जोशीमठ: दरकते, धंसते, तबाह होते शहर के मुक़द्दर में क्या लिखा है- ग्राउंड रिपोर्ट

जोशीमठ

इमेज स्रोत, VINEET KHARE/BBC

इमेज कैप्शन, सुनैना सकलानी
    • Author, विनीत खरे
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, जोशीमठ

बद्रीनाथ, औली, वैली ऑफ़ फ़्लावर, हेमकुंड जैसी जगहों का द्वार कहलाने वाले जोशीमठ का भविष्य क्या है?

घर टूटे हैं. प्रभावित लोगों को सरकार से मदद की उम्मीद है और उनके मन में अपने और जोशीमठ के भविष्य को लेकर तमाम सवाल हैं.

पिछले साल अक्टूबर में जब हम गांव सुनील में सुनैना सकलानी के घर गए थे, तब से दीवारों और ज़मीन की दरारें बहुत बढ़ गई हैं.

शहर के कई लोगों की तरह सुनैना ने भी बताया कि दो जनवरी की रात धंसने जैसी आवाज़ आई. ऐसा लगा कि घर हिल सा गया हो. सुबह देखा तो घर रहने लायक नहीं था.

घर के सामने की धरती इतनी फट गई थी कि उसे भरने के लिए वहां गाड़ी भर पत्थर डालना पड़ा.

अक्टूबर में सकलानी परिवार ने हमें बताया था कि उन्होंने प्रशासन से मदद मांगी, पत्रकारों को अपना दर्द बताया, लेकिन उनकी कोई सुनवाई नहीं हुई. जोशीमठ में अब अधिकारियों, नेताओं और मंत्रियों का तांता लगा हुआ है.

छोड़िए YouTube पोस्ट
Google YouTube सामग्री की इजाज़त?

इस लेख में Google YouTube से मिली सामग्री शामिल है. कुछ भी लोड होने से पहले हम आपकी इजाज़त मांगते हैं क्योंकि उनमें कुकीज़ और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है. आप स्वीकार करने से पहले Google YouTube cookie policy और को पढ़ना चाहेंगे. इस सामग्री को देखने के लिए 'अनुमति देंऔर जारी रखें' को चुनें.

चेतावनी: तीसरे पक्ष की सामग्री में विज्ञापन हो सकते हैं.

पोस्ट YouTube समाप्त

घर के सामने सुनैना के पिता दुर्गा प्रसाद सकलानी ने हमसे कहा, "लड़की की शादी का भी प्रोग्राम था. सोचा था अप्रैल में मैं लड़की की शादी कर दूंगा. पर मुझे नहीं पता था कि ये मकान इतना फट जाएगा. मैंने सोचा है कि जब तक सिर के ऊपर छत न हो, मेरी लड़की की शादी नहीं होगी."

पास के रविग्राम की सुमेधा भट्ट के घर में भी दरारें ज़्यादा चौड़ी हुई हैं. दो जनवरी की रात के वाक़ये ने घर को कैसे झकझोरा, यही दिखाने वो हमें घर के भीतर ले गईं. दहशत इतनी है कि बच्चों को देहरादून भेज दिया गया है.

जोशीमठ

इमेज स्रोत, VINEET KHARE/BBC

इमेज कैप्शन, दुर्गा प्रसाद सकलानी बेटी की शादी की योजना बना रहे थे लेकिन लगता है अब इस पर पानी फिर गया है

दहशत पैदाकरने वाले दृश्य

क़रीब 20,000 की जनसंख्या वाले जोशीमठ में दरारें पुरानी बात हैं, लेकिन ज़मीन और दीवार फटने के ताज़ा दृश्य डर पैदा कर रहे हैं.

देहरादून में भूवैज्ञानिक डॉक्टर एसपी सती कहते हैं, "जोशीमठ का ज़ोन जो नीचे जा रहा है, कोई सूरत नहीं है कि जो घर हैं, जो बस्ती, जो भवन निर्माण हैं, वो बच जाएं. (ज़मीन पर) ऐसी बाधाएं नहीं रह गई हैं जो उसे रोक दें."

वो कहते हैं, "हां ये ज़रूर है कि ये बहुत कठोर वक्तव्य है. क्या पता लोग इस समय सुनने के लिए तैयार न हों. लेकिन ये बहुत पहले सोचा जाना चाहिए था, जब लोग चिल्ला रहे थे, जब वहां दरारें पड़ रही थीं."

बेंगलुरू में भूवैज्ञानिक और भूकंप पर जल्द बाज़ार में आने वाली एक किताब के लेखक सीपी राजेंद्रन के मुताबिक़, ऐसा लगता है कि जोशीमठ में दरारों का चौड़ा होना कुछ वक्त तक जारी रह सकता है.

वो कहते हैं, "अभी ये नहीं कहा जा सकता कि धंसाव कितना होगा, लेकिन ज़मीन नीचे धंसकर एक नई निचली ऊंचाई पर स्थिर होगी. सभी इमारतों को तो नहीं, लेकिन कई इमारतों को नुक़सान पहुंचेगा."

जोशीमठ

इमेज स्रोत, VINNET KHARE/BBC

इमेज कैप्शन, डॉक्टर एस.पी. सती

क्यों धंस रहा है जोशीमठ?

आधिकारिक रिकॉर्ड्स के मुताबिक़, जोशीमठ में क़रीब 1,800 भवन हैं. और साल 2011 के आंकड़े के मुताबिक़, यहां करीब 3,900 परिवार रहते हैं.

जानकार बताते हैं कि जोशीमठ पहाड़ से टूटे बड़े टुकड़ों और मिट्टी के अस्थिर ढेर पर बसा है. भारी निर्माण कार्य, जनसंख्या के बढ़ते बोझ और ड्रेनेज सिस्टम नहीं होने इत्यादि कारणों से धंसाव बढ़ा है.

अधिकारी कह रहे हैं कि जोशीमठ के भविष्य पर सवाल उठाने से स्थानीय लोगों को ही नुक़सान होगा.

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के सचिव आर. मीनाक्षी सुंदरम कहते हैं, "उत्तराखंड हिमालय से लगा एकमात्र राज्य है जहां बिजली का अभाव है जबकि हिमालय से लगे दूसरे राज्य देश के अन्य हिस्सों में बिजली आपूर्ति कर रहे हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि उत्तराखंड में बहुत सारे ऐक्टिविस्ट हैं."

वो कहते हैं, ''हिमालय के पहाड़ कई देशों में फैले हैं. चीन, नेपाल, पाकिस्तान, भारत जैसे कई देश हिमालय के पहाड़ से लगे हैं. सिर्फ़ उत्तराखंड को क्यों निशाना बनाया जा रहा है? अगर हिमालय इतना ही नाज़ुक है तो हर देश और राज्य में विकास कार्य रोक दिया जाना चाहिए."

जोशीमठ

इमेज स्रोत, VINEET KHARE

चमोली के ज़िलाधिकारी हिमांशु खुराना कहते हैं, "जितनी ज़्यादा हम ये बात करेंगे, (यहां) पर्यटक नहीं आएंगे. आख़िरकार यहां के लोगों पर ही असर होगा. हम ऐसी कोई भी बात करें, जोशीमठ धंस रहा है, या पूरा इलाका धंस जाएगा तो उसका वैज्ञानिक आधार होना चाहिए."

इसरो की एक रिपोर्ट से संकेत मिले कि जोशीमठ तेज़ी से धंस रहा है. इस पर हिमांशु खुराना ने कहा कि "आधिकारिक रूप से हमें ये रिपोर्ट नहीं मिली है जिसके आधार पर हम कार्रवाई कर सकें, लेकिन सिर्फ़ इसरो के एक्सपर्ट ही नहीं बल्कि वो एक्सपर्ट भी हैं जो यहां ज़मीन पर काम कर रहे हैं."

जोशीमठ

इमेज स्रोत, VINEET KHARE/BBC

इमेज कैप्शन, चमोली के ज़िलाधिकारी हिमांशु खुराना

दो जनवरी की रात क्या हुआ?

जोशीमठ में हमें कई लोगों ने कहा कि दो जनवरी की देर रात ऐसा लगा कि धरती धंसी, लेकिन आख़िर उस रात क्या हुआ था?

शहर के केंद्र से थोड़ी दूर जेपी पावर प्लांट का कैंपस है जहां कंपनी के कर्मचारी और इंजीनियर रहते हैं. एक साल पहले यहां भी दरारें दिखनी शुरू हुई थीं, लेकिन दो जनवरी के वाक़ये ने यहां के मेस और दूसरी इमारतों में बड़ी-बड़ी दरारें ला दी हैं.

सीढ़ियों से ऊपर चढ़ते हुए जब हम कैंपस के सबसे ऊपरी सिरे पर पहुंचे तो वहां बने बैडमिंटन कोर्ट के बीच की धरती फटी हुई थी. कोर्ट की ज़मीन का एक हिस्सा ऊपर तो एक नीचे था.

जोशीमठ

इमेज स्रोत, VINEET KHARE/BBC

तीन जनवरी की दोपहर साढ़े बारह बजे से ऊपर पहाड़ों के बीच से मटमैले पानी की धार निकलनी शुरू हुई थी, जो अभी तक जारी है. ये पानी कहां से आ रहा है, इसका जोशमठ पर क्या असर पड़ेगा, क्या इससे जोशीमठ और ज़्यादा धंसेगा, ये पता नहीं.

इन्हीं दरारों को देखने पहुंचे उत्तराखंड डिज़ास्टर मैनेजमेंट सचिव डॉक्टर रंजीत कुमार सिन्हा कहते हैं कि वो देखना चाह रहे थे कि दरारों में बढ़ोतरी तो नहीं हो रही, वो नए इलाकों में तो नहीं फैल रहे या फिर दरारों में कोई पैटर्न तो नहीं.

जोशीमठ

इमेज स्रोत, VINEET KHARE/BBC

इमेज कैप्शन, डॉक्टर रंजीत सिन्हा

भूवैज्ञानिक डॉक्टर स्पप्नमिता वैदिस्वरण भी कैंपस के दरारों का दौरा करके निकली ही थीं जब हम उनसे मिले.

उन्होंने बताया, "हमारे पास समस्या ये है कि हमारे पास ज़मीन के भीतर का डेटा नहीं है. हाल ही में धरती के कांपने की कुछ घटनाएं हुई हैं. हम कंपन को नापने के लिए उपकरणों का एक जाल फैलाना चाहते हैं ताकि हम इस इलाके में हल्के भूकंप को समझ सकें, और कुछ आवाज़ों को रिकॉर्ड कर सकें. क्योंकि जब दरारें हिलती हैं तो उनमें से कुछ फ़्रीक्वेंसी निकलती है. हम ये समझना चाहते हैं कि वो क्या कहानी बता रही हैं."

डॉक्टर स्पप्नमिता वैदिस्वरण कहती हैं कि ज़रूरत है कि ज़मीन पर भार को कम किया जाए.

जोशीमठ

इमेज स्रोत, VINEET KHARE/BBC

इमेज कैप्शन, भूवैज्ञानिक डॉक्टर स्पप्नमिता वैदिस्वरण

क्या जोशीमठ की स्थिति के लिए एनटीपीसी ज़िम्मेदार?

दो जनवरी की रात के वाक़ये के बाद एनटीपी के ख़िलाफ़ जोशीमठ में रोष बढ़ा है. दुकानों, गाड़ियों, घरों के बाहर हमें सफ़ेद कागज़ पर "एनटीपीसी वापस जाओ" लिखा मिला.

इन लोगों की मानें तो संवेदनशील पहाड़ के नीचे से बनाई जा रही कंपनी की सुरंग जोशीमठ की हालत के लिए ज़िम्मेदार है.

'जोशीमठ बचाओ संघर्ष समिति' के संयोजक अतुल सती कहते हैं, "अब मैं ये कह रहा हूं कि इस पूरी परिघटना के लिए, इस ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, सीमा के अंतिम नगर की बर्बादी के लिए, विनाश के लिए एनटीपीसी ज़िम्मेदार है. अब हम ये कह रहे हैं कि एनटीपीसी पर ये ज़िम्मेदारी डाली जाए... प्रत्येक आदमी को एक-एक करोड़ रुपए देना चाहिए."

जोशीमठ

इमेज स्रोत, VINEET KHARE/BBC

एनटीपीसी आरोपों से इनकार करती है, बीबीसी को भेजे एक वक्तव्य में एनटीपीसी ने कहा कि उसकी सुरंग जोशीमठ के नीचे से नहीं गुज़रती और ये शहर की बाहरी सीमा से एक किलोमीटर से भी ज़्यादा की दूरी पर है.

ऊर्जा मंत्री आरके सिंह ने कहा कि जोशीमठ की स्थिति और एनटीपीसी के बीच कोई भी संबंध नहीं है.

उत्तराखंड डिज़ास्टर मैनेजमेंट सचिव डॉक्टर रंजीत कुमार सिन्हा ने बताया, "एनटीपीसी और पावर मिनिस्ट्री को स्पष्ट निर्देश दिए गए थे कि आपको इसमें जो कुछ भी जांच करनी हो वो कर लीजिए और जनता की जो आशंका हो उसे दूर कीजिए. अभी जो हम बात कर रहे हैं वो शायद अटकलबाज़ी है.''

''जनता कह रही है कि इस कारण हो रहा है, वो कह रहे हैं इस कारण नहीं हो रहा है. लेकिन कोई भी सबूत के साथ नहीं आ रहा है कि असल वजह क्या है. उनको यही निर्देश दिए गए हैं कि आप सबूत के साथ, जांच रिपोर्ट के साथ आइए."

शहर के केंद्र में एक होटल इतना असुरक्षित है कि इसे तोड़ा जा रहा है. इसी के पीछे बने घर इतनी बुरी हालत में हैं कि हमें वहां जाने से रोक दिया गया.

लोग होटलों, गुरुद्वारों में शरण ले रहे हैं. उन्हें समझ नहीं आ रहा है कि वो इन कमरों में कब तक रहेंगे. यहां वो सुकून कहां जो लोगों की अपनी छत के नीचे था.

जोशीमठ

इमेज स्रोत, VINEET KHARE

इमेज कैप्शन, इस होटल को तोड़ा जा रहा है

'लोगों को पांच जगह बसाने की तैयारी'

डॉक्टर रंजीत कुमार सिन्हा ने बताया कि सरकार ने लोगों को बसाने के लिए पांच जगह ज़मीनें देखी हैं.

रविवार को बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, "भारतीय भूवैज्ञानिक संगठन ने चार जगहों का सर्वे किया है. एक और जगह का सर्वे चल रहा है. वो भी मेरे ख़्याल से एक दो दिन में पूरा हो जाएगा. हम ट्रांज़ीशन शेल्टर बना रहे हैं. ''

''हम प्री फ़ैब्रिकेटेड ट्रांज़ीशन शेल्टर बना रहे हैं, उसमें हम तीन तरह का सेट रख रहे हैं -वन रूम, टू रूम, थ्री रूम सेट. जनता उसे देख ले. पसंद आएगा तो ठीक है, नहीं तो हम कुछ और व्यवस्था करेंगे."

ये पूछे जाने पर कि ये व्यवस्था कितने लोगों के लिए की जा रही है, उन्होंने कहा, "हम अभी जो प्लैन कर रहे हैं उसमें 500 से 600 प्री-फ़ैब्रिकेटेड ट्रांज़िट सेंटर्स बनाने की बात है. ज़रूरत पड़ी तो ये एक महीने के अंदर बन सकती हैं. जितनी भी चाहें बन सकती हैं."

जोशीमठ

इमेज स्रोत, VINEET KHARE/BBC

इमेज कैप्शन, जोशीमठ को बचाने की गुहार लगाती स्थानीय महिलाएं

मीनाक्षी सुंदरम कहते हैं, "साल 2013 में केदारनाथ की तबाही से दो साल तक पर्यटन पर असर रहा. घटना केदारनाथ में हुई, लेकिन लोग मसूरी तक नहीं आ रहे थे. इसलिए मीडिया से मेरा अनुरोध है कि इस मामले को और ज़्यादा हाइप न करे."

दून विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र डिपार्टमेंट के प्रोफ़ेसर और प्रमुख डॉक्टर राजेंदर पी ममगैन के मुताबिक़, उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था में पर्यटन का योगदान 12-16 प्रतिशत का है. वो कहते हैं कि जोशीमठ की स्थिति से हालांकि राज्य की अर्थव्यवस्था पर बहुत ज़्यादा असर नहीं पड़ेगा, स्थानीय अर्थव्यवस्था ज़रूर प्रभावित होगी.

प्रशासन भरोसा दिला रहा है कि सब मिल कर बेहतर जोशीमठ बनाएंगे. पर लोगों की नज़र होगी कि ये वायदे कितने पूरे होते हैं.

ये भी पढ़ें:-

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)