योगी आदित्यनाथ क्या कर पाएंगे उत्तर प्रदेश के मदरसों में 'सुधार'?- ग्राउंड रिपोर्ट

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- Author, अनंत झणाणे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, लखनऊ
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नई दिल्ली के विज्ञान भवन में 1 मार्च 2018 को आयोजित इस्लामिक विरासत विषय के एक कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए कहा कि, "पूरी ख़ुशहाली, समग्र विकास तभी संभव हैं जब आप यह देखें कि मुस्लिम युवाओं के एक हाथ में क़ुरान शरीफ़ है तो दूसरे हाथ में कम्प्यूटर है."
इसी बात को आधार बना कर उत्तर प्रदेश का मदरसा बोर्ड प्रदेश के ग़ैर-मान्यता प्राप्त मदरसों की काया पलटने के बड़े-बड़े दावे कर रहा है.
30 अगस्त को उत्तर प्रदेश सरकार ने एक आदेश पारित किया. सरकार ने सभी ज़िलों के डीएम से कहा कि वो ग़ैर-मान्यता प्राप्त मदरसों का सर्वे करवा कर सरकार को इसकी जानकारी दें.
मदरसों के सर्वे के योगी सरकार के आदेश पर राजनीतिक बयानबाज़ी शुरू हो गयी.
एआईएमआईएम के प्रमुख असदउद्दीन ओवैसी ने सरकार की इस पहल के बारे में कहा, "मदरसे संविधान के अनुच्छेद 30 के अनुसार हैं तो उत्तर प्रदेश सरकार ने सर्वेक्षण का आदेश क्यों दिया है? यह कोई सर्वेक्षण नहीं है बल्कि एक छोटा एनआरसी है. कुछ मदरसे उत्तर प्रदेश मदरसा बोर्ड के अधीन हैं. आप क्यों शक़ कर रहे हैं मदरसों पर. राज्य सरकार हमारे अधिकारों में हस्तक्षेप नहीं कर सकती. वे मुसलमानों को परेशान करना चाहते हैं. आपका मक़सद है इस्लाम को बदनाम करना."
आपको यह भी बता दें कि पिछले कुछ दिनों में भाजपा शासित असम से मदरसों पर बुलडोज़र चलने की ख़बरें भी आई हैं. राज्य के बोंगाईं गांव ज़िले में सरकार की ओर से एक मदरसा गिराए जाने की ख़बर सामने आई और बीते कुछ दिनों में राज्य सरकार तीन मदरसे गिरा चुकी है.
असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा का कहना है कि इन मदरसों से चरमपंथी गतिविधियां चलाई जा रही थीं.
समाचार एजेंसी एएनआई से असम के एक नेता बदरुद्दीन अजमल ने कहा कि 2024 के चुनाव नज़दीक हैं. उनके अनुसार मदरसे इसलिए तोड़े जा रहे हैं ताकि मुसलमान 2024 के चुनाव में डर कर बीजेपी को वोट दे दें.
इन घटनाओं और भाजपा शासित राज्यों में मदरसों से जुड़े आदेशों से बने माहौल के बाद मदरसों में मिलने वाली तालीम और आज के ज़माने में शिक्षा में उनकी भूमिका एक बार फिर से चर्चा में है.
हमने उत्तर प्रदेश के कुछ मदरसों में जाकर यह जानने की कोशिश की कि योगी आदित्यनाथ की सरकार के मदरसों में सुधार और आधुनिकीकरण की ज़मीनी हक़ीक़त क्या है?

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क्या कहता है मदरसों के सर्वे का आदेश?
सबसे पहले यह समझने की कोशिश करते हैं कि आख़िरकार योगी सरकार मदरसों का सर्वे करा कर क्या हासिल करने का दावा कर रही है.
बीबीसी को मिली सरकारी आदेश की कॉपी के मुताबिक़ प्रदेश के सभी ज़िलों के ग़ैर-मान्यता प्राप्त मदरसों का सर्वे कर एक निर्धारित समय सीमा में एक निर्धारित फ़ॉर्मेट में सरकार को डाटा देने को कहा गया है.
सर्वे में ग़ैर-मान्यता प्राप्त मदरसों के संचालन करने वाली संस्था, मदरसे की स्थापना की तारीख़, उसका स्टेटस (निजी या किराए के घर में चल रहा है), मदरसे में पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं की सुरक्षा, पानी, फ़र्नीचर, बिजली, शौचालय के इंतज़ाम की जानकारी, छात्र- छात्राओं की कुल संख्या, शिक्षकों की संख्या, वहां पढ़ाया जाने वाला पाठ्यक्रम, मदरसे की आय का स्त्रोत, अगर छात्र किसी अन्य जगह भी पढ़ रहे हैं तो उसकी जानकारी, और अगर सरकारी समूह या संस्था से मदरसों की संबद्धता है तो उसका विवरण देने को कहा गया है.
10 सितंबर 2022 तक सभी ग़ैर-मान्यता प्राप्त मदरसों के सर्वे के लिए टीम का गठन होना है.
सर्वे का काम पांच अक्टूबर 2022 को पूरा होना है और सभी डीएम 25 अक्तूबर तक सर्वे का डाटा उत्तर प्रदेश शासन को उपलब्ध कराएंगे.
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यूपी: मदरसों के सर्वे को लेकर छिड़ी बहस

मार्च 2018, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बोले समग्र विकास तभी संभव हैं जब मुस्लिम युवाओं के एक हाथ में क़ुरान शरीफ़ हो और दूसरे में कम्प्यूटर.
अगस्त 2022, यूपी सरकार ने सभी एक निर्धारित समय सीमा के भीतर ग़ैर-मान्यता प्राप्त मदरसों का सर्वे करवाने की बात की.
सर्वे का काम पाँच अक्टूबर 2022 को पूरा होना है और 25 अक्तूबर सर्वे का डाटा सरकार को दिया जाना है.
असदउद्दीन ओवैसी बोले, सरकार मुसलमानों को परेशान करना चाहती है.
लेकिन मदरसा बोर्ड का कहना है कि सरकार मदरसों का आधुनिकीकरण करना चाहती है.
असम में बीते कुछ दिनों में राज्य सरकार तीन मदरसे गिरा चुकी है.
मदरसों से जुड़े आदेशों के बाद वहां दी जाने वाली तालीम को लेकर चर्चा छिड़ गई है.
मदरसों के आधुनिकीकरण के लिए उत्तर प्रदेश सरकार मदरसा टीचर्स एलिजिबिलिटी टेस्ट (एम-टीईटी) कराने की योजना बना रही है.


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सरकार के मुताबिक़ क्या है सर्वे का मक़सद?
मदरसा बोर्ड से मिली जानकारी के मुताबिक़ उत्तरप्रदेश में कुल 16,500 मान्यता प्राप्त मदरसे हैं. जिनमें से 560 मदरसों को सरकार उनके शिक्षकों का वेतन देती है.
मदरसा बोर्ड के चेयरमैन डॉ इफ़्तिख़ार अहमद जावेद कहते हैं, "उत्तरप्रदेश में ऐसे कितने मदरसे हैं जिनकी मान्यता नहीं है, उनकी गिनती नहीं हो पा रही है. समय-समय पर जब मदरसों पर उंगलियां उठती हैं तो फिर सवाल उठाते हैं कि यह कौन-सा मदरसा है? क्या यह मान्यता प्राप्त मदरसा है, या ग़ैर-मान्यता प्राप्त मदरसा है या फिर अनुदान से चलने वाला मदरसा है? हमारा रिकॉर्ड ठीक होना चाहिए. इसके लिए सर्वे किया जा रहा है. जिससे मालूम हो कि कितने मदरसे और हैं. ताकि आने वाले समय में उनको भी हम वो सुविधाएं दे सकें जो हम दूसरे मदरसों के बच्चों को दे रहे हैं."
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मदरसों से जुड़े बयान पर डॉ इफ़्तिख़ार अहमद जावेद कहते हैं, "मदरसों के बच्चों के बारे में प्रधानमंत्री जी की मंशा साफ़ है. वे कहते हैं कि मदरसों के बच्चों के एक हाथ में क़ुरान और एक हाथ में कंप्यूटर होना चाहिए. क़ुरान से मतलब धार्मिक शिक्षा भी ग्रहण करें, और कंप्यूटर से मतलब है कि मॉडर्न एजुकेशन भी हासिल करें. वो अरबी उर्दू पढ़ें, कुरान पढ़ें, हदीस पढ़ें, लेकिन साथ ही साथ वो साइंस, मैथेमेटिक्स और विज्ञान भी पढ़ें. देश का इतिहास भी जानें. इसी मक़सद से हम लोग लगातार मदरसों के माहौल को धार्मिक शिक्षा के साथ-साथ आधुनिक शिक्षा की ओर बढ़ावा दे रहे हैं."
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क्या सरकारी अनुदान पर चलने वाले मदरसों में ऊंची कक्षा वाले छात्रों को अब ABCD पढ़ाई जा रही है?
सरकारी अनुदान पर चलने वाले मदरसों से जुड़ी जानकारी हासिल करने के लिए बीबीसी के सहयोगी पत्रकार पवन शाह ने गोरखपुर के दीवान बाज़ार स्थित मदरसा दारुल-उलूम हुसैनिया में जाकर जायज़ा लिया.
आपको बता दें कि उत्तर प्रदेश के भाजपा यूनिट ने 13 अक्टूबर 2021 को मदरसों के आधुनिकीकरण और उनमें एनसीईआरटी कोर्स लागू करने को लेकर एक ट्वीट किया था.
उन्होंने लिखा था, "भाजपा सरकार में आधुनिक हो रहे मदरसे. यूपी के मदरसों में अगले सत्र से अनिवार्य होगा एनसीईआटी कोर्स. पढ़ाए जाएंगे हिन्दी व अंग्रेज़ी सहित सभी विषय."
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पवन शाह ने गोरखपुर के मदरसा दारुल उलूम हुसैनिया में पाया कि छोटे बच्चों के साथ बड़े बच्चे भी कक्षा में बैठ कर ABCD पढ़ रहे थे.
इस बारे में अंग्रेज़ी पढ़ा रहे शिक्षक मोहम्मद आज़म कहते हैं, "जो छात्र आ रहे हैं, वो एक उम्र के नहीं हैं. कोई 18 साल का है, कोई 12 साल का है, कोई 20 साल का है. अब उनको अंग्रेज़ी पढ़ाना है क्योंकि यह कम्पलसरी कर दिया गया है. हमारे साथ मजबूरी है. अब मैं उनको बेसिक चीज़ों से लेकर चल रहा हूं. अगर मैं उन्हें डायरेक्टली लेसन पढ़ाऊं जो एनसीईआरटी के पाठ्यक्रम में है तो उनको दिक़्क़त आएगी. वो इतनी चीज़ें समझ नहीं पाएंगे. सही ढंग से रीडिंग नहीं कर पाते हैं."
गोरखपुर के मदरसा दारुल उलूम हुसैनिया में अंग्रेज़ी पढ़ रहे 12वीं के छात्र महमूद रज़ा ने बीबीसी से कहा, "मैंने अंग्रेज़ी पढ़ना 18 साल की उम्र से शुरू किया है. टीचर अच्छे से पढ़ा रहे हैं, बस हमें अलग से पर्मानेंट डेडिकेटेड शिक्षक दिया जाये तो पढ़ाई और बेहतर हो सके. हमें हर ज़बान सीखना चाहिए. हमें भी शौक़ पैदा हुआ कि अंग्रेज़ी सीख कर के हम अपनी क़ौम और अपने देश की ख़िदमत कर सकें."
बड़े बच्चों को नए सिरे से अंग्रेज़ी पढ़ाये जाने के बारे में मदरसा बोर्ड के चेयरमैन डॉ इफ़्तिख़ार अहमद जावेद कहते हैं, "बहुत बड़ा प्रदेश है. मैंने मदरसों के बच्चों के हाथ में एनसीईआरटी की किताबें भी देखी हैं. पढ़ाई हो रही है. कुछ जगहों पर कमियों को दूर किया जा रहा है. अचानक से हम नौवीं के बच्चे को साइंस दे देंगे तो वो साइंस नहीं पढ़ सकता है. धीरे-धीरे हम उन चीज़ों को ला रहे हैं. अभी हम शुरुआत के दौर में एक से आठ तक करेंगे. फिर आगे बढ़ेंगे. दसवीं और बारहवीं को करेंगे. केवल दीनी तालीम पढ़ कर वो नौकरियां नहीं कर सकते हैं. वो कोई बड़ा काम नहीं कर सकते हैं. फिर वो मस्जिदों और मदरसों तक सीमित रह जाते हैं."
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मज़हबी तालीम के साथ-साथ पढ़ाई जा रही हैं इंग्लिश, गणित, साइंस
मदरसों में पढ़ाई की गुणवत्ता और स्तर समझने के लिए बीबीसी की टीम लखनऊ के गोमती नगर में चल रहे मदरसा दारुल उलूम वारसिया पहुंची और पाया कि बच्चे धार्मिक शिक्षा के साथ अंग्रेज़ी भी सीख रहे हैं. एक कक्षा में बच्चों को नाउन (संज्ञा), प्रोनाउन (सर्वनाम) की परिभाषा और अंतर पढ़ाया जा रहा था.
बच्चों को अंग्रेज़ी पढ़ा रहे शिक्षक शाहिद अहमद ने कहा कि वो क़रीब 10-12 सालों से मदरसे में बच्चों को अंग्रेज़ी पढ़ा रहे हैं. वो रोज़ाना सुबह आठ बजे से एक बजे तक मदरसे में बच्चों को पढ़ाते हैं.
शाहिद अहमद ने बताया कि मदरसे में पहली कक्षा (तहतानिया) से लेकर फ़ाज़िल (पोस्ट ग्रेजुएशन) तक पढ़ाई होती है और सारी कक्षाओं में अंग्रेज़ी पढ़ाई जाती है.
शाहिद अहमद के अनुसार आज की तारीख़ में उस मदरसे में क़रीब 600 बच्चे हैं.
कक्षा में अंग्रेजी पढ़ रहे 14 साल के छात्र फ़रमान अहमद वारसी का मदरसे में यह पहला साल है. इससे पहले वह प्राइवेट स्कूल में पढ़ाई करते थे, जहां पर नर्सरी से लेकर पांचवी तक की पढ़ाई की थी. और अब फ़ौक़ानिया (कक्षा छह से आठ) के बीच की तालीम वह यहां ले रहे हैं.
फ़रमान कहते हैं, "यहां पर प्राइवेट स्कूल के मुताबिक़ अंग्रेज़ी पढ़ाई जाती है. और ग्रामर तर्जुमे के साथ पढ़ाई जाती है."
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एक दूसरे छात्र मोहम्मद फ़रहान ने कहा, "आज कल का जो माहौल है उसको देखते हुए इंग्लिश जानना बहुत ज़रूरी है. हम बैंक में जाते हैं या कहीं और बाहर जाते हैं और हमको इंग्लिश नहीं आती है तो बहुत शर्मिंदगी महसूस होती है. इस वजह से इंग्लिश इस वक़्त जानना बहुत ज़रूरी है."
जम्मू के रामबन ज़िले से मोहम्मद इरशाद अत्तारी चार-पांच महीने पहले ही लखनऊ के एक मदरसे में पढ़ने आए हैं. लखनऊ से पहले वो मुरादाबाद में पढ़ते थे.
मोहम्मद इरशाद अत्तारी कहते हैं, "परीक्षा बहुत सख्ती से होती है. हमारे तमाम उस्ताद भी बहुत बेहतरीन हैं और बहुत मेहनत से बच्चों को पढ़ाते हैं."
योगी सरकार की मदरसों में 'सुधार' की कोशिशों के बारे में मोहम्मद इरशाद अत्तारी कहते हैं, "कहीं ना कहीं शक़ भी होता है, लेकिन सरकार इस बारे में सोच भी रही है कि मदरसे के अंदर मज़हबी तालीम के साथ दुनियावी तालीम होना लाज़मी है."

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क्या नई शिक्षा प्रणाली से मदरसों के छात्र मुख्यधारा में जुड़ पाएंगे?
मदरसों से पढ़ कर निकले बच्चे डॉक्टर्स, साइंटिस्ट या अन्य पेशों को अपनाते हैं या नहीं? इस बारे में लखनऊ के मदरसे के साइंस टीचर मोहम्मद वसीम अहमद कहते हैं, "बच्चों को जो दिल है वो एक सादे काग़ज़ की तरह है. हम उस पर जो लिखेंगे, वही आगे आएगा. ज़ाहिर सी बात है जब हम उन्हें तैयार करते हैं तो वो डॉक्टर, इंजीनियर उस दिशा में जाने की कोशिश भी करते हैं. आप मुझे देखें, मैं इसी मदरसे से पढ़ कर निकला, यूनिवर्सिटी में पढ़ा, इंग्लिश में एम.ए भी किया. और अब मैं यहां आया हूं. मैं बच्चों को और अच्छा करने की कोशिश कर रहा हूं ताकि हम उन्हें प्रोफ़ेशनल फ़ील्ड में ले जा सकें. इसमें उनकी बाक़ायदा दिलचस्पी भी दिखती है. ख़ुद मेरे पढ़ाये हुए 6-7 बच्चे यूनिवर्सिटी में एडमिशन लेकर पढ़ रहे हैं."
भाजपा सरकार के एक हाथ में क़ुरान, एक हाथ में कम्प्यूटर की सोच के बारे में मोहम्मद वसीम अहमद कहते हैं, "तालीम कोई भी हो, तालीम से तो पीछे नहीं हटा जा सकता है. अगर सरकार यह कह रही है तो अच्छी बात है. यह दौर की ज़रुरत है. इसे होना चाहिए, और इसी से कामयाबी हासिल की जा सकती है."
सरकार फ़िलहाल अनुदान पर चल रहे मदरसों में सिर्फ़ तनख्वाह का ख़र्च उठा रही है, तो क्या योगी सरकार को उससे आगे बढ़ कर मदरसों को और सुविधाएँ देना चाहिए?
मोहम्मद वसीम अहमद कहते हैं, "मदरसों का आधुनिकीकरण बिल्कुल किया जाना चाहिए. लेकिन जो यहां बोर्ड है, या जो भी हुकूमत है, उसकी तरफ़ से अगर और सुविधाएं दी जाएंगी तो ज़ाहिर सी बात है कि बच्चे और आगे जाएंगे. हर एक एजुकेशनल इंस्टिट्यूशन में जो होता है, वो यहां भी होना चाहिए."
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क्या एनसीईआरटी की किताबों से हो रही है अनुदान प्राप्त मदरसों में पढ़ाई?
गोरखपुर के मदरसा दारुल उलूम हुसैनिया दीवान बाज़ार के एक शिक्षक मोहम्मद आज़म ख़ान कहते हैं, "सरकार की मदरसों के आधुनिकीकरण की मंशा ठीक है. हम लोगों ने भी काफ़ी स्वागत किया. लेकिन वो सुविधाएं जो मिलनी चाहिए वो मिल नहीं पा रही हैं. 2022-2023 का वर्तमान सत्र चल रहा है. सितंबर का महीना आ गया है और अभी एनसीईआरटी की किताबें नहीं आई हैं. इस कंडीशन में कैसे बच्चे पढ़ेंगे? एक तरफ़ आप (मदरसा बोर्ड) एनसीईआरटी का पैटर्न लागू करना चाहते हैं. लेकिन जो मूलभूत समस्याएं हैं वो जस की तस हैं."
साइंस, मैथ्स या दूसरे ग़ैर-धार्मिक विषय पढ़ाने के बारे में एक दूसरे शिक्षक मोहम्मद शरफ़ुद्दीन क़ारी कहते हैं, "सरकार ने जो नया निसाब (सिलेबस) बनाया है उसमें इंग्लिश भी है, मैथ्स भी है, सोशल साइंस भी है, और हिंदी भी है. बहुत सारे सब्जेक्ट हैं. लेकिन हमारे पास उन्हें पढ़ाने के लिए उतने टीचर नहीं हैं."
क्या उत्तरप्रदेश में मदरसों में पढ़ने वाले छात्रों की संख्या घट रही है?
पत्रिका इंडिया टुडे में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक़ 2016 में मुंशी-मौलवी पाठ्यक्रम में पंजीकृत छात्रों की संख्या 422,627 थी. जो 2022 में घट कर 92 हज़ार हो गई. मतलब 2016 के आंकड़े के एक चौथाई से भी कम.
जब बीबीसी ने इंडिया टुडे में छपी इस रिपोर्ट के बारे में उत्तरप्रदेश मदरसा बोर्ड के चेयरमैन डॉ इफ़्तिख़ार अहमद जावेद से पूछा तो उनका कहना था, "छात्रों की तादाद घटने के दो कारण हैं. एक तो 2018 में पोर्टल बना. पोर्टल में मदरसे जब फीड किए गए तो बहुत सारे मदरसे जो हैं ग़ायब हो गए."
आपको बता दें कि उत्तर प्रदेश के सभी अनुदान प्राप्त और मान्यता प्राप्त मदरसों को बोर्ड की पोर्टल पर अपना पंजीकरण कराना अनिवार्य है. योगी सरकार के शासन में आने के बाद यह आदेश पारित और लागू हुआ था.
डॉक्टर जावेद आगे कहते हैं, "पहले के समय में बहुत सारे लोग स्कॉलरशिप के चक्कर में बच्चों की संख्या बढ़ा के दिखाते थे. पोर्टल बना, सारी चीज़ें फ़ीड हुईं, तो उसमें मदरसे भी घट गए. लोगों ने अफ़वाह उड़ाई की मदरसों को बंद कर दिया गया था. मदरसे थे ही नहीं जो बंद होते. और बच्चे भी घट गए, जो कि काग़ज़ों पर केवल थे हक़ीक़त में नहीं थे."
डॉक्टर जावेद कोविड महामारी को भी छात्रों की संख्या में कमी का कारण बताते हैं. उनके अनुसार अब उत्तरप्रदेश में कुल 16,513 मान्यता प्राप्त मदरसे बचे हैं.
बोर्ड के चेयरमैन डॉक्टर जावेद नई परीक्षा प्रणाली को भी पंजीकृत छात्रों की संख्या में कमी का कारण बताते हैं.
वो कहते हैं, "पहले कोई इम्तहान दे रहा है, उसकी जगह बैठ कर कोई और जा रहे हैं. इस पर रोक लगाई गई. आज सीसीटीवी की निगरानी में परीक्षा हो रही है. इन वजहों से कई छात्रों ने फ़ॉर्म भरकर परीक्षा ही नहीं दी. इन कारणों से मदरसों में बच्चों की संख्या कम हुई है."
523 अनुदान प्राप्त मदरसों में हुए इम्तहानों में पारदर्शिता का दावा करते हुए डॉ इफ़्तिख़ार अहमद जावेद कहते हैं, "पूरे 523 केंद्रों में सीसीटीवी कैमरे लगे हुए थे. हम लोग ख़ुद लखनऊ से मॉनिटरिंग कर रहे थे. दो महीनों में हम लोगों ने मदरसा बोर्ड का रिज़ल्ट घोषित कर दिया. हम चाहते हैं कि और बोर्डों की तुलना में हमारा बोर्ड भी कहीं कमतर ना हो."

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मदरसों के 866 करोड़ से अधिक बजट में क्या-क्या सुविधा देती है योगी सरकार?
उत्तर प्रदेश में मौजूदा 16,513 मान्यता प्राप्त मदरसों में से 560 अनुदान प्राप्त मदरसे हैं, जिनमें मदरसा बोर्ड शिक्षकों के वेतन देता है. बाक़ी बचे ख़र्चे मान्यता प्राप्त मदरसे ख़ुद उठाते हैं.
मान्यता प्राप्त मदरसों में भी आधुनिक टीचर्स के नाम पर उन्हें तीन टीचर्स मिलते हैं जो उन्हें पढ़ाते हैं.
मदरसा बोर्ड के अनुसार एनसीईआरटी की किताबें, ड्रेस का ख़र्च भी सरकार उठाती है और हर ज़िले के बेसिक शिक्षा अधिकारी किताबों को मुहैया कराते हैं.
टीचर्स की नियुक्ति के लिए भी लाई जा रही है नयी नीति?
मदरसों के आधुनिकीकरण और सुधार के नज़रिये से उत्तरप्रदेश सरकार शिक्षकों की नियुक्ति के लिए एक नई नियमावली बनाने में लगी हुई है.
जिस तरह प्रदेश में TET और सुपर-TET के इम्तहानों के तहत बेसिक शिक्षा के टीचर का चयन होता है. अब उसी तर्ज़ पर प्रदेश सरकार मदरसा टीचर्स एलिजिबिलिटी टेस्ट (एम-टीईटी) के ज़रिए मदरसों में शिक्षकों की भर्ती करने जा रही है.
इस बारे में बोर्ड के चेयरमैन डॉ इफ़्तिख़ार अहमद जावेद कहते हैं, "मदरसों में टीचर्स के चयन का अधिकार मदरसों की मैनेजमेंट को है. नियमावली के अनुसार आप टीचर्स का चयन करके बता सकते हैं. मदरसा बोर्ड आने वाले दिनों में एम-टीईटी की परीक्षा कराएगा. जो एम-टीईटी क्वालिफ़ाइड शख्स होगा वो ही मदरसों में शिक्षक बन पाएगा. फ़िलहाल नियमावली बन रही है. उसके बाद इम्तहान होगा और सर्टिफ़िकेट मिलेगा जो आजीवन मान्य होगा. जो लोग मदरसों में शिक्षक बनाना चाहते हैं उनके लिए मदरसा बोर्ड यह परीक्षा कराएगा. जो विषय टीचर्स को पढ़ाना है, उसके हिसाब से उनका एलिजिबिलिटी टेस्ट होगा."

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मदरसों के आधुनिकीकरण और शिक्षकों की व्यवस्था को लेकर मदरसा दारुल उलूम के शिक्षक मोहम्मद आज़म बताते हैं कि "मदरसों के आधुनिकीकरण की योजना साल 1995 में प्रारंभ हुई. पहले तो एक टीचर मिला था फिर बीच में 2 टीचर, फिर 2 से चार हुए. लेकिन फिर 2009 से चार से एक टीचर को कम करके तीन कर दिया गया."
वो कहते हैं, "लेकिन सबसे बड़ी समस्या इन तीन टीचरों की ये है कि अप्रैल 2017 से इन टीचरों को केंद्र की जो धनराशि होती है वह अभी तक नहीं मिली है. अब ऐसी कंडीशन में वो शिक्षक कैसे शिक्षा दे पाएंगे. इसमें जो एक शिक्षक होता है उसको नियमित मानदेय मिलता है जो 15 हज़ार रुपए होता है, इसमें केंद्र सरकार का हिस्सा 12 हज़ार होता है और राज्य सरकार को तीन हज़ार देना होता है. राज्य सरकार जो मानदेय देती है वो अपडेट है यानी अगस्त तक का मानदेय हमको मिल चुका है लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि केंद्र सरकार की तरफ़ से हमें जो 12 हज़ार रुपए मानदेय मिलता है वो अप्रैल 2017 के बाद से हमें (एमए और बीएड) शिक्षकों को नहीं मिला है. और हमारे पास वो तीन ही शिक्षक हैं वो ऐसे में कैसे आधुनिक शिक्षा दे पाएंगे."
शिक्षकों को समय पर मानदेय में केंद्र सरकार से हिस्सा न मिलने के सवाल पर मदरसा बोर्ड के चेयरमैन डॉ इफ़्तिख़ार अहमद जावेद कहते हैं, "केंद्र सरकार की तरफ़ से पैसे आते हैं. सरकार कोई भी हो, थोड़ी दिक़्क़त आती हैं. हम लोग जो पता कर पाए, मदरसा बोर्ड से इसका मतलब नहीं है. यह केंद्र सरकार की योजना है और निदेशालय से होकर के वो मदरसों के आधुनिक शिक्षकों को मिलती है. उसका मदरसा बोर्ड से कोई लेना-देना नहीं है. पहले ये विभाग शिक्षा मंत्रालय में था, अब अल्पसंख्यक मंत्रालय में चेंज हुआ है. उस वजह से भी कुछ चीज़ें रुकी हुई हैं. लेकिन एक लंबी धनराशि अभी आई थी और टीचरों को मिली है."

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राष्ट्रवाद और मदरसे
पिछले कुछ दिनों में उत्तरप्रदेश सरकार मदरसों में राष्ट्रगान, तिरंगा फहराने, योग करने को लेकर समय-समय पर आदेश जारी करती रही है.
21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के दिन मदरसों में छात्रों और शिक्षकों ने सुबह-सुबह योग किया. बीबीसी ने लखनऊ में भी अनुदान प्राप्त मदरसे में टीचर और बच्चों से बात की और उन्होंने इसे सेहत के नज़रिये से अच्छी पहल बताया.
आज़ादी के अमृत महोत्सव के बारे में लखनऊ के शिक्षक मोहम्मद ज़हीर ख़ान बरकाती कहते हैं कि यह सब चीज़ें बहुत पहले से होती आ रही हैं.
वो कहते हैं, "सरकार ने तो बाद में कहा है. लेकिन 15 अगस्त और 26 जनवरी को झंडा फहराना और राष्ट्रगान तो बहुत पहले से चला आ रहा. सरकार ने अब कहा है. हम भी मुल्क के बाशिंदे हैं. मुल्क की आज़ादी में हमने कुर्बानी पेश की है. जब मुल्क आज़ाद हुआ तो सब की तरह हमें भी ख़ुशी हुई. ज़ाहिर सी बात है कि हम झंडा फहरायेंगे."
अगर यह होता चला आ रहा है तो फिर सरकार को इनसे जुड़े आदेश क्यों जारी करने पड़े?
मोहम्मद ज़हीर ख़ान बरकाती कहते हैं, "सरकार की यह बात तो बिना वजह है. ज़बरदस्ती की बात है. यह तो होता ही रहा है. इसमें कोई मसला नहीं है. कोई नई बात नहीं हुई. इस साल आज़ादी के 75 साल पूरे हुए थे. सरकार की तरफ़ से उसे बहुत बड़े पैमाने पर करने की बात हुई तो हम लोगों ने पूरा सहयोग किया. हम सब बड़ी-बड़ी टोपी दस्तार वाले लखनऊ के परिवर्तन चौक पहुंचे."
मदरसों में राष्ट्रगान गाने, झंडा फहराने को लेकर मदरसा बोर्ड के मेंबर क़मर अली ने बीबीसी से बताया कि "हिंदुस्तान में जितने भी लोग हैं, सभी राष्ट्रवादी हैं, क्योंकि जिन लोगों को ये ग़लतफ़हमी थी कि मदरसों में राष्ट्रगान नहीं होता है उनकी ग़लतफ़हमी हर मदरसे में राष्ट्रगान करवा के दूर कर दी गई. चाहे दारुल उलूम (देओबंद) देख लें, चाहे नदवा (लखनऊ) देख लें या फिर कोई छोटा मदरसा, हर जगह हमेशा से राष्ट्रगान होता आ रहा है."
मदरसे में राष्ट्रगान करने वाले आदेश को जारी करने की वजह को क़मर अली जागरूकता की कमी बताते हैं और कहते हैं कि "मदरसे के शिक्षक ये समझते थे की ये अनिवार्य नहीं हैं तो उनको बताया गया कि ये सौ प्रतिशत अनिवार्य है. चाहे 26 जनवरी हो चाहे 15 अगस्त हो."
इस बारे में बोर्ड के चेयरमैन डॉ इफ़्तिख़ार अहमद जावेद कहते हैं, "मदरसा का बच्चा भी देशभक्त है. वो भी देश की भावनाओं से जुड़ा हुआ है. उसे भी हर सुविधा मिलनी चाहिए. वो देश का इतिहास भी जाने, साथ-साथ धर्म की चीज़ें भी पढ़े. वो क़ुरान भी पढ़े, वो हदीस भी पढ़े, दीन्याद भी पढ़े."
अंत में डॉक्टर जावेद कहते हैं, "इंग्लिश मध्यम के स्कूलों में पढ़ने वाले सारे बच्चे राष्ट्रगान गाते हैं. मेरा बच्चा राष्ट्रगान गाता है. 52 साल से मैं राष्ट्रगान गा रहा हूँ. तो मदरसे का बच्चा क्यों नहीं गाएगा? वो सारी चीज़ें होनी चाहिए. जिस तरीक़े से पूरे प्रदेश के मदरसों ने अपनी भूमिका निभाई है, वो अपने आप में एक मिसाल बना है. प्रदेश में तमाम तिरंगा यात्रा निकलीं. तमाम कार्यक्रमों का आयोजन हुआ. मदरसों के अंदर निबंध प्रतियोगिता, नाटक, चित्रकला के द्वारा अपने शहीदों को याद किया गया. प्रदर्शनी लगाई गईं और मदरसों ने अपना झंडा बुलंद किया और देश का नाम रोशन किया."

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क्या है ज़कात से चलने वाले मदरसे और क्या अब वो आएंगे सरकार के दायरे में?
बीबीसी के सहयोगी पत्रकार शहबाज़ अनवर ने पश्चिम उत्तर प्रदेश के बिजनौर में एक ग़ैर-मान्यता प्राप्त मदरसे के पूर्व संचालक से यह समझने की कोशिश की कि आख़िरकार इस सर्वे में कौन-से मदरसों की सरकार गिनती कर सकती है.
बीबीसी इन पूर्व संचालक की गुज़ारिश पर उनका नाम साझा नहीं कर रही है.
पूर्व संचालक ने मदरसों को चलाने के लिए चंदे और ज़कात की प्रथा को समझाते हुए बीबीसी से कहा, "यह चंदा रमज़ान महीने में ज़्यादा (इकठ्ठा) होता है. साल भर ज़कात कभी भी दी जा सकती है. मदरसों की जो ज़्यादातर आमदनी होती है वो रमज़ान के महीने में होती है."
मदरसों के आधुनिकीकरण की ज़रूरत के बारे में वे कहते हैं, "जमीयत उलेमा के प्रोग्रामों में कई साल तक मैंने यह बात रखी कि हमारे कुछ आलिम अपने बच्चों को कॉन्वेंट और आरएसएस के स्कूलों में पढ़ाना पसंद कर रहे हैं. जबकि उन्हें मालूम है कि अगर वो वहां जाएंगे तो फिर वहां पर दूसरे मज़हबों का कल्चर उन पर हावी हो सकता है. लेकिन इसके बावजूद भी वो न चाहते हुए भी भेज रहे हैं. और वो इसलिए क्योंकि उनकी तालीम का स्टैण्डर्ड बेहतरीन है."
लेकिन छोटी-छोटी मस्जिदों में ज़कात (चंदे) के पैसे से चलने वाले मदरसे आख़िरकार क्यों नहीं कराते हैं अपना पंजीकरण? इस बारे में यह पूर्व संचालक कहते हैं, "वो सोचते हैं कि हम पंजीकरण करा कर किसी झंझट में तो नहीं पड़ जायेंगे. इसकी वजह कुछ आर्थिक हालात हैं और कुछ डर."
लेकिन ज़कात से चलने वाले मदरसों से तालीम लेने वाले बच्चे आगे क्या करते हैं या कर सकते हैं?
इस बारे में बिजनौर के पूर्व मदरसा संचालक कहते हैं, "प्राइमरी सरकारी स्कूल जो थे, या अनुदान प्राप्त स्कूल थे, वहां दीनी तालीम की उचित व्यवस्था नहीं थी. तो बच्चों को इसलिए मदरसे में भेजते हैं कि पांचवी तक उन्हें मज़हबी और दुनिया की तालीम दोनों हासिल हो जाएं. और पांचवी के बाद वो उनका स्कूल में एडमिशन करवा देते थे. और जिन परिवारों को अपने बच्चों को मौलवी बनाना होता था तो वो उसे आगे भी पढ़ा देते थे."
बीबीसी ने बिजनौर के शेरकोट में मदरसा इस्लामिया अरबिया के क़ाज़ी शमीम अहमद से मुलाक़ात की. वो ज़कात की रक़म से मदरसा चलाते हैं. सरकार की तरफ़ से उनके मदरसे को कोई अनुदान नहीं मिलता.
उत्तर प्रदेश सरकार की तरफ़ से ग़ैर-अनुदान प्राप्त मदरसों के सर्वे कराए जाने को लेकर क़ाज़ी शमीम अहमद कहते हैं, "सरकार जैसे चाहे सर्वे कर ले. मदरसों में तो प्यार मोहब्बत से रहने का तरीक़ा सिखाया जाता है, दीनी तालीम का तरीक़ा सिखाया जाता है. मुल्क की वफ़ादारी का तरीक़ा सिखाया जाता है. मदरसे आज से नहीं सैकड़ों सालों से चल रहे हैं और कभी आज तक रजिस्ट्रेशन की ज़रूरत नहीं पड़ी. बहुत लोगों के मदरसों के रजिस्ट्रेशन नहीं हैं. अगर गवर्नमेंट कहेगी रजिस्ट्रेशन कराना ज़रूरी है तो मदरसे करा लेंगे रजिस्ट्रेशन. सरकार हमसे जो कुछ मांगेगी हम सब कुछ देंगे."

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क्या कहता है संविधान का अनुच्छेद 30?
असदउद्दीन ओवैसी ने सरकार से सवाल पूछा है कि, "मदरसे संविधान के अनुच्छेद 30 के अनुसार हैं तो उत्तर प्रदेश सरकार ने सर्वेक्षण का आदेश क्यों दिया है?"
संविधान के अनुच्छेद 30 के अनुसार, "भारत के सभी अल्पसंख्यक धर्म के लोगों को अपने शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने और उसे अपनी पसंद के हिसाब से शिक्षा देने का अधिकार है."
तो क्या इस तरीक़े का सर्वे अनुच्छेद 30 का उल्लंघन है? इस बारे में मदरसा बोर्ड के चेयरमैन डॉ इफ़्तिख़ार अहमद जावेद कहते हैं, "मदरसों में कोई रुकावट नहीं डाली जाएगी. और धार्मिक शिक्षा के लिए मदरसे चल रहे हैं, मस्जिदों में भी चल रहे हैं और वो आर्टिकल 30 के तहत बिलकुल जायज़ हैं. उसमें हमें कोई दिक़्क़त नहीं है. लेकिन हमें जानकारी होनी चाहिए कि इतने मदरसे हमारे ऐसे हैं जो केवल धार्मिक शिक्षा दे रहे हैं. उसमें बहुत सारे मदरसे मान्यता प्राप्त करना चाहते हैं. उनके डाटा के हिसाब से हम उनकी मान्यता भी करेंगे. मुख्य मक़सद है उन्हें मेनस्ट्रीम में लाना. यह कोई जांच नहीं है. यह सिंपल-सा सर्वे है, हमारे अपने डाटा के लिए."
सवाल ये है कि अगर इस सर्वे के बाद कुछ मदरसे ऐसे निकलते हैं जो महज़ दीनी तालीम दे रहे हैं, मैथ्स साइंस जैसे विषय नहीं पढ़ा रहे हैं और अगर वो सरकार से अनुदान प्राप्त भी नहीं है तो क्या उन्हें दीनी तालीम के अलावा अन्य विषयों की पढ़ाई कराना अनिवार्य होगा?
इस पर डॉक्टर जावेद कहते हैं, "ऐसा नहीं है. वो दीनी तालीम दे रहे हैं तो कोई दिक़्क़त नहीं है. उन्हें इसका हक़ है. हमें सर्वे से बस जानकारी चाहिए."
लेकिन क्या आगे जाकर सरकार की कोई नीति नहीं आएगी कि कोई भी मदरसा सिर्फ़ दीनी तालीम नहीं दे सकता है और उसे दूसरे विषय भी पढ़ाने होंगे?
इस पर डॉ इफ़्तिख़ार अहमद जावेद का कहना है, "ऐसी कोई पॉलिसी नहीं है. जो मदरसा बोर्ड की मान्यता लेगा वो बोर्ड के हिसाब से चलेगा. और जो सिर्फ़ दीनी तालीम देना चाहता है वो आर्टिकल 30 के हिसाब से अपना मदरसा चलाए. सबको धार्मिक शिक्षा देने का अधिकार है."
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ग़ैर-मान्यता वाले मदरसों के सर्वे के बारे में शिक्षकों की राय
लखनऊ के गोमती नगर में स्थित दारुल उलूम वारसिया में मोहम्मद वसीम अहमद पिछले तीन साल से साइंस पढ़ा रहे हैं.
वो कहते हैं, "हमारे यहां जो बच्चे पढ़ने आते हैं वो अलग-अलग पृष्ठभूमि से होते हैं. ज़्यादातर ग्रामीण इलाक़ों के बच्चे होते हैं. हम मदरसों में मिलने वाली तालीम के साथ-साथ उन्हें उच्च शिक्षा हासिल करने के लिए भी तैयार करते हैं."
योगी सरकार के ग़ैर-मान्यता प्राप्त मदरसों से जुड़े सर्वे के बारे में लखनऊ के मदरसा शिक्षक मोहम्मद ज़हीर ख़ान बरकाती अपनी व्यक्तिगत राय देते हए कहते हैं, "सरकार अगर सुविधा देना चाहती है, तो बहुत अच्छी बात है. लेकिन अगर उन्हें टारगेट करना चाहती है तो यह ग़लत बात है. क्योंकि मुल्क का क़ानून कहता है कि हम अपनी मज़हबी तालीम को आज़ादी से दे सकते हैं. उसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए. हां, अगर सरकार को यह पता लगाना है कि फ़ंडिंग कहां से हो रही है तो पता लगाए, ये अच्छी बात है. अगर कहीं से ग़लत फ़ंडिंग हो रही है तो उस पर रोक लगाएं."
गोरखपुर के दीवान बाज़ार स्थित मदरसा दारुल उलूम हुसैनिया के शिक्षक मौलाना मोहम्मद रियाज़ुद्दीन कहते हैं कि "इससे पहले भी मदरसों की कई बार जांच हुई. चाहे अनुदानित हों या ग़ैर-अनुदानित हों. लेकिन सही बात तो ये है कि जांच के बाद अगर बुनियादी चीज़ों को दुरुस्त किया गया होता तो मेरे हिसाब से बहुत अच्छा होता."
मौलाना मोहम्मद रियाज़ुद्दीन असम में मदरसों को बंद करने की कार्रवाई का ज़िक्र करते हुए कहते हैं, "आदमी को डर बना रहता है कि कहीं यह ना हो कि वो ज़मीन के काग़ज़ात मांग लें. किसी ने ज़बानी वक़्फ़ कर दिया और उस पर मदरसा बना दिया. अब क्योंकि वो दुनिया से जा चुके हैं, वो (सर्वे करने वाले) कहेंगे की उसकी रजिस्ट्री दिखाइए, तो हम कहां से दिखाएंगे. क्योंकि और सूबों में हो चुका है, इसलिए एक डर बना रहता है."
ज़कात याने चंदे की रक़म से चलने वाले मदरसों की गिनती से जुड़े इस सर्वे के बारे में मदरसा दारुल उलूम हुसैनिया के मौलाना मोहम्मद रियाज़ुद्दीन कहते हैं, "मुस्लिम लोग जो ज़कात की रक़म निकालते हैं उनकी मदद से मदरसे चलते हैं. ये लोग इतने मज़बूत नहीं होते हैं कि अच्छे टीचर रखकर कर के पढ़ाई को आगे बढ़ा सके. अगर सर्वे के साथ ये किया जाए कि जहां जिन चीज़ों की कमियां है उनको दूर कर दें, जहां सहूलियत नहीं है उसको सहूलियत दे दें तो बहुत अच्छी बात है."

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मदरसा बोर्ड: सर्वे के अलावा भी और भी अहम फ़ैसले
मदरसा बोर्ड के चेयरमैन डॉ इफ़्तिख़ार अहमद जावेद कहते हैं कि बोर्ड ने ग़ैर-मान्यता प्राप्त मदरसों के सर्वे के अलावा कई और अहम फ़ैसले भी लिए हैं.
उनके मुताबिक़ बोर्ड ने, "महिला शिक्षकों को मैटरनिटी लीव लागू की है. सरकारी अनुदान वाले मदरसों में कुल 1,000 से 1,200 महिला टीचर और कर्मचारी हैं. इसके अलावा पति-पत्नी शिक्षकों के लिए म्यूच्यूअल ट्रांसफ़र स्कीम को भी लागू करने का आदेश दिया है. नौकरी के दौरान मृत्यु होने पर अनुकम्पा के आधार पर मृतक आश्रित कोटे के तहत नौकरी की नियमावली भी तैयार की जा रही है."
लेकिन आने वाले समय में मदरसों को लेकर सरकार कितनी गंभीर है वो इस बात पर निर्भर करेगा कि वो मदरसा शिक्षा को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए कितना बजट आवंटित करती है और कैसे वो मदरसों में ज़्यादा से ज़्यादा बच्चों के लिए दीनी तालीम के साथ-साथ निजी और सरकारी स्कूलों के पाठ्यक्रम को बेहतर तरीक़े से लागू करने में कारगर साबित होती है.
रही बात सर्वे की तो योगी सरकार को अपने दावे पर खरा उतरना होगा कि वो इस सर्वे के आधार पर बच्चों को फ़ायदा पहुंचाने की नीतियां बनाने की भरपूर कोशिश करेगी.
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