होर्मुज़ स्ट्रेट की वजह से क्यों हो रहा है तेल और गैस की क़ीमतों में उछाल, कब तक रहेगा ऐसा

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इमेज कैप्शन, दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल और गैस की ढुलाई होर्मुज़ स्ट्रेट से होती है
    • Author, डैनियल थॉमस, बेन हैटन, पीटर होस्किन्स और डियरबेल जॉर्डन
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़
  • पढ़ने का समय: 5 मिनट

मध्य पूर्व में अमेरिका और इसराइल के जारी हमलों के जवाब में ईरान लगातार हमले कर रहा है. इस बीच दुनिया में तेल की क़ीमतों में बढ़ोतरी दर्ज की गई.

सोमवार को प्राकृतिक गैस की क़ीमतों में लगभग 50 फ़ीसदी की तेज़ बढ़ोतरी हुई है, क्योंकि दुनिया की सबसे बड़ी निर्यातक कंपनियों में से एक क़तर एनर्जी ने अपनी फ़ैसिलिटीज़ पर हुए "सैन्य हमलों" के बाद उत्पादन रोक दिया.

तेल की वैश्विक मानक क़ीमत यानी ब्रेंट क्रूड सोमवार को 10 फ़ीसदी उछलकर 82 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गया.

पिछले दो दिनों में होर्मुज़ जलडमरूमध्य (स्ट्रेट) के पास कम से कम तीन जहाज़ों पर हमले के बाद यह बढ़ोतरी हुई. स्ट्रेट दो समुद्रों को जोड़ने वाली एक संकरी वॉटर बॉडी होती है.

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ईरान ने देश के दक्षिण में स्थित होर्मुज़ स्ट्रेट से किसी भी समुद्री जहाज़ के गुज़रने पर पाबंदी लगा दी है. दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल और गैस की ढुलाई इसी रास्ते से होती है.

सोमवार को लंदन में एफ़टीएसई 100 शेयर बाज़ार सूचकांक क़रीब एक प्रतिशत गिरावट के साथ खुला. मध्य पूर्व में हवाई क्षेत्र बंद होने के बाद एयरलाइंस कंपनियों के शेयरों में भारी गिरावट देखी गई.

लुढ़के दुनिया भर के बाज़ार

होर्मुज़ स्ट्रेट

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इमेज कैप्शन, विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि अगर संघर्ष लंबा खिंचता है तो ऊर्जा क़ीमतें और बढ़ सकती हैं

यूरोप के प्रमुख शेयर बाज़ारों में इससे भी अधिक गिरावट दर्ज की गई. फ्रांस में सीएसी-40 सूचकांक 1.6 प्रतिशत गिरा, जबकि जर्मनी का डैक्स 1.7 प्रतिशत नीचे आया.

इस बीच सोने की क़ीमत 2.3 प्रतिशत बढ़कर 5,395.99 डॉलर प्रति औंस हो गई.

विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि अगर संघर्ष लंबा खिंचता है तो ऊर्जा क़ीमतें और बढ़ सकती हैं. होर्मुज़ स्ट्रेट के प्रवेश द्वार पर अंतरराष्ट्रीय शिपिंग लगभग ठप हो गई है.

यूके मैरीटाइम ट्रेड ऑपरेशंस सेंटर ने कहा कि दो जहाज़ों को निशाना बनाया गया और तीसरे जहाज़ के बेहद पास एक "अज्ञात प्रोजेक्टाइल" फटने की सूचना मिली है.

शुरुआती उछाल के बाद ब्रेंट क्रूड 79 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया, जबकि अमेरिकी बाज़ार में कारोबार होने वाला तेल 7.6 प्रतिशत की बढ़त के साथ 72.20 डॉलर पर रहा.

एमएसटी मार्की में ऊर्जा अनुसंधान प्रमुख सॉल कावोनिक ने बीबीसी से कहा, "बाज़ार में घबराहट नहीं है."

उन्होंने कहा, "अब तक यह स्पष्ट है कि किसी भी पक्ष ने तेल परिवहन और उत्पादन ढांचे को निशाना नहीं बनाया है."

उन्होंने कहा, "बाज़ार इस बात के संकेतों पर नज़र रखेगा कि होर्मुज़ स्ट्रेट से यातायात कब सामान्य होता है. अगर ऐसा हुआ तो तेल की क़ीमतें फिर से कम हो सकती हैं."

क्या कह रहे हैं जानकार

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इमेज कैप्शन, तेल की क़ीमते 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर जा सकती हैं
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हालांकि कुछ विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि अगर संघर्ष लंबा चलता है तो क़ीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर जा सकती हैं.

इसका असर महंगाई और ब्याज दरों पर पड़ सकता है.

दुबई स्थित कंसल्टेंसी कमर एनर्जी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी और तेल कंपनी शेल के पूर्व अधिकारी रॉबिन मिल्स ने कहा, "क़ीमतों में यह उछाल लगभग तुरंत असर डालेगा क्योंकि तेल कारोबारी भी ख़बरों पर क़रीबी नज़र रख रहे हैं. फ़िलहाल तेल की क़ीमतें बहुत अधिक नहीं हैं. वे दो साल पहले के स्तर से भी नीचे हैं, इसलिए अभी हम पूरी तरह तेल संकट की स्थिति में नहीं हैं."

रविवार को तेल उत्पादक देशों के समूह ओपेक प्लस ने क़ीमतों में संभावित बढ़ोतरी को संतुलित करने के लिए उत्पादन दो लाख छह हज़ार बैरल प्रतिदिन बढ़ाने पर सहमति जताई.

हालांकि कुछ जानकारों को लगता है कि शायद ही इससे ज़्यादा राहत मिले.

ब्रिटेन में ऑटोमोबाइल एसोसिएशन के अध्यक्ष एडमंड किंग ने चेतावनी दी कि मौजूदा संघर्ष दुनिया भर में पेट्रोल की क़ीमतों को बढ़ा सकता है.

उन्होंने कहा, "मध्य पूर्व में उथल-पुथल और बमबारी वैश्विक स्तर पर तेल वितरण में बाधा पहुँचा सकती है. इससे क़ीमतों में बढ़ोतरी तय है. पेट्रोल पंप पर क़ीमतों में बढ़ोतरी की मात्रा और अवधि इस बात पर निर्भर करेगी कि संघर्ष कितने समय तक चलता है."

सरासिन एंड पार्टनर्स में मुख्य अर्थशास्त्री और निवेश रणनीति प्रमुख सुबिथा सुब्रमण्यम ने कहा कि अगर तेल की क़ीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहीं, "तो इसका असर खाद्य, कृषि और औद्योगिक सामान की क़ीमतों पर पड़ेगा. इससे महंगाई में और बढ़ोतरी होगी."

ब्रिटेन में महंगाई की रफ़्तार कम हुई है, जिसके चलते बैंक ऑफ़ इंग्लैंड ने ब्याज दरों में कटौती की है.

सुब्रमण्यम ने संकेत दिया कि बैंक हाल में आगे और कटौती के संकेत देने के बावजूद फ़िलहाल ब्याज दरें 3.75 प्रतिशत पर स्थिर रख सकता है.

रविवार को ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (आईआरजीसी) ने कहा कि ब्रिटेन और अमेरिका के तीन टैंकरों को "मिसाइल से निशाना बनाया गया है और वे जल रहे हैं."

ब्रिटेन और अमेरिका ने इस पर कोई टिप्पणी नहीं की है.

यूके मैरीटाइम ट्रेड ऑपरेशंस सेंटर ने कहा कि अरब और ओमान की खाड़ी में 'कई सुरक्षा घटनाओं' की सूचना मिली है और जहाज़ों को 'सावधानी के साथ गुज़रने' की सलाह दी गई है.

जहाज़ ट्रैकिंग प्लेटफॉर्म क्लेपेर के अनुसार, होर्मुज़ स्ट्रेट के पार खुली खाड़ी के पानी में कम से कम 150 टैंकरों ने लंगर डाल दिया है.

हालांकि कुछ ईरानी और चीनी जहाज़ सोमवार को वहां से गुज़रे हैं.

केप्लर के होमायून फ़लाकशाही ने बीबीसी न्यूज़ से कहा, "ईरान की धमकियों के कारण जलडमरूमध्य प्रभावी रूप से बंद है."

उन्होंने कहा, "जोखिम बहुत अधिक है और बीमा लागत तेज़ी से बढ़ी है, इसलिए जहाज़ों ने एहतियात के तौर पर प्रवेश नहीं करने का फ़ैसला किया है."

उन्होंने कहा कि अमेरिका संभवतः शिपिंग मार्गों की सुरक्षा की कोशिश करेगा. अगर यह सफल रहा तो तेल की क़ीमतों में तेज़ उछाल रोका जा सकता है, लेकिन अगर होर्मुज़ स्ट्रेट लंबे समय तक बंद रहा तो कीमतें "काफ़ी, काफ़ी बढ़" सकती हैं.

डेनमार्क की कंटेनर शिपिंग कंपनी मर्स्क ने रविवार को बयान जारी कर कहा कि वह बाब अल-मंदब स्ट्रेट और स्वेज़ नहर से गुज़रने वाली सेवाओं को अस्थायी रूप से रोक रही है और जहाज़ों को केप ऑफ़ गुड होप के रास्ते मोड़ रही है.

होर्मुज़ स्ट्रेट कहाँ है और इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

होर्मुज़ स्ट्रेट

फ़ारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी के बीच स्थित होर्मुज़ स्ट्रेट, ईरान और ओमान की समुद्री सीमा के बीच आता है. यह एक सँकरा जलमार्ग है, जो एक जगह तो केवल 33 किलोमीटर ही चौड़ा है.

इसके महत्व का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि दुनिया की कुल तेल आपूर्ति का लगभग पाँचवाँ हिस्सा इसी रास्ते से होकर गुज़रता है.

सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत और ईरान जैसे देशों से निर्यात होने वाला कच्चा तेल इसी स्ट्रेट से होकर अन्य देशों तक पहुँचता है.

इसके अलावा, दुनिया में सबसे अधिक लिक्विफ़ाइड नेचुरल गैस (एलएनजी) निर्यात करने वाला देश क़तर भी अपने निर्यात के लिए इसी रास्ते पर निर्भर है.

साल 1980 से 1988 तक चले ईरान-इराक़ युद्ध के दौरान, दोनों देशों ने इसी जलमार्ग में एक-दूसरे की तेल आपूर्ति को रोकने की कोशिश की थी.

इस संघर्ष में कमर्शियल टैंकरों पर हमले किए गए, जिससे अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा आपूर्ति पर गंभीर असर पड़ा.

इस संघर्ष को इतिहास में 'टैंकर युद्ध' के नाम से भी जाना जाता है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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