उत्तरकाशी सुरंग हादसा: बिहार–झारखंड से काम करने आए मज़दूर किस हाल में रहते हैं?

- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, उत्तरकाशी से
बिहार के मोतीहारी ज़िले से आने वाले राजू कुमार बीते दो सालों से उत्तरकाशी में जारी सिल्कायारा सुरंग परियोजना में काम कर रहे हैं.
लगभग नौ दिन पहले इसी सुरंग में एक हादसा होने के बाद से यहां काम रुका हुआ है.
सुरंग से कुछ आधा किलोमीटर की दूरी पर राजकुमार जैसे क़रीब चार सौ मजदूरों के रहने के लिए अस्थाई कमरे बने हुए हैं.
हमने इस जगह पर पहुंचकर राजकुमार के साथ-साथ कुछ दूसरे मजदूरों से उनकी रोजमर्रा के जीवन, परिवार और आर्थिक चिंताओं पर बात की है.
हर महीने 17 हज़ार रुपए पगार मिलती है. इसमें से चार हज़ार रुपए मेस और पीएफ़ का कट जाता है, कुछ पैसे जेब ख़र्च के लिए रखते हैं और 10 हज़ार रुपये अपने माता पिता को भेज देते हैं.
राजू कुमार अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी बयां करते हुए कहते हैं, "जब हमारी शिफ़्ट ख़त्म होती है तो हम लोग अपने कमरे में आते हैं, हाथ मुंह धोते हैं, फ्रेश होते हैं, और फिर कपड़े धोते हैं. इसके बाद फ़ोन से घर पर बात करते हैं और फिर आराम करते हैं."
यहाँ काम करने वाले सभी मज़दूर पुरुष हैं और अधिकतर युवा हैं जिनकी शादी भी नहीं हुई है. एक कमरे में आठ मज़दूर रहते हैं. परिवार वालों को यहाँ रखने की इजाज़त नहीं है.
कमरों के सामने सामूहिक टॉयलेट्स हैं और उनसे सटी एक जगह पर नल लगा है जहाँ ये मजदूर दाढ़ी बनाते और नहाते हैं.
खाने के वक़्त इन मजदूरों को मेस में गर्म खाना मिलता है जिसमें रोटी, दाल, सब्ज़ी और चावल शामिल होता है.
बाइस वर्षीय राजू कुमार कहते हैं, “सभी मज़दूर मिल जुल कर रहते हैं. घर से दूर यही हमारा घर है, यही हमारा परिवार है, यही हमारी दुनिया है."
जब मैं उनसे मिलने गया तो वो अपने कपड़े धोकर उठे थे. उन्होंने हमें अपना कमरा दिखाया जिसके अंदर आठ बिस्तर लगे हुए थे. कुछ कपड़े, जूते और सुरंग में काम करने वाले हेलमेट इधर-उधर रखे हुए थे.
कमरे का साइज़ बड़ा ज़रूर था लेकिन इतना बड़ा भी नहीं कि इसमें आठ बिस्तरों की जगह हो. राजू और उनके साथियों के लिए कुछ ख़रीदना काफ़ी मुश्किल रहता है.
वो कहते हैं, "बाज़ार यहाँ से 10 किलोमीटर की दूरी पर है. वहां तक जाने के लिए कोई साधन नहीं है, इसलिए हमें पैदल ही जाना होता है.”
सुरंग परियोजना
सुरंग में 200 से 270 मीटर तक हादसे से कुछ दिन पहले से ही कुछ समस्या थी. पत्थर गिर रहे थे, इसकी मरम्मत की जा रही थी और 12 नवंबर को अचानक वो हिस्सा नीच आ गिरा.
सिल्क्यारा सुरंग परियोजना पर साल 2018 में काम शुरू हुआ था. राजू की तरह 400 के क़रीब मज़दूर इस सुरंग के निर्माण में जुटे हैं.
यहाँ कोई अपनी शिफ़्ट ख़त्म करके आया है तो कोई शिफ़्ट शुरू करने जा रहा है. ये मज़दूर अधिकतर बिहार, ओडिशा, पश्चिमी बंगाल और झारखंड के रहने वाले हैं.
राजू के बाद हम राजेश कुमार यादव से मिले जो झारखण्ड के देवघर ज़िले से यहाँ काम करने आये हैं. वो कहते हैं कि उन्हें कड़ी मेहनत के बाद अपने कमरे में आकर सुकून मिलता है.
राजेश कुमार यादव के मुताबिक, "हमें हर महीने 17 हज़ार रुपए पगार मिलती है. इसमें से चार हज़ार रुपए मेस और प्रोविडेंट फंड का कट जाता है, कुछ पैसे हम जेब ख़र्च के लिए रख लेते हैं और 10 हज़ार रुपये अपने माता पिता को भेज देते हैं."
राजेश के मुताबिक़ झारखंड की तुलना में उत्तरकाशी में ठंड बहुत ज़्यादा है, जिसके कारण उन्हें दिक़्क़त होती है.
वो कहते हैं, "खुले में ठंडे पानी से नहाने में बहुत ठंड लगती है.”
12 नवंबर को दिवाली के दिन राजू और राजेश अपनी शिफ़्ट ख़त्म करके अपने कमरे में आराम कर रहे थे. वो दिवाली मनाने घर नहीं जा सके थे. इसलिए सभी मज़दूर दिवाली मनाने की तैयारी में थे कि तभी उन्हें सुरंग में हादसे की ख़बर मिली.
राजेश कहते हैं, "वो सभी फंसे हुए मज़दूर हमारे भाई की तरह हैं और हम सब उनके निकलने की राह देख रहे हैं. हमें उनकी चिंता है.”
हादसे के समय राजेश और राजू के 41 साथी अंदर काम कर रहे थे. वो तब से अंदर फंसे हुए हैं. उनके निकालने के काम में देरी हो रही है.

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हम उनके कमरों में दोपहर के समय गए थे. लंच का वक़्त हो चला था. राजेश की शाम की शिफ़्ट थी, इसलिए वो सोने चले गए.
राजू खाना खाने मेस में पहुंचे. मेस में रोशनी कम थी, टेबल और कुर्सियां नहीं थीं लेकिन बैठने के लिए और खाने के लिए पक्के स्लैब्स लगे हुए थे. राजू की थाली में चावल, रोटी, दाल और सब्ज़ी थी. किचन बेसिक सा था लेकिन साफ़ था.
ये तो वो मज़दूर थे जिन्होंने हमसे कैमरे पर बात की. हमने कई और मज़दूरों से बात की लेकिन वे थोड़ा डरे हुए थे और कैमरे पर बात करने को तैयार नहीं हुए. इनमें से दो मज़दूरों ने हमें बताया कि वो सुरंग में चट्टान काटने का काम करने वाली टीम में हैं.
इनमें से एक ने कहा, "सुरंग में 200 से 270 मीटर तक हादसे से कुछ दिन पहले से ही कुछ समस्या थी. पत्थर गिर रहे थे, इसकी मरम्मत की जा रही थी और 12 नवंबर को अचानक वो हिस्सा नीच आ गिरा."
उनका कहना था कि उन्होंने सबसे पहले जमशेदपुर में अपने परिवारवालों को फ़ोन करके बताया कि वो ठीक हैं और वो हादसे के समय काम नहीं कर रहे थे.
वहां मौजूद बिहार से आए उनके साथी ने बताया कि उन्होंने अपने परिवार को ये बताया ही नहीं था कि वो इस सुरंग में काम करते हैं.
इस सुरंग को नवयुग इंजीनियरिंग नाम की एक कंस्ट्रक्शन कंपनी बना रही है. ये मज़दूर इसी कंपनी के कर्मचारी हैं.
जब हमने इस कंपनी के अधिकारियों से मज़दूरों की रिहाइश पर कुछ सवाल किए तो उन्होंने हमें कोई जवाब नहीं दिया.
लेकिन कंपनी में काम करने वाले दो सुपरवाइज़रों ने बताया कि बिहार, झारखंड और ओडिशा से आने वाले मज़दूर इतनी दूर इसलिए आते हैं क्योंकि उन राज्यों में नौकरियों की कमी है. उनको अपने परिवार को चलाना होता है. इसलिए मजबूरी में वो इतनी दूर आकर काम करते हैं.
चार धाम परियोजना

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निर्माणाधीन सुरंग महत्वाकांक्षी चारधाम परियोजना का हिस्सा है, जो बद्रीनाथ, केदारनाथ, यमुनोत्री और गंगोत्री तक कनेक्टिविटी बढ़ाने के लिए एक राष्ट्रीय बुनियादी ढांचा बनाने की पहल है.
ये एक विवादित परियोजना है. कई पर्यावरण विशेषज्ञ इस प्रोजेक्ट को लेकर आशंका जताते रहे हैं. उनके मुताबिक़ हाल के दिनों में इस इलाके में बाढ़ और भूस्खलन की आशंका बढ़ गई हैं.
हज़ारों करोड़ रुपये की लागत से इस प्रोजेक्ट को 2020 में अंजाम देना था लेकिन अब कहा जा रहा है कि इसे 2024 के अंत में पूरा कर लिया जाएगा.
हालाँकि, 12 नवंबर के हादसे के बाद इसमें और भी देरी हो सकती है. अब तक इस प्रोजेक्ट के 70 फीसदी हिस्से में काम मुकम्मल हो चुका है
कैसे हुआ हादसा

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हादसे के बाद अधिकारियों ने सुरंग में फंसे मज़दूरों को निकालने के लिए पांच विकल्पों पर काम शुरू किया है और अधिकारी कहते हैं कि उन्हें जल्द ही निकाल लिया जाएगा
12 नवंबर को साढ़े चार किलोमीटर लंबा निर्माणाधीन हिस्सा ढह गया जिसके बाद सुरंग के 70 मीटर क्षेत्र में मलबा फैल गया, जिससे मजदूरों का रास्ता बंद हो गया.
इसके बाद से अंदर फंसे सभी 41 कर्मचारियों को पाइप के जरिए खाना, ऑक्सीजन और पानी भेजा जा रहा है.
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