धारचूला: दो देश, नाम एक, ज़ख़्म एक

उत्तराखंड में आई बाढ़ से प्रभावित लोग
    • Author, मोहन लाल शर्मा
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दारचूला, नेपाल से

भारत के उत्तराखंड में जब प्रकृति अपना रौद्र रूप दिखा रही थी, तो उसी समय नेपाल के लोग भी यह कहर झेल रहे थे. इस आपदा के चलते पिछले एक महीने में तो कई इलाकों का भूगोल ही बदल गया है.

भारत की सीमा में धारचूला है और नेपाल की सीमा में दारचूला. दोनों के बीच काली नदी है जो देशों का बँटवारा करती है. एक जैसा नाम और एक जैसी आपदा दोनों जगहों पर आई.

<link type="page"><caption> धारचूला का हाल तस्वीरों में</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/multimedia/2013/07/130726_uttarakhand_flood_effected_area_gallery_vr.shtml" platform="highweb"/></link>

आज नेपाल और भारत को जोड़ने का काम सिर्फ़ एक संकरा सा झूला पुल करता है. हालांकि भारत और नेपाल के बीच दो और झूला पुल हुआ करते थे. इनमें से एक जॉलजीबी में था, लेकिन प्राकृतिक आपदा में ये दोनों पुल बह चुके हैं.

<link type="page"><caption> बर्बादी की दास्तान</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/indepth/uttarakhand_flood_special_ml.shtml" platform="highweb"/></link>

नेपाल में भी सबसे ज्यादा नुकसान उन बाज़ारों और घरों को हुआ, जो नदी किनारे थे. नेपाल में पुल की तरफ का बाज़ार और सड़क सब कुछ काली नदी के प्रचंड वेग में समा गया.

नदी ने छीन लिया

पुल के पास अब जो बाज़ार बचा है, वह सिर्फ़ आधा है. नदी किनारे जो बहुमंज़िली इमारतें और दुकानें थीं, अब साफ हो चुकी हैं.

<link type="page"><caption> बाढ़ को दावत देती है</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/07/130722_south_asia_flood_ap.shtml" platform="highweb"/></link>

इसी बाज़ार के सबसे बड़े दुकानदार हरक सिंह थावन्ना कहते हैं, "मेरा घर, मकान, दुकान और सामान मिलाकर लगभग दस करोड़ नेपाली रुपए का नुकसान हुआ है."

हरक सिंह आगे बताते हैं, "यकीन ही नहीं होता कि यहाँ पर लगभग 50-60 दुकानें और हुआ करती थीं. सड़क काफी दूर तक जाती थी, लेकिन अब कुछ नहीं बचा है. मेरे यहाँ पर कई गोदाम और दुकानें थीं. अब सिर्फ एक ही दुकान बची है, बाकी सब काली नदी ने छीन लिया."

<link type="page"><caption> केदारनाथ मंदिर की हालत</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/07/130717_kedarnath_uttarakhand_vt.shtml" platform="highweb"/></link>

हरक सिंह की तरह ही मदन सिंह का चार मंज़िला मकान 'गनफ़े' गाँव में था, जो अब तबाह हो चुका है. चपरासी की नौकरी करने वाले मदन सिंह कहते हैं कि उन्होंने कर्ज़ लेकर लगभग 35 लाख नेपाली रुपए की लागत से परिवार के लिए आठ कमरे का मकान बनाया था.

सरकारी मुआवज़ा नहीं

उत्तराखंड में आई बाढ़ से प्रभावित नेपाल का दारचूला क्षेत्र

नेपाल की सरकार ने पूरी तरह ध्वस्त मकानों के लिए 35 हज़ार रुपए देने की घोषणा की है. कुछ दिन पहले ही नेपाल के प्रधानमंत्री और पूर्व राजा ने भी इस इलाक़े का दौरा किया था, लेकिन पीड़ित बताते हैं कि यहाँ उन्हें मुआवज़ा नहीं मिल रहा.

<link type="page"><caption> बाढ़ के बाद एक महीना</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/07/130716_uttarakhand_one_month_dp.shtml" platform="highweb"/></link>

मदन सिंह को अब तक कोई राहत नहीं मिली. इसी तरह हरक सिंह भी सरकारी मुआवज़े के लिए दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं. मदन सिंह किसी तरह एक टिन का झोपड़ा बनाकर अपने बच्चों के साथ रह रहे हैं.

वो कहते हैं, "इस समय तो उधार लेकर बच्चों का पेट भर रहे हैं. सबसे बड़ी समस्या यह है कि मुझ पर अभी करीब साढ़े चार लाख रुपए का कर्ज़ है, वह कैसे उतरेगा, पता नहीं."

<link type="page"><caption> अपनों का इंतजार</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/07/130715_uttarakhand_crisis_rns.shtml" platform="highweb"/></link>

नेपाल के आपदा पीड़ितों को शिकायत है कि जब भारत की सरकार बढ़-चढ़कर अपने लोगों की मदद कर रही है. उनके खाने-पीने, रहने का इंतज़ाम कर रही है तो नेपाल सरकार क्यों नहीं.

आपदा के बाद नेपाली दारचूला में ज़रूरी रसद आपूर्ति के रास्ते कट गए हैं. इसलिए भारत के ज़रिए ही वो इस बचे हुए झूला पुल से ज़रूरी रसद हासिल कर पा रहे हैं. यहाँ तक कि गैस सिलिंडर भरवाने के लिए भी उन्हें भारत आना पड़ रहा है.

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