मदरसों में गीता रामायण पढ़ाने की ख़बर को सरकार ने बताया तथ्यों से खिलवाड़

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- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
शिक्षा मंत्रालय के अधीन स्वायत संस्थान 'राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी शिक्षा संस्थान' से मान्यता प्राप्त मदरसों में गीता और रामायण पढ़ाए जाने की रिपोर्ट को केंद्र सरकार ने खारिज किया है.
सरकार की ओर से जारी बयान में कहा गया है, "इस समाचार में तथ्यों के साथ खिलवाड़ किया गया है, यह वास्तविकता से परे है और इसके पीछे दुर्भावनापूर्ण इरादा नजर आता है. यहां पर स्पष्ट किया जाता है कि एनआईओएस मदरसों को एसपीक्यूईएम (मदरसों की गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए विशेष प्रावधान) के तहत मान्यता देता है."
"इस प्रावधान के अंतर्गत छात्रों को औपचारिक शिक्षा प्रणाली के विपरीत निश्चित विषय संयोजन की बंदिशों के बिना विभिन्न विषयों की पेशकश की जाती है. एनआईओएस द्वारा उपलब्ध कराए गए विषयों में से विषय संयोजन का चयन करना छात्र के विवेक पर निर्भर है."
"लगभग 100 मदरसों को एनआईओएस से मान्यता मिली हुई है, जिनमें 50,000 छात्र पढ़ते हैं. इसके अलावा, एनआईओएस की निकट भविष्य में लगभग 500 और मदरसों को मान्यता देने की योजना है. ऐसा पूरी तरह से मदरसों की मांग के आधार पर ही किया जाएगा."
दरअसल, 'राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी शिक्षा संस्थान' यानी 'एनआईओएस' ने भारत के प्राचीन ज्ञान के लिए अपने पाठ्यक्रम में कुल 15 कोर्स शामिल किए हैं. ये नए कोर्स फ़िलहाल कक्षा तीन, पाँच और आठ के लिए बनाया गया है जो तीन भाषाओँ में उपलब्ध कराए जा रहे हैं.
इसकी औपचारिक घोषणा मंगलवार को एक समारोह में की गई जिसमें केंद्रीय शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक शामिल थे. उनका कहना था कि इस शिक्षा का लाभ 'एनआईओएस' बोर्ड से जुड़ने वाले हर शैक्षणिक संस्थान को मिलेगा जिनमे लगभग सौ मदरसे भी शामिल हैं.
रमेश पोखरियाल निशंक ने ये भी कहा कि ये सब कुछ नई शिक्षा नीति के अनुरूप ही किया जा रहा है. कुछ समाचार माध्यमों में कहा गया है कि नए कोर्स के लागू होने के बाद अब मदरसों में भी गीता और रामायण भी पढ़ाए जाएंगे.

'एनआईओएस' का पाठ्यक्रम
लेकिन 'एनआईओएस' की अध्यक्ष सरोज शर्मा ने बीबीसी से बात करते हुए इसका खंडन किया और कहा कि कहीं से भी ये नहीं कहा गया है कि मदरसों में गीता या रामायण को पढ़ाया जाना अनिवार्य किया जा रहा है.
उनका कहना था कि कुल 15 कोर्स तीन भाषाओं में उपलब्ध कराए जा रहे हैं - हिंदी, अंग्रेज़ी और संस्कृत. वो ये भी कहती हैं कि ये कोर्स मुख्यतः वेद, योग, ज्योतिष शास्त्र, विज्ञान और व्यावसायिक शिक्षा से संबंधित हैं.
सरोज शर्मा कहती हैं, "लगभग सौ मदरसों के साथ 'एनआईओएस' का क़रार हुआ है जहां हमारे बनाए गए कोर्स पढाए जाएंगे. आने वाले कुछ सालों में ऐसे मदरसों की तादात पाँच सौ तक पहुँच जाएगी. मुक्त विद्यालय के बनाए पाठ्यक्रम में कई विषय ऐसे हैं जो बिलकुल अनिवार्य नहीं है और ये संस्था और छात्र पर निर्भर करेगा कि वो कौन सा विषय चुनते हैं."
जमीयत उलेमा-ए-हिंद भी कई मदरसों का संचालन करता है और इन मदरसों में प्राथमिक, सेकेंडरी और सीनियर सेकेंडरी स्तर पर 'एनआईओएस' का पाठ्यक्रम शामिल किया गया है.

सरकारी मदद वाले मदरसे
भारतीय मुसलमानों की सामाजिक और धार्मिक संस्था जमीयत में शिक्षा का संयोजन करने वाले नियाज़ अहमद फ़ारूक़ी कहते हैं कि भारत में दो तरह के मदरसों का संचालन होता है.
"एक वो जिन्हें सरकारी मदद मिलती है और दूसरे वे जिन्हें नहीं मिलती. सरकारी मदद वाले सरकार द्वारा अल्पसंख्यकों के लिए चलाए जा रहे विशेष कार्यक्रम के तहत संचालित किये जा रहे हैं जबकि समाज द्वारा संचालित मदरसे समूहों द्वारा संचालित हैं."
फ़ारूक़ी जिस योजना की बात कर रहे थे वो 'अल्पसंख्यकों को गुणवत्ता वाली शिक्षा देने के लिए चलाई जा रही केंद्र प्रायोजित योजना' (एसपीक्यूईएम) के अंतर्गत आती है.
'एनआईओएस' के अनुसार राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनपीई) ने राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली की संकल्पना अपनाई है जिसका अर्थ है कि एक स्तर विशेष तक सभी विद्यार्थी, चाहे वे किसी जाति धर्म, भाषा अथवा लिंग के हों, उन्हें समान गुणवत्ता की शिक्षा दी जाएगी.
नई बनाई गई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भी "शैक्षिक रूप से पिछड़े हुए अल्प संख्यकों के उत्थान" के लिए सुविधाओं का प्रावधान किया गया है.

गीता और रामायण पढ़ाने का प्रावधान
अल्पसंख्यक वर्ग के लिए जारी योजनाओं के बारे में बताते हुए 'एनआईओएस' का कहना है कि इन वर्ग के छात्रों को आधुनिक विषयों में शिक्षा प्रदान करने के लिए केन्द्र सरकार मदरसा आधुनिकीकरण योजना चला रही है.
'एनआईओएस' के अनुसार, "इस योजना का उद्देश्य प्रारंपरिक संस्थानों जैसे मदरसों और मकतबों को विज्ञान, गणित, सामाजिक अध्ययन, हिंदी और अंग्रेज़ी विषयों की पाठ्यक्रम शुरू करने के लिए वित्तीय सहायता देकर प्रोत्साहित करना है. लेकिन पारंपरिक मदरसों और मकतबों के आधुनिकीकरण की प्रक्रिया स्वैच्छिक होगी."
फ़ारूक़ी के अनुसार, जो सरकारी मदद से चलने वाले मदरसे हैं, उनमें नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुकूल बदलाव किए गए हैं.
वो कहते हैं, "नई नीति के तहत भारत के प्राचीन ज्ञान के बारे में पढ़ाने का प्रावधान है. मगर ये स्वेच्छिक है. गीता और रामायण पढ़ाने का प्रावधान है. मगर ये अनिवार्य नहीं है."
चूँकि 'एनआईओएस' के कोर्स ओपन स्कूल सिस्टम के तहत पढ़ाए जाते हैं, इसलिए इसमें भी विषयों की अनिवार्यता नहीं रखी गई है.

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पाँच मुख्य विषय
हालांकि जमीयत ने ख़ुद के द्वारा संचालित किए जा रहे मदरसों के संबंध में जो पर्चे छपवाए हैं, उसमे पाँच मुख्य विषयों का उल्लेख किया गया है.
जमीयत ने 'सुझाव' दिया है कि मदरसे के छात्रों को इन विषयों को अवश्य ही पढ़ना चाहिए - उर्दू, अरबी, मनोविज्ञान, बिज़नेस स्टडीज़ और भारतीय संस्कृति और परंपरा.
जमीयत के पर्चे में कहा गया है कि "उर्दू और अरबी की जगह छात्र अंग्रेज़ी, हिंदी, विज्ञान और समाज शास्त्र ले सकते हैं."
फ़ारूक़ी के अनुसार मदरसों के लिए जिस तरह का पाठ्यक्रम 'एनआईओएस' ने मदरसों के लिए बनाया है वो काफ़ी विस्तृत और अच्छा है जिससे ज़्यादा से ज्यादा छात्र ख़ुद को शिक्षा से जोड़ पाने में कामयाब रहेंगे.
उत्तर प्रदेश में मदरसा शिक्षा परिषद के अधीन ही मदरसों का संचालन किया जाता है जिसका पाठ्यक्रम 'एनआईओएस' जैसा विस्तृत तो नहीं लेकिन वो भी काफ़ी व्यापक है जिसके तहत संस्कृत, योग और विज्ञान पहले से ही शामिल हैं.
'स्वागत होना चाहिए'
एजाज़ अहमद उत्तर प्रदेश में रहते हैं और आधुनिक मदरसा संघ के अध्यक्ष भी हैं.
बीबीसी से बात करते हुए वो कहते हैं, "अगर गीता, रामायण, महाभारत, वेद, उपनिषद और योग को एनआईओएस अपने पाठ्यक्रम में शामिल भी करता है तो उसका स्वागत होना चाहिए."
वो कहते हैं कि उत्तर प्रदेश के मदरसों में पहले से ही एनसीईआरटी की किताबें लागू हैं. इन मदरसों में इतिहास, हिंदी और विज्ञान जैसे विषयों के अलावा संस्कृत और महापुरुषों की जीवनी पहले से ही पढ़ाई जा रही है.
लेकिन वो कहते हैं कि एनआईओएस, मदरसों को मान्यता देने में कई वर्षों का समय लगाता है जो कभी-कभी तो पाँच साल से भी अधिक हो जाता है.
उनका कहना है कि अगर मान्यता देने की औपचारिकताएं जल्द कर दी जाती हैं तो उत्तर प्रदेश के भी बहुत सारे मदरसे 'एनआईओएस' से जुड़ जाएंगे.

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एनआईओएस के साथ मिलकर जमीयत के मदरसों का जो पाठ्यक्रम तय किया गया है वो कई शिक्षाविदों की निगरानी में किया गया है.
इनमें से एक हैं प्रोफ़ेसर अख्तरउल वासे. बीबीसी से बात करते हुए वासे कहते हैं कि नए पाठ्यक्रम को लेकर ये परिकल्पना की गई थी कि मदरसों के छात्र के एक हाथ में कुरान हो तो दुसरे हाथ में दुनिया हो.
उनका कहना है कि मदरसे एनआईओएस के पाठ्यक्रम का भरपूर फ़ायदा उठा रहे हैं और आगे भी उठाते रहेंगे.
अख्तरुल वासे कहते हैं, "एनआईओएस का कोई भी विषय अनिवार्य नहीं किया गया है इसलिए किसी को कोई भी विषय चुनने में ना तो कोई रोक रहा है और अगर प्राचीन संस्कृति, इतिहास या धार्मिक ग्रंथों के बारे में पढ़ाया भी जाता है तो इससे ज्ञान ही बढ़ेगा और किसी को इसपर कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए."
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