जोशीमठ जैसा ख़तरा क्या अब हिमाचल प्रदेश में भी मंडरा रहा है?

हिमाचल जोशीमठ भूस्खलन

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इमेज कैप्शन, जगह-जगह धंस रही है धर्मशाला से मैकलॉडगंज जाने वाली सड़क
    • Author, अर्चना फुल
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, शिमला से बीबीसी हिंदी के लिए

पिछले दिनों उत्तराखंड के जोशीमठ में जिस तरह से ज़मीन धंसने का मामला सामने आया, उसने उत्तराखंड ही नहीं बल्कि पड़ोसी राज्य हिमाचल प्रदेश में भी नई चिंताओं को जन्म दे दिया है क्योंकि यहां के कई इलाक़े भी पारिस्थितकीय तौर पर संवदेनशील माने जाते हैं.

हाल ही में राज्य में बनी कांग्रेस सरकार ने एक उच्चस्तरीय बैठक करके जोशीमठ की स्थिति का जायज़ा लिया और हिमाचल प्रदेश में ऐसी आशंकाओं वाली जगहों को लेकर विस्तृत रिपोर्ट तैयार करने का फ़ैसला लिया है.

राज्य सरकार ने डूब की आशंका, भूकंप और ज़मीन धंसने वाले क्षेत्रों की पहचान करके वहां पर आपदा प्रबंधन क्षमता और चेतावनी देने की व्यवस्था को बेहतर करने के निर्देश दिए हैं.

इन सबके बीच राज्य के जाने-माने भूवैज्ञानिक और पर्यावरणविद् डॉ. एके महाजन ने कहा, ''अब वक़्त आ चुका है कि स्थानीय प्रशासन मैकलॉडगंज जैसी जगह को जोशीमठ बनने से रोकने के लिए क़दम उठाए.''

मैकलॉडगंज हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला से भी ऊंचाई पर स्थित है. ये जगह तिब्बती धार्मिक गुरू दलाई लामा के शरण लिए जाने से भी मशहूर है.

विशेषज्ञों के मुताबिक धर्मशाला से मैकलॉडगंज जाने वाली सात किलोमीटर लंबी सड़क कई जगहों पर धंस रही है और उस पर तत्काल ध्यान देने की ज़रूरत है.

डॉ. महाजन सेंट्रल यूनिवर्सिटी, हिमाचल प्रदेश के पर्यावरण विज्ञान विभाग के प्रोफेसर हैं, इससे पहले वे देहरादून के वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ़ हिमालयन जियोलॉजी में काम कर चुके हैं.

उनके मुताबिक मैकलॉडगंज, हिमाचल प्रदेश का वह इलाक़ा है जो धंस रहा है. उन्होंने धर्मशाला के कई इलाक़ों को भूस्खलन के लिहाज़ से आपदाग्रस्त इलाक़ा माना है.

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इमेज कैप्शन, कांगड़ा ज़िले में भूस्खलन की फाइल फोटो

क्यों बढ़ रहा है ख़तरा?

विशेषज्ञों के मुताबिक धर्मशाला से मैकलॉडगंज जाने वाली सड़क पर ट्रैफ़िक का बहुत बोझ है और बीते कई सालों से यह सड़क क्षमता से अधिक परिवहन को ढो रही है. इस इलाक़े में भूस्खलन भी आम है.

इन चिंताओं की वजह से कांगड़ा के उपायुक्त ने धर्मशाला नगर निगम के आयुक्त और नगर योजना विभाग को धंसने वाली सड़कों पर रिपोर्ट जमा करने को कहा है.

इसके अलावा विशेषज्ञों को मैकलॉडगंज की पहाड़ी पर रिपोर्ट तैयार करके इलाक़े में ख़तरे के स्तर को आंकने के लिए कहा गया है.

कांगड़ा के उपायुक्त डॉ. निपुल जिंदल ने बताया, "यह काफ़ी संवेदनशील मामला है, इसलिए हम लोगों ने संज्ञान लिया है. ज़मीन से विस्तृत रिपोर्ट मिलने के बाद ही हम लोग क्या कर सकते हैं, देखेंगे."

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कहां-कहां है ज़्यादा ख़तरा?

  • हिमाचल प्रदेश में प्राकृतिक आपदाएं आती रही हैं और आपदा प्रबंधन राज्य सरकार के सामने चुनौती भी रहा है.
  • हिमाचल प्रदेश राज्य आपदा प्राधिकरण के आंकड़ों के मुताबिक राज्य में 17,120 जगहें ऐसी हैं जहां भूस्खलन की आशंका है.
  • इसमें सिरमौर ज़िले में सबसे ज़्यादा 2,559 जगहें चिन्हित हैं.
  • इसके बाद दूसरे स्थान पर चंबा ज़िला है जहां 2,389 जगहें ऐसी हैं. इनमें 675 जगहें ऐसी हैं, जहां पास में ही निर्माण के बड़े प्रोजेक्ट हैं या फिर लोगों का निवास है.
  • चंबा में ऐसी 113 जगहें हैं, जबकि मंडी में 110 जगहें ऐसे ख़तरे से भरी हैं.
  • इनमें से 27 जगहें ऐसी हैं, जहां भूस्खलन या ज़मीन धंसने की आशंका सबसे ज़्यादा है और ऐसी 27 जगहों में 10 जगहें शिमला और दो कांगड़ा ज़िले में हैं.
  • कांगड़ा ज़िले में शामिल दो जगहों में मैकलॉडगंज की पहाड़ी का इलाक़ा शामिल है.
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हिमाचल प्रदेश राज्य आपदा प्राधिकरण के मुताबिक़ 2022 में 117 जगहों पर ज़मीन धंसने का मामला सामने आया, जिसमें सबसे ज़्यादा 21 मामले कुल्लू ज़िले में देखने को मिले. जबकि 2021 में 100 जगहों पर ज़मीन धंसने का मामला सामने आया था.

बीते तीन सालों में ज़मीन धंसने और भूस्खलन से 180 लोगों की मौत हो चुकी है जबकि अचानक आयी बाढ़ के चलते 26 लोगों की मौत हुई है.

हालांकि, राज्य में बीते तीन सालों में अलग-अलग आपदाओं में 5012 लोगों की मौत दर्ज की गई है, जिसमें 2858 मौतें सड़क दुर्घटना के चलते हुई हैं.

राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान ने 2017 में मंडी के कोटरूपी इलाक़े में हुए भूस्खलन पर एक अध्ययन कराया था. इस हादसे में दो बसों में सवार 46 यात्रियों की मौत हुई थी.

इस अध्ययन में कहा गया था कि भूस्खलन, भूकंप के बाद सबसे ज़्यादा प्रभावित करने वाली आपदा है.

इस अध्ययन में कहा गया था, "भूकंप सबसे बड़ी आपदा है. आंकड़े बताते हैं कि रिक्टर स्केल पर चार से ज़्यादा की तीव्रता वाले भूकंप 80 से ज़्यादा बार आ चुके हैं. चंबा, हमीरपुर, कांगड़ा, कुल्लू और मंडी में इसका ख़तरा सबसे ज़्यादा है."

क्या कह रहे हैं विशेषज्ञ?

इसी रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि मॉनसून के मौसम में हिमाचल प्रदेश में कम से कम एक भूस्खलन का बड़ा मामला सामने आता ही है और यह मकान, सड़क, पुल और टेलीकॉम व्यवस्था को प्रभावित करता है.

इससे ना केवल राज्य की अर्थव्यवस्था प्रभावित होती है, बल्कि जनजीवन पूरी तरह से थम जाता है.

इस रिपोर्ट के मुताबिक राज्य में भूस्खलन की आशंका की सबसे बड़ी वजहों में लगातार बारिश का होना, भूकंपीय गतिविधियां, नदियों और झरनों से होने वाला कटाव, वनों की कटाई और ऊंचे पहाड़ों में लगातार बढ़ता अतिक्रमण शामिल है.

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पर्यावरणविद डॉ. एके महाजन बताते हैं, "राज्य में सेक्टर के हिसाब से मैपिंग कराए जाने की ज़रूरत है. अलग-अलग संस्थाएं, अलग-अलग जगहों की मैपिंग कर रही हैं लेकिन बेहतर प्रबंधन के लिए एक अध्ययन और एक रिपोर्ट होनी चाहिए. हमें बारिश में हर दिन होने वाली बारिश की मात्रा दर्ज करनी चाहिए और कई जगहों के मौसम संबंधी पूर्वानुमान को हासिल करने के लिए ऑटोमैटेड व्यवस्था होनी चाहिए."

एके. महाजन के मुताबिक राज्य के नीति निर्माताओं को भूस्खलन और ज़मीन धंसने के मामले को समग्रता से देखना चाहिए और ये पता लगाना चाहिए कि इसकी वजह क्या है, क्या बहुत ज़्यादा निर्माण इसकी वजह है? ये देखना चाहिए.

सरकार क्या कर रही है?

राज्य के राजस्व सचिव और राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के सदस्य सचिव ओंकार शर्मा ने कहा, "राज्य के मुख्यमंत्री ने शुरुआती चेतावनी जारी करने की व्यवस्था को लेकर नए निर्देश दिए हैं. आईआईटी मंडी की सहायता से हम लोग 30 जगहों पर ऐसी व्यवस्था स्थापित कर चुके हैं. हम लोग आपदाओं को रोकने के लिए ज़रूरी क़दम उठा रहे हैं."

ओंकार शर्मा दावा करते हैं कि दूसरे विभाग भी अपनी योजनाओं को लागू करने में आपदा प्रबंधन विभाग के सुझावों का ध्यान रख रहे हैं.

हालांकि, राज्य में सक्रिय पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि सरकार को अपने विकास की योजनाओं में बदलाव लाना चाहिए.

सुंदरलाल बहुगुणा के साथ चिपको आंदोलन में सक्रिय रहे हिमालय नीति अभियान चलाने वाले पर्यावरणविद कुलभूषण उपमन्यू कहते हैं, "बिना किसी वैज्ञानिक अध्ययन के राज्य में कई बड़े हाइड्रो प्रोजेक्ट लगाए गए हैं. हिमाचल प्रदेश को विकास और पर्यावरण में संतुलन रखना चाहिए. इसके लिए बड़े हाइड्रो प्रोजेक्ट का आवंटन बंद करना चाहिए और छोटे प्रोजेक्ट पर ध्यान देना चाहिए. सोलर पावर जैसे वैकल्पिक उपायों को बढ़ावा देना चाहिए."

उपमन्यू के मुताबिक, "बड़े हायड्रो प्रोजेक्ट से राज्य में पारिस्थितकीय संतुलन बिगड़ रहा है और मानव जनित आपदाओं को आमंत्रित कर रहा है, इससे स्थानीय लोगों का विस्थापन भी हो रहा है और लाखों पेड़ों की कटाई होती है."

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ डिज़ास्टर मैनेजमेंट के 2017 के अध्ययन में भी कहा गया था सतलुज, ब्यास, रावी, चेनाब और यमुना नदी पर कुल मिलाकर 118 हायड्रो प्रोजेक्ट हैं, इनमें 67 हायड्रो प्रोजेक्ट उन जगहों पर हैं जहां भूस्खलन की आशंका हैं.

इसके अलावा राज्य में फोर लेन की सड़कों के निर्माण से भी पहाड़ों का नुक़सान हो रहा है और आपदाएं बढ़ रही हैं.

उपमन्यू इस निर्माण को लेकर भी सरकार से विचार करने की अपील करते हुए कहते हैं, "राज्य सरकार को टूरिज़्म से जुड़े निर्माण कार्यों पर अंकुश लगा कर इको टूरिज़्म की गतिविधियों को बढ़ावा देना चाहिए,"

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