टनल के भीतर की ज़िंदगी: घुप अंधेरे में न फ़ोन, न टिफ़िन और घंटों तक दुनिया से दूर

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- Author, रवि प्रकाश
- पदनाम, बीबीसी हिन्दी के लिए, राँची से
घुप्प अंधेरा. टार्च की रोशनी में काम. माथे पर विशेष हेलमेट. उसके अगले हिस्से में जलती टार्च. कमर में बंधे बेल्ट में टंगी बैटरी. उस बैटरी से तार के सहारे जुड़ा टार्च अगर बंद हो जाए, तो खुद का हाथ भी न दिखे.
अपने काम की जगह से दूसरी जगह जाने की मनाही. धरती के अंदर काम करने वाली जगह (खान या सुरंग) में शौचालय का प्रायः नहीं होना. फ़ोन ले जाने की मनाही. खाने की टिफ़िन भी नहीं. अमूमन 2 लीटर की एक वॉटर बोतल. काम के आठ घंटे बाहरी दुनिया से कोई संपर्क नहीं.
ऐसी होती है धरती की सतह से कई मीटर अंदर गहरी खान या सुरंग में काम करने वाले किसी मज़दूर (माइनर) की जिंदगी.
उत्तरकाशी में हुए टनल हादसे के बाद धरती के अंदर काम करने वाले ऐसे ही कुछ लोगों से बीबीसी ने बातचीत की. ताकि, यह समझ सकें कि खान या सुरंग के अंदर लोग किन परिस्थितियों में अपना काम करते हैं. उस वक्त उन्हें किन परेशानियों का सामना करना होता है.
इस बातचीत के लिए हमने कुछ वैसे लोगों को चुना, जिन्होंने अपनी ज़िंदगी का बड़ा हिस्सा (औसतन 25 साल) धरती के अंदर खान में काम करते हुए गुज़ारा है.
हालाँकि, अब वे पिछले कुछ साल से ओपन कास्ट माइंस (खुली खदान) में काम करने लगे हैं.
देश के कोल कैपिटल कहे जाने वाले धनबाद के चर्चित झरिया के एक कोयला खदान में काम करने वाले पोखन साव ऐसे ही शख्स हैं.
49 साल के पोखन साव अब सीनियर ओवरमैन हैं. महज 21 साल की उम्र में साल 1995 में इन्होंने माइनिंग वर्कर (खान मज़दूर) के तौर पर काम करना शुरू किया. अब वे रेस्क्यू टीम को भी लीड करते हैं.
जब पहली बार खदान में गए…
पोखन साव जब खदान के अंदर पहली बार गए तो साथ में अनुभवी साथियों (माइनिंग सरदार) के होने के बावजूद उन्हें डर लगा. यह सोचकर नर्वस होते रहे कि अगर अंदर कुछ अनहोनी हो गई, तो क्या होगा.
शुरुआती दिनों में खदान में किस रास्ते से गए और कैसे बाहर निकले, यह पता ही नहीं चलता था. धीरे-धीरे रास्ते से परिचित हो सके.
उन्होंने बीबीसी से कहा, “खदान में जाने से पहले वोकेशनल ट्रेनिंग सेंटर (वीटीसी) में पूरी ट्रेनिंग दी गई थी. यह बताया गया था कि अंदर क्या-क्या होता है. कैसे काम करना है. कैसे कम्यूनिकेशन होगा या फिर आपात स्थिति में कैसे रहना है. हमें एक डमी खदान में प्रैक्टिस भी करायी गई थी. इसके बावजूद मुझे डर लग रहा था. पहले दिन मैं सिर्फ़ 2-3 घंटे ही खदान के अंदर रहा. फिर धीरे-धीरे आदत बन गई. तब डर लगना बंद हो गया.”
झारखंड के पारसनाथ के मूल निवासी पोखन साव ने बताया कि खदान में जाने से पहले माइनिंग यूनिफ़ॉर्म पहनने होते हैं. विशेष प्रकार के जूते, ज़रूरी मशीनें और कमर मे बेल्ट लगानी होती है.
इसमें बैट्री लगी होती है. पहले इसका वजन 5 किलो होता था. अब यह बैटरी 250 ग्राम की होती है. इसे पतले तार के जरिये हमारी कैप लाइट (हेलमेट के अगले हिस्से में लगा टार्च) से जोड़ा जाता है. उसी कैपलाइट की रोशनी में हम अपना काम करते हैं. हालाँकि, खदान में जगह-जगह रोशनी का भी इंतज़ाम होता है लेकिन हमारा काम हमारी कैपलाइट से ही होता है.
खाना-पानी का इंतजाम

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पोखन साव ने कहा, “हम अपने साथ पानी की बोतल भी रखते हैं. नियमों के मुताबिक़ (माइंस रुल्स एंड रेगुलेशन) पीने के पानी की आपूर्ति पाइपलाइन के जरिये होनी चाहिए लेकिन प्राय: ऐसा नहीं होता. लिहाज़ा हम अपनी वाटर बोतल साथ ले जाते हैं. खाने का टिफिन ले जाने का चलन नहीं है.”
“पहले कुछ खदानों में कैंटीन भी हुआ करती थी लेकिन अब ऐसा नहीं है. अब ज़्यादातर ओपन कास्ट माइंस हैं. जो अंडर माइंस हैं, उनमें भी कैंटीन नहीं है. लिहाजा, खान मज़दूर ड्यूटी पर आने के पहले घर पर ही खा लेते हैं. हमारी आठ घंटे की शिफ्ट होती है. इस दौरान भूख नहीं लगती. शिफ़्ट के बाद खदान से बाहर आकर साफ-सफाई और कागजी काम करने होते हैं. उसके बाद हमलोग घर वापस लौटकर ही खा पाते हैं.”

ऑक्सीजन की आपूर्ति
उन्होंने बीबीसी से कहा, “खदान में ऑक्सीजन की आपूर्ति के लिए 2 रास्ते होते हैं. पंखों के जरिये सामान्य हवा खदान के अंदर भेजी जाती है, जो दूसरे रास्ते से बाहर निकलती है. प्रॉपर वैंटिलेशन होता है इसलिए साँस लेने के लिए कभी ऑक्सीजन की दिक़्क़त महसूस नहीं होती. ऑक्सीजन का लेवल कभी 19 प्रतिशत से कम नहीं होता.”
“हमें सेल्फ रेस्क्यूअर भी दिया जाता है. उसका वजन डेढ़ किलो का होता है तो कई बार मज़दूर उसे लेकर नहीं भी जाते हैं. यह बड़ी लापरवाही है. इसके बावजूद कभी ऑक्सीजन की दिक़्क़त नहीं होती. मैंने अपनी 28 साल की नौकरी में कभी ऑक्सीजन की कमी महसूस नहीं की है.”
कई दफा लोग खदान के अंदर सीढ़ियों से पैदल चलकर जाते हैं. लेकिन, खदान गहरी होने पर मज़दूरों को लिफ्ट (पीट) के जरिये भी ले जाया जाता है. इसे चानक भी कहते हैं.
खदान या सुरंग के अंदर काम करने वालों के लिए ये सामान्य बाते हैं जो उनकी दिनचर्या में शामिल है.
धरती के अंदर काम करने के ख़तरे

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धरती की सतह से कई सौ मीटर अंदर और कई मीटर गहरी खदान की सुरंगों में काम करने के अपने खतरे भी हैं. यह प्रकृति के विरूद्ध काम है. लिहाज़ा, इसकी अपनी चुनौतियां और खतरे हैं.
साल 1993 में बिहार के सुगौली (पूर्वी चंपारण) से झारखंड इलाके में आकर मज़दूर के तौर पर नौकरी शुरू करने वाले (अब क्लर्क) चंदेश्वर कुमार सिंह ने बीबीसी से बातचीत के दौरान कहा कि किसी भी सुरंग या खदान में जाने का मतलब ही है कि आप बाहरी दुनिया से कट चुके हैं.
“आपके पास कोई फोन नहीं है और न खाने का इंतज़ाम. आप अपनी व्यवस्था सिर्फ़ आठ घंटे की शिफ्ट के मुताबिक़ ही रखते हैं. सबसे बड़ा रिस्क तो यही है.”
उत्तरकाशी सुरंग हादसे में फँसे मज़दूरों का उदाहरण देते हुए वे कहते हैं, “उन मज़दूरों के पास सिर्फ अपनी शिफ्ट का इंतज़ाम रहा होगा. ऐसे में अगर उन्हें खाना-पानी नहीं पहुँचाया जाता, तो कोई कितने दिन तक सर्वाइव कर सकेगा.”
चंदेश्वर कुमार सिंह ने कहा, “कोयला खदान में काम करना तो और भी बड़ा रिस्क है. वहाँ से मिथेन गैस निकलती है. जो ज्वलनशील है. खतरा पैदा कर सकती है. अगर आग लगी, तो विस्फोट भी हो सकता है. पृथ्वी के अंदर का तापमान भी सतह की तुलना में अधिक होता है. इसलिए, धरती के अंदर का काम विपरीत परिस्थितियों में किया जाने वाला रिस्की काम है.”
सुविधाओं की कमी

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माइंस रुल्स से मुताबिक खदानों के अंदर शौचालय होना चाहिए ताकि मज़दूर इनका उपयोग कर सकें और सफ़ाई बनी रहे लेकिन प्राय: ऐसा नहीं होता. अधिकतर खदानों में शौचालय नहीं हैं. सुरंगों के अंदर भी ऐसी ही स्थिति है.
उत्तरकाशी के सुरंग प्रोजेक्ट में काम करने वाले झारखंड के एक मज़दूर और झरिया कोल ब्लॉक की माइंस में काम करने वाले कई मज़दूरों ने बीबीसी को बताया कि उनके लिए शौचालय की व्यवस्था नहीं है.
एक मज़दूर ने बीबीसी से कहा, “पेशाब लगे तो खदान में कहीं पर कर लीजिए. अंधेरा होता है तो कोई देखता नहीं. शौच लगने पर भी एक खास जगह पर जाना होता है. वह जगह परदे (ब्रिटिश क्लॉथ) से ढकी होती है. इसके अलावा और कोई उपाय नहीं है. खदान से बाहर ही प्रॉपर शौचालय मिलता है.”
दुर्घटना की स्थिति में क्या करते हैं?

खदान या सुरंग के अंदर होने वाली दुर्घटनाएँ काफी भयावह होती हैं. अधिकतर मामलों में रेस्क्यू करना कठिन होता है और जान की क्षति हो जाती है. पोखन साव और चंदेश्वर कुमार सिंह ने बीबीसी से कहा कि धरती के अंदर की दुर्घटनाओं में तकनीक, समर्पण, दक्षता और दुआएं समानांतर तरीके से काम करती हैं.
इन दोनों लोगों ने फरवरी-2001 में झरिया कोल ब्लॉक की बागडिगी खान हादसे को देखा है. उस हादसे में 29 खदान मज़दूरों की मौत हो गई थी. तब सिर्फ़ एक मज़दूर को जिंदा बचाया जा सका था.
पोखन साव ने बीबीसी से कहा, “तब 12 नंबर खदान में पानी भर गया था. पानी इतनी तेजी से भरा कि किसी को बाहर आने में सफलता नहीं मिली. मरे हुए मज़दूरों की लाशें निकालने में भी 7-8 दिन लगे. वह रेस्क्यू ऑपरेशन काफी कठिन था.”
पोखन साव साल 2010 के जीतपुर खदान हादसे में रेस्क्यू टीम में शामिल रहे थे. तब लिफ्ट का गर्म लोहा खदान के अंदर चले जाने से भयंकर आग लग गई थी.
उन्होंने कहा, “खदान में पानी होता है, जिसका रासायनिक गठन हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के मिलने से होता है. दुर्घटना की स्थिति में यह कंपाउंड टूट जाता है. अब हाइड्रोजन और ऑक्सीजन अलग-अलग हो गए. हाइड्रोजन ज्वलनशील गैस है और ऑक्सीजन जलने में मदद करती है. इसलिए आग और तेजी से लगती है. लिहाजा, थोड़ी सी चूक बड़े हादसे का कारण बन जाती है.”

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बीमार होने का ख़तरा
लंबे वक्त तक धरती के अंदर काम करने से कई तरह की बीमारियों के खतरे भी बढ़ जाते हैं.
खासकर कोल माइंस, पत्थर की खदान और सुरंग बनाने में लगे मज़दूरों को न्यूमोकोनोयोसिस जैसी लाइलाज बीमारी के खतरे होते हैं. यह बीमारी जानलेवा है. इसमें फेफड़ों में घूल जमा हो जाती है और साँस लेने में तकलीफ़ होने लगती है.
माइनिंग के नियमों के मुताबिक़ ऐसे मज़दूरों की नियमित स्वास्थ्य जाँच के अलावा हर पाँच साल पर विशेष जाँच करायी जानी चाहिए लेकिन ऐसा अक्सर नहीं होता.
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