उत्तराखंड आपदा: एक क़स्बा जो ‘टापू’ बन गया

- Author, मोहन लाल शर्मा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, मदकोट, उत्तराखंड से
उत्तराखंड राज्य के कुमाँऊ मंडल में मदकोट एक ऐसा क़स्बा है जिसका आपदा के एक महीने बीत जाने के बाद भी सड़क संपर्क क़ायम नहीं हो पाया है. रास्ता न होने के चलते यहाँ राहत सामग्री और रोज़मर्रा की ज़रुरतों का सामान पहुंचना टेढ़ी खीर है.
राहत कामों में लगे आपदाकर्मी भी जान जोखिम में डाल दूसरों की ज़िंदगी बचाने में लगे हैं. मुनसियारी से 22 किलोमीटर दूर बसे मदकोट तक पहुंचने का अब एक ही ज़रिया है, एक किलोमीटर लंबा पहाड़ पार करना.
<link type="page"><caption> दो देश, नाम एक, जख्म एक</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/07/130728_uttarakhand_flood_nepal_vr.shtml" platform="highweb"/></link>
स्थानीय लोग घर पहुंचने के लिए दुर्गम पहाड़ को जान हथेली पर रखकर पार करते हैं. मदकोट से तीन किलोमीटर पहले भदेली के बाद सड़क नहीं है. गोरी गंगा ने इस रास्ते को ख़त्म कर दिया है.
ये ही एक मात्र रास्ता था जो मदकोट को मुनसियारी और जॉलजीबी से जोड़ता था पर अब ना तो मदकोट से आगे जाया जा सकता है और ना ही पीछे. इन पहाड़ों को पार करने का एक ही तरीका है, बग़ल में उगी घास-पौधौं को पकड़िए और किसी का नाम लेकर चढ़ जाइए.
चढ़ते समय बस एक ही बात का ध्यान रखना है कि धीरे चढ़ें, क़दम छोटे हों, मुँह से साँस न लें, ज़मीन पर नज़रें गड़ी रहें, अगल-बग़ल देखने से पैर अगर डगमगाए तो सीधा गहरी खाई में. और उतरते समय सिर्फ़ एक बात का ख्याल कि पैर सीधे पड़ें, शरीर के वज़न का संतुलन बनाए रखें ताकि फिसलने की स्थिति में ख़ुद को संभाल सकें.
नदी काल बन गई

नदी से सटे मदकोट बाज़ार को गोरी नदी के कटाव ने निगल लिया. ये बाज़ार ही इस क़स्बे की जान हुआ करता थी. इस जगह आपदा के चलते मौंतें तो नहीं हुईं लेकिन काफ़ी लोगों की रोज़ी-रोटी चली गई.
मुनसियारी के उप ज़िलाधिकारी अनिल कुमार शुक्ला बताते हैं कि मदकोट के 14 मकान पूरी तरह नदी में समा गए है. पटवारी चौकी, प्राथमिक स्कूल, पंचायत घर भी टूट गया है.
<link type="page"><caption> कल चमन था</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/multimedia/2013/07/130726_uttarakhand_flood_effected_area_gallery_vr.shtml" platform="highweb"/></link>
नदी किनारे मकान-दुकान सब कुछ नदी में समा गए और जो बच गए हैं, आधे नदी में लटके हुए हैं, इन स्थानीय लोगों के पास राहत शिविर में शरण लेने के अलावा कोई चारा नहीं है. मदकोट के राहत शिविर में 14 परिवार रह रहे हैं, राहत शिविर में रहने वालों में हीरा मरतोलिया भी है.
हीरा उस दिन को याद नहीं करना चाहतीं, "16 तारीख को जब हमने देखा कि नदी अपने प्रचंड वेग पर है, कटाव हो रहा है, हमारे मकान ढहने की कगार पर हैं तो हमने पूरे परिवार के साथ मकान खाली कर दिया. धरती हिल रही थी, नदी उफ़ान पर थी, जलजला आया और मेरी आँखों के सामने मेरा 22 कमरों का मकान पानी में समा गया. मकान के साथ ही हमारी दुकान थी और इसमें हमारी रो़ज़ी-रोटी चला करती थी, पर अब कुछ भी नहीं."
राहत शिविर में रह रहे सभी लोगों को सरकार की ओर से दो लाख का मुआवज़ा मिल चुका है.
सरकार से शिकायत नहीं

राहत शिविर में रह रही महिलाओं, बुज़ुर्गों को सरकार से कोई शिकायत नहीं है. इन लोगों की बस एक ही माँग है कि सरकार इन्हें जल्द से जल्द ज़मीन मुहैया करा दें ताकि नए तरीके से इनकी नई ज़िंदगी की शुरुआत हो सके.
लेकिन बात यहीं ख़त्म नहीं होती. मदकोट से आगे तो स्थितियाँ और भी ख़राब हैं. दो किलोमीटर के आगे जाकर शेराघाट पर सड़क फिर से नदी में. शेराघाट तो इतना दुर्गम हो चुका है कि सामने खड़ी चट्टान है.
स्थानीय लोगों का कहना है कि अब शेराघाट से अब आगे जाने का रास्ता बनाने के लिए पहाड़ को काट कर खुली सुरंग बनानी होगी. इसके बाद बंगापानी और लुमती में भी सड़क नदी में समा गई है.
<link type="page"><caption> बर्बादी की दास्तान</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/indepth/uttarakhand_flood_special_ml.shtml" platform="highweb"/></link>
डीज़ल, पेट्रोल की किल्लत के बावजूद मदकोट में गाड़ियाँ चल रही हैं. दरअसल गाड़ियों के लिए जो डीज़ल या पेट्रोल आ रहा है, वो भी जान जोखिम में डालकर आ रहा है. डीज़ल 80 रुपए और पेट्रोल 120 रुपए लीटर बिक रहा है.
स्थानीय निवासी जगदीश उप्रेती कहते हैं, "तेल 22 किलोमीटर दूर मुनसियारी से डिब्बों में भर कर लाया जा रहा है. जहाँ तक सड़क है वहाँ तक तो गाड़ी से और उसके बाद लोग दस लीटर के कैन को पीठ पर लादकर पहाड़ की पथरीली पगडंडी पर चढ़कर पहुंचा रहे हैं."
पूरा रास्ता मलबे और गाद से भरा पड़ा है. सीमा सड़क संगठन के लोग सड़क बनाने में जुटे तो हैं पर अगर वो भदेली और मदकोट के बीच सड़क बनाने में सफल हो भी गए, तो शेराघाट पर क्या करेंगे, जहाँ पहाड़ सीधा खड़ा है. चुनौती पहाड़ तोड़कर आगे जाने और बाकी इलाकों से संपर्क बनाने की है.
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