बेंगलुरु से एक सप्ताह में ओडिशा 'पैदल लौटने' वाले कालाहांडी के 3 मज़दूरों की कहानी

प्रवासी मज़दूर

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    • Author, संदीप साहू
    • पदनाम, भुवनेश्वर (ओडिशा) से, बीबीसी हिंदी के लिए

काम की तलाश में बेंगलुरु गए ओडिशा के तीन मज़दूर अपने मालिक के शोषण से तंग आकर पैदल ही तकरीबन 1300 किलोमीटर की दूरी तय कर पिछले रविवार अपने गांव पहुंचे हैं.

इन तीनों के दावे के मुताबिक़, एक एजेंट ने कालाहांडी के कुल 12 लोगों को काम दिलाने का वादा किया. झांसा देकर बेंगलुरु ले गया, लेकिन ये पीड़ित उस एजेंट के बारे में इससे ज़्यादा जानकारी नहीं दे पा रहे हैं.

कालाहांडी के जयपाटना ब्लॉक के एक गांव के रहनेवाले इन तीन मज़दूरों ने (बुदू मांझी, कातारु मांझी और भिकारी मांझी ) 26 मार्च (रविवार) को बेंगलुरु से चलना शुरू किया. पूरे एक हफ्ते बाद पिछले रविवार को यानी 2 अप्रैल को अपने गांव पहुंचे.

इन आठ दिनों में उन्होंने लगभग 1300 किलोमीटर की दूरी तय की, यानी हर रोज़ 160 किलोमीटर से भी ज़्यादा.

इस ख़बर के सामने आने के बाद यह सवाल उठ रहा है कि उन्होंने ये दूरी पैदल कैसे तय की होगी?

दरअसल पैदल चलते हुए बीच में कभी किसी ट्रक चालक ने तो कभी किसी बाइक वाले ने उन्हें लिफ्ट भी दी.

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क्यों वापस लौटना पड़ा?

तीनों का कहना है कि उनके मालिक ने उन्हें उनकी मज़दूरी नहीं दी. और तो और पैसे मांगने पर उन्हें मारा- पीटा जिस वजह से इन लोगों ने गांव वापस लौटने का फ़ैसला लिया.

बीबीसी के साथ फ़ोन पर बातचीत करते हुए बुदू माझी ने कहा, "दो महीने पहले हम लोग काम करने बेंगलुरु गए थे. वहां हमें खाना तो मिल जाता था, लेकिन मेहनताना नहीं मिलता. पैसे मांगने पर मालिक ने हमें पीटना शुरू कर दिया. उसी वक्त हमने तय किया कि हम गांव वापस चले जाएंगे. चूंकि हमारे पास टिकट के पैसे नहीं थे, इसलिए हम पैदल ही निकल पड़े."

बुदू के अनुसार, पहले कुछ दिन तक ठेकेदार उन्हें ख़र्चे के लिए हर हफ़्ते 100 रुपये दिया करता था.

उन्होंने बताया, "लेकिन इतने में गुज़ारा करना मुश्किल था. हमें साबुन, तेल और रोज़मर्रा के बाक़ी सारे समान खरीदना पड़ता था. इसलिए हमने ठेकेदार से यह रकम बढ़ाने की गुजारिश की. इसके बाद हमें हर सप्ताह 200 रुपए मिलने लगे. लेकिन लगभग एक महीना पहले यह रकम मिलनी भी बंद हो गई. हमारा वहां जीना दूभर हो गया. हमें एहसास हुआ कि हमारे साथ धोखा हुआ है और हमने गांव वापस जाने का फ़ैसला किया."

अगर उनका शोषण हो रहा था और उनसे मारपीट की जाती थी तो उनके साथ गए बाक़ी लोग क्यों वापस नहीं आए? इस सवाल के जवाब में बुदू का कहना था, "वे लोग किसी अन्य स्थान पर काम कर रहे हैं. बेंगलुरु पहुंचने के बाद हम अलग हो गए. हम तीनों को एक बिल्डिंग के निर्माण के काम पर लगा दिया गया. फिर उनसे हमारा कोई संपर्क नहीं हुआ."

रास्ते में कुछ लोगों ने उनपर तरस खाकर उन्हें थोड़ा बहुत जो भी खाने को दिया, उसी से गुज़ारा करते हुए तीनों आगे बढ़ते रहे.

बुदू ने कहा, "हम केवल दो बोतलों में पानी लेकर बेंगलुरु से चले थे. एक जगह हमें एक चाय की दुकान वाले ने चाय और एक केक दिया. इसी तरह जहां जो मिला उसी से हमने गुज़ारा किया. लेकिन कई बार ऐसा भी हुआ कि पूरा दिन हमें खाने को कुछ भी नहीं मिला."

बीच बीच में इन तीन मज़दूरों को कुछ दूर तक ट्रक या दूसरी गाड़ी में लिफ्ट मिल गया. लेकिन सफ़र का बड़ा हिस्सा उन्होंने पैदल ही तय किया.

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कैसे पहुंचे अपने गांव?

ओडिशा की सीमा में प्रवेश करने के बाद कोरापुट के पट्टांगी में कुछ लोगों की नज़र थकान और भूख से निढाल इन मज़दूरों पर पड़ी और उन्होंने इन तीनों को खाना खिलाया, कुछ पैसे दिए और गाड़ी में बैठा दिया.

ओडिशा मोटरिस्ट एसोसिएशन पट्टांगी शाखा के अध्यक्ष भगवान पड़ाल ने कहा, "हमारे एसोसिएशन के एक सदस्य ने मुझे फ़ोन पर इन तीनों के बारे में सूचना दी. फिर हमने दूसरे सदस्यों को बुलाया, इन तीनों से मिला, उनके खाने का बंदोबस्त किया, उनके हाथ में कुछ पैसे दिए और उन्हें पापड़ाहांडी जानेवाली गाड़ी पर बैठा दिया."

नवरंगपुर के पापड़ाहांडी से ये तीन श्रमिक पैदल चलकर रविवार की शाम अपने अपने गांव पहुंचे.

इनमें से बुदू पहले भी लॉकडाउन के दौरान काम करने के लिए एक बार ओडिशा से बाहर जा चुके थे. वो बाक़ी दोनों के मुकाबले बाहर की दुनिया के बारे में थोड़ा अधिक जानते थे.

लेकिन बुदू को भी मालूम नहीं था कि बेंगलुरु से ओडिशा आने वाला रास्ता कहां कहां से होकर गुज़रता है. तो अपनी बुद्धि से उन्होंने उसका एक अनोखा हल ढूंढ निकाला. वे रेलवे लाइन के बगल में चलने लगे थे.

बुदू कहते हैं, "पूरा दिन हम चला करते थे और जहां रात हुई वहीं विश्राम कर लेते थे. कभी किसी की दया हुई तो कुछ खाने को मिल जाता था. वरना भूखे पेट पानी पीकर ही सो जाते थे. चलते चलते पावों में छाले पड़ गए. लेकिन हम लोगों के पास चलते रहने के अलावा कोई चारा नहीं था."

ये अनपढ़ आदिवासी ये भी नहीं जानते कि वे बेंगलुरु में कहां और किस कंपनी में काम रहे थे. यहां तक कि उन्हें बेंगलुरु ले जानेवाले एजेंट का नाम भी पता नहीं है. वे बस इतना ही बता पा रहे हैं कि जनवरी के महीने में वे ज़िले के अन्य नौ लोगों के साथ बेंगलुरु गए थे.

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घर की दयनीय हालत

इन तीनों की अनुपस्थिति में उनके घरवालों को काफी कष्ट झेलना पड़ा. भिकारी की पत्नी कहती हैं, "मैं जंगल से 'करड़ी' और 'कुलेर' साग लाया करती थी. सरकार से मिले पांच किलो चावल के साथ उसी में गुज़ारा करती थी. हमने सोचा था कि ये जब वापस आएंगे तो कुछ पैसे लेकर आएंगे. लेकिन वह भी नहीं मिला. पता नहीं आगे कैसे गुज़ारा होगा?"

आश्चर्य कि बात है कि स्थानीय सरपंच के पास भी इनके बेंगलुरु जाने के बारे में कोई ख़बर नहीं थी. सरपंच भगवती नायक ने फ़ोन पर कहा, "ये लोग नियम के अनुसार रजिस्ट्रेशन नहीं करवाते, जिसके कारण हमें कई बार इनके बाहर जाने के बारे में कोई ख़बर नहीं होती."

अपने इस दर्दनाक अनुभव के बाद जामचुआ गांव के भिकारी कहते हैं कि अब वे काम की तलाश में बाहर कभी नहीं जाएंगे.

"वैसे भी हम गांव छोड़कर बाहर जाना नहीं चाहते थे. लेकिन यहां कोई काम नहीं मिलता, जिसके कारण हमें मजबूरन बाहर जाना पड़ा. लेकिन अब और नहीं, चाहे हम मर भी जाएं."

हालांकि जयपाटना के बीडीओ स्निग्धाराणी प्रधान इस आरोप का खंडन करते हैं कि मज़दूरों को इलाके में काम नहीं मिलता है.

उन्होंने बीबीसी से कहा, "हमारे इलाके में काम की कमी नहीं है. नरेगा के तहत चेक डैम का काम है, अमृत सरोवर का काम है. जंगल विभाग में भी कई तरह के काम हैं. लेकिन ये लोग अधिक पैसे की लालच में काम करने बाहर चले जाते हैं और कई बार शोषण का शिकार हो जाते हैं. दलाल उन्हें 350 रुपए प्रतिदिन देने का वायदा करते हैं, जबकि नरेगा में उन्हें 238 रुपए प्रतिदिन मिलते हैं. इनके यहां काम न करने का एक कारण यह भी है कि उन्हें उनकी मज़दूरी थोड़ी देर से मिलती है."

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क्या कहते हैं कलेक्टर?

कालाहांडी के कलेक्टर पी. अन्वेषा रेड्डी ने बीबीसी से फ़ोन पर कहा कि उन्होंने स्थानीय बीडीओ से शोषण का शिकार हुए लोगों की गांव में जाकर इस संदर्भ में जांच कर एक रिपोर्ट देने को कहा है. उन्होंने यह भी कहा, "उनकी रिपोर्ट मिलने की बाद हम उनके लिए कुछ मदद के लिए सरकार से आग्रह करेंगे."

पीड़ितों के गांव में पहुंचने वाले पहले पत्रकार शेषदेव बेहेरा कहते हैं कि अन्य राज्यों में काम के लिए गए श्रमिकों के उत्पीड़न की घटनाएं इतनी आम बात बन गई है कि ऐसी घटनाओं से कोई फर्क़ नहीं पड़ता.

लंबे समय से ओड़िशा के नंबर एक अख़बार "संबाद" के किए काम कर रहे बेहेरा कहते हैं, "ये तीनों तो किस्मत वाले हैं कि वे ज़िंदा वापस आ गए. कई लोग तो लाश बनकर ही वापस आते हैं. लेकिन प्रशासन के कानों में जूं तक नहीं रेंगती. प्रशासन कहता है कि इनके लिए पर्याप्त काम है. लेकिन होता असल में यह है कि ठेकेदार मज़दूरों को लगाकर काम करने के बजाय मशीन से काम करवाते हैं. इसलिए अकुशल मज़दूरों को यहां काम नहीं मिलता और सारे ख़तरों के बावजूद वे बाहर जाने के लिए मजबूर हो जाते हैं."

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