उत्तराखंड में किस हाल में हैं मदरसे, बीजेपी सरकार क्यों करना चाहती है सर्वे

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- Author, राजेश डोबरियाल
- पदनाम, देहरादून से, बीबीसी हिंदी के लिए
देहरादून के क्लेमेंट टाउन छावनी क्षेत्र की चौड़ी सड़कों के पीछे जाने के बाद अचानक तंग गलियां शुरू हो जाती हैं. इस आशंका के बीच कि तंग गलियों में से गाड़ी निकल भी पाएगी या नहीं, हम भारूवाला के मदरसा अबुल कलाम आज़ाद तक पहुंचे, लेकिन इस मदरसे में अंग्रेज़ी में लगे बोर्ड में कहीं भी उसे मदरसा नहीं कहा गया है.
स्कूल का बोर्ड इसे अंग्रेज़ी मीडियम स्कूल बताता है जिसे राज्य सरकार से मान्यता मिली हुई है. उत्तराखंड मदरसा बोर्ड के डिप्टी रजिस्ट्रार ने इसे मदरसों के लिए मिसाल बताया था, तो हम इस आदर्श मदरसे को देखने पहुंच गए. ख़ास बात यह है कि उत्तराखंड सरकार के मदरसों के सर्वे को लेकर मदरसा या स्कूल संचालकों को कोई एतराज़ नहीं था, बल्कि उन्होंने तो इसका स्वागत ही किया.
दरअसल उत्तर प्रदेश की तर्ज पर उत्तराखंड में भी मदरसों की जांच को लेकर राजनीतिक सरगर्मियां तेज़ हो गई हैं. हाल ही में उत्तराखंड वक्फ़ बोर्ड के अध्यक्ष बने पूर्व बीजेपी प्रवक्ता शादाब शम्स ने मदरसों के सर्वे की बात कही.
इसके बाद मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी मदरसों के सर्वे को ज़रूरी बता दिया. हालांकि उत्तराखंड के समाज कल्याण मंत्री ने साढ़े चार महीने पहले ही मदरसों के सर्वे के आदेश दे दिए थे.

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मदरसा बोर्ड, मदरसे और स्कूल

उत्तराखंड में मदरसा बोर्ड की स्थापना 2012 में हुई थी. इसके बाद हरीश रावत के मुख्यमंत्रित्व काल में इसे वैधानिक स्वरूप प्रदान किया गया था.
2016 में 419 मदरसे उत्तराखंड मदरसा बोर्ड से मान्यता प्राप्त थे. बाद में चार मदरसों ने मदरसा बोर्ड की मान्यता छोड़ विद्यालयी शिक्षा बोर्ड से मान्यता ले ली. अब 415 मदरसे बोर्ड से संबद्ध हैं.
इनमें से एक मौलाना रिसालुद्दीन हक्कानी का मदरसा भी था. उत्तराखंड विद्यालयी शिक्षा बोर्ड से मान्यता लेने के बाद अब वह देहरादून में ही दसवीं तक की मान्यता वाला एक स्कूल चला रहे हैं- आज़ाद एजुकेशन अकेडमी.
बता दें कि कक्षा के लिहाज से मदरसों को चार वर्गों में रखा जाता है. प्राथमिक यानी पहली से पांचवीं कक्षा तक को तहतानिया कहा जाता है. छठी से आठवीं तक के मदरसों को फ़ौकानिया कहा जाता है.
नवीं-दसवीं की शिक्षा पाने वाले को मुंशी/मौलवी का सर्टिफ़िकेट मिलता है और ग्यारहवीं-बारहवीं की पढ़ाई को आलिया कहा जाता है. बारहवीं पास करने वाला आलिम कहलाता है.

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मदरसों के सर्टिफ़िकेट की मान्यता नहीं

बीबीसी हिंदी से बातचीत में मौलाना रिसालुद्दीन कहते हैं कि सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि मदरसा बोर्ड का कोई सिलेबस ही नहीं है. इसकी वजह से 2015 से ही मदरसा बोर्ड के सर्टिफ़िकेट्स की मान्यता का मामला फंसा हुआ है.
मदरसा बोर्ड लगातार पाचंवीं से बाहरवीं तक के सर्टिफ़िकेट को शिक्षा बोर्ड के सर्टिफ़िकेट के समकक्ष मान्यता देने की मांग कर रहा है.
अल्पसंख्यक मामलों पर लगातार काम करने वाले पत्रकार शाह नज़र कहते हैं, "उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, महाराष्ट्र जैसे राज्यों में मदरसों के छात्रों की पढ़ाई को शिक्षा बोर्ड के समकक्ष मान्यता है, लेकिन उत्तराखंड में नहीं. इसकी वजह से मदरसों से पास होने वाले छात्रों को सामान्य स्कूलों या फिर कॉलेज में एडमिशन नहीं मिल पाता."
मौलाना रिसालुद्दीन कहते हैं सबसे बड़ी दिक़्क़त यही है और इसी वजह से उन्होंने अपने मदरसे को स्कूल में तब्दील करवा लिया ताकि वहां पढ़ने वाले बच्चों का भविष्य ख़राब न हो.

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मदरसे के छात्रों को यूनिवर्सिटी में मिला एडमिशन

मदरसा बोर्ड के डिप्टी रजिस्ट्रार अब्दुल यामीन कहते हैं कि यह एक बड़ा भ्रम है. उन्होंने करीब एक साल पहले मदरसा बोर्ड में डिप्टी रजिस्ट्रार की ज़िम्मेदारी संभाली है.
बीबीसी हिंदी से बातचीत में वह कहते हैं, ''न जाने अब तक ऐसा क्यों हुआ लेकिन मदरसा बोर्ड के सर्टिफ़िकेट्स को अस्थायी मान्यता तो 2015 से ही है. लेकिन मदरसा बोर्ड के अधिकारियों की लापरवाही से यह बात फैल गई कि मदरसा बोर्ड के सर्टिफ़िकेट को विद्यालयी शिक्षा बोर्ड के समकक्ष नहीं माना जाता और इसका ख़ामियाजा हज़ारों विद्यार्थियों को भुगतना पड़ा है.
इसके विपरीत मदरसों से पढ़ने वाले बच्चों को अन्य स्कूलों में और आलिम बनने वाले विद्यार्थियों को कॉलेज में एडमिशन मिलने में कोई दिक़्क़त नहीं होनी चाहिए. दरअसल मदरसों में एनसीईआरटी का तैयार सिलेबस ही पढ़ाया जाता है. बस यह हिंदी या अंग्रेज़ी के बजाय उर्दू में होता है. इसके अलावा दीनी तालीम और उर्दू की पढ़ाई भी अतिरिक्त करवाई जाती है.''
यामीन कहते हैं कि उन्होंने मदरसों को बता दिया है कि किसी भी किस्म की दिक्कत हो तो वह बोर्ड से संपर्क कर सकते हैं. हाल ही में मदरसों से पास कई विद्यार्थियों को कुमाऊं विश्वविद्यालय में ऐडमिशन भी मिला है.

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राजनीति और सर्वे

भाजपा के पूर्व प्रवक्ता और उत्तराखंड में पार्टी के मुस्लिम चेहरे के रूप में पहचाने जाने वाले को शादाब शम्स 7 सितंबर को उत्तराखंड वक्फ़ बोर्ड का अध्यक्ष बनाया गया था.
पद संभालने के बाद शादाब शम्स ने भाजपा के एजेंडे को आगे बढ़ाना शुरू किया और रुड़की में स्थित मशहूर दरगाह पिरान कलियर में नशाखोरी और देह व्यापार होने की बात कह दी.
इस पर बवाल हुआ तो वह अपने बयान से पलट गए और कहा कि वह दरगाह क्षेत्र नहीं बल्कि विधानसभा और गांव की बात कर रहे थे.
इसके अलावा शादाब शम्स ने यूपी की तर्ज पर उत्तराखंड के मदरसों का सर्वे करने की भी मांग की. उनकी इस मांग का समर्थन अगले ही दिन मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कर दिया.
मुख्यमंत्री ने कहा कि बहुत सारी जगहों पर मदरसों को लेकर तमाम तरह की बातें आ रही हैं, इसलिए उनका एक बार सर्वे होना नितांत जरूरी है जिससे सारी वस्तुस्थिति स्पष्ट हो जाए.
लेकिन समाज कल्याण मंत्री चंदन रामदास तो शपथ ग्रहण करने के एक महीने बाद ही यानी कि 23 अप्रैल को ही मदरसों के सर्वे की बात कह चुके थे.

बच्चों का भविष्य

बीबीसी हिंदी से बातचीत में चंदन रामदास ने कहा कि ''मदरसों का सर्वे कराने का आदेश इसलिए दिया गया क्योंकि उनके सर्टिफ़िकेट की मान्यता न होने की वजह से बच्चों का भविष्य ख़राब हो रहा था. मदरसों को कहा गया कि आप या तो विद्यालयी शिक्षा बोर्ड से मान्यता ले लो या फिर बच्चों के भविष्य की सुरक्षा के लिए कोई और उपाय करो.''
चंदन रामदास यह भी कहते हैं कि सर्वे उन्हीं 192 मदरसों का करवाया जाएगा जिन्हें राज्य या केंद्र सरकार से सहायता मिलती है.
हालांकि मंत्री के आदेश के साढ़े चार महीने बाद भी सर्वे शुरू नहीं हो पाया है. अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के निदेशक राजेंद्र कुमार ने बीबीसी हिंदी से बातचीत में कहा कि मंत्री जी का अनुमोदन मिल गया है और अब सर्वे का काम शुरू किया जा रहा है.
हालांकि चंदन रामदास जल्द ही सर्वे की स्थिति जानने के लिए समीक्षा बैठक बुलाने की तैयारी कर रहे हैं.
बता दें कि उत्तराखंड में सिर्फ़ एक मदरसे को ही सहायता प्राप्त स्कूलों की तरह सरकारी सहायता मिलती है. बाकी करीब 192 मदरसों को एसपीईएमएम (स्कीम फ़ॉर प्रोवाइडिंग एजुकेशन इन मदरसा) के तहत शिक्षकों को निश्चित मानदेय मिलता है. स्नातक शिक्षकों को 6,000 रुपये और परास्नातक या बीएड को 12,000 रुपये.
इसके अलावा कुछ मदरसों को मिड-डे-मील भी मिलता है.

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मदरसों की जांच

भारूवाला के मौलाना अबुल कलाम आज़ाद मदरसे में हमें मदरसा संचालक और प्रिंसिपल शहज़ाद अली और वाइस प्रिंसिपल बिल्क़ीस जहाँ मिले.
बिल्कीस उत्तराखंड मदरसा शिक्षक संघ की मीडिया प्रभारी भी हैं.
शहज़ाद अली सरकार के सर्वे करवाए जाने का स्वागत करते हैं. वह कहते हैं कि अल्पसंख्यक कल्याण विभाग और मदरसा बोर्ड के अधिकारी तो समय-समय पर मदरसे की जांच के लिए आते ही रहते हैं.
वह बताते हैं कि सर्टिफ़िकेट की मान्यता न होने की दिक़्क़त के चलते ही उन्होंने 2017 में ओपन स्कूल से दसवीं-बारहवीं की मान्यता ले ली है.

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चूंकि स्कूल में अब अंग्रेज़ी मीडियम में पढ़ाई करवाई जाती है और उत्तराखंड बोर्ड का सिलेबस लगा हुआ है, इसलिए बच्चों को कहीं भी एडमिशन में परेशानी नहीं होती.
शहज़ाद गर्व से बताते हैं कि इस साल उनके स्कूल की पांच छात्राएं उत्तराखंड के टॉपर्स में शामिल रही हैं.
उन्होंने एक बड़ा टीवी भी क़िस्तों पर ख़रीद लिया है और जल्द ही स्मार्ट क्लास भी शुरू करने वाले हैं.
मौलाना अबुल कलाम आज़ाद मदरसा की वाइस प्रिंसिपल बिल्क़ीस जहाँ बताती हैं कि ''इस मुस्लिम बहुल आबादी में आस-पास करीब पांच स्कूल हैं. जो लोग अपने बच्चों को दीनी तालीम भी देना चाहते हैं, वे उन्हें इस मदरसे या स्कूल में डालते हैं.''

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शहज़ाद कहते हैं कि स्कूल कहने से ज़्यादा बच्चे स्कूल में आते हैं, अंग्रेज़ी मीडियम भी आकर्षित करता है हालांकि दीनी तालीम और उर्दू यहां अतिरिक्त पढ़ाई जाती है.
बिल्कीस कहती हैं कि मदरसा है तो मदरसा करने में शर्म नहीं करनी चाहिए. बल्कि लोगों को मदरसे की पुरानी इमेज को बदलने की ज़रूरत है.
इस स्कूल में साइंस पढ़ाने वाले एक हिंदू शिक्षक ने यहीं से आलिम की पढ़ाई की ताकि वह इस परिवेश को, बच्चों को और साथी शिक्षकों को बेहतर ढंग से समझ सकें.
देश के पहले शिक्षा मंत्री के नाम पर बना यह मदरसा और स्कूल कम संसाधनों में एक बेहतर मॉडल पेश करता नज़र आता है.
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