बिहार में शिक्षा: सीएम नीतीश कुमार के गृह ज़िले का हाल, कहीं कमरे नहीं तो कहीं दरी पर बैठने को मजबूर छात्र

- Author, फ़ैसल मोहम्मद अली
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, परवलपुर (नालंदा) बिहार
महादलितों-पिछड़ों की बसावट वाले ताराबिगहा में जब स्कूल की मांग उठी तो कहा गया कि वहां सरकारी ज़मीन नहीं है इसलिए स्कूल नहीं बन सकता. इस पर एक ग्रामीण राजेश चौधरी ने तक़रीबन 12 साल पहले स्कूल भवन के लिए भूमि दान में दे दी, लेकिन स्कूल की कक्षाएं फिर भी खेत में लगती रहीं.
दो साल पहले स्कूल के नाम पर मिट्टी से जोड़कर ईंट के चार खंभे खड़े कर दिए गए, ऊपर टिन की छत लगा दी गई, लेकिन वो प्राइमरी स्कूल भी, अब कहीं और, दो किलोमीटर दूर किसी और गांव में शिफ़्ट कर दिया गया है.
गांव से अलग, खेतों के बीच बनाए गए स्कूल पहुंचने पर वहां तब बना शौचालय ही खड़ा दिखता है.
'स्कूल चल गइले नेहुंआपर, त इस सब बुतुरआ जा पाई ऊंहा, जा पाई पनिया में' (स्कूल नेहुआंपर चला गया है, इतने छोटे बच्चे वहां जा पाएंगे, ख़ासतौर पर जब बारिश हो रही हो), गांव की पानी टंकी के पास बैठी हुई आठ दस औरतों में से एक अशर्फ़ी देवी सवाल के लहजे में हमसे पूछती हैं.

राजेश चौधरी कहते हैं, "कोई समझते ही नहीं है, बुझबे न करते हैं, इ पिछड़ा का गांव है. यहां कोई देख-रेख थोड़े ही है कि क्या हो रहा है, क्या नहीं हो रहा है. सबसे मिले, कहते हैं, हो जाएगा, हो जाएगा, फिन (फिर) कहते हैं पैसा ही नहीं है. हम इत्ते (इतने) बड़े आदमी थोड़े ही हैं कि अपने से लगा देंगे, पहले त ज़मीन दे दिए. तब त ज़मीन ख़रीदारी हुआ था हमारा, त सोचे कि बना देते हैं गांव घर का इज़्ज़त है, बाल बच्चा पढ़ेगा ...."
राजेश चौधरी का ये जवाब हमारे इस सवाल पर आया था कि भू-दान के बावजूद स्कूल न बन पाने की शिकायत क्या उन्होंने प्रशासन, या अपने जन प्रतिनिधियों से की थी?
नालंदा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का गृह ज़िला है. साथ ही महादलितों और अति पिछड़ों को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का वोट बैंक समझा जाता है.

स्कूल अलग-अलग... हाल एक सा
नेहुआंपर का स्कूल उत्क्रमित मध्य विद्यालय है, यानी इस स्कूल को प्राइमरी से मिडिल स्कूल में तब्दील किया गया है.
नेहुआंपर पहुंचते-पहुंचते हमें साढ़े तीन बज जाते हैं. स्कूल में आज की पढ़ाई ख़त्म होने में अभी आधे घंटे का वक़्त बचा है, मगर स्कूल के आठों कमरे में ताला जड़ा मिलता है.
स्कूलों के प्रभारी शिक्षकों अर्थात इंचार्ज हेडमास्टरों की ब्लॉक मुख्यालय में बैठक का आयोजित होना, हमसे इसकी वजह बताई गई. मगर बाक़ी के शिक्षक?
हमारी टीम की मुलाक़ात, 'एक बच्ची पढ़ गई, सात पीढ़ी तर गई, और, बेटा पढ़ाना फ़र्ज़ है, बेटी में क्या हर्ज है.' जैसे सुंदर नारों से ज़रूर हुई.
चार अगस्त की ही सुबह हम परवलपुर ब्लॉक के करनबिगहा मध्य विद्यालय पहुंचे थे, साढ़े नौ बजे के आसपास, मगर स्कूल तब तक बंद ही था.
बिहार में स्कूल का समय सुबह नौ से दोपहर बाद चार बजे तक का है.
साल 2004 में स्थापित करनबिगहा स्कूल में हाल तक पांचवीं क्लास तक की पढ़ाई होती थी, अब उसे आठवीं तक कर दिया गया है. लेकिन स्कूल में एक छोटे कमरे को मिलाकर कुल चार कमरे हैं.
गांव का आंगनबाड़ी केंद्र भी स्कूल भवन के ही एक कमरे में है.

"एक कमरे में एक से पांच तक कि क्लास चलती है"
साल 2003 में शिक्षा मित्र के तौर पर बहाल हुईं कौशल्या कुमारी, वो अपना नाम इसी तरह लिखती हैं, प्रभारी हेडमास्टर की ज़िम्मेदारी भी निभाती हैं.
कौशल्या कहती हैं, "हमें एक ही कमरे में कई क्लास के छात्रों को बैठाना होता है, एक कमरे में एक से पांच तक कि क्लास चलती है, दूसरे में छह से आठ तक की. बहुत दिक्क़त होती है. बच्चे जब अधिक हो जाते हैं तो कुछ को दरी पर बरामदे में बैठाते हैं."
जिस कमरे में छठी से आठवीं के बच्चे साथ-साथ बैठते हैं, उसमें एक क्लास के छात्रों को बेंच पर एक साथ बैठा दिया जाता है. एक दो बेंच छोड़ सातवीं के छात्र बैठे हैं, वहीं दूसरी तरफ़ आठवीं के बच्चों की पढ़ाई जारी रखने की कोशिशें हो रही हैं.
शिक्षिका मोनिका सिन्हा कहती हैं, "हम चाहकर भी ब्लैक बोर्ड पर नहीं पढ़ा पाते हैं. क्योंकि अगर हम सातवीं कक्षा के बच्चों को ब्लैक बोर्ड पर पढ़ाने लगते हैं तो दूसरे बच्चों को डिस्टर्ब होने लगता है, उनका ध्यान अपने विषय से हट जाता है और सब ब्लैक बोर्ड को ताकने लगते हैं."
एक ही कमरे में तीन क्लास ले रहे शिक्षकों और छात्रों को धीमे स्वर में बातचीत करनी होती है ताकि दूसरों का ध्यान न भटके.

यहां स्कूल में खाना बेहतर था
ख़ैर है कि स्कूल में फ़िलहाल शिक्षकों की कमी नहीं, और दस टीचर हैं, सिवाए अंग्रेज़ी और पीटी के.
स्कूल में हमारी मौजूदगी के क्रम में ही कुछ अभिवावक वहां पहुंच जाते हैं और स्कूल को लेकर अपनी राय देने लगते हैं.
जहां सकूना देवी का कहना है कि अगर सरकारी स्कूल में अच्छी पढ़ाई होती तो उन्हें अपने दोनों बच्चों को पास के प्राइवेट स्कूल में नहीं भेजना होता, जिसके लिए उन्हें पांच सौ रुपये हर माह देने होते हैं.
तो दूसरी ग्रामीण मनिता देवी, ग्रामीण के मुताबिक़ 'स्कूल में फागून से पढ़ाई बढ़िया हो गया है, नई मैडम आई हैं जो कड़ाई करती हैं', तो उन्होंने अपने बच्चों को एकेडमी से हटाकर फिर से यहां भेजना शुरू कर दिया है.

हैंडपंप की दूसरी ओर बने कमरे में गोरकी देवी और दो अन्य सहायिका बच्चों के लिए मिड-डे मील की तैयारी कर रही हैं. आज भात-दाल और परवल आलू की सब्ज़ी दिन के खाने में परोसी जाएगी.
दूसरे स्कूलों में भी बच्चों को समय पर, और बेहतर खाना परोसा जाता दिखा.
स्कूलों में पुराने भवनों की जगह नए भवन तैयार खड़े दिखे, हालांकि कम कमरों में ज़्यादा क्लासेज़, शिक्षकों का अभाव और दूसरी सुविधाएं जैसे कई विद्यालयों में शौचालयों की कमी की समस्या पूरी तरह समाप्त हो गई हो, ऐसा नहीं.

करनबिगहा विद्यालय जहां कमरों की कमी से जूझ रहा वहीं दो मंज़िला आठ कमरों वाले पलीच प्राथमिक विद्यालय के मात्र दो कमरों में ही क्लास चल रही है.
बार-बार ख़ाली कमरों की वजह पूछने पर शिक्षिका मंजू कुमारी झिझकते हुए बताती हैं कि लोग कहते हैं कि मध्य विद्यालय यहां बननेवाला था लेकिन वो करनबिगहा के कुछ नेताओं के चलते वहां चला गया, यहां ऐसे ही रह गया.
स्कूल कहां बनेगा इसको लेकर एक ओर जहां आजतक पॉलिटिक्स जारी है, वहीं सरकारी नीतियां जैसे खातेदारों के अकाउंट में सीधे मनी ट्रांसफर जैसी स्कीम्स कई अड़चनें पैदा कर रही हैं.
पैसे खाते में आने के बाद अभिवावक पहले ज़रूरत की दूसरी चीज़ें ख़रीद लेते हैं, शिक्षकों का कहना है कि किताब या स्कूल यूनिफ़ॉर्म बहुत सारे माता-पिता के लिए आख़िरी नंबर पर आता है, लेकिन किताब-कॉपियों की ग़ैर-मौजूदगी में पढ़ाई और मुश्किल हो जाती है क्योंकि बच्चे घर से कुछ भी पढ़कर नहीं आते.

हक़ों के लिए अदालतों के दरवाज़े खटखटाने पड़े
रूदा प्राथमिक स्कूल के शिक्षक सुबोध कुमार सुमन कहते हैं कि स्कूलों में शिक्षकों की कमी तब और बढ़ जाती है जब टीचर्स को दूसरे सरकारी कामों में लगा दिया जाता है.
"वर्तमान समय की बात करें तो शिक्षक से पढ़ाने के अलावा सभी काम करवाया जाता है. जनगणना करना उसका काम है, ब्लॉक स्तर का कोई काम हो, कोई भी सरकारी योजना हो वो शिक्षक से होकर ही गुज़रेगी. अभी जातीय जनगणना होनेवाली है उसमें छह माह के लिए हमें लगा दिया जाएगा, बच्चों की पढ़ाई हो न हो, सत्र छूट जाए कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता." वो थोड़े नाराज़गी भरे लहजे में अपने स्कूल के एक कमरे में बैठे हमसे कहते हैं.
हाल के दिनों में बहाल हुए स्कूली शिक्षकों को वेतन और दूसरी सुविधाओं को लेकर भी शिकायतें हैं. सरकार के नए नियम के अनुसार जो नियोजित शिक्षक हैं, यानी एक तरह का कॉन्ट्रैक्ट, उनकी तनख़्वाह सरकारी स्कूलों में पूर्व में, साल 2010 से पहले, बहाल शिक्षकों की तुलना में बहुत कम है.
कई हक़ों के लिए शिक्षकों को अदालतों का दरवाज़ा खटखटाना पड़ा है, इनके चलते हड़ताल भी हुई हैं.
टीईटी-एसटीईटी उत्तीर्ण नियोजक शिक्षक संघ के प्रवक्ता अश्विनी पांडेय दावा करते हैं कि महिला शिक्षिकाओं के लिए मैटरनिटी लीव तक उन्हें लड़कर लेना पड़ा, उन्हें ग्रेच्युटी नहीं मिलती है, पीएफ़ तक के लिए अदालत से लड़ने के बाद ही सरकार राज़ी हुई.
जदयू के सीनियर नेता और बिहार के पूर्व शिक्षा मंत्री विजय कुमार चौधरी कहते हैं कि शिक्षकों की नियुक्ति और समान काम, समान वेतन जैसे मामलों पर देश की सबसे ऊंची अदालत ने अपना अंतिम फ़ैसला दे दिया है और कहा है कि वो शिक्षक जिस रूप में पुराने टीचर्स को मिलनेवाले वेतन से समानता की बात कर रहे हैं वो उनपर लागू नहीं होता क्योंकि पुराने सरकारी शिक्षकों और नियोजित शिक्षकों की श्रेणी अलग-अलग है.

विजय कुमार चौधरी हालांकि शिक्षकों की कमी की बात स्वीकार करते हैं और कहते हैं कि जल्द ही सवा लाख टीचर्स की बहाली का काम शुरू होने जा रहा है.
बावजूद इसके बिहार में बनी नई सरकार, ख़ासतौर पर उप-मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव से शिक्षकों को बड़ी उम्मीदें हैं क्योंकि शिक्षकों के मसले पर वो समान काम, समान वेतन की बात कह चुके हैं.
शिक्षकों का कहना है कि शिक्षकों की मांगों को नए तौर पर देखा जाना चाहिए, और अगर ज़रूरत पड़ी तो वो फिर से सड़क पर उतरने को तैयार हैं.
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