अरविंद केजरीवाल के क्या पुराने तेवर लौट आए हैं, राष्ट्रीय राजनीति पर इसका कोई असर होगा?

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- Author, राजेश डोबरियाल
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
- पढ़ने का समय: 10 मिनट
दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल बहुत समय बाद अपने पुराने रंग में नज़र आए.
बहुत लंबे अरसे बाद उन्होंने अपना चिर-परिचित दावा दोहराया, ''केजरीवाल कट्टर ईमानदार है''. और इसके साथ ही कहा, 'मनीष सिसोदिया, संजय सिंह, दुर्गेश पाठक और आम आदमी पार्टी कट्टर ईमानदार हैं.''
अरविंद केजरीवाल ने यह दावा शुक्रवार को राउज़ एवेन्यू कोर्ट के शराब नीति से जुड़े कथित भ्रष्टाचार मामले में फ़ैसले के बाद किया.
कोर्ट ने दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल और दिल्ली के पूर्व डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया समेत 23 अभियुक्तों को आरोपों से मुक्त किया है.
अदालत ने फ़ैसला सुनाते हुए जांच में हुई खामियों के लिए सीबीआई को कड़ी फटकार लगाई और कहा कि चार्जशीट में कई खामियां हैं जिनका समर्थन किसी गवाह या बयान से नहीं होता. स्पेशल जज जितेंद्र सिंह ने ये भी कहा कि चार्जशीट में 'भ्रामक दावे' किए गए हैं.
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लेकिन सवाल यह है कि इससे अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी की राजनीति के फलक पर वापसी हो पाएगी?
राजनीतिक विश्लेषकों को लगता है कि यह इस पर निर्भर करता है कि अरविंद केजरीवाल ने अपने हालिया अनुभव से क्या सीखा है.
फ़ैसले में क्या है?

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लाइव लॉ के मुताबिक शुक्रवार को दिल्ली के राउज एवेन्यू कोर्ट ने आम आदमी पार्टी सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, तेलंगाना जागृति की फाउंडर के कविता और 20 अन्य को कथित शराब पॉलिसी स्कैम केस से जुड़े करप्शन केस में डिस्चार्ज कर दिया.
राउज़ एवेन्यू कोर्ट के स्पेशल जज जितेंद्र सिंह ने 598 पेज के कड़े शब्दों वाले ऑर्डर में सीबीआई को उसकी जांच के तरीके के लिए फटकार लगाई. साथ ही जांच एजेंसी की तरफ़ से कई कमियों को भी गिनाया.
अदालत ने कहा कि सिसोदिया के खिलाफ़ प्रथम दृष्टया मामला बनाने में सीबीआई विफल रही.
इसके अलावा जज ने यह भी कहा कि केजरीवाल को बिना किसी ठोस सबूत के इस केस में शामिल किया गया.
कोर्ट ने पाया कि प्रॉसिक्यूशन ऐसा कोई मटीरियल पेश करने में नाकाम रहा, जिससे पता चले कि उस समय के दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, जो केस में आरोपी नंबर 18 हैं, ने रिश्वत के पैसे लिए या उन्हें लेने में मदद की.
कोर्ट के मुताबक़ उनके ख़िलाफ़ आरोप सह अभियुक्तों या गवाहों के बयानों पर आधारित है, लेकिन कोर्ट ने उन्हें किसी भी क्रिमिनल साज़िश से जोड़ने वाली किसी भी स्वतंत्र पुष्टि के न होने पर ध्यान दिया.
कोर्ट ने कहा कि बेईमानी या लेन-देन के सबूत के बिना सिर्फ़ पॉलिसी से जुड़े फ़ैसलों को मंज़ूरी देने पर क्रिमिनल ज़िम्मेदारी नहीं बनती. जज को ऐसा कोई डॉक्यूमेंट्री या इलेक्ट्रॉनिक सबूत नहीं मिला, जिससे यह साबित हो सके कि केजरीवाल को कथित स्कैम से पैसे का फ़ायदा हुआ.
कोर्ट ने कहा, "एक डेवलपिंग इकॉनमी में पॉलिसी में बदलाव आम बात है और अक्सर रेवेन्यू बढ़ाने, रेगुलेटरी फ्रेमवर्क को बेहतर बनाने या पब्लिक वेलफेयर के मकसद को आगे बढ़ाने के लिए ये ज़रूरी होते हैं. क्रिमिनल केस को सिर्फ़ इसी वजह से सही नहीं ठहरा सकते कि कोई खास पॉलिसी उम्मीद के मुताबिक़ नतीजे नहीं देती, या निजी भागीदार ऐसी पॉलिसी के तहत कानूनी तौर पर मुनाफ़ा कमाते हैं."
"अच्छी नीयत से लिए गए आर्थिक और प्रशासनिक फ़ैसलों को तब तक क्रिमिनल नहीं बनाया जा सकता जब तक कि पहली नज़र में कोई साफ़ सबूत न हो जिससे गलत इरादे, लेन-देन या पद का गलत इस्तेमाल पता चले."
'हम कट्टर ईमानदार हैं'

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फ़ैसला सुनाए जाने के बाद राउज़ एवेन्यू कोर्ट से बाहर आए अरविंद केजरीवाल मीडियाकर्मियों से बात करते हुए भावुक हो गए. तब उनके साथ खड़े मनीष सिसोदिया ने उन्हें संभाला.
इसके बाद उन्होंने आम आदमी पार्टी नेता मनीष सिसोदिया और संजय सिंह के साथ एक प्रेस कांफ़्रेंस की.
इसमें उन्होंने कहा, "पिछले चार साल से ईडी को, सीबीआई को इस्तेमाल करके हमारे ऊपर शराब घोटाला नाम का एक आरोप लगाया गया. सीबीआई, ईडी ने इसमें चार्जशीट फ़ाइल की. आज कोर्ट को प्रथम दृष्टया यह निर्णय लेना था कि क्या सबूतों और बयानों के आधार पर पर्याप्त मटीरियल है कि इसमें मुकदमा चलाया जाए.. और कोर्ट ने लगभग 600 पेज के आदेश में कहा कि इतना भी सबूत नहीं है, इतने भी गवाहों के बयान नहीं हैं.. एक तिनका सा भी सबूत नहीं है कि इसमें मुक़दमा चलाया जा सके."
"कोर्ट ने कहा कि इतना फ़र्ज़ी केस है, एक भी सबूत नहीं है, एक भी गवाह नहीं है... कि इसमें मुक़दमा भी नहीं चलाया जा सकता."
प्रेस कांफ्रेंस में अरविंद केजरीवाल ने आरोप लगाया कि उनके ख़िलाफ़ षड्यंत्र रचा गया है.
उन्होंने कहा, "यह पूरा षड्यंत्र दो लोगों ने रचा- नरेंद्र मोदी जी और अमित शाह जी. और आज उन दोनों को सारे देश से माफ़ी मांगनी चाहिए. दोनों ने षड्यंत्र रचा कि आम आदमी पार्टी को ख़त्म किया जाए, बर्बाद किया जाए."
उन्होंने आगे कहा, "वह देख रहे थे कि वह आम आदमी पार्टी को दिल्ली में नहीं हरा सकते, काम की राजनीति के आधार पर वह कहीं खड़े नहीं होते, तो उन्होंने एक षड्यंत्र रचा. जनता जानती है कि केजरीवाल ईमानदार है तो उन्होंने कहा कि केजरीवाल की ईमानदारी पर चोट करो. वह जानते थे कि आम आदमी पार्टी ईमानदार है, उन्होंने कहा कि आम आदमी पार्टी की ईमानदारी पर चोट करो."
अरविंद केजरीवाल ने कहा, "मैंने ज़िंदगी में सिर्फ़ इज़्ज़त कमाई है, एक नया पैसा नहीं कमाया. आज कोर्ट के ऑर्डर से यह साबित हो गया कि केजरीवाल कट्टर ईमानदार है. मनीष सिसोदिया कट्टर ईमानदार, संजय सिंह कट्टर ईमानदार है, दुर्गेश कट्टर ईमानदार है, आम आदमी पार्टी कट्टर ईमानदार है."
"यह मैं नहीं कह रहा, यह कोर्ट ने पूरे देश के सामने कहा है."
उन्होंने उस सवाल का जवाब भी दिया जो राजनीतिक हलकों में बहुत समय से तैर रहा था.
उन्होंने ख़ुद कहा, "कई लोग कहते हैं कि जेल से आने के बाद केजरीवाल चुप क्यों हो गया? केजरीवाल ग़ायब हो गया, केजरीवाल कहां गया?"
खुद ही इन सवालों का जवाब देते हुए उन्होंने कहा, "मैं कोई नेता नहीं हूं, मैं कोई पॉलिटिशियन नहीं हूं. पॉलिटिशियन को फ़र्क नहीं पड़ता. उनको चार गाली दे दो, उनको फ़र्क नहीं पड़ता, मोटी चमड़ी होती है उनकी. मुझे जब कोई बेईमान बोलता है, मुझे फ़र्क पड़ता है. मुझे जेल भेजा जाता है, मेरे परिवार को ताने मारे जाते हैं तब मुझे फ़र्क पड़ता है, केजरीवाल को फ़र्क पड़ता है."
"इसीलिए मैंने तय किया था कि जब तक सारे देश के सामने निर्दोष साबित नहीं हो जाऊंगा, तब तक मैं चुप रहूंगा. आज मेरे दिल से बहुत बड़ा बोझ उतर गया है."
केजरीवाल से किसे फ़ायदा?

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अरविंद केजरीवाल बहुत दिनों बाद अपने पुराने रंग में, पुराने तेवरों में नज़र आए लेकिन क्या इससे आम आदमी पार्टी अपनी खोई हुई जगह बना पाएगी? और इससे देश की राजनीति में क्या फ़र्क पड़ेगा, ख़ासकर अगले साल होने वाले गोवा, पंजाब और गुजरात के चुनावों में?
वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक अदिति फडणीस मेहता कहती हैं, "आने वाले चुनाव में क्या होगा यह कहना तो अभी जल्दबाज़ी होगी लेकिन यह तय है कि आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता जिस निराशा में डूबे हुए थे, उस निराशा के बादल अब छंट गए हैं."
वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक नीरजा चौधरी भी इस बात से सहमत नज़र आती हैं. वह कहती हैं, " कथित शराब घोटाले के बाद न केजरीवाल, न आम आदमी पार्टी के दूसरे नेता कहीं नहीं दिख रहे थे. अब इस फ़ैसले के बाद उनके नेताओं में और कार्यकर्ताओं में नया उत्साह आएगा."
वह कहती हैं कि यह कहना होगा कि आम आदमी पार्टी में इस फ़ैसले से नई जान आई है लेकिन यह भी मानना होगा कि आम आदमी पार्टी जितना अच्छा करेगा उससे बीजेपी को फ़ायदा होगा.

कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने भी समाचार एजेंसी पीटीआई के साथ बात करते हुए कुछ ऐसा ही कहा.
उन्होंने कहा कि, "पंजाब और गुजरात में चुनाव आ रहे हैं तो केजरीवाल को वॉशिंग मशीन से निकालकर पेश किया जा रहा है. क्योंकि बीजेपी का लक्ष्य है कांग्रेस मुक्त भारत."
नीरजा चौधरी इसी बात को आगे बढ़ाते हुए कहती हैं, "दरअसल आम आदमी पार्टी की जिन राज्यों में पहचान है- पंजाब, गोवा और गुजरात, इसके साथ ही यूपी में भी... वही 2029 का मूड तय करेंगे. आप वहां दमखम से लड़ेगी तो वह कांग्रेस को नुक़सान करेगी."
"पंजाब में कांग्रेस की चुनावी संभावना बन रही है, बीजेपी का वहां स्वतंत्र वजूद नहीं है. वहां वह अकाली दल के साथ है. ऐसे में अगर बीजेपी को चुनना होगा तो वह चाहेगी कि कांग्रेस के बजाय आप मज़बूत हो. कांग्रेस अगर जीती तो उसके पास 5 राज्य हो जाएंगे और वह और मज़बूत हो जाएगी, यह बीजेपी नहीं चाहती."
वह कहती हैं, "गोवा में भी आम आदमी पार्टी अच्छा प्रदर्शन करेगी तो वह कांग्रेस का वोट काटेगी और बीजेपी मज़बूत होगी. यह ठीक है गुजरात प्रधानमंत्री और गृहमंत्री का गृह प्रदेश है और बीजेपी का गढ़ है लेकिन फिर भी वहां एंटी इनकम्बेंसी तो है ही. गुजरात में भी अगर आम आदमी पार्टी कांग्रेस का वोट काटेगी तो बीजेपी को फ़ायदा होगा."
नीरजा चौधरी कहती हैं, "कुछ लोगों को लगता है कि बीजेपी चाहती है कि आम आदमी पार्टी अच्छा प्रदर्शन करे क्योंकि अगर वह जीत भी गई और उसका आधार कुछ बढ़ भी गया तो बीजेपी इन्हें आसानी से कंट्रोल कर सकती है. लेकिन क्या ऐसा हो पाएगा, यह कहा नहीं जा सकता."
झटके खाकर क्या सीखा?

लेकिन क्या केजरीवाल के मज़बूत होने से आम आदमी पार्टी को भी फ़ायदा होगा?
अदिति फडणीस मेहता को लगता है कि नहीं.
वह कहती हैं, ''केजरीवाल को पिछले कुछ महीनों में कई धक्के लगे हैं. उनकी पार्टी के गोवा के प्रबंधक अमित पालेकर को कहा गया कि आप इस्तीफ़ा दे दीजिए. उनके साथ चार और लोगों ने इस्तीफ़ा दे दिया और अब पूरी पार्टी ही वहां न के बराबर है.''
''हालांकि उन्हें वहां अच्छा-ख़ासा वोट शेयर मिला था और पालेकर जी का कहना है कि उन्होंने इस बात की पैरवी की थी कि उन्हें अन्य पार्टियों, यानी कांग्रेस के साथ मिलकर स्थानीय निकाय का चुनाव लड़ना चाहिए. उनकी बात को ख़ारिज कर दिया गया जिसकी वजह से आम आदमी पार्टी, जिसे गोवा में काफ़ी उम्मीदें थीं, अब कहीं नहीं रह गई है.''
अदिति फडणीस कहती हैं कि इसी तरह गुजरात में आम आदमी पार्टी की नींव बहुत अच्छी पड़ी थी लेकिन उनके सारे लोग भाग गए थे.
वो कहती हैं, "तो इससे निष्कर्ष क्या निकलता है कि आप नींव बहुत अच्छी डालते हैं लेकिन उसके बाद लोगों को अपने साथ जोड़कर नहीं रख पाते हैं. उसकी वजह से आपके कार्यकर्ताओं ने सोचा कि हम कहीं और जाकर कोशिश करें तो ज़्यादा अच्छा होगा."
उनका मानना है, "भले ही अरविंद केजरीवाल अब नए जोशो-ख़रोश से फिर मैदान में उतरे हैं लेकिन गोवा जैसे राज्य में अब फिर से पार्टी खड़ा करना आम आदमी पार्टी के लिए बहुत मुश्किल होगा. वहां अगर आप कांग्रेस के साथ जाती है तो आपका अस्तित्व ही ख़तरे में पड़ जाएगा और अगर नहीं जाएगी तो अकेले आप इतनी मज़बूत नहीं है कि वहां सत्ता में आ सके, तो गोवा में पार्टी के सामने न उगलने और निगलने वाली स्थिति है."
वहीं स्थानीय स्तर पर केजरीवाल के काम करने की शैली पर भी सवाल उठते हैं.

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फडणीस कहती हैं कि अमित पालेकर ने एक उदाहरण देते हुए कहा था "मैं बहुत अच्छी फ़िश करी बनाता हूं. लेकिन ज़रूरी नहीं कि यह सभी जगह के लोगों को पसंद आए. लेकिन अगर पंजाब का कोई आदमी मुझे बताए कि मुझे कैसे फ़िश करी बनानी चाहिए तो मैं कहूंगा कि आप अपनी फ़िश करी अपने पास रखो."
वह कहती हैं कि इस उदाहरण के ज़रिये पालेकर यह बता रहे थे कि अरविंद केजरीवाल पार्टी में बहुत ज़्यादा दख़ल देते हैं जबकि स्थानीय स्तर पर पार्टी नेताओं को यह तय करने का अधिकार होना चाहिए कि राज्य में क्या किया जाना चाहिए, और उनकी यही दिक्कत गोवा से गुजरात तक है.
हालांकि वह मानती हैं कि पंजाब में स्थानीय निकाय चुनाव में रिज़ल्ट बिल्कुल उल्टा था और पंचायत चुनाव में आम आदमी पार्टी का प्रदर्शन बहुत अच्छा था. इससे पार्टी में काफ़ी उत्साह का संचार हुआ क्योंकि पिछले घटनाक्रम से कार्यकर्ता बहुत हतोत्साहित थे.
वह कहती हैं, "और अब जो यह फ़ैसला आया है, उसके बाद वहां आम आदमी पार्टी को कोई रोक नहीं पाएगा."
नीरजा चौधरी भी अरविंद केजरीवाल के काम करने की शैली पर अदिति फडणीस मेहता की बात से सहमत दिखती हैं.
वह कहती हैं कि आम आदमी पार्टी के कई कार्यकर्ता और इनके एमएलए तक कहते हैं कि वह किसी की सुनते नहीं हैं, तानाशाहीपूर्ण बर्ताव करने रहते हैं.
"लेकिन दिल्ली तक में चुनाव हारने के बाद और जेल से हो आने के बाद भी अब देखना यह होगा कि क्या वह अपने बर्ताव में कुछ बदलाव लाते हैं? अभी इसका इंतज़ार ही किया जा सकता है."
फडणीस कहती हैं कि आने वाले चुनाव में क्या होगा यह कहना तो अभी जल्दबाज़ी होगी लेकिन यह तय है कि आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता जिस निराशा में डूबे हुए थे, उस निराशा के बादल अब छंट गए हैं.
अब आने वाले समय में क्या होता है, इसका अंदाज़ा लगाना अभी ठीक नहीं क्योंकि अभी चुनाव में काफ़ी वक़्त है.
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