोज़ाना लगभग 1.7 मिलियन बैरल तेल (17 लाख बैरल) निर्यात करता है.
ईरान के सेंट्रल बैंक के अनुमान के मुताबिक, मार्च 2025 को ख़त्म होने वाले वित्त वर्ष में ईरान ने 67 अरब डॉलर का तेल निर्यात किया. पिछले दस साल में यह उसकी सबसे ज्यादा तेल आमदनी है.
स्ट्रेट की नाकाबंदी से एशिया पर भी बड़ा असर पड़ेगा.
ईआईए के अनुमान बताते हैं कि 2022 में, होर्मुज़ जलडमरूमध्य से निकलने वाला लगभग 82% कच्चा तेल और कंडेन्सेट (कम-घनत्व वाले तरल हाइड्रोकार्बन जो आमतौर पर प्राकृतिक गैस के साथ पाए जाते हैं) एशियाई देशों के लिए जा रहा था.
ग्लोबल बाज़ार में ईरान जो तेल बेचता है उसका लगभग 90% चीन ही खरीदता है.
चूंकि चीन इस तेल से सामान बनाता है और फिर उन्हें दूसरे देशों को निर्यात करता है, इसलिए तेल की बढ़ती कीमतें दुनिया भर के उपभोक्ताओं के लिए कीमतें बढ़ने का कारण बन सकती हैं.
ईरान होर्मुज़ को को कैसे बंद कर सकता है?

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संयुक्त राष्ट्र के नियमों के अनुसार, देश अपनी तटरेखा से समुद्री सीमा में 12 नॉटिकल मील (13.8 मील) तक नियंत्रण का अधिकार रखते हैं.
अपने सबसे संकरे हिस्से में, होर्मुज़ जलडमरूमध्य और उसकी शिपिंग लेन पूरी तरह ईरान और ओमान के क्षेत्रीय जल के भीतर आते हैं.
यह साफ़ नहीं है कि ईरान होर्मुज़ को बंद करने की क्या योजना बना रहा है, पर विशेषज्ञों के अनुसार इसे बंद करने के सबसे प्रभावी तरीकों में से एक यह है कि वह तेज़ हमलावर नौकाओं और पनडुब्बियों की मदद से पानी में बारूदी सुरंगें बिछा दे.
अमेरिकी सेना ने कहा है कि उसने जलडमरूमध्य में ईरान के बारूदी सुरंग बिछाने वाले 16 जहाज़ों को 'खत्म' कर दिया है.
ईरान की नियमित नौसेना और आईआरजीसी नौसेना भी विदेशी युद्धपोतों और वाणिज्यिक जहाज़ों पर हमले शुरू कर सकती है.
हालांकि, बड़े सैन्य जहाज़ खुद भी अमेरिकी हवाई हमलों के आसान निशाने बन सकते हैं, और ट्रंप कह चुके हैं कि उनके लक्ष्यों में से एक ईरान की नौसेना को नष्ट करना है.
ईरान की तेज़ गति वाली नौकाएं अक्सर एंटी शिप मिसाइलों से लैस होती हैं, और देश के पास कई तरह के सतह पर चलने वाले जहाज़, अर्ध पनडुब्बी यान और पनडुब्बियां भी हैं.
अमेरिका पहले भी अपनी सैन्य ताकत का इस्तेमाल करके इस जलडमरूमध्य से समुद्री यातायात को फिर से बहाल कर चुका है.
1980 के दशक के अंत में, आठ साल चले ईरान इराक़ युद्ध के दौरान, तेल सुविधाओं पर हमले बढ़कर एक 'टैंकर युद्ध' में बदल गए थे, जिसमें दोनों देशों ने आर्थिक दबाव डालने के लिए तटस्थ जहाज़ों पर भी हमले किए.
इराक़ी तेल ले जाने वाले कुवैती टैंकर ख़ास तौर पर ज़्यादा असुरक्षित थे.
आख़िरकार, अमेरिकी युद्धपोतों ने खाड़ी में उनके साथ चलना शुरू किया और अमेरिकी नौसेना संस्थान के अनुसार यह, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के सबसे बड़े नौसैनिक सतह युद्ध अभियानों में से एक था.
क्या वैकल्पिक रास्ते नाकाबंदी से बचा सकते हैं?

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होर्मुज़ जलडमरूमध्य बंद होने के लगातार ख़तरे ने खाड़ी क्षेत्र के तेल निर्यात करने वाले देशों को वर्षों से वैकल्पिक निर्यात मार्ग विकसित करने के लिए प्रेरित किया है.
ईआईए के अनुसार, सऊदी अरब 1,200 किमी लंबी पाइपलाइन ऑपरेट करता है, जो रोज़ाना 50 लाख बैरल कच्चा तेल ले जाने में सक्षम है.
एक बार पहले उसने अस्थायी रूप से एक प्राकृतिक गैस पाइपलाइन को भी कच्चा तेल ढोने के लिए उपयोग में लिया था.
संयुक्त अरब अमीरात ने अपने अंदरूनी तेल क्षेत्रों को ओमान की खाड़ी पर स्थित फ़ुजैरा बंदरगाह से जोड़ने के लिए एक पाइपलाइन बनाई है, जिसकी क्षमता कम से कम 15 लाख बैरल प्रतिदिन है.
तेल को इस वैकल्पिक ढांचे के माध्यम से मोड़कर होर्मुज़ जलडमरूमध्य को बाइपास किया जा सकता है, लेकिन रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, ऐसा करने से सप्लाई में रोज़ाना 80-100 लाख बैरल की कमी हो जाएगी.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.















