सुग़रा हुमायूँ मिर्ज़ा: जिन्होंने पर्दे की रुकावट को ख़त्म किया और स्त्रियों की आवाज़ बनीं

- Author, नासिरूद्दीन
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार
मुलकी हैं हम वतन है मुल्क दक़न हमारा
यह है ज़मीँ हमारी यह है वतन हमारा
तबरेज़ को भी छोड़ा ईरान को भी छोड़ा
मुल्क दक़न बना है अब तो वतन हमारा
यह हैं हैदराबाद दक़न की सुग़रा …
इनकी शख़्सियत की पहचान महिलाओं और ख़ासकर मुसलमान महिलाओं की ज़िंदगी बेहतर बनाने के लिए आवाज़ उठाने वाली लेखिका, संपादक, संगठनकर्ता, समाज सुधारक, साहित्यकार, शिक्षाविद् के रूप में है.
उन्होंने पर्दे में क़ैद ज़िंदगी से ख़ुद को आज़ाद किया था. घर से बाहर बिना पर्दे के निकलने वाली वे हैदराबाद दकन इलाक़े की पहली महिला मानी जाती हैं. ज़ाहिर है, उस वक़्त उनके लिए यह सब करना आसान नहीं होगा. काफ़ी जद्दोजहद करनी पड़ी होगी.

सुग़रा हुमायूँ मिर्ज़ा की जद्दोजहद ने स्त्रियों की आने वाली पीढ़ियों के लिए मज़बूत नींव तैयार की. उनके लेखन, सामाजिक काम और संगठन क्षमता ने ख़ासतौर पर दकन के इलाक़े में लड़कियों की ज़िंदगी पर बेहद असर डाला. उनकी तालीम को बढ़ावा मिला.
अनेक महिलाओं ने अपनी बात कहने के लिए कलम का रास्ता चुना. ढेर सारी महिलाएँ सामाजिक काम से जुडीं. वे आज भी प्रेरणा की स्रोत हैं.
ये भी पढ़ें-
सुग़रा का जन्म हैदराबाद में 1884 में हुआ. वे मरियम बेगम और डॉक्टर सफ़दर अली की बेटी थीं. इनके पुरखे ईरान और तुर्की से आए थे. लेकिन उन्होंने अपना वतन दकन को माना.
उसी की ख़िदमत में अपनी ज़िंदगी लगा दी. उनकी माँ लड़कियों की तालीम की बहुत हिमायती थीं. सुग़रा ने घर पर ही उर्दू और फ़ारसी की तालीम ली. उनकी शादी पटना के सैयद हुमायूँ मिर्ज़ा के साथ 1901 में हुई.
हुमायूँ मिर्ज़ा बैरिस्टर थे और लंदन से पढ़कर आये थे. वे हैदराबाद में वकालत करने आए थे. वहाँ उन्होंने कुछ बैरिस्टरों की मदद से अंजुमन-ए-तरक़्क़ी-ए-निस्वाँ की नींव डाली थी. वहीं उनको सुग़रा के बारे में पता चला. सुग़रा से वे बेहद मुतास्सिर थे.
शादी के बाद वे सुग़रा हुमायूँ मिर्ज़ा के नाम से जानी जाने लगीं. हुमायूँ मिर्ज़ा, स्त्रियों की तालीम और सामाजिक कामों में उनकी भागीदारी के हिमायती थे. इसकी वजह से सुग़रा को लिखने-पढ़ने में कोई रुकावट पैदा नहीं हुई.
वे सामाजिक कामों में और बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेनी लगीं. सुग़रा का हुमायूँ मिर्ज़ा से कितना लगाव था, यह उनकी मौत पर लिखी उनकी एक रचना से पता चलता है, 'मौत ने कर दिया बर्बाद मुझे ऐ लोगो…'
वे हैदराबाद दक़न की पहली महिला सम्पादक मानी जाती हैं. उन्होंने अन-निसा (स्त्री) और ज़ेब-उन-निसा पत्रिकाओं का सम्पादन किया. ये पत्रिकाएँ हैदराबाद और लाहौर से प्रकाशित होती थीं और महिलाओं की ज़िंदगी से जुड़ी थीं.
इनमें महिलाओं की सामाजिक हालत बेहतर करने पर चर्चा होती थी. इनमें ज़्यादातर लेखन महिलाओं का ही होता था. इसमें सुग़रा के सफ़रनामे भी छपा करते थे. अन निसा का पूरा काम सुग़रा ही करती थीं.

उन्होंने 1919 में तैय्यबा बेगम के साथ अंजुमन-ए-ख़्वातीन-ए-दक्कन बनाया. यह अंजुमन महिला शिक्षा के लिए काम करता था.
इसके अलाव वे अंजुमन-ए-ख्वातीन-ए-इस्लाम, ऑल इंडिया वीमेंस कांफ्रेंस जैसी तंज़ीमों के ज़रिये भी महिलाओं को संगठित करने का काम किया. आज़ादी के आंदोलन के अनेक लीडरों, ख़ासकर सरोजनी नायडू से इनका ग़हरा ताल्लुक रहा.
वे 1931 में लाहौर में आयोजित ऑल इंडिया वीमेंस कॉन्फ्रेंस के सम्मेलन में शामिल थीं. वहाँ उन्होंने तक़रीर की कि लड़कियों की तालीम लड़कों के बराबर होनी चाहिए.
माँग की कि मर्द एक बीवी होते हुए दूसरी शादी न करें. यही नहीं, उन्होंने पुरज़ोर तरीक़े से कहा कि वालदैन को चाहिए अपनी लड़की ऐसे शख़्स को न दे जिसकी पहली बीवी मौजूद हो.
उन्होंने अकेले और हुमायूँ मिर्ज़ा के साथ देश दुनिया की काफ़ी सैर की. दुनिया को एक स्त्री की नज़र से देखा. यूरोप, इराक, देहली, भोपाल के कई सफ़रनामे लिखे. उपन्यास लिखे. शायरी की.
उन्होंने हैदराबाद में 1934 में अपने बूते लड़कियों के लिए 'मदरसा सफ़दरिया' शुरू किया था.
वह स्कूल आज भी 'सफ़दरिया गर्ल्स हाईस्कूल' के नाम से चल रहा हैं और स्त्रियों की ज़िंदगी बेहतर बनाने के सोग़रा हुमायूँ मिर्ज़ा के ख़्वाब को पूरा करने में लगा है.
इनकी प्रमुख रचनाएँ हैं- मुशीरेनिस्वाँ, मोहिनी, सरगुज़श्ते हाजरा, सफ़रनामा यूरोप, रोज़नामा देहली व भोपाल, सफ़रनामा वाल्टर वग़ैरह, सैरे बिहार बंगाल, सफ़रनामा इराक़ अरब, मक़ालात ए सुग़रा.

सन 1958 में उनका इंतक़ाल हो गया. हालाँकि, सुग़रा हुमायूँ मिर्ज़ा अपनी ज़िंदगी में यह सब करने के लिए ढेरों रुकावटों और परेशानियों का सामना करना पड़ा.
उन जैसी पुरखिनों को इतिहास में जो मुकाम मिलना चाहिए, वह आज तक नहीं मिला है. सुग़रा हुमायूँ मिर्ज़ा 'हया' की एक रचना है-
मेरे बादकोई भी आएगा तुर्बत पे भला मेरे बादख़ाक
आ आके उड़ायेगी सबा मेरे बादजीते जी क़द्र
किसी ने भी न जानी अफ़सोसयाद में रोयेगा
फ़िर कौन भला मेरे बाद
बीबीसी हिंदी दस ऐसी महिलाओं की कहानी ला रहा है जिन्होंने लोकतंत्र की नींव मज़बूत की. उन्होंने महिलाओं के अधिकारों को अपनी आवाज़ दी. वे समाज सुधारक थीं और कई महत्वपूर्ण पदों पर पहुंचने वाली वे पहली महिला बनीं. बाक़ी की कहानियां नीचे दिए लिंक पर क्लिक कर पढ़ें-
(स्टोरी के सारे इलेस्ट्रेशन गोपाल शून्य ने बनाए हैं)
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

















